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Friday, April 17, 2020

भारत की जलवायु–2


 (B) दक्षिण–पश्चिमी मानसून काल


1. आर्द्र ग्रीष्म ऋतु (15 जून से 15 सितम्बर)– भारत में इसे वर्षा ऋतु भी कहा जाता है। इस समय भारत का मौसम उत्तरी–पूर्वी मानसून काल की तुलना में पूरी तरह परिवर्तित हो जाता है। मानसून के कारण भारत में वर्षा की उत्पत्ति होती है। 

वायुदाब– मई के अन्त और जून के आरम्भ में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकने लगता है। कम वायुदाब और भी कम हो जाता है। इस न्यून वायुदाब का केन्द्र उत्तरी–पश्चिमी भारत पर विकसित हो जाता है। अरब सागर के उत्तरी भाग में स्थित एक लघु न्यून वायुदाब का केन्द्र समाप्त हो जाता है। इन सब प्रक्रियाओं के फलस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की  दक्षिणी–पूर्वी व्यापारिक पवनें विषुवत् रेखा को पार कर भारत के इस निम्न वायुदाब की ओर चल पड़ती हैं। जैसे ही ये हवाएँ विषुवत् रेखा को पार करती हैं,पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण,फेरल के नियमानुसार इनकी दिशा परिवर्तित हो जाती है और ये दक्षिणी–पश्चिमी मानसून के रूप में भारत की ओर प्रवाहित होने लगती हैं। समुद्र की नमी से परिपूर्ण होने के कारण ये हवाएँ ही भारत में वर्षा के लिए उत्तरदायी होती हैं। इसी समय एक कम वायुदाब का क्षेत्र भारत के छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्र के ऊपर भी बन जाता है। ये कम वायुदाब के क्षेत्र स्थिर न होकर गतिशील होते हैं जिस कारण वर्षा का वितरण भी प्रभावित होता है। इस मौसम में वायुमण्डल में आर्द्रता की मात्रा शत–प्रतिशत तक होती है। दिन में तापमान बढ़ने पर आर्द्रता का अनुपात कुछ कम हो जाता है लेकिन लेकिन रात में तापमान घटने के साथ ही आर्द्रता का अनुपात बढ़ने लगता है। सुबह के समय वायुमण्डल में आर्द्रता की मात्रा सर्वाधिक होती है। 

तापमान– मानसूनी वर्षा के आरम्भ के साथ ही तापमान में कमी आरम्भ हो जाती है। राजस्थान के मरूस्थलीय भागों को छोड़कर प्रायः पूरे देश में तापमान लगभग समान रहता है। लम्बे समय तक शुष्क मौसम होने पर तापमान में वृद्धि होती है। जून में देश भर में तापमान अधिकतम होता है। जुलाई और अगस्त में तापमान क्रमशः गिरने लगते हैं। प्रायद्वीपीय भाग में जून का तापमान मई की तुलना में 3⁰ से 6⁰ सेग्रे तक घट जाता है। देश के उत्तरी–पश्चिमी भाग में जुलाई के तापमान में 2⁰ से 3⁰ सेग्रे की कमी आ जाती है। जुलाई में अधिकतम तापमान थार के रेगिस्तान में 40⁰ सेग्रे पाया जाता है। सितंबर के महीने में भी यहाँ का तापमान 38 सेग्रे तक पाया जाता है। जबकि अन्य मैदानी भागों में औसत तापमान 30⁰ से 32⁰ सेग्रे के बीच रहता है। देश के अधिकांश भागों में सापेक्षिक आर्द्रता उच्च स्तर पर (80-90%) रहती है। केवल मरूस्थलीय भागों में आर्द्रता की मात्रा कम होती है। 

वर्षा– दक्षिणी भारत की प्रायद्वीपीय अवस्थिति के कारण दक्षिणी–पश्चिमी मानसून दो शाखाओं में बँट जाता है। इनमें से एक शाखा अरब सागर और दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी की ओर से देश में प्रवेश करती हैं। ये दोनों शाखाएँ देश के अलग–अलग भागों में वर्षा प्रदान करती हैं–

