Pages

Friday, April 10, 2020

भारत की जलवायु–1

किसी भी स्थान या भूभाग की जलवायु के अन्तर्गत तीन प्रमुख तत्व होते हैं–

    1. तापमान,
    2. वायुदाब एवं
    3. वर्षा

इन्हीं तीन मुख्य तत्वों की प्रकृति और वितरण के बारे में किसी देश की जलवायु के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। देश जितना विशाल हो,जलवायु की विभिन्नताएँ उतनी ही अधिक होती हैं। भारत की जलवायु भी अत्यन्त जटिल है। कर्क रेखा अर्थात 23.5⁰ अक्षांश,देश के लगभग मध्य भाग से गुजरती है। इसका परिणाम यह होता है कि तापीय दृष्टिकोण से कर्क रेखा से उत्तर स्थित देश का लगभग आधा भाग शीतोष्ण कटिबन्ध में आता है जबकि कर्क रेखा के दक्षिण स्थित आधा भाग उष्ण कटिबन्ध में आता है। इस कारण देश की जलवायु में दैनिक,मासिक और वार्षिक आधार पर ढेर सारी विभिन्नताएँ मिलती हैं। जनवरी के महीने में,जबकि पूरा उत्तर भारत शीतलहर के प्रभाव में काँप रहा होता है,दक्षिण भारत के समु्द्र तटों पर मौसम सुहाना हो जाता है। इसी तरह मई–जून के महीनों में पश्चिम से लेकर पूरब तक लू के प्रभाव में जब गंगा का मैदान जल रहा होता है तब हिमालयी क्षेत्रों में मौसम स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है। देश की जलवायु के सर्वप्रमुख तत्व मानसून के आगमन और निवर्तन का समय भी पूरे देश में अलग–अलग स्थानों पर अलग–अलग होता है।

उच्च हिमालय की श्रेणियाँ मानसूनी हवाओं को रोककर देश में बारिश कराती हैं और देश को एक शुष्क मरूस्थल बनने से रोकती हैं। साथ उत्तर की ध्रुवीय बर्फीली हवाओं को रोककर अत्यधिक शीत प्रभाव को भी रोकती हैं। इस प्रकार मानसूनी हवाएँ और हिमालय दोनों मिलकर एक विशिष्ट प्रकार की मानसूनी जलवायु का निर्माण करती हैं। इसी तरह दक्षिणी प्रायद्वीपीय भाग तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण समुद्री हवाओं के प्रभाव में रहता और अत्यधिक महाद्वीपीयता के प्रभाव से मुक्त रहता है। हिमालय भारत की जलवायु पर निर्णायक प्रभाव रखता है। इसके कारण उष्ण कटिबन्धीय हवाओं का असर पूरे देश पर पूरे वर्ष महसूस किया जाता है। अतः इसे उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी जलवायु भी कहा जाता है। 

जलवायु की भिन्नताओं और मानसूनी हवाओं के प्रभाव काे देखते हुए भारतीय मौसम विभाग ने सामान्य तौर पर पूरे वर्ष को निम्न चार ऋतुओं में विभाजित किया है–

(A) उत्तरी–पूर्वी मानसून काल
    1. शीत ऋतु– 15 दिसंबर से 15 मार्च तक
    2. शुष्क ग्रीष्म ऋतु– 15 मार्च से 15 जून तक
(B) दक्षिणी–पश्चिमी मानसून काल
    1. आर्द्र ग्रीष्म ऋतु– 15 जून से 15 सितंबर
    2. शरद् ऋतु– 15 सितंबर 15 दिसंबर

(A) उत्तरी–पूर्वी मानसून काल

1. शीत ऋतु (15 दिसंबर से 15 मार्च)– उत्तर भारत में शीत ऋतु का आरम्भ मध्य नवम्बर से होता है तथा दिसम्बर और जनवरी सबसे ठण्डे महीने होते हैं। केण्ड्रयू महोदय के अनुसार,ʺस्वच्छ आकाश,सुहावना मौसम,निम्न तापक्रम एवं आर्द्रता,सर्वोच्च दैनिक तापांतर तथा धीमी चलने वाली उत्तरी हवाएँ,इस ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ हैं।ʺ इस ऋतु में वायुदाब,तापमान और वर्षा की स्थिति निम्नवत् रहती है–

