Friday, August 11, 2017

डलहौजी–बारिश में भीगा एक दिन

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21 जून
डलहौजी हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में स्थित है। इसे 1854 में एक हिल स्टेशन के रूप में स्थापित किया गया। तत्कालीन वायसराय लार्ड डलहौजी के नाम पर इसका नाम रखा गया था। उस समय अंग्रेज अधिकारी व सैनिक अपनी छुटि्टयां बिताने यहाँ आया करते थे। डलहौजी की समुद्रतल से आैसत ऊँचाई 1970 मीटर या 6460 फीट है। डलहौजी एक बहुत ही छोटा सा कस्बा है जिसकी कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 7000 है और इस वजह से यहाँ लोगों का शाेर कम ही सुनाई देता है। पर्यटन के लिहाज से यह हिमाचल प्रदेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है और इसलिए आज हमने डलहौजी और आस–पास घूमने का प्लान बनाया था।
कल बीस जून को हम खज्जियार गये थे। खज्जियार के अपने रूप–रंग के अलावा बारिश ने भी कई रंग दिखाये। खज्जियार के कई सारे रूप एक ही दिन में देखने को मिल गये। शाम को आने के बाद हम डलहौजी और उसके आस पास घूमने के लिए एक गाड़ी बुक करने के फेर में थे। होटल वाले के माध्यम से बात भी हो गयी। हम निश्चिन्त होकर सो गये। अगले दिन डलहौजी घूमने के सपने लेकर। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही निर्धारित कर रखा था।

Friday, August 4, 2017

खज्जियार–मिनी स्विट्जरलैण्ड

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20 जून
डलहौजी के आस–पास देखने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन घूमने के लिहाज से अच्छा यही रहता है कि दूर वाला पहले घूम लें नजदीक वाला बाद में। इसलिए आज मिनी स्विट्जरलैण्ड के नाम से विख्यात खज्जियार की ओर निकल पड़े। खज्जियार जाने के लिए भी समस्या। अगर रिजर्व साधन से जाना चाहते हैं तो स्थानीय ट्रैवेल एजेण्ट लूटमार करने पर उतारू हैं। डलहौजी से खज्जियार की दूरी 22 किमी है। खज्जियार और दो–तीन और रास्ते में पड़ने वाली छोटी–छोटी जगहों को मिलाकर 2500 रूपये का पैकेज तैयार कर दिया गया है। अब अगर निगल सकते हैं तो निगलिए। 

Friday, July 28, 2017

वाराणसी से डलहौजी

मई की भीषण गर्मी में मध्य प्रदेश के पथरीले इलाके की एेसी सैर की कि किसी ठण्डी जगह जाना जरूरी महसूस होने लगा। तो जून के महीने में शरीर को ठण्ड का एहसास दिलाने  के लिए हिमाचल प्रदेश की वादियों में डलहौजी की ओर निकल पड़े। हमेशा की तरह मैं और मेरी चिरसंगिनी संगीता। सबसे पहली लड़ाई– घर से बनारस की। आधा दिन तो इसी में निकल जाता है और इसके बाद कहीं वास्तविक युद्ध शुरू हो पाता है। बनारस से जम्मू–कश्मीर या हिमाचल प्रदेश के उत्तरी भागों की तरफ जाने के लिए सबसे अच्छी ट्रेन है– बेगमपुरा एक्सप्रेस। हमने भी इसी को चुना था।
बनारस से 12.50 पर पठानकोट के लिए ट्रेन थी इसलिए सुबह की इण्टरसिटी एक्सप्रेस से घर से बनारस के लिए निकल पड़े। हिन्दुस्तान की ट्रेन है। कब लेट हो जाय और कब समय से पहुंच जाय,कहा नहीं जा सकता। बनारस अन्य कामों से आना–जाना पड़ता है तो इसी ट्रेन की सेवा लेता हूँ और यह कभी अपने निर्धारित समय पर नहीं पहुँचती। आज हमको 12.50 पर पठानकोट के लिए ट्रेन पकड़नी थी तो हमारी बनारस वाली गाड़ी 9 बजे तक बनारस में हाजिर हो चुकी थी। अब प्लेटफार्म की सेवा लम्बे समय तक लेनी पड़ेगी। इन्तजार किया गया। बेगमपुरा एक्सप्रेस 12 बजे तक प्लेटफार्म पर आ लगी। छोटा प्लेटफार्म,लम्बी गाड़ी। धूप तो लगेगी ही। अब ठण्डी जगह जा रहे हैं तो इतनी तो धूप सहन कर ही सकते हैं।

Friday, July 21, 2017

ग्वालियर का किला

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28 मई
आज हमारी इस यात्रा का आखिरी दिन था और आज का कार्यक्रम था ग्वालियर का किला। कल जब हम ग्वालियर पहुँचे और आटो से इधर–उधर भाग–दौड़ कर रहे थे तो कई जगह से ग्वालियर के किले की बाहरी दीवारों की एक झलक दिखाई पड़ी। काफी रोमांचक लगा। आज हम बिल्कुल पास से इसे देखने जा रहे थे। अपने होटल के पास से ही हमने आटो पकड़ी और आधे घण्टे के अन्दर 15–20 रूपये में किले के गेट तक पहुँच गये। बाहरी गेट के पास से किला बहुत साधारण सा लग रहा था लेकिन असली दृश्य अभी सामने आना बाकी था। किले के दो गेट हैं– पूर्व की ओर ग्वालियर गेट है जहाँ हम पहुँचे थे। यहाँ से आगे पैदल ही जाना पड़ता है। पश्चिम की ओर उरवाई गेट है जहाँ वाहन से पहुँचा जा सकता है। किले के आस–पास किले के अन्दर घुमाने के लिए लगभग 400 रूपये के खर्च में गाड़ियाँ उपलब्ध हैं लेकिन मोलभाव जरूरी है। ये सभी गाड़ियां पश्चिमी गेट से किले में प्रवेश करती हैं। हाँ,अगर 8–10 किमी पैदल चलने की इच्छा व क्षमता हो तो पैदल भी घूमा जा सकता है।

