Tuesday, February 28, 2017

पुरी

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समुद्र स्नान में 10.30 बज गये। वापस लौटे तो कमरे पर नहा–धोकर फ्रेश होने में 12 बज गये। अब चिन्ता थी पुरी के स्थानीय भ्रमण के लिए साधन खोजने की। चक्रतीर्थ रोड पर जगह–जगह आटो वाले खड़े–खड़े सवारियों का इन्तजार करते मिल रहे थे। कइयों से बात की तो पुरी के साधनों एवं उनके रेट का पता चला। पुरी में कहीं से भी कहीं जाने के लिए आटो मिल जायेंगे। इतना ही नहीं,जो दूरियां बसें एवं अन्य चारपहिया वाहन तय करते हैं,उनके लिए भी आटो उपलब्ध हैं। छोटे चारपहिया वाहनों का सिस्टम यहां बहुत कम है। सड़कें अच्छी हैं इसलिए आटो में भी कहीं जाने में कोई दिक्कत नहीं है। शहर के अन्दर लोकल दूरियों के लिए रिजर्व आटो रिक्शा का,50 रूपये से कम किराया सम्भवतः नहीं है। यह 70,80 या 100 रूपये से भी अधिक हो सकता है। मानव चालित रिक्शे भी उपलब्ध हैं जिनका रेट भी आटो रिक्शा वालों के लगभग बराबर है।

Wednesday, February 22, 2017

पुरी–समुद्री बीच पर

जय जगन्नाथǃ
यह उद्घोष जहां होता है वह है जगन्नाथ की नगरी– ‘पुरी‘ या जगन्नाथपुरी।
समुद्र के किनारे बसे इस छोटे से शहर में,यहां के निवासियों के साथ–साथ समुद्र भी निरन्तर जय जगन्नाथ का उद्घोष करता रहता है। प्राकृतिक और धार्मिक सुन्दरता से भरपूर इस शहर की यात्रा पर एक दिन हम भी निकल पड़े। हम यानी– मैं और मेरी साथी संगीता। जनवरी के अन्तिम सप्ताह में जबकि पूरा उत्तर भारत शीतलहरी के प्रकोप से कराह रहा होता है,भारत के पूर्वी हिस्से में बसे राज्य उड़ीसा की सांस्कृतिक राजधानी पुरी का मौसम बहुत ही सुहाना होता है।
ठण्ड से दो–दो हाथ करते हुए अपने शहर बलिया के एक छोटे से कस्बे से पुरी की ट्रेन पकड़ने के लिए हम मुगलसराय जंक्शन की ओर जनवरी के अन्तिम सप्ताह में ही निकल पड़े। मुगलसराय से हमारा रिजर्वेशन नंदनकानन एक्सप्रेस में था जो दिल्ली से पुरी तक जाती है। नई दिल्ली में इस ट्रेन का समय 6.25 बजे सुबह में है और वहां से यह समय से चली। मुगलसराय में इसका समय शाम 6 बजे है इसलिए हम इसके नियत समय से काफी पहले स्टेशन पर पहुंच चुके थे। लेकिन यह बेदर्द ट्रेन पहुंची रात के 12.15 बजे। और हम इसका इन्तजार करने में ही थक चुके थे।
खैर,ट्रेन आयी तो सवार हुए और अपनी–अपनी सीटों पर सो गये। एक सीट ऊपर की और दूसरी बीच वाली। कोई डिस्टर्बेंस नहीं,सोने का आनन्द लीजिए। सोने में ही सासाराम,डेहरी आन सोन,गया,कोडरमा,पारसनाथ स्टेशन गुजर गये। सुबह हुई तो सोते–सोते ही पता लगा कि गोमो जंक्शन आने वाला है जहां कि इस ट्रेन को रात बारह बजे के आस–पास होना चाहिए था। लेकिन यह लेट थी और हमें अब किसी तरह पहुंचना था सो सोते रहे। करें भी क्याǃ कुछ देर बाद उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त हुए और चाय पीकर फिर सोने की तैयारी करने लगे। थकान मिटाने के लिए सोना जरूरी है।