वायुदाब– शीत ऋतु में सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है।  22 दिसंबर तक यह मकर रेखा पर पहुँच जाता है। इसके पश्चात् यह विषुवत् रेखा की ओर (8⁰ या 10⁰ दक्षिणी अक्षांश हिन्द महासागर में) लौटना प्रारम्भ कर देता है। शीतकाल में एशिया उच्च दाब का केन्द्र बन जाता है। इस समय भारतीय उप–महाद्वीप पर उच्च दाब का केन्द्र पेशावर के निकट स्थित होता है। मेघाच्छादन 2/10 से अधिक नहीं होता। उत्तरी भारत में व्यापक रूप से पाला पड़ता है। हिमालय की ओर से आने वाली ठण्डी पवनों के कारण उत्तरी भारत में शीत लहर का प्रभाव देखने को मिलता है। 

तापमान– उत्तर भारत में न्यूनतम तापमान दिसंबर–जनवरी माह में ही पाये जाते हैं। जनवरी में न्यूनतम तापमान रिकार्ड किया जाता है। उत्तर भारत के अधिकांश भागों में औसत दैनिक तापमान 21⁰ सेग्रे से कम ही रहता है। लेकिन रात का तापमान काफी कम,यहाँ तक कि कई स्थानों पर हिमांक से भी नीचे चला जाता है। ऐसा भरसक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी भागों में हाेता है। उत्तर और दक्षिण भारत के तापमान में साधारण अन्तर मिलता है। उत्तर से दक्षिण की ओर तापमान क्रमशः बढ़ता जाता है। उत्तर भारत में तापमान 10⁰-12⁰ सेण्टीग्रेड रहता है जबकि दक्षिण भारत में चेन्नई और काेचीन का तापमान 24⁰ से 25⁰ सेण्टीग्रेड रहता है। तिरूवनन्तपुरम में औसत निम्नतम तापमान 29⁰ सेण्टीग्रेड रहता है। समुद्र के प्रभाव से तटवर्ती भागों में ऋतुवत परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता। राजस्थान जैसे भीतरी भागों में दैनिक ताप–परिसर काफी अधिक होता है। तमिलनाडु में यह 6⁰ सेग्रे,पश्चिमी बंगाल में 10⁰ सेग्रे,मालाबार तट पर 15⁰ सेग्रे जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 20⁰ सेग्रे तक होता है। समताप रेखाएँ काफी कुछ अक्षांशों का अनुसरण करती हैं।
जनवरी के अन्त और फरवरी के आरम्भ में कैस्पियर सागर एवं तुर्किस्तान की ओर से ठण्डी हवाएँ उत्तरी–पश्चिमी भारत की ओर से प्रवेश करती हैं जो उत्तरी–पश्चिमी भारत के तापमान को गिरा देती हैं। इस कारण घने कोहरे व पाले की दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दक्षिण और पूर्व की ओर पाले की मात्रा क्रमशः घटती जाती है। समुद्रतट पर पाला अनुपस्थित होता है। दक्षिणी भारत में कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती।