Friday, July 14, 2017

ग्वालियर–जयविलास पैलेस

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26 मई की रात को दिल्ली जाने वाली भोपाल एक्सप्रेस समय से चली और ऐसे ही समय से चलती रहती तो भोर में 2.55 बजे यह ग्वालियर पहुँच गयी होती। लेकिन रात में सोते समय पता नहीं कब बहुत भीषण आँधी आयी और रेलवे के तार वगैरह टूट गये और इसकी मरम्मत होने में ट्रेन 4 घण्टे लेट हो गयी। ग्वालियर पहुँचने में 7 बज गये। वैसे इससे हम लोगों का समय के अतिरिक्त अौर कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ। ग्वालियर पहुँच कर भी वैसा ही हुआ जैसा कि हर जगह होता है। हम लोग स्टेशन से बाहर प्लेटफार्म नं0 1 की ओर बाहर निकले और आटो वालों की शरण में पड़े। दरअसल मैं ग्वालियर रेलवे स्टेशन के पास न ठहरकर किले के पास ठहरना चाह रहा था क्योंकि स्टेशन से किला काफी दूर (लगभग 3 किमी) है। ग्वालियर का किला देखने की मुझे बड़ी इच्छा थी। आटो वाले से बात करके किले की तरफ गये लेकिन वहां कोई ढंग का होटल ही नहीं मिला। वहाँ हजीरा चौराहे के आस–पास इक्के–दुक्के होटल ही थे। एक गली में एक होटल दिखा भी तो उसके अगल–बगल देसी और विदेशी शराब की अनेकों दुकानें दिखाई दे रही थीं। कई बार दरवाजा भड़भड़ाने के बाद भी होटल का कोई स्टाफ चेहरा दिखाने के लिए बाहर नहीं निकला। रात की आँधी की वजह से छोटी–मोटी दुकानें व टिन–शेड वगैरह उखड़े पड़े थे। उसी आटो से हम फिर उल्टे पाँव स्टेशन के पास आ गये।

Friday, July 7, 2017

भोपाल–राजा भोज के शहर में

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24 मई को दिन में भोजपुर मन्दिर और भीमबेटका की गुफाएं देखने के बाद शाम के 7 बजे तक हम कमरे पर थे। अब समय आराम करने का था क्योंकि दिन में बहुत धूप लगी थी लेकिन हमारी किस्मत में आराम कहाँǃ नीरज के मन में एक कीड़ा कुलबुलाने लगा। महाकालेश्वर दर्शन की इच्छा जगी। मैंने भी आधे मन से सहमति दे दी। आज रात की ही योजना बन गई। खाना खाकर रात के 9 बजे निकल पड़े भोपाल के आई.एस.बी.टी. स्टेशन के लिए। हमारे मित्र सुरेन्द्र गुप्ता ने बताया था कि उज्जैन के लिए रात के दस बजे तक आराम से बसें मिल जाती हैं। टाउनशिप के सामने से हमने लोकल बस पकड़ी। भोपाल होशंगाबाद रोड पर स्थित औद्योगिक क्षेत्र मण्डीदीप से भोपाल के लिए लोकल बसें चलती हैं। हम ऐसी ही एक बस में चढ़े थे। अब लोकल बस में बैठे हैं और अन्जान जगह है तो बार–बार सिर उचकाकर बाहर देखना तो पड़ेगा ही कि कहाँ तक पहुँचे हैं। लाख सावधानी के बाद भी बस वाले ने आई.एस.बी.टी. बस स्टेशन से 200 मीटर पहले ही हबीबगंज रेलवे स्टेशन के पास उतार दिया। पैदल चलते हुए बस स्टेशन पहुँचे तो पता लगा कि अभी उज्जैन के लिए कोई बस नहीं। नीरज ने दृढ़ संकल्प किया कि वापस नहीं जायेंगे। स्टेशन परिसर में स्थित एक–दो अन्य आॅपरेटरों से भी सम्पर्क किया तो नतीजा वही निकला। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में पुरानी राज्य परिवहन निगम वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है और यह सेवा अब निजी हाथों में है। वैसे यह निजी सेवा भी पूरी तरह संगठित और समयबद्ध तरीके से संचालित होती है। अलग–अलग निजी संचालक निर्धारित समय पर अपनी बसें चलाते हैं।

Friday, June 30, 2017

भीमबेटका–पूर्वजों की निशानी

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भोजपुर मन्दिर से उसी दिन अर्थात् 24 मई को वापस होकर कमरे पहुँचने तक दोपहर के एक बज चुके थे। हमारे मित्र सुरेन्द्र का आग्रह था कि आराम करो लेकिन–
"राम काज कीन्हें बिना मोहिं कहाँ विश्राम।"
और यहाँ राम ने भेज दिया है कि जाओ भ्रमण करो। तो फिर पेट व बोतलों को पानी से भरकर लगभग आधे घण्टे बाद ही मित्र की स्कूटी उठाई और निकल पड़े उस स्थान की ओर जहाँ हजारों–हजार साल पहले हमारे पूर्वज हमारे लिए कुछ छोड़ गये थे और जिसे पाने की उत्कण्ठा लिए इस मई के महीने में आग उगलते सूरज और तपते पथरीले धरातल के बीच रेगिस्तान के मृग की भाँति हम भाग रहे थे।
यह जगह थी– भीमबेटका। जी हाँ,ये वही जगह है जहाँ आज से दस हजार साल से भी अधिक पहले विन्ध्य पर्वत की गुफाओं में निवास करने वाले दो हाथ और दो पैरों वाले इस जीव ने गेहूँ पर गुलाब की विजय की उद्घोषणा की और अपने हाथों और उंगलियों की कला को पत्थर के कैनवास पर उतार दिया और वो भी इस तरह से कि हम आज भी उसे अपना बताकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
दोपहर के लगभग डेढ़ बजे किसी प्राचीन भारतीय तपस्वी की भाँति पंचाग्नि तापते हुए हम भोपाल–होशंगाबाद मार्ग पर स्थित भीमबेटका की ओर चल पड़े। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका की भोपाल से दूरी 46 किमी है लेकिन हम जहाँ ठहरे थे वहाँ से यह दूरी घटकर 28 किमी ही रह गयी थी। रास्ते में मण्डीदीप नामक एक स्थान पड़ता है। वर्तमान में यह औद्योगिक क्षेत्र है। इस मण्डीदीप के बारे में भी एक कहानी है।