अरब सागरीय मानसून– इस शाखा का प्रभाव पश्चिमी घाट के पश्चिम की ओर ही अधिक होता है और पूर्व की ओर इसका प्रभाव घटता जाता है। यह शाखा देश के पश्चिमी तट,पश्चिमी घाट,महाराष्ट्र,गुजरात और मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में वर्षा प्रदान करती है और अन्त में पंजाब के मैदान एवं निकटस्थ हिमालय के पास बंगाल की खाड़ी वाली मानसूनी शाखा से मिल जाती है। यह शाखा तीन दिशाओं से भारत में प्रवेश करती है– 

(i) पश्चिमी घाट की शाखा– यह शाखा सर्वप्रथम पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से टकराती है और पश्चिमी तट और पश्चिमी घाट पर अत्यधिक वर्षा करती है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से टकराकर ये मानसूनी हवाएँ ऊपर उठती हैं और तटीय प्रदेशों की तुलना में पहाड़ी ढलानों पर अत्यधिक वर्षा करती हैं जिससे अनेक नदियों को जल प्राप्त होता है। पश्चिमी घाट को पार करते समय इनकी आर्द्रता समाप्तप्राय हो जाती है। साथ ही पश्चिमी घाट को पार कर नीचे उतरते हुए ये और गर्म और शुष्क हो जाती हैं। फलतः पठार के भीतरी भाग पर वृष्टि छाया क्षेत्र बन जाता है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तट पर 240 सेमी वर्षा होती है जबकि यहाँ से केवल 160 किमी पूर्व की ओर वर्षा की मात्रा केवल 50 सेमी रह जाती है। इस शाखा का प्रभाव दक्षिण से उत्तर की ओर घटता जाता है। मंगलौर में वर्षा का औसत 300 सेमी रहता है जबकि रत्नागिरि में 250 सेमी,मुम्बई में 180 सेमी और सूरत में 105 सेमी वर्षा होती है। पश्चिमी घाट में स्थित महाबलेश्वर में वर्षा का औसत 650 सेमी रहता है जबकि तट पर स्थित मुम्बई में यह 180 सेमी है। महाबलेश्वर के पूर्व की ओर केवल 105 किमी की दूरी पर स्थित गोकक में केवल 55 सेमी वर्षा होती है और पुणे में केवल 50 सेमी। 

(ii) मध्य भारत की शाखा– अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा मध्य भारत में नर्मदा और ताप्ती नदियों की घाटी में होती हुई गुजरात,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड तक पहुँच जाती है। यहाँ लगभग 125 सेमी वर्षा होती है। झारखण्ड में यह बंगाल की खाड़ी की शाखा से मिल जाती है। पश्चिमी तट पर नर्मदा और ताप्ती नदियों के मुहाने वाले भाग में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों जैसा कोई अवरोध न पाये जाने के कारण ही इस शाखा का मध्य भारत में प्रवेश संभव हो पाता है।
 
(iii) उत्तरी शाखा– अरब सागरीय मानसून की एक शाखा गुजरात,कच्छ की खाड़ी और राजस्थान काे पार करके,बिना वर्षा किये हुए सीधे उत्तरी–पश्चिमी हिमालय से टकराती है और जम्मू–कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के पहाडी ढालों पर अधिक वर्षा करती है। पर्वतों की ऊँचाई से नीचे मैदानों की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है। राजस्थान में 25 सेमी से भी कम वर्षा होती है। राजस्थान के पश्चिमी भाग में वर्षा की मात्रा और भी कम रह जाती है। राजस्थान में ऐसा कोई पर्वत नहीं है जो इन हवाओं को रोककर वर्षा करा सके। राजस्थान में अरावली की पहाड़ियों की दिशा इन हवाओं के समानान्तर होने के कारण मानसूनी पवनों के मार्ग में कोई अवरोध नहीं उत्पन्न होता जिससे बारिश हो सके। अरावली पहाड़ियों के दक्षिणी ढालों पर साधारण वर्षा हो जाती है। 
राजस्थान के शुष्क होने के कई कारण बताये जाते हैं–

