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Friday, July 30, 2021

विक्रमशिला–गौरवशाली अतीत

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4 लेन के बरौनी–पूर्णिया हाइवे पर मेरी बाइक धुआँधार भागने लगी। लेकिन यह खुशी कुछ ही किलोमीटर जाने के बाद काफूर हो गयी। दरअसल यह एक निर्माणाधीन हाइवे है और काफी दूर तक मुझे गिट्टी पड़ी सड़क पर ही चलना पड़ा। अभी इसे फोर लेन बनाने की शुरूआत भर हो सकी है। लब्बोलुआब ये कि सड़क दो लेन की ही थी और नतीजा ये कि यात्रा में समय अधिक लगने वाला था। अब मेरी मंजिल थी भागलपुर या फिर भागलपुर के आस–पास स्थित कोई अन्य महत्वपूर्ण स्थल। लगभग सीधी सड़क कभी गंगा के पास तो कभी दूरी बनाते हुए चल रही थी। खगड़िया के बाद तो यह गंगा और कोसी के दोआब क्षेत्र में प्रवेश कर गयी। वैसे तो यह अप्रैल का महीना था लेकिन नदियों ने पर्याप्त हरियाली उपजा रखी थी। नदियों के बीच फैला ये हरा–भरा इलाका सुन्दर तो लग रहा था लेकिन शायद ये इसकी पूरी सच्चाई नहीं थी। कोसी नदी बाढ़ों के लिए कुख्यात रही है। कोसी के गीत बिहार के आमजन में अभी भी प्रचलित हैं। अब इसे भले ही बेड़ियाँ पहना दी गयी हों लेकिन मानसून के मौसम में यह डराती तो अब भी है।
बेगूसराय से 105 किलोमीटर दूर,नौगछ्यिा से थोड़ा सा पहले तेतरी नामक स्थान पर एक चौराहा है जहाँ से दक्षिण की ओर घूमकर 20 किलोमीटर की दूरी पर,गंगा उस पार भागलपुर शहर बसा हुआ है। आज का दिन और रात भागलपुर के लिए ही समर्पित थी। तो मैंने भागलपुर शहर से पहले गंगा नदी पर बने,4700 मीटर लम्बे विक्रमशिला सेतु काे पार किया और भागलपुर शहर की सीमा में दाखिल हो गया। भागलपुर के पास मेरे दो लक्ष्‍य थे– एक तो विक्रमशिला विश्वविद्यालय के खण्डहर और दूसरा मंदार पहाड़ी। नदी पार कर भागलपुर शहर के पास मैं जहाँ पर खड़ा था,वहाँ से मुझे विक्रमशिला जाना उचित प्रतीत हुआ तो मैं बायीं तरफ कहलगाँव की ओर चल पड़ा।
कहलगाँव गंगा के किनारे ही बसा हुआ है। भागलपुर से कहलगाँव की दूरी केवल 32 किलोमीटर है और कहलगाँव से 12 किलोमीटर की दूरी पर विक्रमशिला। कुछ ही किलोमीटर चलने के बाद इस सड़क ने अपने रंग–ढंग दिखाने शुरू कर दिये। मुझे लगा भागलपुर से कहलगाँव की ये सड़क शायद बिहार की सबसे दलित–शोषित सड़क है। सामने देखकर यह तो महसूस हो जा रहा था कि यह सड़क है लेकिन इससे अधिक इसे सड़क के रूप में परिभाषित करने लायक कुछ भी नहीं था। सड़क के दोनों तरफ फैले ईंट–भट्ठों को देखकर तो यही लग रहा था कि पूरे हिन्दुस्तान में ईंटों की सप्लाई यहीं से होती है। ट्रक और ट्रैक्टर–ट्रेलरों ने तो अन्धेरगर्दी मचा रखी थी। अभी शायद इससे भी कुछ कमी पड़ी तो पानी के टैंकरों ने पानी गिराकर कीचड़ की एक मखमली परत बिछा दी थी। शस्य श्यामला कही जाने वाली धरती को धूल और गर्द से भर दिया गया था। मतलब मेरे आने की खुशी में पूरी तैयारी कर ली गयी थी और मैं मन में कल की बेगूसराय की यादें लिए मन ही मन खीझ रहा था। मु्झे याद ही नहीं रहा कि मैं विक्रमशिला के खण्डहर देखने जा रहा हूँ। अभी तो खण्डहर बनी सड़क ही सामने दिख रही थी। एक तो गड्ढों वाली सड़क और उस पर पानी गिरने से पैदा हुई फिसलन। कोढ़ में खाज। 