Friday, June 23, 2017

भोजपुर मन्दिर–एक महान कृति

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24 मई
अपने भोपाल निवासी मित्र सुरेन्द्र गुप्ता से किये गये वादे के मुताबिक आज हमें होटल छोड़कर उनके घर शिफ्ट हो जाना था। इसलिए सुबह उठकर जल्दी से तैयारी में लग गये। नहा–धोकर बाहर निकले और एक दुकान पर छः रूपये वाली चाय पी। बहुत अच्छी लगी क्योंकि दस रूपये से नीचे की तो चाय मिल ही नहीं रही थी। अब मित्र के घर पहुँचने के लिए वाहन की जरूरत थी। चाय वाले से पूछा तो उसने लोकल बस पकड़ने के लिए ऐसा रास्ता बताया जो समझ में ही नहीं आया। चूंकि हमें शहर से बाहर काफी दूरी पर बसी एक टाउनशिप में जाना था और ठीक–ठीक रास्ता पता नहीं था इसलिए मन के उहापोह को खत्म करने के लिए हमने एक आटो वाले से बात की। वह 200 रूपये में तैयार हो गया। हमने पिट्ठू और घसीटू दोनों बैग आटो में लादे और चल पड़े। अभी आटो वाला एकाध किलोमीटर ही चला होगा कि उसने अपनी आटो अपने ही किसी भाई के बगल में खड़ी कर दी। उससे रास्ता पूछने लगा। वो बोला कि यह तो बहुत दूर है और यहां का किराया 300 से कम नहीं लगेगा। अब हमारा आटो वाला अपनी बात से मुकरने लगा। हम बुरे फँसे। किसी तरह उसी दूसरे आटो वाले को कह–सुन कर तैयार किया गया और आगे बढ़े। पता चला कि यह टाउनशिप भोपाल शहर से 20–22 किमी दूर है। अच्छा किया कि आटो पकड़ लिया अन्यथा बस के फेर में मारे–मारे फिरे होते। वास्तव में जबतक रास्ते का सही पता न हो किसी बड़े शहर की लोकल बस में बोरिया–बिस्तर के साथ यात्रा न ही की जाय तो अच्छा। वैसे भोपाल शहर की लोकल बस सर्विस अन्य किसी समकक्ष शहर की व्यवस्था की तुलना में काफी उच्च स्तर की है।

Friday, June 16, 2017

सांची–महानता की गौरव गाथा

मंजिल की तरफ चलता हूँ तो कोई न कोई साथी मिल ही जाता है और मजरूह सुल्तानपुरी की वो पंक्तियां याद आ जाती हैं–
"मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल,मगर लोग साथ आते गये,कारवां बनता गया।"
वैसे तो यात्रा करना या घूमना मुझे अच्छा लगता है लेकिन बिल्कुल अकेले भी यात्रा करना कुछ जमता नहीं। अकेले यात्रा करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अपने मन मुताबिक घूमा जा सकता है लेकिन कम से कम एक साथी होने से यात्रा उबाऊ नहीं होती। तो इस बार यात्रा में मेरे साथी बने मेरे मित्र नीरज। नीरज की सलाह पर ही मध्य प्रदेश जाने का प्लान बना था। यात्रा का उद्देश्य था मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके आस–पास स्थित ऐतिहासिक धरोहरों सांची व भीमबेटका,जिनके चित्र हम किताबों में देखते और पढ़ते आये हैं,का खुली आंखों से दीदार करना एवं इससे अागे बढ़कर इतिहास प्रसिद्ध ग्वालियर के किले की दुर्जेयता का प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करना। यानी हम इतिहास की यात्रा पर थे। नहीं तो इतनी गर्मी में गर्म जगह पर कोई जाता है क्या?

Saturday, June 10, 2017

पंचायत से

पंचों,
इस समय खूब शादी विवाह हो रहा है। खूब गाजे–बाजे बज रहे हैं। धूम–धड़ाम हो रहा है। जमके लगन चल रही है। ऐसी ही एक लगन में एक दिन बुझावन मिल गये।
बोले– "क्यों सरपंच जी,आजकल तो खूब लगन का मौसम चल रहा है।"
हमने कहा– "हां भई लगन तो चल ही रही है लेकिन लगन का मौसम कैसा। मौसम तो तीने होते हैं– जाड़ा,गर्मी,बरसात। बचपन में मास्टर जी तो यही बताये थे।"
लेकिन बुझावन कहां मानने वाले थे। बोले– "नहीं भई,किसी टाइम पर काेई काम खूब जोर–शोर से होता है तो कहते हैं कि इस काम का मौसम आ गया है। तो लगन का भी मौसम चल रहा है इ तो मानना ही पड़ेगा।"
हमने समझाने की कोशिश की कि भइया अब इस उमर तक तो सुनते और पढ़ते आये हैं कि मौसम तीने होते हैं तो फिर ये चउथा मौसम कहां से आ खड़ा हुआ? हमारी सरकार भी तीने मौसम मानती है। बाकायदा इनके लिए मौसम विभाग बना हुआ है। इन मौसम के बारे में मौसम विभाग हर साल भविष्यवाणी करता है भले उ हर साल फेल हो जाय। इस साल भी विभाग वाले मानसून की भविष्यवाणी कर दिये हैं कि ई सामान्य रहेगा। भले ही सूखा पड़ जाय चाहे बाढ़ आ जाये।

