Friday, June 30, 2017

भीमबेटका–पूर्वजों की निशानी

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भोजपुर मन्दिर से उसी दिन अर्थात् 24 मई को वापस होकर कमरे पहुँचने तक दोपहर के एक बज चुके थे। हमारे मित्र सुरेन्द्र का आग्रह था कि आराम करो लेकिन–
"राम काज कीन्हें बिना मोहिं कहाँ विश्राम।"
और यहाँ राम ने भेज दिया है कि जाओ भ्रमण करो। तो फिर पेट व बोतलों को पानी से भरकर लगभग आधे घण्टे बाद ही मित्र की स्कूटी उठाई और निकल पड़े उस स्थान की ओर जहाँ हजारों–हजार साल पहले हमारे पूर्वज हमारे लिए कुछ छोड़ गये थे और जिसे पाने की उत्कण्ठा लिए इस मई के महीने में आग उगलते सूरज और तपते पथरीले धरातल के बीच रेगिस्तान के मृग की भाँति हम भाग रहे थे।
यह जगह थी– भीमबेटका। जी हाँ,ये वही जगह है जहाँ आज से दस हजार साल से भी अधिक पहले विन्ध्य पर्वत की गुफाओं में निवास करने वाले दो हाथ और दो पैरों वाले इस जीव ने गेहूँ पर गुलाब की विजय की उद्घोषणा की और अपने हाथों और उंगलियों की कला को पत्थर के कैनवास पर उतार दिया और वो भी इस तरह से कि हम आज भी उसे अपना बताकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
दोपहर के लगभग डेढ़ बजे किसी प्राचीन भारतीय तपस्वी की भाँति पंचाग्नि तापते हुए हम भोपाल–होशंगाबाद मार्ग पर स्थित भीमबेटका की ओर चल पड़े। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका की भोपाल से दूरी 46 किमी है लेकिन हम जहाँ ठहरे थे वहाँ से यह दूरी घटकर 28 किमी ही रह गयी थी। रास्ते में मण्डीदीप नामक एक स्थान पड़ता है। वर्तमान में यह औद्योगिक क्षेत्र है। इस मण्डीदीप के बारे में भी एक कहानी है।

Friday, June 23, 2017

भोजपुर मन्दिर–एक महान कृति

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24 मई
अपने भोपाल निवासी मित्र सुरेन्द्र गुप्ता से किये गये वादे के मुताबिक आज हमें होटल छोड़कर उनके घर शिफ्ट हो जाना था। इसलिए सुबह उठकर जल्दी से तैयारी में लग गये। नहा–धोकर बाहर निकले और एक दुकान पर छः रूपये वाली चाय पी। बहुत अच्छी लगी क्योंकि दस रूपये से नीचे की तो चाय मिल ही नहीं रही थी। अब मित्र के घर पहुँचने के लिए वाहन की जरूरत थी। चाय वाले से पूछा तो उसने लोकल बस पकड़ने के लिए ऐसा रास्ता बताया जो समझ में ही नहीं आया। चूंकि हमें शहर से बाहर काफी दूरी पर बसी एक टाउनशिप में जाना था और ठीक–ठीक रास्ता पता नहीं था इसलिए मन के उहापोह को खत्म करने के लिए हमने एक आटो वाले से बात की। वह 200 रूपये में तैयार हो गया। हमने पिट्ठू और घसीटू दोनों बैग आटो में लादे और चल पड़े। अभी आटो वाला एकाध किलोमीटर ही चला होगा कि उसने अपनी आटो अपने ही किसी भाई के बगल में खड़ी कर दी। उससे रास्ता पूछने लगा। वो बोला कि यह तो बहुत दूर है और यहां का किराया 300 से कम नहीं लगेगा। अब हमारा आटो वाला अपनी बात से मुकरने लगा। हम बुरे फँसे। किसी तरह उसी दूसरे आटो वाले को कह–सुन कर तैयार किया गया और आगे बढ़े। पता चला कि यह टाउनशिप भोपाल शहर से 20–22 किमी दूर है। अच्छा किया कि आटो पकड़ लिया अन्यथा बस के फेर में मारे–मारे फिरे होते। वास्तव में जबतक रास्ते का सही पता न हो किसी बड़े शहर की लोकल बस में बोरिया–बिस्तर के साथ यात्रा न ही की जाय तो अच्छा। वैसे भोपाल शहर की लोकल बस सर्विस अन्य किसी समकक्ष शहर की व्यवस्था की तुलना में काफी उच्च स्तर की है।