वर्षा– इस ऋतु में वर्षा,उत्तरी भारत में उत्तर–पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से और दक्षिण भारत में लौटते हुए मानसून से होती है। उत्तर–पश्चिम भारत में अधिकांश चक्रवात भूमध्यसागर सागर से ईरान होते हुए आते हैं। इनको भारत की ओर दिशा देने में पश्चिमी जेट–स्ट्रीम महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इनके आने पर अचानक तापमान में वृद्धि हो जाती है और किन्तु वर्षा हो जाने के बाद तापमान गिर जाता है। इन्हीं चक्रवातों के कारण हिमालय में हिमपात भी होता है और हिमालय सहित उत्तर के मैदानी भागों में तापमान गिर जाता है। इस समय सम्पूर्ण उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में आ जाता है और तापमान 5⁰ से 7⁰ सेग्रे तक गिर जाता है। इन चक्रवातों का प्रभाव 21⁰ उत्तरी अक्षांश के उत्तर में,मध्य गंगा के मैदान अर्थात पश्चिमी बिहार तक सीमित रहता है। इन चक्रवातों की संख्या महीने में 4 से लेकर 6 तक हो सकती है। केन्ड्रयू महोदय के अनुसार पश्चिमी चक्रवातों की संख्या नवम्बर में 2,दिसंबर में 4,जनवरी में 5,फरवरी में 5,मार्च में 5,अप्रैल में 5 तथा मई में 2 होती है। इन चक्रवातों से होने वाली वर्षा,सम्पूर्ण वर्षा का केवल 2 प्रतिशत ही होती है लेकिन यह न्यून वर्षा भी उत्तरी भारत में रबी की फसल के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। पश्चिम से पूर्व की ओर इस वर्षा की मात्रा घटती जाती है। 
दक्षिणी भारत में लौटते हुए उत्तरी–पूर्वी मानसूनों से कोरोमण्डल तट पर वर्षा होती है। तटीय भागों में अधिक वर्षा होती है। तमिलनाडु के तटवर्ती भागों में,दिसम्बर में 25 सेमी तक वर्षा होती है जबकि कर्नाटक व अन्य आन्तरिक भागों में यह 2.5 सेमी तक होती है। कभी–कभी तूफानों द्वारा अत्यधिक वर्षा भी हो जाती है। शीत ऋतु में पूर्वोत्तर भारत भी वर्षा की कुछ मात्रा प्राप्त करता है।
शीतकाल की वायु में आर्द्रता की मात्रा कम पायी जाती है। देश के भीतरी भागों में तापमान में कमी के साथ–साथ आर्द्रता में और भी कमी आ जाती है। देश के किसी भी भाग में आर्द्रता की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक नहीं होती। राजस्थान के कुछ मरूस्थलीय भागों में तो यह शून्य प्रतिशत तक होती है। पठारी भाग में अरब सागर के तटवर्ती भागों में सापेक्षिक आर्द्रता 40 से  50 प्रतिशत तक होती है। 


2. शुष्क ग्रीष्म ऋतु (15 मार्च से 15 जून)– यह उष्ण और शुष्क ग्रीष्म ऋतु होती है। उत्तरी भारत में इस ऋतु की ये विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती हैं। कमजोर हवाएँ और शुष्कता इस ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ होती हैं। इस ऋतु में वायुदाब,तापमान और वर्षा की स्थिति निम्नवत् रहती है–

वायुदाब– फरवरी माह में सूर्य विषुवत् रेखा पर लम्बवत होता है। मार्च के अन्त में यह कर्क रेखा की ओर बढ़ने लगता है। इस कारण देश में तापमान बढ़ने लगता है और वायुदाब कम होने लगता है। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध के विभिन्न भागों में तापमान गिरने के कारण प्रतिचक्रवातीय दशाएँ उत्पन्न होने लगती हैं। सूर्य के कर्क रेखा की ओर बढ़ने के साथ ही निम्न वायुदाब भी उत्तर–पश्चिम की ओर बढ़ने लगता है। मार्च के महीने में सर्वोच्च तापमान दक्षिण भारत में 43⁰ सेग्रे तक पाया जाता है। अप्रैल के महीने में मध्य प्रदेश और गुजरात में उच्चतम तापमान 43⁰ सेग्रे तक हो जाता है। भारत के उत्तरी–पश्चिमी भाग में क्रमशः ताप वृद्धि होने लगती है जिसके कारण यहाँ निम्न वायुदाब का केन्द्र बन जाता है। जून माह में उच्चतम तापमान दक्षिणी पंजाब और राजस्थान में पाया जाता है जो 45⁰ सेग्रे और कभी–कभी उससे भी अधिक हो जाता है। जून माह में यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक कि वर्षाकालीन हवायें यहाँ तक न पहुँच जाएँ।
इस समय तक शीतकालीन मानसूनी पवनों की दिशा परिवर्तित हो जाती है। इस कारण विभिन्न जगहों पर स्थानीय पवनों की उत्पत्ति हो जाती है। इस समय उत्तरी भारत में दिन के समय गर्म और शुष्क पवनें चलने लगती हैं जिसे ʺलूʺ कहते हैं। कभी–कभी मैदानी भागों में इन गर्म हवाओं से आर्द्र पवनें मिल जाती हैं तो तूफानों की उत्पत्ति हो जाती है। इन तूफानों में वायुवेग 100 से 125 किमी तक हो जाता है। इस प्रकार के तूफान प0 बंगाल में अधिक आते हैं जिन्हें काल बैसाखी (Norwesters) कहते हैं। उत्तरी और उत्तरी–पश्चिमी भारत में इस समय धूल भरी आँधियाँ चलती हैं। दक्षिणी भारत और समुद्रतटीय भागों में इनका अभाव होता है। 