Thursday, June 1, 2017

पंचायत से

पंचों,
सोनम गुप्ता फिर से बेवफा हो गईǃ
कल शाम को लोगों के झगड़ा झंझट फरियाने से थोड़ा टाइम मिला तो साेचे कि सड़क पर टहल लें लेकिन जइसे ही गांव से थोड़ा बहरे निकले तो बुझावन मिल गये। अब कहां का टहलना। बुझावन  की बुझौनी तो बूझनी ही पड़ेगी।
नजर पड़ते ही बुझावन ने गोला दाग दिया–
"का सरपंच बाबू,इ सोनम गुप्ता फिर से बेवफा हो गई का?"
हम जान बचाने की फिकर में थे सो बोले– "अरे का बुझावन,इ सब का बे सिर पैर की बात में पड़ते हो। हम तुम्हारी उल्टी बानी का मतलब नहीं समझते। कुछ दिन पहले भी ऐसा हल्ला मचा था और आज फिर तुम्हारे मुंह से सुनाई पड़ रहा है। किसी की भी औरत के बारे में बिना जाने–बूझे ऐसी–वैसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए।"
"नहीं सरपंच बाबू तुम खूब समझते हो। लेकिन आज तो हम भी फाइनले करके रहेंगे। लुगाई तुम्हारी हो या हमारी। ऐसी हरकत तो बर्दास से बाहर है। ऐसी लुगाई को तो तीन तलाक दे देना चाहिए। कुछ दिन पहिले भी इ खबर आई थी तो हम समझे थे कि लड़के सब हंसी मजाक कर रहे हैं लेकिन इस औरत ने पता नहीं अइसा क्या जादू कर दिया था कि पब्लिक सुसरी एक–एक रूपये को तरस गयी। बैंक से लेकर घर तक लाइन लग गई। लोगों को पइसे के लिए बैंक में जान गंवानी पड़ गई। शादी बियाह भी लोगों का एक्के रूपये में होने लगा। औरतों की जनम भर की कमाई मर्दों को पता चल गयी। हमको भी एक दिन बैंक का मैनेजर पइसा नहीं दे रहा था तो हम भी उससे लड़ गये। उ तो पुलिस वाले हमको पकड़ लिए नहीं तो लाठी से मार के उसका कपार फोर दिये होते भले ही तीन सौ दू का मुजरिम बन जाते। अउर आज फिर से यही सब सुनाई दे रहा है। तुम तो राजनीत वाले आदमी हो। तुम्हारा तो कामे पब्लिक को लड़ा–भिड़ा कर वोट बटोरना है। तुमको तो इ सब ठीके लगेगा।"

Thursday, May 25, 2017

दार्जिलिंग–वज्रपात का शहर

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16 अप्रैल–
दार्जिलिंग–
या वज्रपात का शहर।
लघु हिमालय में स्थित इस पहाड़ी क्षेत्र को अंग्रेजों ने एक हिल स्टेशन के रूप में स्थापित किया। यह स्थान उनके लिए शारीरिक सुख के लिहाज से अनुकूल था। साथ ही सिक्किम की ओर जाने वाले मार्ग में पड़ने वाला दार्जिलिंग सामरिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण था। इसी वजह से भारत के अन्य हिल स्टेशनों की तरह ही अंग्रेजों ने इसकी खोज की और इसे विकसित किया। ब्रिटिश ढाँचे में बनी इमारतें इसकी गवाह हैं। इन इमारतों के अलावा कुछ स्थानों केे नाम भी अंग्रेजों के प्रभाव को बखूबी बयां करते हैं। दार्जिलिंग से कलिम्पोंग की यात्रा में कुछ स्थानों के नाम हमें इस तरह मिले जैसे– सिक्स्थ माइल,टेन्थ माइल,इलेवेन्थ माइल (6th mile, 10th mile, 11th mile) जिनका मतलब हम समझ नहीं सके। काफी खोजबीन करने के बाद एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसने ये राज खोला। दरअसल उस समय ये स्थान आबादी विहीन थे लेकिन लम्बे रास्ते में सुविधाजनक पड़ावों के लिए कुछ खास चिह्न बनाना आवश्यक था। तो फिर उस समय के अंग्रेज प्रशासकों ने माइलस्टोन के नाम पर ही इन स्थानों के नाम रख दिये जो आजतक चले आ रहे हैं।

Thursday, May 18, 2017

कलिम्पोंग

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15 अप्रैल–
आज हम कलिम्पोंग जा रहे थे। जल्दी सो कर उठे और गरम पानी के लिए होटल के काउण्टर पर कई बार दौड़ लगाई फिर भी सात बजे पानी मिला। दार्जिलिंग से कलिम्पोंग की दूरी 54 किमी है और रास्ता पहाड़ी मोड़ों वाला। इसलिए हम सतर्क थे कि कहीं देर न हो जाए और हमें घूमने का समय न मिले। लगभग आठ बजे तक हम दार्जिलिंग के चौक बाजार बस स्टैण्ड पहुँच गये। टिकट बुक कराने काउण्टर पर गये तो पता लगा कि पहली गाड़ी निकल चुकी है और दूसरी गाड़ी में पीछे वाली सीट ही खाली है। अगली गाड़ी निकलने में लगभग 45 मिनट का समय लग सकता है। इसलिए पीछे वाली सीट से ही सन्तोष कर लिया। दार्जिलिंग से कलिम्पोंग का शेयर्ड गाड़ी का किराया 130 रूपये है। 8.15 तक हमारी गाड़ी कलिम्पोंग के लिए रवाना हो गयी। गाड़ी में कुल 10 लोगों में हमारी श्रेणी के या़त्री हम दो लाेग ही थे। हमारी श्रेणी का मतलब कलिम्पाेंग जाने और वहाँ घूमकर वापस आने वाले। अधिकांश तो वहाँ जाकर रूकने वाले ही थे और एक–दो लौटने वाले थे तो किसी खास प्रयोजन से कलिम्पोंग जा रहे थे। घूमने वाले हम ही थे।

Friday, May 12, 2017

दार्जिलिंग हिमालयन रेल का सफर

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14 अप्रैल
आज हम दार्जिलिंग हिमालयन रेल या ट्वाय ट्रेन का सफर करने वाले थे जिसके लिए हमने लगभग 15 दिन पूर्व ही टिकट बुक कर रखा था। चूँकि हमारी ट्रेन का टाइम 9.40 पर था अतः उसके पहले हमने दार्जिलिंग के कुछ लोकल साइटसीन का प्लान बनाया जिसके लिए हमने कल बुकिंग की थी। इसके अनुसार आज सुबह का प्लान था– 3 प्वाइंट टूर। इसमें सम्मिलित था टाइगर हिल पर सूर्योदय,बतासिया लूप तथा घूम मोनेस्ट्री। टाइगर हिल पर सूर्योदय देखने के लिए आवश्यक था कि वहाँ लगभग 5 बजे तक पहुँच जाया जाय। इसलिए सुबह उठने का टाइम 4 बजे का निर्धारित था। इसके पहले ही होटल के एक लड़के ने सभी जाने वाले पयर्टकों का दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया। हम भी नित्यक्रिया से निवृत्त हुए और 4.30 बजे तक हम गाड़ी के अन्दर थे। शेयर्ड गाड़ी में बीच वाली सीट में हम पहले से आकर बैठ गये थे इस डर से कि कहीं पीछे न बैठना पड़ जाय।