कमरतोड़ मेहनत करने के बाद मैं कहलगाँव पहुँचा। कहलगाँव कस्बा पार करने के बाद सिंगल लेकिन ठीक–ठाक गँवई सड़क मिली तो शरीर को थोड़ी राहत मिली और मन को सुकून। गाँवों और खेतों के बीच से गुजरते रास्ते को देखकर लगता ही नहीं कि हम किसी अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के पुरातात्विक स्थल की ओर जा रहे हैं। बाहर के या दूर के कितने लोग इसे देखने आते हाेंगे,कहना मुश्किल है। क्योंकि न तो रास्ता ही सीधा है,न यहाँ पहुँचने का कोई साधन। अपनी गाड़ी न हो तो यहाँ पहुँचना मुश्किल ही नहीं,लगभग असंभव है। पता नहीं कोई ट्रैवेल एजेण्ट इसे अपने पैकेज में शामिल करता होगा कि नहीं। रास्ते के किनारे जगह–जगह पुरातत्व विभाग के कुछ बोर्ड लगे हुए हैं लेकिन बिना रास्ता पूछे यहाँ पहुँचना काफी मुश्किल है।
सारी जद्दोजहद के पश्चात दिन के 11 बजे मैं विक्रमशिला पहुँचा। विक्रमशिला मतलब विक्रमशिला के खण्डहर। यहाँ विक्रमशिला नाम का न तो कोई शहर है न गाँव। पुरातात्विक स्थल की चारदीवारी के मुख्य द्वार के बाहर गुमटियों में अपना आशियाना बनाये दो–चार दुकानदार हैं जो अप्रैल की दुपहरी में पहुँचे मेरे जैसे यात्रियों को कोल्ड ड्रिंक की बोतलें उपलब्ध कराते हैं और बाइकों व उन पर लदे सामान की देखभाल करते हैं। मैं जब वहाँ पहुँचा तो दो–तीन चारपहिया गाड़ियाँ पहले से खड़ी थीं और इन गाड़ियों से उतरे,विभिन्न आकृतियों में दाढ़ी व बाल की कटिंग कराये कुछ नवयुवा थें जो विभिन्न आकार–प्रकार की मुद्राओं में सेल्फी ले रहे थे। मेरे लिए अच्छी बात ये थी कि ये विक्रमशिला के खण्डहरों का परित्याग कर ये अब बाहर आ चुके थे और उसे मुझ अकेले के लिए खुला छोड़ दिया था नहीं तो मुझे एक फोटो खींचने के लिए उनके पीछे अपनी बारी का इन्तजार करना पड़ता। वैसे भी इस समय तेज धूप अपनी रंगत में आ रही थी। मैंने पास की एक दुकान से कोल्ड ड्रिंक की बोतल खरीदी,बाइक और उस पर बँधा बैग दुकानदार के हवाले किया और 25 रूपये की टिकट खरीदकर गेट से अन्दर प्रवेश कर गया।

गेट से अन्दर प्रवेश करते ही बायीं तरफ संग्रहालय बना हुआ है जबकि थोड़ा सा आगे बढ़कर दाहिनी तरफ उत्खनित क्षेत्र अवस्थित है। मैं उत्खनित क्षेत्र की ओर बढ़ गया। यह एक काफी बड़ा क्षेत्र है जो इस विश्वविद्यालय की तत्कालीन भव्यता को प्रदर्शित करता है। प्रांगण में इसके बारे में जानकारी प्रदान करते कई सूचना–पट्ट लगे हुए हैं। कहते हैं कि यह विश्वविद्यालय सौ एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ था। इसकी स्थापना आठवीं शताब्दी के अंतिम चरण और नवीं शताब्दी के आरंभ में पाल नरेश धर्मपाल द्वारा की गयी थी। एक दिलचस्प तथ्य है कि इसके बारे में अधिकांश जानकारी भारतीय स्रोतों से न मिलकर तिब्बती स्रोतों से प्राप्त होती है। 16-17वीं शताब्दी के प्रसिद्ध तिब्बती इतिहासकार तारानाथ द्वारा दिये गये विवरणों से सर्वाधिक जानकारी प्राप्त होती है। इस विश्वदि्यालय के संस्थापक धर्मपाल को प्राप्त एक उपाधि ʺविक्रमशीलʺ के आधार पर इसका नाम विक्रमशिला विश्वविद्यालय पड़ा। एक किंवदन्ती के अनुसार इस स्थान पर विक्रम नामक यक्ष का इस स्थान पर दमन हुआ था और इसी कारण इसका यह नाम पड़ा। प्राचीन काल में इसे राजकीय विश्वविदयालय के नाम से जाना जाता था। इसके उत्खनन से प्राप्त कुछ मुहरों पर ʺराजगृह महाविहारेʺ अंकित है। ऐसा माना जाता है कि तिब्बत में इसे विक्रमशिला महाविहार के नाम से जाना जाता था जबकि भारत में राजगृह महाविहार इसका अधिक प्रचलित नाम था।

