Friday, February 23, 2018

अजंता–हमारी ऐतिहासिक धरोहर (पहला भाग)

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24 दिसम्बर
औरंगाबाद आने का मतलब है हमारी ऐतिहासिक धरोहरों अजंता और एलोरा से मुलाकात। आज रविवार था। सोमवार के दिन अजंता की गुफाएं बन्द रहतीं हैं जबकि मंगलवार के दिन एलोरा की। और हमारे पास कुल तीन दिन ही थे। भारत जैसे विशाल देश के दूर–दराज के किसी गाँव में रहने का मतलब होता है कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचने में ही कई दिन लग जायेंगे। हम भी जब ऐसे ही अपने गाँव से एक सप्ताह की यात्रा पर निकलते हैं तो चार या तीन दिन तो अपनी मंजिल वाली जगह तक पहुँचने और वापस घर लौटने में रास्ते में ही बीत जाते हैं। ट्रेनों की लेटलतीफी और भी बुरा हाल कर देती है। यहाँ भी वही हाल था। दो दिन तो पहुँचने में भी लग गये। दो दिन वापस जाने में लग जायेंगे। बचे तीन दिन। उसमें भी कोई जगह किसी दिन खुलती है तो कोई किसी दिन। तो आज हमने अजंता जाने का फैसला किया।

Friday, February 16, 2018

औरंगाबाद बाई ट्रेन

प्रकृति का भौतिक स्वरूप आकर्षण का केन्द्र होता है। लेकिन इसके इस स्वरूप का भविष्य अनिश्चित है। इसके अतीत को जानने के लिए हमें किसी भूगोलवेत्ता या भूगर्भवेत्ता की शरण में जाना पड़ेगा। वैसे इतिहास में यदि हमारी रूचि हो तो इतिहास की किताबों से कुछ न कुछ इसके बारे में हम जान ही जाते हैं। और अगर इतिहास का वर्तमान हमारे सामने दृश्य हो तो यह भी आकर्षण का केन्द्र होता है। मेरी आत्मा इतिहास और भूगोल दोनों में बसती है। तो इस बार मैं आत्मा की शांति के लिए निकल पड़ा महाराष्ट्र के ऐतिहासिक शहर औरंगाबाद की ओर। लेकिन अकेले नहीं वरन अपनी चिरसंगिनी संगीता के साथ।

Friday, February 9, 2018

कौसानी–गाँधी जी के साथ एक रात

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24 अक्टूबर
आज बागेश्वर से कौसानी की यात्रा पर था। सुबह 7.30 मैंने होटल से चेकआउट कर लिया। बस स्टैण्ड पहुँचा तो बस पहले से ही मेरा इन्तजार कर रही थी। यह बस बागेश्वर से बैजनाथ,गरूड़,कौसानी,सोमेश्वर होते हुए अल्मोड़ा जा रही थी। अब पूछना क्या थाǃ मैं बस में सवार हो गया। बागेश्वर से कौसानी की दूरी 39 किमी है। लेकिन 8.15 बजे बस चली तो कौसानी पहुँचने में 10.15 बज गये। यानी 39 किमी की दूरी तय करने में दो घण्टे लग गये। लेकिन ये दो घण्टे उबाऊ न होकर बड़े ही आनन्ददायक रहे।
उत्तराखण्ड का सौन्दर्य अगर देखना है तो तीव्र पहाड़ी मोडों से होकर धीमी गति से गुजरती गाड़ी में बैठकर ही देखा जा सकता है। तो मैं देखता रहा।

Friday, February 2, 2018

बागेश्वर

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23 अक्टूबर
अल्मोड़ा में आज मेरा तीसरा दिन और दूसरी सुबह थी। आज मुझे बागेश्वर के लिए निकलना था। मैं पिछली रात में ही अल्मोड़ा के रोडवेज बस स्टेशन से बागेश्वर की बस के बारे में पता कर आया था। पता चला था कि 6 बजे बागेश्वर के लिए बस है। अल्मोड़ा का रोडवेज बस स्टेशन सड़क पर ही अवस्थित है। इसका कार्यालय सड़क के नीचे एक बड़े हाॅल में बना हुआ है लेकिन बसों के खड़े होने की जगह सड़क पर ही है। सड़क के नीचे मतलब अण्डरग्राउण्ड नहीं। वरन सड़क के बगल में नीचे हटकर है क्योंकि पहाड़ में सबकुछ या तो ऊपर होता है या फिर नीचे।