Saturday, May 6, 2017

मिरिक–प्रकृति की गोद में

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13 अप्रैल–
कल शाम तक हम दार्जिलिंग पहुँच चुके थे और दार्जिलिंग से साक्षात्कार हो चुका था। थके थे इसलिए जल्दी सो गये। दार्जिलिंग की सड़कों पर घूमने का प्लान तैयार नहीं हो पाया। इसलिए आज सीधे दार्जिलिंग से बाहर मिरिक की ओर निकल पड़े। मिरिक घूमने के लिए किसी विशेष प्लानिंग की जरूरत नहीं है। मिरिक जाने के लिए चौक बाजार बस स्टैण्ड जाना पड़ता है। या यूँ कहें कि चौक बाजार बस स्टैण्ड ही दार्जिलिंग से बाहर निकलने के लिए मुख्य द्वार है। यहां से लगभग सभी स्थानों के लिए छोटी बसें या शेयर्ड टाटा सूमो या इसी तरह की अन्य गाड़ियाँ उपलब्ध हैं। दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन से चौक बाजार बस स्टैण्ड की दूरी लगभग 1 किमी है। रास्ता अगर मालूम नहीं है तो पूछते–पूछते यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है। लगभग सीधा रास्ता है। सुबह के 7 बजे से ही यहां से गाड़ियाँ मिलनी शुरू हो जाती हैं। सीटों की बुकिंग के लिए छोटे–छोटे काउण्टर बने हुए हैं। काउण्टर से एडवान्स में टिकट बुक करा सकते हैं या फिर सड़क पर जा रही कोई गाड़ी जिस पर मिरिक की नेम प्लेट लगी हो,को हाथ के इशारे से रोककर सीधे भी उसमें सवार हो सकते हैं। जैसी आपकी मर्जी। दार्जिलिंग से मिरिक तक का शेयर्ड गाड़ी का किराया 100 रूपये है। इसमें कोई मोल–भाव नहीं। जो पहले से पूरी तरह से निर्धारित है तो है। अपनी निजी गाड़ी बुक करने का किराया लगभग 1500 रूपये के आस–पास है।

Monday, May 1, 2017

न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग की ओर

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12 अप्रैल
दोपहर के 12.25 बजे ट्रेन से उतरने के बाद न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर हमने दार्जिलिंग जाने के विकल्पों के बारे में पता किया। रिजर्व टैक्सी का किराया 2500 सुना तो पांव तले की जमीन खिसक गई। न्यू जलपाईगुड़ी से सिलीगुड़ी की दूरी लगभग 5 किमी है। इस दूरी को यदि 20 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब शेयर्ड आटो से तय कर लिया जाय तो फिर सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के लिए शेयर्ड टाटा सूमो गाड़ी आसानी से मिल जायेगी। लेकिन इस बात की जानकारी हमें नहीं थी। अभी हम इधर–उधर की सोच ही रहे थे कि एक मानवचालित रिक्शेवाले ने हमें कैप्चर कर लिया। उसने बताया कि मैं 50 रूपये में सिलीगुड़ी बस स्टैण्ड पहुंचा दूंगा और वहां से आपको बस मिल जायेगी। हमने सोचा ठीक ही है। अच्छे से मोल भाव किया और रिक्शे पर सवार होकर चल दिये। लेकिन न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही रिक्शे वाला प्राइवेट ट्रैवेल एजेन्सी वालों के सामने जा खड़ा हुआ और ट्रैवेल एजेन्सी वाले पीछे पड़ गये। हमने पूछा– "अरे भाई यहां कहां रोक दिएǃ"
रिक्शेवाले ने कहा– "यहां भी देख लीजिए फिर चलते हैं।"

Monday, April 24, 2017

बक्सर से न्यू जलपाईगुड़ी की रेल यात्रा

अप्रैल के प्रारम्भ से ही लू व गर्मी की शुरूआत लगभग हो जाती है और इस समय पहाड़ी इलाकों का मौसम बहुत ही सुहावना हो जाता है। भारत के बहुत सारे हिल स्टेशनों में से दार्जिलिंग भी एक है। मैंने भी दार्जिलिंग की खूबसूरती के किस्से सुन रखे थे तो अपना भी मन चल पड़ा एक दिन दार्जिलिंग की सैर पर। इस सफर में संगीता भी साथ थी। दार्जिलिंग का नजदीकी रेलवे स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी और नजदीकी बस स्टेशन सिलीगुड़ी है। तो न्यू जलपाईगुड़ी की ट्रेन पकड़ने के लिए हम बलिया से चल पड़े बिहार के एक रेलवे स्टेशन बक्सर के लिए। अप्रैल महीने की 11 तारीख और शरीर को झुलसाती गर्मी। पर मन में संतोष था कि जितने दिन दार्जिलिंग में रहेंगे उतने दिन तो कम से कम गर्मी से छुटकारा रहेगा।
इसी उमंग में हम शाम के लगभग 7 बजे तक बक्सर रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुके थे। हमारी ट्रेन थी 12506 अप नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस और इसका समय था 7.53 लेकिन इसकी लोकेशन के हिसाब से यह लगभग 4 घण्टे से अधिक लेट चल रही थी। फिर भी स्टेशन तो समय से पहुंचना था,सो पहुंच गये। अब जब ट्रेन की लेटलतीफी हमारी बर्थ की ही तरह कनर्न्म हो चुकी थी तो हमने स्टेशन के प्रतीक्षालय में ही चादर बिछाई और लोट गये। क्या पता स्लीपर की बोगी में कितनी भीड़ होǃ उससे तो शायद यहां कम ही थी।

