Friday, July 6, 2018

यही है जिंदगी

जीवन एक यात्रा है। अनवरत यात्रा। यह तभी रूकती है जब मृत्यु से साक्षात् होता है। मनुष्य की जिजीविषा मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य को भी भुला देती है। मृत्यु की वास्तविकता को जानते हुए भी वह उससे पहले विराम लेने को तैयार नहीं होता। और मनुष्य का यही हठ जीवन के सौन्दर्य का सृजन करता है। अन्यथा मृत्यु का भय मृत्यु से पहले ही सृष्टि के सृजन को सीमित कर देता। मानव जीवन की इसी विशेषता में सृष्टि का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है और गहराई तक सोचने पर लगता है कि शायद यही है जिन्दगी

मनुष्य अपने वर्तमान स्वरूप में एक लम्बी यात्रा के बाद पहुँच सका है। इस लम्बी यात्रा में उसने क्या कुछ देखा और अनुभव किया है,इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। हमारे आदिपुरूष ने शायद डरना नहीं सीखा था। वरन प्रकृति के विराट स्वरूप में उसने देवत्व का आभास किया। तभी तो उसने प्रकृति की विविधता के साथ तादात्म्य स्थापित किया। उसे अपने जीवन का अंग बनाया। प्रकृति ने भी उसे अपनी गोद में बिठाया। अपने आकर्षण में बाँधा। प्रकृति की सुंदरता पर मुग्ध हो वह उसका सहचर बन गया। प्रकृति का सहचर बन कर उसने प्रकृति का आनन्द लिया। उसने उसका एकतरफा उपभोग नहीं किया। दुर्गम प्रकृति की गोद में रहकर उसने अपनी जीवनचर्या को सुगम और सरल बनाया और तब उसे समझ में आया कि शायद यही है जिन्दगी
प्रकृति का अपना स्वभाव है। वह सुगम भी होती है,दुर्गम भी होती है। मैदानों में यह सरल होती है तो पहाड़ों पर दुर्गम। पर्वत की दुर्गमता ही इसका अस्तित्व है। क्योंकि यह दुर्गमता या फिर दुर्जेयता ही मनुष्य को अपने सामने झुकने पर मजबूर करती है। उसके सामने चुनौतियां प्रस्तुत कर उसे नए रास्ते खोजने को बाध्य करती है। अन्यथा सरल प्रतीत होने वाले मैदानों की तो मनुष्य ने छाती ही चीरकर रख दी। पर्वतों की दुर्गमता ने ही जीवनदायिनी नदियों की सृष्टि की। नदी की इस जीवनदायिनी शक्ति ने पर्वत के साथ एकाकार होकर उसे शिवत्व प्रदान किया। हिमालय वस्तुतः शिव ही तो है। हम इसके विभिन्न अंगों में शिव के अस्तित्व को अप्रत्यक्ष रूप में स्वीकार करते ही हैं।

स्वाभाविक रूप से हमारे पूर्वजों में चरैवेति का गुण था। मनुष्य की संस्कृति में प्रवाह होना ही चाहिए। हमारे पुरखे वास्तविक घुमक्कड़ थे। जिन्होंने केवल घूम–घूम कर इतनी बड़ी दुनिया बसा डाली। और हम उस दुनिया को देखने में ही घुमक्कड़ हो गए। हमारी घुमक्कड़ी तो केवल कमरे तक सीमित हमारी जिन्दगी का ही एक हिस्सा है। इसमें घुमक्कड़ी का वह तत्व कहाँǃ हम तो साल में दो–चार बार कुछ जगहों पर घूमने जाते हैं। पूरा प्लान बनाकर। दुनिया भर का माल–असबाब लेकर। ये कैसी घुमक्कड़ी। हमारे पूर्वजों ने तो सिर्फ अपने आत्मबल और मनोबल को आधार बनाकर विशाल भूखण्डों को एकीकृत किया। उन्होंने वो तीर्थ बनाये जो आज भी हमारी यात्राओं के जनक हैं। दूरस्थ क्षेत्रों और संस्कृतियों को जोड़ने के लिए उन्होंने मेलों का सूत्रपात किया जो आज भी हमारे मनोरंजन और मिलन का साधन हैं और अप्रत्यक्ष रूप में हमें जोड़ने के लिए सूत्ररूप हैं।
आज तो नौबत यहाँ तक आ गयी है कि दिन भर सोशल मीडिया पर घूमने वाला भी शाम को घुमक्कड़ बन जाता है। लक्जरी गाड़ियों में सारी सुख सुविधाओं का आनन्द उठाते हुए हफ्ते भर में इकट्ठे किए गए तनाव को वीकेण्ड में पहाड़ों के ऊपर फेंक आने वाला मनुष्य भी घुमक्कड़ हो गया है। शायद पहाड़ की दर्दभरी आह को वह नहीं सुन पाता। नहीं समझ पाता उस विरासत को जो अल्पविकसित या अविकसित कहे जाने वाले हमारे पुरखे हमारे लिए छोड़ गए।

