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Friday, March 3, 2017

भुवनेश्वर

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दूसरा दिन–
आज पुरी में हमारा दूसरा दिन था और आज हम भुवनेश्वर जा रहे थे। जैसा कि मैं पिछले भाग में भी उल्लेख कर चुका हूं कि भले ही यह जनवरी का अन्तिम सप्ताह था लेकिन पुरी में ठंड का कोई असर नहीं था। हां,कही–कहीं भूले–भटके कुहरा दिख जा रहा था। पुरी से भुवनेश्वर की दूरी लगभग 65 किमी है। पुरी से भुवनेश्वर जाने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। पुरी का जगन्नाथ मन्दिर,कोणार्क जाने वाले जिस मुख्य सड़क मार्ग के किनारे स्थित है उसी सड़क मार्ग के किनारे,मन्दिर से लगभग 2.5 किमी दूर,गुण्डीचा मन्दिर के पास बस स्टैण्ड भी स्थित है जिसका आटो रिक्शा वाले मन्दिर के पास से 10 रूपया किराया लेते हैं।
अगर मन्दिर के आस–पास आप ठहरे हैं तो आसानी से दस रूपये देकर इस बस स्टैण्ड तक पहुंच सकते हैं और कहीं और ठहरे हैं तो कुछ अधिक पैसे खर्च करने पड़ेंगे। इसे वैसे तो कोणार्क बस स्टैण्ड के नाम से ही जाना जाता है लेकिन यहाँ से भुवनेश्वर जाने के लिए भी बसें यहां से मिल जाती है। वैसे भुवनेश्वर जाने के लिए एक दूसरा बस स्टैण्ड भी है।

अगर आप यात्रा की प्लानिंग खुद करने वाले हैं तो बस–स्टैण्ड से बस पकड़ कर भुवनेश्वर जा सकते हैं। वहां आटो–रिक्शा या छोटी चारपहिया गाड़ी किराये पर लेकर अपनी मर्जी से भुवनेश्वर और उसके आस–पास के स्थानों का आसानी से भ्रमण कर सकते हैं। दूसरा विकल्प रिजर्व बसें हैं जो टूर पैकेज देती हैं और इन्हें किसी टूर आपरेटर के माध्यम से बुक किया जा सकता है। इसमें एक ही दिन में कोणार्क–चन्द्रभागा तथा भुवनेश्वर और आस–पास शामिल होता है,किराया है 250 रूपये प्रति व्यक्ति। पूरे दिन भागमभाग वाली स्थिति रहेगी,कुछ जगहों को पकड़ेंगे तो कुछ छूट जायेंगीं। बस वाले इस तरह से भागमभाग मचाये रहते हैं मानो कोई भूत पीछे पड़ा हो। यदि दो या अधिक व्यक्ति एक साथ हैं तो पहला विकल्प सर्वोत्तम है। अकेले रहने पर तो खर्च बढ़ ही जायेगा। हमने बस में दो सीटें बुक की थीं।
भुवनेश्वर उड़ीसा की राजधानी है। यह एक आधुनिक ढंग से बसाया गया नगर है परन्तु इसके दो स्वरूप हैं। एक तो आधुनिक भुवनेश्वर है जहां भारत की स्वतंत्रता के बाद बने विभिन्न कार्यालय,सरकारी भवन तथा रिहायशी कालोनियां हैं तथा दूसरा,तीसरी सदी ईसा पूर्व से लेकर छठीं सदी के मध्य बना भुवनेश्वर है जहां विभिन्न धर्माें से सम्बन्धित मन्दिर एवं मठ वगैरह हैं। कलिंग राज्यकाल के दौरान भी भुवनेश्वर को राजधानी के रूप में प्रयुक्त किया गया था।
ऐतिहासिक दृष्टि से भुवनेश्वर एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल रहा है। बौद्ध धर्म के प्रभाव में आने से पूर्व यह क्षेत्र जैन धर्म के प्रभाव में रहा क्योंकि यहां के राजा खारवेल जैन धर्म के उपासक थे। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में हुए भीषण कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप यह बौद्ध धर्म के प्रभाव में आ गया। सातवीं शताब्दी में हिन्दू राजाओं के शासन में आ जाने के कारण यहां बहुत से हिन्दू मन्दिरों का भी निर्माण हुआ।
प्राचीन भुवनेश्वर का सबसे वैभवपूर्ण स्थान है– ग्यारहवीं सदी में बना लिंगराज मन्दिर। मन्दिर के अन्दर स्थापित काले पत्थर के शिवलिंग का धार्मिक दृष्टि से जो भी महत्व हो,शिल्पकला की दृष्टि से सम्पूर्ण मन्दिर ही अद्भुत है जिसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता और कैमरा मन्दिर के अन्दर ले जाना ही प्रतिबन्धित है। ऊंची चारदीवारी से घिरे मन्दिर को बाहर से देखने पर वैसा कुछ महसूस नहीं होता जैसा कि यह वास्तव में है। लेकिन अन्दर प्रवेश कर जाने के बाद यह हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। समझ में नहीं आता कि आठ सौ साल पहले इतनी बारीक कारीगरी कैसे की गयी होगी। लिंगराज मन्दिर में गैर–हिन्दुओं का प्रवेश प्रतिबन्धित है।

