Sunday, July 24, 2016

निवेदन

हे प्रियतमǃ तुम आये
मन के मोती खनखनाये।
कौन कहता हैǃ
शंकर ने कामदेव को जला दिया,
तुम सशरीर मेरे पास हो।


मेरी जीवनरूपी आकांक्षा की चरम परिणति,
जन्मों की संचित अभिलाषा का मूर्त रूप,
मेरे आंगन के फूलों के माली।
इस तुच्छ जीवन के,
इस तुच्छ क्षण को,
तुम्हारी स्मृतियों ने जीवन्त कर दिया।
मुझे लगा तुम पास हो,
आहǃ मैं धन्य हो गई।


हे प्रियतमǃ तुम्हारी स्मृति धन्य है,
तुम कैसे होगेǃ
शायद मेरी याद तुम्हें न आये,
मैं सह लूंगी–तुम मेरे पास न आओ।
पर इक अभिलाषा है–
मेरा वो क्षण मुझे दे देना,
‘मेरी अन्तिम सांस तुम्हारी हो जाये।‘

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