मैंने भी एक दिन पूर्वजों की विरासत या धरोहरों का व्यवस्थित रूप से प्रत्यक्षानुभव करने की सोची। पूर्वजों की धरोहर यानी उन्होंने जो कुछ हमारे लिए छोड़ा– अपने हाथों का किया हुआ या फिर अपने पूर्वजों का किया हुआ या फिर प्रकृति का वह स्वरूप जिसे उन्होंने उपहार स्वरूप पाया और उसे उसी स्वरूप में हमारे लिए छोड़ गए।
दुनिया घूमने का जुनून बचपन से ही खून में था सो घुमक्कड़ी तो बहुत पहले से ही चलती थी। पढ़ाई के सिलसिले में जिस शहर में भी गया उसकी गलियाें को छान गया। बनारस के गंगा किनारे के घाटों की गिनती पैदल ही गिन गया,कुशीनगर के बौद्ध मंदिरों के रहस्य को हर शाम टहलते हुए टटोला और इलाहाबाद की सड़कों को साइकिल से नापा। लेकिन अबतक की सारी घुमक्कड़ी जबानी ही थी और उसे अब लिपिबद्ध करने की इच्छा जाग्रत हुई। और इस सारी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप एक ब्लाॅग का जन्म हुआ– यही है जिन्दगी। वैसे तो इसे बहुत पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था लेकिन कई सारी बाधाएं थीं जिन्होंने सोचा हुआ नहीं होने दिया। तो जिन्दगी का प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए जो भी देखा–सुना,उसे यहाँ लिख डाला और इसी में इतना खोया कि दो साल कब गुजर गए पता ही नहीं चला।

तो अब इस बीते समय के बारे में भी कुछ सोचने का समय आ गया है। पिछले दो वर्षाें में जिन्दगी की भीड़–भाड़ से बचते–बचाते कई यात्राएं कीं। रेलगाड़ियों की सवारी की,सड़कें नापीं और मोटरसाइकिल को भी कष्ट दिया। समझ नहीं आता कि मोटरसाइकिल ने मुझे कष्ट दिया या मैंने उसको। लम्बी–लम्बी दूरियां तय कर गया। राेजमर्रा की भागमभाग वाली यात्रा तो अलग से है ही। कौन इसका हिसाब लगाता है। वैसे एक दिन बैठकर दूरियों का मोटा–मोटी हिसाब लगाने लगा तो दिमाग चकरा गया। अपने घुमक्कड़ी के जुनून में पिछले दो सालों में लगभग तैंतीस हजार (32758) किलोमीटर तो रेल यात्रा ही कर चुका हूँ। लगभग 5000 किलाेमीटर की बस यात्रा और कुछ बाइक यात्रा भी। अपने नियमित जॉब को पूरा करने में पिछले लगभग बारह–पन्द्रह सालों से चल रही रोज वाली 85–90 किलोमीटर की बाइक यात्रा इसमें शामिल नहीं है। पुरानी मोटरसाइकिलों के मीटर की खोज–खबर ली तो पता चला कि लगभग तीन लाख किलोमीटर बाइक चला चुका हूँ। अगर इतनी बाइक यात्रा एक सीधी लम्बाई में की गयी होती तो धरती के एक बड़े हिस्से की यात्रा पूरी हो गयी होती। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं है।
जिन्दगी की भागमभाग ने हमें इस तरह जकड़ रखा है कि एक आजाद पंछी की तरह से हम नहीं उड़ सकते। दुनिया अर्थ प्रधान हो गयी है और उसी तरह से हमारी जिन्दगी भी। आज की घुमक्कड़ी बिना अर्थ के नहीं हो सकती। तो घुमक्कड़ी के लिए भी अर्थ चाहिए,जीने के लिए भी अर्थ चाहिए और अर्थ की प्राप्ति के लिए समय और श्रम दोनों चाहिए। तो फिर अर्थ की प्राप्ति के लिए समय और श्रम लगाया जाए कि घुमक्कड़ी के लिएǃ भारी दुविधा है।
मेरी रेल यात्राओं का विवरण ब्लाॅग पर उपलब्ध है। साथ ही इन्हें सोशल मीडिया पर शेयर करता रहता हूँ जहाँ मित्रों का असीमित प्यार मिलता है। लेकिन इस प्रक्रिया में कितना श्रम करना पड़ा और कितना समय देना पड़ा,आज जब सोचता हूँ तो हैरत में पड़ जाता हूँ। एक ऐसे वज्र देहात में रहकर ब्लाग लिखना,जहाँ ट्रेन पकड़ने के लिए 20–25 किलोमीटर चलना पड़ता हो,बस पकड़ने के लिए 4–6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता हो और इंटरनेट कनेक्ट कराने के लिए लैपटॉप और मोबाइल के सामने 10 बार कान पकड़कर उठा–बैठी करनी पड़ती हो,हिमालय चढ़ने से कम मेहनत वाला काम नहीं है। फिर भी जुनून के आगे सारी बाधाएं नतमस्तक हैं तो फिर चलते रहना ही है जिन्दगी।

अब तक ब्लाॅग पर प्रकाशित मेरी प्रमुख यात्राओं की लिंक निम्नवत है–

4 comments:

  1. बहुत सी जगह मैंने इसमे देख रखी है ,बाकी जो है वो बहुत रोचक जानकारी के साथ आपके ब्लॉग पर मौजूद है ,सहायता देंगी यह ,शुक्रिया

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी। आपने प्रोत्साहित किया इसके लिए शुक्रिया।

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  2. आपकी लेखन शैली में पकड़ है, पढ़कर और पढने का मन होता है, एक बार शुरू कर दिया है तो अब सारे लेख पढ़कर ही दम लूँगा !

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रदीप भाई इतने भारी प्रोत्साहन के लिए। आप मेरे ब्लाग पर आए यही मेरे लिए बहुत सम्मान की बात है। आगे भी आते रहिए। मैं भी आपके ब्लाग से नियमित मदद लेता रहता हूँ।

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