लिंगराज मन्दिर से निकलने के बाद हम पहुंचे भुवनेश्वर से उत्तर–पश्चिम में 8 किमी दूर स्थित खण्डगिरि–उदयगिरि की पहाड़ियों पर। ये दोनों सड़क के दो तरफ स्थित जुड़वां पहाड़ियां हैं जिनमें से एक का नाम खण्डगिरि तथा दूसरी का उदयगिरि है। ये गुफाएं जैन परम्परा से सम्बन्धित हैं और इनका निर्माण कलिंग के राजा खारवेल व उनके उत्तराधिकारियों द्वारा जैन मुनियों के उपयोग के लिए कराया गया था। खण्डगिरि के ऊपर एक जैन मन्दिर भी स्थित है। वैसे तो ये प्राचीन स्थल वर्तमान में आधुनिक युग के प्राणियों के लिए एक वीकेण्ड मनाने की तरह से हैं जहां लोग आते हैं और एक दो घण्टे बिताकर चले जाते हैं लेकिन थोड़ी गम्भीरता से सोचने पर इनके महत्व का एहसास होता है। आज से हजारों साल पहले जब आज की तरह के संचार साधन नहीं थे,उस समय ये गुफाएं ज्ञान और वैचारिक समृद्धि का केन्द्र थीं जहां से विचारों का प्रसार विभिन्न क्षेत्रों में होता था।
भुवनेश्वर के दक्षिण–पश्चिम की ओर 8 किमी की दूरी पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण धौलीगिरि स्थित है। यह वही स्थान है जहां पर कलिंग का विश्व–प्रसिद्ध युद्ध लड़ा गया था। धौलीगिरि से प्राप्त अशोक के स्तम्भ पर अशोक के जीवन के बारे में वर्णन किया गया है। धौलीगिरि पर शान्तिस्तूप की स्थापना की गयी है। इसमें भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित विभिन्न मूर्तियां भी स्थापित की गयी हैं। इस पहाड़ी की चोटी पर एक मन्दिर भी है।

ऐतिहासिक और धार्मिक इमारतों के अलावा भुवनेश्वर के पास देखने लायक जो दूसरा महत्वपूर्ण स्थान है वह है सफेद बाघ के लिए प्रसिद्ध नंदनकानन चिड़ियाघर। यह भुवनेश्वर शहर से लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित है। इसकी स्थापना सन 1960 में हुई थी और वर्तमान में यह एक बोटेनिकल गार्डेन भी है। चिड़ियाघर में एक प्राकृतिक झील भी है। यह एक खूबसूरत पिकनिक स्पाट है। यहां चिड़ियाघर के अलावा पाैधविज्ञान पर आधारित गार्डेन भी है। जाड़े के दिनों में यहां प्रवासी पक्षी भी आते हैं। चिड़ियाघर में प्रवेश शुल्क 25 रूपये है और अगर साथ में डिजिटल कैमरा है तो अलग से 10 रूपये का टिकट भी लेना पड़ेगा। यह सोमवार को बन्द रहता है। चिड़ियाघर में खुली ई–रिक्शा में जंगल–सफारी की सुविधा भी उपलब्ध है जिसका किराया 50 रूपये प्रति व्यक्ति है।



खण्डगिरि–उदयगिरि की गुफाएं

गुफा संख्या 10 अर्थात गणेश गुफा के सामने दरबान के रूप में हाथियों की मूर्तियां

खण्डगिरि पहाड़ी पर स्थित जैन मन्दिर







नन्दनकानन उद्यान का मुख्यद्वार
नन्दनकानन के मुख्यद्वार से प्रवेश करते ही ये शानदार फव्वारा दिखता है



बाघ से मुलाकात इतने नजदीक से हुई कि शरीर रोमांचित हो गया







ये एक शरीर के साथ दो सिर हैं क्याǃ

मुख्यद्वार से अन्दर प्रवेश करते ही यह खूबसूरत नजारा दिखता है


अगला भागः चिल्का झील

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

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