Tuesday, January 10, 2017

नैनीताल और आस–पास

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11 अक्टूबर को हमने नैनीताल के आस–पास के पर्यटन–स्थलों तक पहुंचने की सोची। कई विकल्प सामने थे– एक तो था भुवाली–रानीखेत–अल्मोड़ा,दूसरा था जिम कार्बेट तथा तीसरा था– लेक टूर यानी सातताल–भीमताल–नौकुचियाताल। समय अभी हमारे पास तीन दिन था क्योंकि हमारी वापसी 13 तारीख को थी। इसमें से एक दिन अभी हम नैनी झील के लिए रखना चाह रहे थे और आस–पास थोड़ा घूमना चाह रहे थे और जिम कार्बेट में 1 जून से 14 नवम्बर तक मानसून की वजह से प्रवेश नहीं होता,लेकिन ना–जानकारी की वजह से सही प्लानिंग नहीं हो पाई।
हमारे होटल में ठहरा हुआ एक और परिवार रानीखेत–अल्मोड़ा जाने की प्लानिंग कर रहा था और बोलेरो गाड़ी बुक कर रहा था लेकिन उसे 2500 का किराया महंगा पड़ रहा था सो उसने हमसे शेयर करने की बात की। हमने स्वीकार कर लिया। लेकिन ट्रेवल एजेन्सी वाला बात करने के बाद भी अत्यधिक भीड़ की वजह से गाड़ी उपलब्ध नहीं करा पाया। ऐसा दशहरे की छुट्टी की वजह से हुआ।
इसके बाद हम नैनीताल सरकारी बस अड्डे पहुंचे लेकिन वहां पहुंचकर पता चला कि रानीखेत जाने वाली आखिरी बस 8 बजे सुबह ही निकल जाती है। पूछताछ काउण्टर पर बैठे व्यक्ति ने सलाह दी कि अगर आप यहां से मुक्तेश्वर जाने वाली बस पकड़कर भवाली चले जाते हैं तो वहां से हल्द्वानी–काठगोदाम से आकर रानीखेत जाने वाली बसें आपको मिल सकती हैं। हम अौर कहीं बीच में नहीं फंसना चाह रहे थे इसलिए प्राइवेट बस आपरेटरों के बारे में भी पता किया लेकिन असफल रहे। इसी आपा–धापी में 10.30 बज गये और हमने नैनीताल के बाहर जाने की योजना असफल घोषित कर दी।
अब दूसरे विकल्प तलाशे जाने लगे।

