Monday, January 2, 2017

नैनीताल भ्रमण

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9 अक्टूबर को यानी नैनीताल पहुंचने के अगले दिन हमने स्नो व्यू प्वाइंट तक पैदल चलने का निश्चय किया और चल दिये। बिल्कुल सही रास्ता पता नहीं था अतः पूछते हुए चल दिये। एक दिन पहले टैक्सी से भी हम यहां पहुंच चुके थे लेकिन इन पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर टैक्सीवाला किधर से वहां पहुंचा,समझ में नहीं आया। वैसे बहुत ज्यादा पूछने की आवश्यकता भी नहीं थी। माल रोड पर ही चिड़ियाघर जाने के लिए छोटी गाड़ियों का स्टैण्ड है और वहीं से ऊपर चढ़ाई करते हुए एक सड़क गई है जिसपर कुछ दूर आगे जाने पर स्नो व्यू प्वाइंट जाने वाला रास्ता बायें कट जाता है और दाहिने का रास्ता चिड़ियाघर चला जाता है। सुबह के लगभग आठ बजे हम निकले और पैदल टहलते हुए 10.30 बजे तक अर्थात लगभग ढाई घंटे में ढाई किमी की दूरी तय कर ली। 
अब नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाला मुहावरा कैसे बना यह तो नहीं पता लेकिन शायद कोई ऐसा ही चलने वाला बहादुर रहा होगा जिसकी चाल पर यह मुहावरा बन गया।
वैसे हमारा इस तरह चलना अन्यथा नहीं था। नैनीताल की समुद्र तल से ऊंचाई 6538 फीट है। और इस पर भी पहाड़ी चोटियों पर चढ़ना कोई आसान काम नहीं है। धीमे चलने का एक दूसरा पहलू भी है और वो यह कि  पहाड़ी और जंगली रास्ते का पूरा मजा लेते हुए चला जाय– खाने काे खूब चबा कर खाने पर ही पूरा स्वाद आता है। अतः पहाड़ पर चलिए,चारों तरफ देखते हुए चलिए।
फिर हम ठहरे मैदान के आदमी। यहां केवल चलने तो आये नहीं हैं। यहां के घर–आंगन,रहन–सहन,रास्ते–दुकान को भी तो थोड़ा देखते चलें। पहाड़ की ढलान यहां के जन–जीवन को किस तरह से प्रभावित करती है,यह कुछ छोटे–छोटे बच्चों को सड़क किनारे गेंद खेलते हुए देखकर पता चला। हमारे यहां किसी मैदान में गेंद को पैर से मार दें तो दूर तक सीधी चली जायेगी लेकिन यहांǃ पूछ्यिे मत। ढलान पर गेंद हाथ से छूटी और थोड़ा सा झटका लगा तो फिर पकड़ना मुश्किल। देखकर हंसी आ गयी।

