Thursday, August 4, 2016

ठूंठ

त्याग दिये पत्ते क्यों, हे तरूǃ
हारे बाजी जीवन की।
क्यों उजाड़ते हो धरती को,
हरते शोभा उपवन की।
हुए अचानक क्यों तुम निष्ठुर,
बहुत सुना तेरा गुणगान,
पर उपकारी, बहु गुणकारी,
तरू धरती का पुत्र महान।
सोच लिया क्या करूं पलायन,
देख विकट इस जग की मार,
छाेड़ चले ‘तरू बन्धु‘, ‘धरा मां‘,
‘पिता व्योम‘ का अनुपम प्यार।
धैर्य, अचलता और उदारता,
बिखर गये तेेरे आदर्श।
पश्चाताप नहीं थोड़ा भी,
कर तो लेते जरा विमर्श।
शायद, असली रूप यही है,
पार्थǃ देख लो ‘माधव‘ का,
ढोंग नहीं आता है, जिसको
‘ठूंठ‘ नाम उस मानव का।

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