हमने पैदल चलने की सोची और र्इको केव गार्डन की ओर चल दिये। मल्लीताल से लगभग 1 या डेढ़ किमी दूर स्थित ईको केव गार्डन एक छाेटा सा पार्क है जिसमें जंगली जानवरों की कुछ गुफाएं बनी हैं जिन्हें टाइगर केव,पैन्थर केव,बैट केव,स्क्वेरिल केव,फ्लाइंग फाक्स केव और एप केव के नाम से जाना जाता है। यह पार्क पर्यटकों को पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली की एक झलक प्रदान करता है।
गुफाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं परन्तु कहीं–कहीं इतनी संकरी हैं कि रेंगकर पार करना पड़ता है। इस पार्क और इन गुफाओं में प्रवेश कर जाने के बाद लगता है कि हम कहीं गहरे घनघोर जंगल में घुस गये हैं और जंगली जानवरों की असली गुफाओं में प्रवेश कर गये हैं। गुफाओं के अन्दर बिजली के बल्ब लगाये गये हैं। कमजोर दिल वाले,अत्यधिक बुजुर्ग,बहुत छोटे बच्चे और बहुत भारी शरीर वाले व्यक्ति इसमें न ही प्रवेश करें तो अच्छा है।
केव गार्डन के गेट पर टिकट लेते समय टिकट काउन्टर पर बैठे व्यक्ति ने कहा था कि ‘सर,छः गुफाएं हैं जिसे देखकर ही आइएगा।‘ तो हम भी कहां पीछे रहने वाले थे। हम तो देखने के लिए ही गये थे। लेकिन सारी गुफाएं देखने के बाद यह एहसास भी हो गया कि गुफाएं तो चौपायों के लिए ही हैं क्योंकि गुफाओं में घुसने और निकलने में हमारी तो सांसें ही फूल गयीं।
गुफाओं से बाहर पार्क में एक संगीत की धुन पर चलने वाला फव्वारा भी है। पार्क के सबसे ऊंचे स्थान से नैनीताल शहर का बहुत ही सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। तो गुफाओं से निकलकर थकान मिटाने की व्यवस्था भी है। गुफा से बाहर आइए,कैण्टीन से बिस्कुट खरीदिए और किसी ऊंची जगह पर बनी कुर्सी पर बैठकर नैनीताल शहर का नजारा देखिए। हमने भी यही किया।
फिर भी, सब कुछ करने के बाद भी,अभी केवल 2.30 बजे थे अौर हमारे पास पर्याप्त समय था। सो निकल पड़े नैना देवी की शरण में और साथ ही मेले में। आज मेले का अाखिरी दिन था अतः रावण,कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतले खड़े किये जा रहे थे। बिजली की सजावट हुई थी। हमने भी खूब आनन्द लिया। मेले तो बहुत देखे थे लेकिन नैनीताल में पहली बार देख रहे थे और महत्व स्थान का होता है। रात के समय मेले का आनन्द ही कुछ और था। रात के समय नैना देवी के मन्दिर में शुद्ध देसी घी के हलवे का प्रसाद वितरण हो रहा था। प्रसाद खाकर मन प्रसन्न हो गया।
इन सबके साथ ही आज के दिन हमने एक और काम भी किया और वो था– नैनी झील की परिक्रमा। हमें लगा कि हमारी पूरी नैनीताल यात्रा का सबसे रोचक और रोमांटिक समय यही था। पूरी झील की परिक्रमा करने में लगभग 4 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। तो आइए आपको भी परिक्रमा कराते हैं। कहीं से भी शुरू कर सकते हैं। हां,समय शाम का हो तो सर्वोत्तम है। बस चलते जाइए,चलते जाइए। अगर आपने तल्लीताल बस स्टैण्ड से शुरू किया है तो माल रोड पकड़ लीजिए और आगे बढ़ते रहिए। शाम के समय माल रोड की रौनक ही कुछ अलग होती है। इस समय एक साइड पर गाड़ियों की आवाजाही बन्द हो जाती है यानी नो इन्ट्री। सड़क किनारे पर्यटकों के हिसाब से दुकानों की संख्या कुछ बढ़ जाती है। बिजली की रोशनी में सारा शहर जगमगा उठता है। चाहें तो कुछ खरीदारी भी कर सकते हैं या फिर नाश्ता भी कर सकते हैं।
ठीक,अब आप मल्लीताल के उत्तरी छोर पर आ पहुंचे हैं। अगर आप और आगे सीधे बढ़ते चले जाएंगे तो बड़ा बाजार शुरू हो जायेगा जो नैनीताल का बाजार और रिहायशी इलाका भी है। यहां रहने और खाने के लिहाज से माॅल रोड की तुलना में काफी सस्ते होटल मिल जाएंगे। पर अभी नहीं,अभी तो झील की परिक्रमा करनी है ,तो बायीं तरफ मुड़िए। एक छोटा सा पार्क आपका स्वागत करेगा। आगे नैना देवी का मन्दिर है। दर्शन करना है तो कर लीजिए और फिर आगे बढ़िए और बायें मुड़िए।
जी हांǃ ये ठंडी सड़क है। पता नहीं क्यों इसका नाम ठंडी सड़क है। इस पर इंट्री करते ही लगता हम शहर से बाहर कहीं दूर आ चुके हैं। मौसम भी कुछ ठंडा लगने लगता है। झील के इस तरफ पहाड़ी कुछ सीधी खड़ी है,पेड़ों से ढकी है। रिहायश वगैरह नहीं है। शहर का कोलाहल बिल्कुल शान्त है। लगता है किसी दूसरे शहर में आ गये हैं। सही भी है क्योंकि जब इधर से घूमकर मॉल की तरफ देखते हैं तो नैनीताल जगमगाता हुआ दूर बसे किसी शहर सा लगता है। ठण्डी सड़क पर भी दो छोटे–छोटे मन्दिर हैं। यानी भगवान के दर्शन से आप यहां भी वंचित नहीं हैं।
पहाड़ी के खड़े ढाल और घने पेडों की वजह से ठण्डी सड़क पर धूप की चहलकदमी बहुत ही कम या शायद नहीं ही हो पाती है। इस कारण ठण्ड कुछ अधिक ही महसूूस होती है। मौसम सुहाना लगता है। धीमी चाल से टहलते रहिए और झील की तरफ देखते रहिए। मन में रोमांस अपने आप पैदा हो जाएगा।
अब लग रहा है ठण्डी सड़क भी समाप्त होने को है। एक गेट लगा हुआ है जिससे केवल पैदल ही आर–पार जा सकते हैं। धीरे–धीरे शहर शुरू होने लगा है। कुछ सरकारी कार्यालय दिख रहे हैं और आबादी दिखने लगी है यानी कि फिर से नैनीताल आ गया। हमारी परिक्रमा पूरी होने को है। अब हम बायें मुड़ गये हैं और थोड़ी दूर ही चले हैं कि एक पुल मिला है जो झील के पानी के निकास के लिए है। जल्दी ही बस स्टैण्ड वाला चौराहा आ गया है और हमारी यात्रा पूरी हो गयी है और अब हम अपने कमरे जा सकते हैं।
12 अक्टूबर को हमने पहले से ही लेक टूर का कार्यक्रम तय कर रखा था। लेक टूर अर्थात सातताल,भीमताल और नौकुचियाताल का भ्रमण। इसका विवरण सातताल के नाम से अगले भाग में है।
13 अक्टूबर को रात में हमें ट्रेन पकड़नी थी,इसलिए हम कहीं दूर नहीं गये और नैनी झील में बोटिंग की गयी। इस दिन दशहरे की छुटि्टयां समाप्त हो चुकी थीं अतः भीड़ भी खत्म हो चुकी थी और इसका साफ असर महंगाई पर दिख रहा था। छुटि्टयों में जहां ट्रैवल एजेण्टों को खोजना पड़ रहा था वहीं आज वे खुद सिर पड़ रहे थे। लेकिन हम भी अब तक समझ चुके थे कि नैनीताल देखने के लिए हमें उनकी आवश्यकता नहीं थी।
नैनीताल के कुछ और स्थानों का भ्रमण बहुत ही रोमांचक है जैसे– नैना पीक या चीना पीक और डोरोथी सीट या टिफिन टाॅप।
नैना पीक या चीना पीक नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी है जिसकी समुद्रतल से ऊंचाई 8579 फुट है। यहां पहुंचने के लिए मल्लीताल या स्नो व्यू प्वाइंट से घोड़े किराये पर लिए जा सकते हैं। लेकिन असली मजा पैदल चढ़ाई में ही है। यह पहाड़ी हरे–भरे जंगलों से ढकी है जो इस पर ट्रैकिंग करने के आनन्द को कई गुना कर देता है। नैना पीक से हिमालय की बर्फीली चोटियों का नयनाभिराम दृश्य दिखाई देता है। नैना पीक पर चढ़ने के पहले कुछ खाना व पानी पैक कर लेना आवश्यक है क्योंकि ऊपर दुकानें नहीं है। नैना पीक की दूरी मल्लीताल से 5 किमी तथा नैनीताल बस स्टैण्ड से 7 किमी है।
टिफिन टाप या डोरोथी सीट दूसरी ट्रेकिंग करने लायक पहाड़ी है। इसकी समुद्रतल से ऊंचाई 7520 फुट है। यह अयारपट्टा की पहाड़ी चोटी पर स्थित है। इस चोटी से भी हिमालय के खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं। मल्लीताल से इसकी दूरी लगभग 4 किमी है। लवर्स प्वांइट या सुसाइड प्वाइंट से 700 रूपये में घोड़े मिलते हैं लेकिन प्रकृति का सौन्दर्य देखना हो तो पैदल जाना बेहतर है। अगर रास्ता पता हो तो ठीक नहीं तो पूछते हुए भी,मल्लीताल की आेर से भी इस पर जाया जा सकता है। सुसाइड प्वाइंट उन सात प्वाइंट में से एक है जिन्हें टैक्सी ड्राइवर 600 रूपये में दिखाते हैं। डोराेथी सीट से आस–पास के ग्रामीण क्षेत्रों एवं नैनीताल शहर का सम्पूर्ण दृश्य दिखाई देता है।
एक अंग्रेज महिला कलाकार डोरोथी केलेट की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद उसकी याद में उसके पति,जो सेना में एक अधिकारी था,के द्वारा इस चोटी का नाम दिया गया। इस चोटी के टिफिन टाप नाम के बारे में कहा जाता है कि दोपहर के समय यहां अपना लंच करने वाले लोगों के द्वारा इसका यह नाम दिया गया।

