Friday, September 30, 2016

पंचायत से

पंचों
मानसून की दुल्हन के जाने का समय आ गया है। अपने घर से कहीं भी दूसरी जगह जाना थोड़ा बुरा तो लगता ही है सो विदाई के गम में बिचारी इस वक्त आंसू बहा रही  है– झरझर झरझर। फिर भी जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि हमारी गीता मइया ने बहुत पहले ही कह रखा है कि जो आया है उसको जाना भी पड़ेगा। जिस समय यह मायके आयी थी,बड़ी ही खुराफात दिखाई।  क्या–क्या नहीं किया– फसलों को बरबाद करने से लेकर घर गिराने तक। किसी के खेतों को बहा ले गयी तो किसी के घर में ही घुस गयी। लेकिन अब तो इसका मन भी ठण्डा हो गया है क्योंकि सारी अपनी वाली तो इसने कर ली। अब ससुराल जो जाना है। अब समय बदल गया है क्योंकि समय तो सबका बदलता है। इसकी जुल्फों के लहराने से चलती हवा इसके आंसुओं की ठण्डक लेकर आ रही है।  इसके रोने की आवाज में जो तड़प है वो मन में हौल पैदा करती  है। जब यह पलकें झपकाती है तो वो बिजली चमकती है कि किसी निर्जीव में भी जान आ जाय।

Friday, September 2, 2016

पंचायत से

पंचों,

चारों तरफ बाढ़ आयी है। सुनते हैं कि सब कुछ बहा गया। घर दुआर,आदमी,गाइ–भंइस,गाड़ी–बस वगैरा वगैरा। और तो और टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश में एगो जेसीबियो बहा गया। पहाड़ पर तो मानो आफते आ गयी है। सब औकात में आ गये। पर पंचों,हम तो ठहरे बांगर के आदमी। अपने यहां दू चार गो चिंउटा–चिंउटी,कीरा–बिच्छी,मूस–मुसरी बहाते तो हमने भी देखा है पर इतना कुछ बहाते हमने नहीं देखा था। उधर बिहार में तो लालू जी ने एकदम सच्ची बात कह दी। गंगा मइया खुश हैं सो चौके तक में आ गयीं। अहोभाग्य बिहार के लोगों का। पर अपनी तो किस्मते खराब है। दू–चार बीघा धान रोपे हैं उ भी सूख रहा है। हे गंगा मइया,हमसे का गलती हो गयी। मत आती हमारे चौके तक,खेत में ही आ जाती। अपने बच्चों में ऐसा भेद क्यों करती हो। बनारस में सारे घाटों को बराबर कर दिया। ना कोई छोटा ना कोई बड़ा। सबका महत्व बराबर। पर क्या कहें इस बुरबक पब्लिक को,बात का बतंगड़ बना देती है। बरखा होती है तो कहती है कि भगवान बरस रहे हैं और गंगा मइया दुआरे पर आईं हैं तो कहती है कि बाढ़ आ गयी।

हरिद्वार और आस–पास

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28 मई की शाम को थके होने के कारण अगले दिन के लिए हम कोई प्रोग्राम तय नहीं कर पाये। अभी हमारे पास चार दिन थे क्योंकि हमारा वापसी का रिजर्वेशन 1 जून को था और घूमने के स्थान भी दिमाग में कई थे–हरिद्वार,ऋषिकेश,मंसा देवी–चण्डी देवी,राजाजी नेशनल पार्क इत्यादि। अगले दिन रविवार था,अतः भीड–भाड़ वाली बात भी दिमाग में थी क्योंकि शनिवार और रविवार किसी भी पर्यटन स्थल के लिए वीकेण्ड मनाने का दिन होता है। 28 मई की शाम को हरिद्वार में ही खाने के बाद मैंने सबको वापस कमरे पर भेज दिया और स्वयं आइसक्रीम पैक कराने लगा और इसी समय बहुत तेज अांधी–पानी आया  जिसमें मैं घिर गया और घण्टे भर बाद ही कमरे पहुंच सका। इस आंधी–पानी का असर अगले दिन देखने को मिला। बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो गयी।