Friday, June 16, 2017

सांची–महानता की गौरव गाथा

मंजिल की तरफ चलता हूँ तो कोई न कोई साथी मिल ही जाता है और मजरूह सुल्तानपुरी की वो पंक्तियां याद आ जाती हैं–
"मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल,मगर लोग साथ आते गये,कारवां बनता गया।"
वैसे तो यात्रा करना या घूमना मुझे अच्छा लगता है लेकिन बिल्कुल अकेले भी यात्रा करना कुछ जमता नहीं। अकेले यात्रा करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अपने मन मुताबिक घूमा जा सकता है लेकिन कम से कम एक साथी होने से यात्रा उबाऊ नहीं होती। तो इस बार यात्रा में मेरे साथी बने मेरे मित्र नीरज। नीरज की सलाह पर ही मध्य प्रदेश जाने का प्लान बना था। यात्रा का उद्देश्य था मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके आस–पास स्थित ऐतिहासिक धरोहरों सांची व भीमबेटका,जिनके चित्र हम किताबों में देखते और पढ़ते आये हैं,का खुली आंखों से दीदार करना एवं इससे अागे बढ़कर इतिहास प्रसिद्ध ग्वालियर के किले की दुर्जेयता का प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करना। यानी हम इतिहास की यात्रा पर थे। नहीं तो इतनी गर्मी में गर्म जगह पर कोई जाता है क्या?

Saturday, June 10, 2017

पंचायत से

पंचों,
इस समय खूब शादी विवाह हो रहा है। खूब गाजे–बाजे बज रहे हैं। धूम–धड़ाम हो रहा है। जमके लगन चल रही है। ऐसी ही एक लगन में एक दिन बुझावन मिल गये।
बोले– "क्यों सरपंच जी,आजकल तो खूब लगन का मौसम चल रहा है।"
हमने कहा– "हां भई लगन तो चल ही रही है लेकिन लगन का मौसम कैसा। मौसम तो तीने होते हैं– जाड़ा,गर्मी,बरसात। बचपन में मास्टर जी तो यही बताये थे।"
लेकिन बुझावन कहां मानने वाले थे। बोले– "नहीं भई,किसी टाइम पर काेई काम खूब जोर–शोर से होता है तो कहते हैं कि इस काम का मौसम आ गया है। तो लगन का भी मौसम चल रहा है इ तो मानना ही पड़ेगा।"
हमने समझाने की कोशिश की कि भइया अब इस उमर तक तो सुनते और पढ़ते आये हैं कि मौसम तीने होते हैं तो फिर ये चउथा मौसम कहां से आ खड़ा हुआ? हमारी सरकार भी तीने मौसम मानती है। बाकायदा इनके लिए मौसम विभाग बना हुआ है। इन मौसम के बारे में मौसम विभाग हर साल भविष्यवाणी करता है भले उ हर साल फेल हो जाय। इस साल भी विभाग वाले मानसून की भविष्यवाणी कर दिये हैं कि ई सामान्य रहेगा। भले ही सूखा पड़ जाय चाहे बाढ़ आ जाये।

Thursday, June 1, 2017

पंचायत से

पंचों,
सोनम गुप्ता फिर से बेवफा हो गईǃ
कल शाम को लोगों के झगड़ा झंझट फरियाने से थोड़ा टाइम मिला तो साेचे कि सड़क पर टहल लें लेकिन जइसे ही गांव से थोड़ा बहरे निकले तो बुझावन मिल गये। अब कहां का टहलना। बुझावन  की बुझौनी तो बूझनी ही पड़ेगी।
नजर पड़ते ही बुझावन ने गोला दाग दिया–
"का सरपंच बाबू,इ सोनम गुप्ता फिर से बेवफा हो गई का?"
हम जान बचाने की फिकर में थे सो बोले– "अरे का बुझावन,इ सब का बे सिर पैर की बात में पड़ते हो। हम तुम्हारी उल्टी बानी का मतलब नहीं समझते। कुछ दिन पहले भी ऐसा हल्ला मचा था और आज फिर तुम्हारे मुंह से सुनाई पड़ रहा है। किसी की भी औरत के बारे में बिना जाने–बूझे ऐसी–वैसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए।"
"नहीं सरपंच बाबू तुम खूब समझते हो। लेकिन आज तो हम भी फाइनले करके रहेंगे। लुगाई तुम्हारी हो या हमारी। ऐसी हरकत तो बर्दास से बाहर है। ऐसी लुगाई को तो तीन तलाक दे देना चाहिए। कुछ दिन पहिले भी इ खबर आई थी तो हम समझे थे कि लड़के सब हंसी मजाक कर रहे हैं लेकिन इस औरत ने पता नहीं अइसा क्या जादू कर दिया था कि पब्लिक सुसरी एक–एक रूपये को तरस गयी। बैंक से लेकर घर तक लाइन लग गई। लोगों को पइसे के लिए बैंक में जान गंवानी पड़ गई। शादी बियाह भी लोगों का एक्के रूपये में होने लगा। औरतों की जनम भर की कमाई मर्दों को पता चल गयी। हमको भी एक दिन बैंक का मैनेजर पइसा नहीं दे रहा था तो हम भी उससे लड़ गये। उ तो पुलिस वाले हमको पकड़ लिए नहीं तो लाठी से मार के उसका कपार फोर दिये होते भले ही तीन सौ दू का मुजरिम बन जाते। अउर आज फिर से यही सब सुनाई दे रहा है। तुम तो राजनीत वाले आदमी हो। तुम्हारा तो कामे पब्लिक को लड़ा–भिड़ा कर वोट बटोरना है। तुमको तो इ सब ठीके लगेगा।"