खैर,अब हमारी यात्रा समाप्ति की ओर थी। नैनीताल झील में बोटिेंग करते हुए शाम होने वाली थी। तो हम भी अपना माल–असबाब लेकर होटल वाले को धन्यवाद देते हुए सड़क पर निकल चुके थे। अब काठगोदाम के लिए टैक्सी पकड़नी थी। अभी हम कुछ ही कदम चले थे कि एक टैक्सी वाला चिल्लाते हुए पहुंचा और हम गाड़ी में अन्दर घुसे। एक और बुजुर्ग दम्पत्ति भी मिल गये और 4 लोगों के लिए 500 रूपये में गाड़ी बुक हो गयी। अगले सवा घण्टे में हम काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर थे।
हमारी ट्रेन हावड़ा–काठगोदाम,बाघ एक्सप्रेस रात में  9.55 पर थी और हम लगभग सात बजे पहुंच गये थे इसलिए काफी समय था। हम आराम से बाहर निकले और एक होटल में खाना खाया। यहां स्टेशन के आस–पास साधारण श्रेणी के ही होटल हैं जिनसे बहुत अच्छे भोजन की उम्मीद नहीं की जा सकती। उस पर हम ठहरे घास–पात खाने वाले शाकाहारी प्राणी। सो कई जगहों पर काफी छानबीन करने के बाद ही भोजन मिल पाता है। ट्रेन समय से चली और अगले दिन समय से ही अर्थात 1.35 पर देवरिया पहुंची। यहां से बलिया के लिए बस की सवारी की गयी और शाम तक यात्रा सकुशल सम्पन्न हुई।

