Saturday, June 10, 2017

पंचायत से

पंचों,
इस समय खूब शादी विवाह हो रहा है। खूब गाजे–बाजे बज रहे हैं। धूम–धड़ाम हो रहा है। जमके लगन चल रही है। ऐसी ही एक लगन में एक दिन बुझावन मिल गये।
बोले– "क्यों सरपंच जी,आजकल तो खूब लगन का मौसम चल रहा है।"
हमने कहा– "हां भई लगन तो चल ही रही है लेकिन लगन का मौसम कैसा। मौसम तो तीने होते हैं– जाड़ा,गर्मी,बरसात। बचपन में मास्टर जी तो यही बताये थे।"
लेकिन बुझावन कहां मानने वाले थे। बोले– "नहीं भई,किसी टाइम पर काेई काम खूब जोर–शोर से होता है तो कहते हैं कि इस काम का मौसम आ गया है। तो लगन का भी मौसम चल रहा है इ तो मानना ही पड़ेगा।"
हमने समझाने की कोशिश की कि भइया अब इस उमर तक तो सुनते और पढ़ते आये हैं कि मौसम तीने होते हैं तो फिर ये चउथा मौसम कहां से आ खड़ा हुआ? हमारी सरकार भी तीने मौसम मानती है। बाकायदा इनके लिए मौसम विभाग बना हुआ है। इन मौसम के बारे में मौसम विभाग हर साल भविष्यवाणी करता है भले उ हर साल फेल हो जाय। इस साल भी विभाग वाले मानसून की भविष्यवाणी कर दिये हैं कि ई सामान्य रहेगा। भले ही सूखा पड़ जाय चाहे बाढ़ आ जाये।
लेकिन बुझावन अड़ गये– "चाहे जो हो जाय,हम भी मनवा के रहेंगे कि चउथा मौसम लगन का होता है। भले ही इसका कोई सरकारी विभाग न हुआ तो का। अरे भई लगन का मौसम सबसे अलग होता है। अउर इसके मौसम विभाग हमारे पण्डित जी लोग होते हैं। कब लगन रहेगी,कब नहीं रहेगी,कब अच्छी लगन रहेगी,कब खराब रहेगी,कब दिन में लगन रहेगी,कब रात में रहेगी,इ सब की भविष्यवाणी करने का जिम्मा इन्हीं लोगों का तो है। तो अब अगर मौसम का विभाग है तो मौसम भी है।"
बुझावन जारी थे– "अउर अब इस मौसम का लच्छन बताते हैं। इ मौसम तुम्हारे बाकी तीनों में से किसी मौसम के बीच में शुरू हो सकता है। इसके विभाग यानी पण्डित जी घोषणा किए नहीं कि मौसम शुरू। इ मौसम शुरू हाेते ही लगन वाले घरों में पब्लिक की भीड़ कुछ बढ़ जाती है। औरतें बन–ठन के हीरोइन के अवतार में आ जाती हैं। बच्चे तो मटर की तरह बाहर से भित्तर डगराने लगते हैं। घर से लेकर सड़क तक गाड़ियों का रेला लग जाता है। चउराहे पर जाम लग जाता है। सारे नये–नये लड़के बारात के जोश में इसपर्ट डराइबर हो जाते हैं और सड़क पर फर्राटे से गाड़ी उड़ाते हैं। किसी ने थोड़ा भी इधर–उधर किया तो ठोंकने से भी नहीं मानते। बैण्ड बाजा इतनी जोर से बजता है कि कपार उधिया जाय। बुढ़ऊ दादा लोग भी नवछ्टिुओं की भीड़ में खड़े होकर इतने मजे से डांस देखते हैं मानो नये पुराने का भेद ही खतम हो गया हो। अउर इस मौसम का सबसे बड़ा लच्छन है सरपंच बाबू पूड़ी अउर तरकारी की खुशबू। अउर कुछ पता चले न चले इससे तो पता चल ही जाता है कि लगन का मौसम आ गया है। इ खुशबू अपनी लड़ाई के लिए पहले से ही परसिद्ध कुक्कुर बिरादरी में जानमार लड़ाई शुरू करा देती है। अब हर मौसम में तबियत खराब होने की अलग अलग वजह है तो इस मौसम में भी है। ज्यादा ठण्ड में रहोगे तो बीमार,ज्यादा धूप में रहोगे तो बीमार,ज्यादा बारिश में भीगोगे तो बीमार और उसी तरह इस मौसम में पूड़ी मिठाई पर ज्यादा जोर लगाओगे तो  भी बीमार पड़ोगे।"
हमने बीच में बुझावन को टोकने की कोशिश की तो बुझावन बिफर पड़े– "अरे हम जानते हैं कि तुम हमारी बात नहीं मानोगे क्योंकि हमने तो तुम्हें वोट दिया नहीं है लेकिन इतना बता देते हैं कि आज तुम भी किसी नेवता में ही जा रहे हो और जल्दी में हो। मौसम का असर तुम्हारे ऊपर भी है,तुम्हें भी लगन वाला बुखार लगा है लेकिन तुम सही बात तो मानोगे नहीं............
पंचों,बुझावन का इतना भाषण सुनने के बाद अब मुझे भी लगने लगा कि मुझे भी लगन के बुखार ने बड़े ही जोर से जकड़ रखा है। सफेद कुर्ता–पायजामा और गले में लिपटा गमछा इस बात की दुहाई दे रहे थे कि लगन का मौसम चल रहा है। सो मैं भी बुझावन से पिण्ड छुड़ाकर भागा और सामने लगे टेण्ट के पास खड़ी भीड़ में शामिल हो गया।

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