यहां पहुंचने के लिए रोपवे भी उपलब्ध है जो भारत में स्थापित पहला हवाई रोपवे है। साथ ही घोड़े वाले भी हैं। लेकिन ये सब जल्दी–जल्दी काम निपटाने के साधन हैं।
स्नो व्यू प्वाइंट पर,ऊपर से हिमालय की बर्फीली चोटियों का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है और इसीलिए इसका नाम ही यही पड़ गया है। यह स्थान जिस श्रेणी की चोटी पर स्थित है उसे शेर का डांड़ा कहते हैं। ऊपर चाय–नाश्ते की कुछ छोटी–छोटी दुकानें हैं जहां आप समय भी बिता सकते हैं और मस्ती कर सकते हैं।
हिमालय की बर्फीली श्रेणियों को देखने के लिए आपकी किस्मत भी ठीक होनी चाहिए नहीं तो बादल पूरा खेल बिगाड़ सकते हैं और सारी मेहनत बेकार हो जायेगी। यहां एक छोटा सा मंदिर भी है जिसमें कई देवी–देवताओं के चित्र स्थापित किए गये हैं।
चोटी पर एक दूरबीन वाला 30 रूपये में बर्फीली चोटियों काे दिखा रहा था। हमने इससे परहेज किया और कैमरे के लेन्स को ही जूम करके इसका आनन्द ले लिया। चूंकि हमने अपना पूरा दिन इसी प्वाइंट के लिए रखा था इसलिए हम बहुत देर तक आस–पास टहलते रहे,चाय–काफी पी गई,नाश्ता किया और काफी फोटो भी खींचे। एक फोटोग्राफर महोदय भी मिल गये जिनकी सेवा ली। पहाड़ी ड्रेस में फोटो खिंचवाये। छोटे बच्चों के लिए एक पार्क भी यहां है। हम अभी ऑफ सीजन में नहीं गये थे और छुटि्टयां भी चल रहीं थीं। भीड़ काफी थी फिर भी दुकान वाले और फोटाग्राफर वगैरह एकदम पीछे पड़ जा रहे थे।
ऊंचाई से नीचे के दृश्य कुछ अजीब से दिखाई देते हैं। अतः ऐसी जगहों पर पहुंचकर जल्दबाजी मत कीजिए। नीचे के दृश्यों का आनन्द लीजिए। पता नहीं इतनी ऊंची छत पर चढ़ने का मौका मिले न मिले।
स्नो व्यू प्वाइंट से लौटकर हमने कुछ हिम्मत जुटाई और चिड़ियाघर जाने का निश्चय किया। यहां पर हमने अपने फोटोग्राफर से चिड़ियाघर जाने के लिए रास्ते के बारे में पूछताछ की। चूंकि वह एक स्थानीय निवासी था अतः उसने काफी जानकारी दी। पता चला कि स्नो व्यू से भी पैदल चिड़ियाघर जाया जा सकता है सो हम भी चल पड़े।
माल रोड के किनारे स्थित टैक्सी स्टैण्ड से चिड़ियाघर की दूरी लगभग 1.5 किमी तथा दोनों तरफ का किराया 40 रूपये है,इसलिये टैक्सी से जाना आसान है। लेकिन अपनी मर्जी से घूमना है तो पैदल चलना ज्यादा अच्छा है। हां,पहाड़ी चढ़ाई पर पैदल चलने में थोड़ा कष्ट तो होगा ही। नैनीताल बस स्टैण्ड से चिड़ियाघर की दूरी 1 किमी है। चूंकि हम नीचे से न जाकर ऊपर ही ऊपर जा रहे थे इसलिए हमारा रास्ता अलग था। लेकिन रास्ते की सही जानकारी न होने की वजह से थोड़ी दिक्कत झेलनी पड़ी।
पहले तो लगभग 1 किमी तक हमें ठीक–ठाक रास्ता मिलता गया लेकिन आगे जाकर सिर्फ पगडंडी मिली और पहाड़ी रास्ते व जंगल में चलने के मोह में हम चलते गये। ऊबड़–खाबड़ रास्ते पर लगभग 1.5 किमी चलने के बाद आखिरकार 3 बजे तक,लगभग दो घण्टे चलने के बाद हम पंडित गोविन्द वल्लभ पंत उच्चस्थलीय प्राणी उद्यान पहुंच ही गये। इस बीच मेरे और संगीता के बीच इस अनजाने रास्ते पर चलने को लेकर थोड़ी–बहुत किच–किच होती रही लेकिन पहाड़ी रास्ते का मजा भी जबरदस्त था।
यह चिड़ियाघर समुद्र सतह से 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह हिमालयन काले भालू सहित विभिन्न जानवरों जैसे बंदरों,साइबेरियन बाघ,तेंदुए,भेड़िये इत्यादि के लिए प्रसिद्ध है। यहां बाघ भी हमें काफी नजदीक से देखने को मिला। दो घण्टे तक इन जानवरों के बीच में हम घूमते रहे और फोटो खींचते रहे। पिंजरे में बन्द जानवरों के अलावा जू में पेड़–पौधों एवं झरनों को सजाकर कुछ बहुत ही सुन्दर दृश्य बनाये गये हैं जो देखने लायक हैं।
पहाड़ी ढलान पर स्थित होने के कारण चिड़ियाघर का सौन्दर्य अपने आप ही कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है और वो ये कि छोटी दूरियां चढ़ने में भी काफी मेहनत लग रही थी। चिड़ियाघर का टिकट 50 रूपये का है जो शाम पांच बजे तक के लिए वैध है। 5 बजे तक हम काफी थक चुके थे लेकिन यहां से निकलने की इच्छा नहीं हो रही थी। फिर भी 5 बजे के बाद होटल लौटे और गोभी और पनीर के पराठे का आर्डर दे दिया। जानकारी के लिए बता दें कि आलू के पराठे 30 रूपये के तथा गोभी के 60 रूपये के थे। पहाड़ों पर सब कुछ बहुत महंगा है।