i– इस भूभाग में मानसूनी पवनों के सामने कोई पर्वत स्थित नहीं है जिसके अवरोध के कारण वर्षा हो। अरावली पहाड़ियों के इन हवाओं के समानान्तर स्थित होने के कारण ये बिना रोक–टोक आगे निकल जाती हैं। 
ii– बलूचिस्तान के पठार की ओर से आने वाली पछुआ पवनें स्वभावतः शुष्क होती हैं जो इन हवाओं से मिलकर इनकी नमी कम कर देती हैं जिससे इन हवाओं की वर्षा करने की क्षमता और भी कम हो जाती है।
iii– बंगाल की खाड़ी वाले मानसून की हवाएँ जब पूरे मैदानी भाग को पार कर यहाँ तक पहुँचती हैं तो उनकी नमी लगभग समाप्त हो चुकी होती है। अतः मानसून की इस शाखा से भी इस भाग में बारिश की कोई संभावना नहीं रह जाती।
iv– केन्ड्रयू और स्टाम्प महोदय के अनुसार,अरब सागरीय मानसून की उत्तरी सीमा खम्भात की खाड़ी ही है। अतः मानसून के आगे न पहुँचने के कारण राजस्थान में वर्षा नहीं हो पाती। 

अरब सागरीय मानसून,देश के पश्चिमी भागों में बंगाल की खाड़ी के मानसून से पहले प्रवेश कर जाता है। पंजाब,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों में अरब सागरीय मानसून द्वारा ही वर्षा प्राप्त होती है। 
बंगाल की खाड़ी का मानसून– मानसून की इसी शाखा से भारत के अधिकांश भागों में वर्षा होती है। इस शाखा को भी कई भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है–

(i) मेघालय शाखा– बंगाल की खाड़ी से निकलकर मानसूनी पवनें सर्वप्रथम म्यांमार के अराकान तथा तेनासरिम पर्वतों से टकराती हैं। इसके पश्चात् आगे बढ़कर मानसूनी पवनें मेघालय पठार पर स्थित गारो और खासी पहाड़ियों से टकराती हैं। इन पहाड़ियों के दक्षिणी ढाल या समुद्राभिमुखी ढाल पर बसे चेरापूँजी में,संसार में सबसे अधिक वर्षा होती है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 1080 सेमी होती है। चेरापूँजी में इतनी अधिक वर्षा होने के कई भौगोलिक कारण हैं। मानसूनी पवनें समुद्र से आकर यहाँ सीधे टकराती हैं। चूँकि इन हवाओं में नमी की मात्रा अत्यधिक होती है अतः पहाड़ों से टकराकर वे यहाँ भारी वर्षा करती हैं। गारो,खासी और जयन्तिया पहाड़ियाँ यहाँ तीन ओर से घिरकर एक कीपनुमा आकृति बनाती हैं जो समुद्र की ओर खुली हुई है। इस कारण मानसूनी हवाएँ इनसे टकराकर शीघ्रता से ऊपर उठ जाती हैं और भारी वर्षा कर देती हैं। इन पहाड़ियों के उत्तर में स्थित ब्रह्मपुत्र घाटी वृष्टि छाया क्षेत्र में आ जाती है जिससे शिलांग में केवल 140 व गुवाहाटी में 100 सेमी वर्षा होती है। 

(ii) उत्तरी–पूर्वी शाखा– मेघालय पठार के साथ साथ बंगाल की खाड़ी के मानसून की मुख्य शाखा असम और पूर्वांचल के पर्वतीय भूभागों से टकराती है तो इसके दो भाग हो जाते हैं। एक भाग ब्रह्मपुत्र की घाटी में पूर्व की ओर चला जाता है जबकि दूसरा भाग पश्चिम की ओर मुड़कर गंगा के मैदान को पार कर पंजाब तक चला जाता है। पर्वतीय भागों पर जब इन हवाओं की सघनता बढ़ जाती है और पीछे से इन पर हवाओं का भारी दबाव पड़ता है तो ये मानसूनी हवायें हिमालय के सहारे उत्तर–पश्चिम और पश्चिम की ओर बढ़ती हुई भारी वर्षा करती हैं। जैसे जैसे ये पश्चिम की ओर बढ़ती हैं,वर्षा की मात्रा घटती जाती है। उदाहरण के लिए दार्जिलिंग में 250,मसूरी में 206 और शिमला में 122 सेमी वर्षा होती है। इसी तरह मैदानी भागों में कोलकाता में 119 सेमी,पटना में 105 सेमी,प्रयागराज में 76 सेमी,दिल्ली में 46 सेमी और गंगानगर में 25 सेमी वर्षा होती है। इसी तरह पहाड़ी भागों से दूरी बढ़ने पर भी वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जैसे नैनीताल में 206 सेमी,बरेली में 110 सेमी,मेरठ में 83 सेमी,आगरा में 68 सेमी और ग्वालियर में 58 सेमी वर्षा होती है। 