Sunday, April 9, 2017

रामनगर और चुनार

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सारनाथ घूमने के अगले दिन रामनगर और चुनार के किले देखने का प्लान बनाया। रामनगर तो गंगा उस पार बनारस से सटे हुए ही है लेकिन वाराणसी से चुनार की दूरी लगभग 45 किमी है। चुनार जाने के लिए पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हैं। वाराणसी सरकारी बस स्टैण्ड से विंध्याचल जाने वाली बसें चुनार होकर ही जाती हैं। इसके अतिरिक्त आटो रिक्शा के भी दो रूट हैं। वाराणसी कैण्ट से राजघाट पुल पार कर पड़ाव के लिए आटाे जाती है। पड़ाव से चुनार के लिए आटो मिल जाती है। इसके अतिरिक्त लंका या बी.एच.यू. से गंगा उस पार चुनार जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाती हैं। इस समय उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव 2017 का माहौल चल रहा था और रैलियों वगैरह की वजह से बसें व्यस्त थीं अतः मुझे आटो वाला विकल्प ही बेहतर लगा। तो फिर पकड़ ली एक आटो रिक्शा और चल पड़े। वाराणसी से रामनगर की दूरी लगभग 15 किमी है।

Wednesday, March 29, 2017

वाराणसी दर्शन–सारनाथ


धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी वाराणसी से लगभग 9 किमी दूर उत्तर–पूर्व में स्थित सारनाथ भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित चार प्रमुख स्थानों– कपिलवस्तु, बोधगया, सारनाथ तथा कुशीनगर में से एक है। कपिलवस्तु में उनका जन्म हुआ, बोधगया में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, सारनाथ में उन्होंने अपने शिष्यों को पहला उपदेश प्रदान किया जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है तथा कुशीनगर में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।
सारनाथ से ही बौद्ध धर्म के प्रचार–प्रसार का आरम्भ माना जाता है। सारनाथ में बुद्ध ने अपना पहला उपदेश 533 ई0 पूर्व में दिया था और उसके बाद से कई सौ सालों तक सारनाथ के इतिहास के बारे में कुछ विशेष पता नहीं चलता है। पुनः मौर्य सम्राट अशोक के काल में विभिन्न स्तूपों एवं बौद्ध मठों का निर्माण हुआ जिसकी वजह से आज का सारनाथ प्रसिद्ध है और जिसे देखने तमाम देशी और विदेशी पर्यटक यहां खिंचे चले आते हैं। अशोक के उत्तराधिकारियों के काल में सारनाथ का महत्व कम हो गया। वैसे सारनाथ के इतिहास में गुप्तकाल सबसे गौरवपूर्ण समय रहा। इसके बाद के काल में न जाने कितनी बार सारनाथ का उत्थान और पतन हुआ होगा लेकिन मेरे लिए सारनाथ का इतना ही इतिहास–ज्ञान काफी था और एक दिन अचानक ही बिना किसी पूर्व निर्णय के मैं वाराणसी जा धमका और वहां से सारनाथ।

Tuesday, March 21, 2017

कोणार्क और चन्द्रभागा

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चौथा दिन–
आज हमारा पुरी में चौथा और अन्तिम दिन था। आज हम कोणार्क जा रहे थे। कोणार्क पुरी जिले में ही पड़ता है। कोणार्क जाने के लिए पुरी से पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हैं। गुण्डीचा मन्दिर के पास स्थित बस स्टैण्ड से कोणार्क जाने के लिए आसानी से बसें मिल जाती हैं जिनका किराया 30 रूपये है। पैकेज के रूप में कोणार्क का टूर प्राइवेट बस आपरेटरों द्वारा भुवनेश्वर के साथ ही कराया जाता है जिसमें काफी भागमभाग व जल्दबाजी होती है। छोटे रिजर्व साधन के रूप में 3 से 4 सीट वाला आटो रिक्शा आसानी से उपलब्ध हैं। बिना मोलभाव वाला किराया है 700 रूपया जिसमें कुछ न कुछ गुंजाइश रहती ही है। पुरी से कोणार्क की दूरी 35 किमी है जिसे बस से तय करने में एक घण्टे से भी कम का समय लगता है।

Monday, March 13, 2017

चिल्का झील

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तीसरा दिन–
आज पुरी में हमारा तीसरा दिन था। आज हमने चिल्का झील जाने का प्लान बनाया था। चिल्का झील जाने के लिए पुरी से बस आपरेटर सप्ताह में तीन दिन– सोमवार,बुधवार और शुक्रवार को टूर आयोजित करते हैं। इसमें प्रति सीट किराया 220 रूपये है। बस के अतिरिक्त आटो या चारपहिया गाड़ी भी चिल्का झील के लिए बुक की जा सकती है परन्तु इनका किराया बहुत महंगा है। बस वाला विकल्प सर्वोत्तम है। अतः हमने बस में दो सीटें एक दिन पहले ही बुक कर ली थीं। चिल्का झील के लिए पर्यटकों की भीड़ भी सम्भवतः कम ही होती है क्योंकि जिस बस में हम बैठे थे वह एक तिहाई से ज्यादा खाली थी।
सुबह के 6.30 बजे हम चक्रतीर्थ रोड स्थित स्टैण्ड पर पहुंच गये परन्तु बस चली 7.30 बजे। इस टूर प्लान में झील के अतिरिक्त एक मन्दिर अलारनाथ का दर्शन भी शामिल था। पुरी से चिल्का झील के किनारे स्थित सतपदा नामक स्थान लगभग 50 किमी है जहां हमें पहुंचना था। लेकिन हमारा पहला पड़ाव अलारनाथ मन्दिर था जो पुरी से 20 किमी दूर है। वैसे तो इस तरह के टूर में जबरदस्ती एक मन्दिर को घुसाना कुछ जमता नहीं लेकिन लेकिन मर्जी बस वालों की। चिल्का झील पहुंचने के लिए इसके अलावा और कोई दूसरा आसान विकल्प उपलब्ध नहीं है।