10 अक्टूबर को कुछ अलग ही विचार बना। नैनीताल हम दशहरे के समय पहुंचे थे इसलिए सोचा कि नैनीताल का मेला भी देख लिया जाय। इसी के साथ नैना देवी का दर्शन भी कर लिया जायेगा। सुबह होटल में खाना खाने के बाद मेले में पहुंच गये। मल्लीताल के उत्तरी सिरे पर नैना देवी का मन्दिर है। वहीं बगल में बड़ा मैदान है जहां मेले के आयोजन और मेले की अस्थायी दुकानें लगने के साथ साथ खेल–कूद भी होते हैं। अभी सुबह का समय था इसलिए मेले में पूरी रौनक नहीं आयी थी इसलिए हम नैना देवी मन्दिर के पास तिब्बती मार्केट में चले गये।
तिब्बती मार्केट पर्यटकों के लिए बहुत ही अच्छा विकल्प है लेकिन सावधानी के साथ। इक्का–दुक्का दुकानें ही एक दाम की हैं जबकि अधिकांश दुकानों में भयंकर मोलभाव है। हमने भी बड़ी ही सावधानी के साथ चप्पलों वगैरह की थोड़ी–बहुत खरीदारी की। यहां एक ही छत के नीचे बहुत सारी वस्तुएं मिल जाती हैं लेकिन बहुत भीड़–भाड़ है। अगर खरीदारी नहीं करनी है तो कोई बात नहीं,तिब्बती मार्केट में देखने के पैसे नहीं लगते। इसलिए मार्केट के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमते रहिए और नजारे देखते रहिए। और जब थक जाएं तो नैना देवी मन्दिर की तरफ बाहर निकलिए और और किसी छोटे से रेस्टोरेन्ट में छोले–भटूरे या पराठों का आनन्द लीजिए और इससे भी मन न भरा तो स्टेडियम की तरफ,कार्नर की किसी दुकान से वाडीलाल या अमूल की आइस–क्रीम भी खा लीजिए।
तिब्बती मार्केट से निकलकर हम नैना देवी मंदिर की ओर चले। नैना देवी मंदिर प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मल्लीताल के उत्तरी छोर पर झील से सटे हुए अवस्थित है। मंदिर में नैना देवी के साथ गणेश जी तथा काली मां की मूर्ति भी स्थापित है। प्रवेश द्वार पर एक विशाल पीपल का पेड़ स्थित है। नवरात्र का अवसर होने की वजह से बहुत सुन्दर सजावट की गयी थी। मंदिर में हमने प्रसाद चढ़ाया और दर्शन किया तथा यह निश्चय करके बाहर निकले कि रात में बिजली की सजावट देखने यहां जरूर आएंगे। यहां मन्दिर की रेलिंग के पास खड़े होकर झील के साफ पानी में तैरती मछलियों को देखना,आध्यात्मिक आनन्द की अनूभूति कराता है।
मंदिर से बाहर निकलकर हम मेले की तरफ चले। मेले में भी बहुत सारी अस्थायी दुकानें लगीं थीं जिनमें पर्यटकों के लायक काफी कुछ था। अक्टूबर के पहले हफ्ते की वजह से हम गर्म कपड़े नहीं ले गये थे और इस कारण सुबह शाम हमें ठंड काफी परेशान कर रही थी। इसलिए काफी सस्ती कीमतों पर मैंने और संगीता ने एक–एक स्वेटर भी मेले में खरीद लिया।
मेले में नगर पालिका परिषद नैनीताल की तरफ से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन हेतु मंच बना हुआ था जिसमें स्कूली छात्र–छात्राओं द्वारा मनोहारी प्रस्तुतियां दी जा रहीं थीं। कुमाऊंनी गीतों के बोल भले ही समझ में नहीं आ रहे थे लेकिन इन गीतों की धुन पर किये जा रहे नृत्य में मन कहीं दूर खो जा रहा था।
पहाड़ मुझे काफी आकर्षित करते हैं और इस कारण वहां की संस्कृति में मुझे अपनापन सा महसूस होता है। वैसे भी जितनी सरलता और सहजता पहाड़ों के रहन–सहन,परम्पराओं और संस्कृति में है उतनी शायद ही कहीं और मिले। 

कुछ नजारे प्रस्तुत हैं–



स्नो व्यू प्वाइंट से
स्नो व्यू प्वाइंट की तरफ जाते समय एक रास्ते में स्थित एक तिब्बती मन्दिर के पास टंगी झण्डियां

बच्चों के पार्क में
चढ़ाई में थकान तो लगनी ही है

पहाड़ी ड्रेस में

स्नो व्यू प्वाइंट जाने वाला रोपवे
मेले में आयाेजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दृश्य









अब जरा चिड़ियाघर के साथियों से मिल लिया जाय
हिमालयन भालू

















ऐसा प्यार कहीं देखा हैǃ





अगला भागः सातताल

सम्बन्धित यात्रा विवरण–



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