(iii) उत्तरी–पश्चिमी शाखा– बंगाल की खाड़ी का मानसून उड़ीसा से होकर भी मध्य उत्तरी भारत में प्रवेश करता है। इस शाखा से छोटा नागपुर के पठारी भाग में वर्षा होती है। साथ् ही ये पवनें उत्तरी मैदानी भागों में प्रवाहित होने वाली मानसूनी पवनों को सघनता प्रदान करती हैं। इससे उन भागों में वर्षा की मात्रा बढ़ जाती है। 

वर्षा का वितरण– भारत में आर्द्र जलवायु वाले भागों में भी वर्षा लगातार नहीं होती वरन रूक–रूक कर होती है। कोलकाता में वर्षा–काल में दो दिनों में एक दिन आर्द्र होता है। वर्ष के कुल 85 आर्द्र दिनों में से 62 आर्द्र दिन जून से सितंबर के मध्य होते हैं। दिल्ली में वर्षा ऋतु के 4 दिनों में से एक दिन आर्द्र होता है। जम्मू–कश्मीर व तमिलनाडु के कुछ भागों को छोड़कर देश के लगभग सभी भागों में जून से सितंबर माह के दौरान दक्षिण–पश्चिम मानसून से वर्षा होती है। पश्चिमी घाट व पश्चिमी तट,असम,दक्षिणी मेघालय,मणिपुर,त्रिपुरा,नागालैण्ड,अरूणाचल प्रदेश में वर्षा की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह 200 सेमी से भी अधिक होती है। राजस्थान के सभी भागों,पंजाब,हरियाणा,पश्चिमी व दक्षिणी–पश्चिमी उत्तर प्रदेश,पश्चिमी मध्य प्रदेश तथा पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित दक्कन का लगभग पूरा पठार 100 सेमी से भी कम वर्षा प्राप्त करता है। देश के शेष सभी भाग जिसमें तटीय तमिलनाडु,पश्चिम बंगाल,ओडिशा,झारखण्ड,छत्तीसगढ़,तेलंगााना,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश व जम्मू कश्मीर के पर्वतपदीय प्रदेश के दक्षिण में फैली सँकरी पेटी में वर्षा का औसत मध्यम होता है और यहाँ 100 से 200 सेमी के मध्य वर्षा प्राप्त होती है। उत्तरी भारत का मध्यवर्ती भाग,जो गंगा और नर्मदा घाटी के मध्य ओडिशा से लेकर अरावली तक फैला है,में कम वर्षा प्राप्त होती है। यहाँ अरब सागर के मानसून और बंगाल की खाड़ी के मानसून,दोनों का प्रभाव कम होता है।

दक्षिणी–पश्चिमी मानसून के समय उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात भी सक्रिय होते हैं। बंगाल की खाड़ी में ये विशेष रूप से पाये जाते हैं। गंगा,महानदी,गोदावरी एवं कावेरी नदियों के डेल्टाई भागों में प्रवेश करके ये चक्रवात भयंकर वर्षा कराते हैं और बाढ़ एवं विनाश का कारण बनते हैं। अरब सागर में चक्रवात मंद रहते हैं और इनकी संख्या भी कम होती है। बंगाल की खाड़ी में जुलाई से नवंबर तक और अरब सागर में मई–जून और नवंबर में ये उत्पन्न होते हैं।









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