Wednesday, March 8, 2017

भुवनेश्वर

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दूसरा दिन–
आज पुरी में हमारा दूसरा दिन था और आज हम भुवनेश्वर जाने वाले थे। जैसा कि मैं पिछले भाग में भी उल्लेख कर चुका हूं कि भले ही यह जनवरी का अन्तिम सप्ताह था लेकिन पुरी में ठंड का कोई असर नहीं था। हां,कही–कहीं कुहरा दिख रहा था। पुरी से भुवनेश्वर की दूरी लगभग 65 किमी है। पुरी से भुवनेश्वर जाने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। पुरी का जगन्नाथ मन्दिर,कोणार्क जाने वाले जिस मुख्य सड़क मार्ग के किनारे स्थित है उसी सड़क मार्ग के किनारे,मन्दिर से लगभग 2.5 किमी दूर,गुण्डीचा मन्दिर के पास बस स्टैण्ड भी स्थित है जिसका आटो रिक्शा वाले मन्दिर के पास से 10 रूपया किराया लेते हैं। अगर मन्दिर के आस–पास आप ठहरे हैं तो आसानी से दस रूपये देकर इस बस स्टैण्ड तक पहुंच सकते हैं और कहीं और ठहरे हैं तो कुछ अधिक पैसे खर्च करने पड़ेंगे। इसे वैसे तो कोणार्क बस स्टैण्ड के नाम से ही जाना जाता है लेकिन से भुवनेश्वर जाने के लिए भी बसें यहां से मिल जाती है। वैसे भुवनेश्वर जाने के लिए एक दूसरा बस स्टैण्ड भी है।

Tuesday, February 28, 2017

पुरी

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समुद्र स्नान में 10.30 बज गये। वापस लौटे तो कमरे पर नहा–धोकर फ्रेश होने में 12 बज गये। अब चिन्ता थी पुरी के स्थानीय भ्रमण के लिए साधन खोजने की। चक्रतीर्थ रोड पर जगह–जगह आटो वाले खड़े–खड़े सवारियों का इन्तजार करते मिल रहे थे। कइयों से बात की तो पुरी के साधनों एवं उनके रेट का पता चला। पुरी में कहीं से भी कहीं जाने के लिए आटो मिल जायेंगे। इतना ही नहीं,जो दूरियां बसें एवं अन्य चारपहिया वाहन तय करते हैं,उनके लिए भी आटो उपलब्ध हैं। छोटे चारपहिया वाहनों का सिस्टम यहां बहुत कम है। सड़कें अच्छी हैं इसलिए आटो में भी कहीं जाने में कोई दिक्कत नहीं है। शहर के अन्दर लोकल दूरियों के लिए रिजर्व आटो रिक्शा का,50 रूपये से कम किराया सम्भवतः नहीं है। यह 70,80 या 100 रूपये से भी अधिक हो सकता है। मानव चालित रिक्शे भी उपलब्ध हैं जिनका रेट भी आटो रिक्शा वालों के लगभग बराबर है।

Wednesday, February 22, 2017

पुरी–समुद्री बीच पर

जय जगन्नाथǃ
यह उद्घोष जहां होता है वह है जगन्नाथ की नगरी– ‘पुरी‘ या जगन्नाथपुरी।
समुद्र के किनारे बसे इस छोटे से शहर में,यहां के निवासियों के साथ–साथ समुद्र भी निरन्तर जय जगन्नाथ का उद्घोष करता रहता है। प्राकृतिक और धार्मिक सुन्दरता से भरपूर इस शहर की यात्रा पर एक दिन हम भी निकल पड़े। हम यानी– मैं और मेरी साथी संगीता। जनवरी के अन्तिम सप्ताह में जबकि पूरा उत्तर भारत शीतलहरी के प्रकोप से कराह रहा होता है,भारत के पूर्वी हिस्से में बसे राज्य उड़ीसा की सांस्कृतिक राजधानी पुरी का मौसम बहुत ही सुहाना होता है।
ठण्ड से दो–दो हाथ करते हुए अपने शहर बलिया के एक छोटे से कस्बे से पुरी की ट्रेन पकड़ने के लिए हम मुगलसराय जंक्शन की ओर जनवरी के अन्तिम सप्ताह में ही निकल पड़े। मुगलसराय से हमारा रिजर्वेशन नंदनकानन एक्सप्रेस में था जो दिल्ली से पुरी तक जाती है। नई दिल्ली में इस ट्रेन का समय 6.25 बजे सुबह में है और वहां से यह समय से चली। मुगलसराय में इसका समय शाम 6 बजे है इसलिए हम इसके नियत समय से काफी पहले स्टेशन पर पहुंच चुके थे। लेकिन यह बेदर्द ट्रेन पहुंची रात के 12.15 बजे। और हम इसका इन्तजार करने में ही थक चुके थे।
खैर,ट्रेन आयी तो सवार हुए और अपनी–अपनी सीटों पर सो गये। एक सीट ऊपर की और दूसरी बीच वाली। कोई डिस्टर्बेंस नहीं,सोने का आनन्द लीजिए। सोने में ही सासाराम,डेहरी आन सोन,गया,कोडरमा,पारसनाथ स्टेशन गुजर गये। सुबह हुई तो सोते–सोते ही पता लगा कि गोमो जंक्शन आने वाला है जहां कि इस ट्रेन को रात बारह बजे के आस–पास होना चाहिए था। लेकिन यह लेट थी और हमें अब किसी तरह पहुंचना था सो सोते रहे। करें भी क्याǃ कुछ देर बाद उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त हुए और चाय पीकर फिर सोने की तैयारी करने लगे। थकान मिटाने के लिए सोना जरूरी है।

Tuesday, January 24, 2017

वाराणसी दर्शन–गंगा के घाट और गंगा आरती

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गोदौलिया बनारस का सबसे पुराना बाजार है। इसलिए भीड़ तो होगी ही। चौराहे पर लगा बोर्ड बता रहा था– काशी विश्वनाथ मन्दिर 500 मीटर और दशाश्वमेध घाट 700 मीटर। चौराहे से पैदल ही जाना है और यही उचित है क्योंकि बाजार और संकरी सड़कों की वजह से गाड़ियां ले जाना काफी समस्या पैदा करने वाला है। फिर भी स्थानीय लोग कहां मानने वाले हैं। रिक्शाें और माेटरसाइकिलों की भीड़ तो थी ही और पैदल की तो पूछना ही क्या।
उसी में बचते–बचाते,धक्के खाते चल दिये। रास्ते में काशी विश्वनाथ मन्दिर का सिंहद्वार दिखाई पड़ा। संगीता की इच्छा दर्शन करने की थी लेकिन अगर दर्शन की लाइन में लग जाते तो वहीं शाम हो जाती। मैं वैसे भी मन्दिरों का बहुत दर्शनाभिलाषी कभी भी नहीं रहा हूं। तो दर्शन का कार्यक्रम किसी तरह से टरकाया और टहलते हुए 2 बजे तक नदी किनारे पहुंचे।

