Sunday, December 11, 2016

नैनीताल

सच में,नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत होǃ
नैनीताल से वापसी के समय ट्रेन में बगल की सीट पर एक खूबसूरत नवयुगल यात्रा कर रहा था। मेरी नजर बार–बार उधर गयी तो उनकी नजरें भी मेरी तरफ आने लगीं। और जब कई बार ऐसा हुआ तो मैंने नजरें हटाना ही बेहतर समझा। अन्त में हार मानकर मैंने खिड़की से बाहर नजरें टिका लीं और मन को सांत्वना दिया–
‘सच में नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत हो और तुम से अच्छा तो यहां कोई नहीं।‘
मेरे मन की यह भावना काफी हद तक वास्तविक होती अगर नैनीताल की वास्तविकता को वास्तविक ही रहने दिया गया होता।
सुन्दरता क्या श्रृंगार के आडम्बर में ही छ्पिी होती हैǃ
मेरे मन को तो प्रकृति की सुन्दरता ही सुन्दर लगती है। काट–छांट कर बनाये गये रूप तो पेट–भरे के बाद खायी जाने वाली मिठाई की तरह से ही लगते हैं। मनुष्य पत्थर को भी काट कर,एक रूप देकर सुन्दर बना देता है परन्तु प्रकृति की अनगढ़ सुन्दरता के क्या कहने। इसी अनगढ़ सुन्दरता की खोज में हम कहां–कहां नहीं भटकते फिरते हैं अन्यथा स्वनिर्मित रचनाओं को कौन बुरा कहता है। अपनी दही को कौन ग्वालिन खट्टी कहती है।