दूसरे छोर से दिखता नैना देवी मन्दिर और नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी नैना पीक


नैनीताल बोट क्लब

नैनीताल बोट क्लब में नावों की मरम्मत

नैना देवी मन्दिर का प्रवेश द्वार

शाम को आरती

पूजा की तैयारी

बिजली की रोशनी से बनी मां नैना की आकृति


मन्दिर में बिजली की सजावट


नैनीताल का रात्रि उत्सव,ठण्डी सड़क की ओर से

मेले का दृश्य


नैना देवी मन्दिर से कुछ ही दूरी पर स्थित एक मस्जिद

केव गार्डन की गुफाएं




केव गार्डन से

केव गार्डन का फव्वारा

दूर से नैना देवी मन्दिर

नैनी झील के दक्षिणी छोर से 

सांध्य वेला में नावों का बादलों से विछोह



स्वच्छ जल में मछलियों का समूह नृत्य







ठण्डी सड़क के किनारे स्थित एक मन्दिर

हमारे नाविक भरत सिंह रावत

दूर दिखती नैना पीक


झील के उत्तरी छोर से मिलते हुए से दिखते दक्षिणी किनारे

पर्यटक प्रीतम के इन्तजार में



विदाई की वेलाःसंध्या



सम्बन्धित यात्रा विवरण–



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