Thursday, January 19, 2017

वाराणसी दर्शन–नया विश्वनाथ मन्दिर

भोले बाबा की नगरी–
वाराणसी
मां गंगा का नगर,भगवान बुद्ध का नगर,फक्कड़ों का नगर,पंडो–पुजारियों का नगर, मन्दिरों का नगर,घाटों का नगर,गलियों का नगर,अखाड़ों का नगर,सन्तों का नगर,औघड़ों का नगर ............
और भी पता नहीं कितने विशेषण जुड़े हैं इस शहर के साथ।
लेकिन वाराणसी या बनारस अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी जडें इतिहास में हैं जिन्हें खोजते हुए तमाम विदेशी और हम भारतीय भी इसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
तो हम भी एक दिन चल पड़े बनारस। जनवरी का पहला सप्ताह। कड़कड़ाती ठंड और कपड़ों काे भिगोता कुहरा। मौसम की बेवफाई और यात्रा का उत्साह। देखते हैं कौन बीस है और कौन उन्नीस।
तो हमने भी–हम यानी मैं और संगीता ने बस पकड़ी और अपने घर से लगभग 140 किमी दूर पहुंच गये घाटों के शहर वाराणसी में। बस इसलिए पकड़ी कि इस मौसम में ट्रेनों को उनका कंट्रोल रूम नहीं बल्कि कोहरा कंट्रोल करता है।

Tuesday, January 10, 2017

नैनीताल और आस–पास

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11 अक्टूबर को हमने नैनीताल के आस–पास के पर्यटन–स्थलों तक पहुंचने की सोची। कई विकल्प सामने थे– एक तो था भुवाली–रानीखेत–अल्मोड़ा,दूसरा था जिम कार्बेट तथा तीसरा था– लेक टूर यानी सातताल–भीमताल–नौकुचियाताल। समय अभी हमारे पास तीन दिन था क्योंकि हमारी वापसी 13 तारीख को थी। इसमें से एक दिन अभी हम नैनी झील के लिए रखना चाह रहे थे और आस–पास थोड़ा घूमना चाह रहे थे और जिम कार्बेट में 1 जून से 14 नवम्बर तक मानसून की वजह से प्रवेश नहीं होता,लेकिन ना–जानकारी की वजह से सही प्लानिंग नहीं हो पाई।
हमारे होटल में ठहरा हुआ एक और परिवार रानीखेत–अल्मोड़ा जाने की प्लानिंग कर रहा था और बोलेरो गाड़ी बुक कर रहा था लेकिन उसे 2500 का किराया महंगा पड़ रहा था सो उसने हमसे शेयर करने की बात की। हमने स्वीकार कर लिया। लेकिन ट्रेवल एजेन्सी वाला बात करने के बाद भी अत्यधिक भीड़ की वजह से गाड़ी उपलब्ध नहीं करा पाया। ऐसा दशहरे की छुट्टी की वजह से हुआ।

Tuesday, January 3, 2017

सातताल

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12 अक्टूबर को हम लेक टूर पर निकले। लेक टूर यानी नैनीताल के अास–पास स्थित झीलों का दर्शन। हमने एक छोटी गाड़ी 1500 रूपये किराये पर ले ली और निकल पड़े। सबसे पहले नैनीताल से लगभग 22 किमी दूर स्थित सातताल। कहते हैं कि सातताल सात छोटी–बड़ी झीलों का समूह है लेकिन यहां के ड्राइवर⁄ट्रैवल एजेण्ट या तो इसकी जानकारी नहीं देते या खुद नहीं जानते। एक और बात भी है और वो यह कि एक बड़ी झील के आस–पास एक–दो छोटी झीलें भी हैं जिनके बारे हर कोई नहीं जानता। बाहर से आने वाले पर्यटक के लिए ऐसी जगहों पर पहुंच पाना असंभव नहीं तो काफी मुश्किल है।
खैर,हमारा मक्सद तो हर उस छोटी–बड़ी जगह तक पहुंचना था जहां तक कि हम पहुंच सकते थे।
एक घण्टे में सातताल पहुंच गये। सातताल की सुन्दरता देखकर मन अभिभूत हो गया। वास्तव में सातताल  में उतनी भीड़–भाड़ और गन्दगी नहीं है। यहां दाे झीलें एक–दूसरे से जुड़ी हुईं हैं और दोनों के संगम पर पुल बना हुआ है। किनारे के दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि इसी में चार भाग हैं अर्थात सातताल की सात झीलों में से चार इसी में हैं और बाकी तीन और कहीं हैं। हमारा ड्राइवर,जो अपने को गाइड बता रहा था,को तो इतना भी नहीं पता था।

Monday, January 2, 2017

नैनीताल भ्रमण

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9 अक्टूबर को यानी नैनीताल पहुंचने के अगले दिन हमने स्नो व्यू प्वाइंट तक पैदल चलने का निश्चय किया और चल दिये। बिल्कुल सही रास्ता पता नहीं था अतः पूछते हुए चल दिये। एक दिन पहले टैक्सी से भी हम यहां पहुंच चुके थे लेकिन इन पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर टैक्सीवाला किधर से वहां पहुंचा,समझ में नहीं आया। वैसे बहुत ज्यादा पूछने की आवश्यकता भी नहीं थी। माल रोड पर ही चिड़ियाघर जाने के लिए छोटी गाड़ियों का स्टैण्ड है और वहीं से ऊपर चढ़ाई करते हुए एक सड़क गई है जिसपर कुछ दूर आगे जाने पर स्नो व्यू प्वाइंट जाने वाला रास्ता बायें कट जाता है और दाहिने का रास्ता चिड़ियाघर चला जाता है। सुबह के लगभग आठ बजे हम निकले और पैदल टहलते हुए 10.30 बजे तक अर्थात लगभग ढाई घंटे में ढाई किमी की दूरी तय कर ली। 
अब नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाला मुहावरा कैसे बना यह तो नहीं पता लेकिन शायद कोई ऐसा ही चलने वाला बहादुर रहा होगा जिसकी चाल पर यह मुहावरा बन गया।