तापमान– इस ऋतु में तटवर्ती और आन्तरिक भागों के तापमान में काफी अन्तर पाया जाता है। तटवर्ती भागों में स्थलीय और समुद्री हवाएँ चलती हैं जिससे दैनिक तापान्तर 5⁰-6⁰ सेग्रे से अधिक नहीं होता लेकिन आन्तरिक भूभागों यह तापान्तर 20⁰ सेग्रे से भी अधिक हो जाता है। मार्च में उत्तरी भारत का तापमान लगभग 32⁰ सेग्रे होता है लेकिन मई में यह 45⁰ सेग्रे तक चला जाता है। बंगाल में काल बैशाखी के प्रभाव के कारण तापमान अधिक ऊँचा नहीं हो पाता। उत्तरी भारत का न्यूनतम तापमान 21⁰ सेग्रे के लगभग होता है जबकि प्रायद्वीपीय क्षेत्र के पूर्वी भाग में यह 27⁰ सेग्रे से अधिक ही रहता है।
उत्तरी भारत में तापमान के अधिक होने के प्रमुख कारण निम्नवत् हैं–
  • उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणों का लम्बवत होना,
  • समुद्र से अधिक दूरी होने के कारण समुद्र का समकारी प्रभाव उपलब्ध न हो पाना और
  • प्रतिचक्रवातीय दशाओं के कारण तापमान का उच्च बने रहना।
वर्षा– इस ऋतु में सम्पूर्ण भारत में वर्षा नगण्य होती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा का केवल 1 प्रतिशत भाग ही प्राप्त होता है। मार्च के महीने में उत्तर भारत में चक्रवातों की वजह से कुछ वर्षा प्राप्त हो जाती है। आर्द्रता की मात्रा तटीय भागों में अधिक होती है लेकिन भीतरी भागों की ओर बढ़ने पर क्रमशः घटती जाती है। समुद्र से अधिक दूरी वाले भागों में वायु अत्यधिक शुष्क एवं उष्ण होती है। इस कारण निचली परताें की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और निम्न वायुदाब का बड़ा क्षेत्र बन जाता है। तापमान की अधिकता के कारण हवाओं में संवहन धाराएँ चलने लगती हैं। पंजाब और हरियाणा में इन्हें धूल के तूफान,उत्तर प्रदेश में आँधियाँ और प0 बंगाल व असम में काल बैशाखी कहा जाता है। इस बारिश से असम और प0 बंगाल के चाय बागानों में नयी पत्तियाँ पैदा होती हैं। दक्षिणी भारत में ʺआम्र की बौछारʺ (mango showers) से बारिश होती है। इसे यहाँ ʺफूलों की बौछारʺ भी कहते हैं। यह वर्षा यहाँ आम और कहवा की फसल के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। दक्षिणी भारत में समुद्र से स्थल की ओर चलने वाली हवाओं से 12 सेमी तक बारिश प्राप्त हो जाती है। पश्चिमी जेट–स्ट्रीम का इनके संचलन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। ऊपरी अधोमण्डल के पश्चिमी विक्षोभों से इनका सम्बन्ध रहता है। कभी–कभी ये हवाएँ स्थानीय तौर पर कुछ बारिश कर देती हैं। यह वर्षा तेज घूमती हवाओं,गरज–चमक और ओलों के साथ होती है।





अगला भाग ः भारत की जलवायु–2

अन्य सम्बन्धित विवरण–

5. भारतीय मानसून

No comments:

Post a Comment