विश्वविद्यालय का पोषण बड़े–बड़े लोगों के दान और भेंट–उपहार से होता था। आवास और भोजन का प्रबन्ध विश्वविद्यालय की ओर से निःशुल्क किया जाता था। भिक्षु अध्यापक प्रबंधन में हाथ बँटाते थे। छः द्वार पण्डितों की समिति द्वारा इसका संचालन होता था जिसका प्रधान महास्थविर होता था। दसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इसके प्रथम द्वार पर कश्मीर निवासी रत्नध्वज,दि्वतीय द्वार पर गौड़ प्रदेश के निवासी ज्ञानश्रीमित्र,तृतीय द्वार पर रत्नाकर शांति,चतुर्थ द्वार पर बागीश्वर कीर्ति,पंचम द्वार पर परोक्ष तथा षष्ठ द्वार पर प्रज्ञाकर मति बैठते थे।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय अपने समय के विशालतम विश्वविद्यालयों में से एक था और इसका दो अन्य प्राचीन विश्वविद्यालयों,नालंदा और ओदन्तपुरी से भी घनिष्ठ सम्बन्ध था। कहते हैं कि यहाँ एक सौ से अधिक शिक्षक और एक हजार विद्यार्थी रहा करते थे। यहाँ के विद्वानों को बौद्ध शिक्षा,संस्कृति और धर्म का प्रसार करने के लिए दूसरे देशों में भी आमंत्रित किया जाता था। इस विश्वविद्यालय को रत्नवज्र,जेतारी,ज्ञान श्रीमित्र,रत्नकीर्ति एवं रत्नाकर शांति जैसे विद्वानों को उत्पन्न करने का श्रेय दिया जाता है। तिब्बत में लामा सम्प्रदाय के संस्थापक आतिश दीपंकर भी यहीं के विद्वान थे। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन के मुख्य विषय अध्यात्म,दर्शन,व्याकरण,तत्वज्ञान,तर्कशास्त्र एवं तंत्रशास्त्र इत्यादि थे लेकिन इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय तंत्रशास्त्र ही था क्योंकि विक्रमशिला महाविहार का उत्कर्षकाल तंत्र–मंत्र एवं जादू–टोने का युग था। इस समय हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही धर्माें के अनुयायी तंत्रशास्त्र एवं गूढ़विद्या में अधिक रूचि लेते थे। आधुनिक विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक अथवा प्रबन्धकारिणी समिति की भाँति विक्रमशिला विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापकों की एक परिषद हुआ करती थी जो विश्वविद्यालय प्रबन्धन के साथ साथ अध्यापकों को आवश्यक दिशा–निर्देश देने का कार्य भी करती थी। यह परिषद नालंदा विश्वविद्यालय के कार्यकलाप पर भी नियंत्रण रखती थी तथा दोनों के बीच अध्यापकों और विद्वानों का विनिमय भी होता था। कार्य एवं प्रबन्धन का ऐसा पारस्परिक सहयोग संभवतः शासक धर्मपाल के कारण था जिनका राजकीय प्रश्रय दोनों ही विश्वविद्यालयों को प्राप्त था। वर्तमान में प्रचलित दीक्षान्त समारोह की भाँति विक्रमशिला में भी सफल छात्रों की उपाधियाँ तत्कालीन राजा द्वारा स्वयं प्रदान की जाती थीं।

लगभग 400 वर्षाें के वैभवकाल के पश्चात 1203 ई0 में बख्तियार खिलजी ने इसे तोड़ कर और जलाकर नष्ट कर दिया। उसने इसे दुर्ग समझ रखा था और इसी कारण इसे तोड़ा। तबकात्–ए–नासिरी में इसका विवरण दिया गया है,जिसके अनुसार यहाँ के अधिकांश निवासी ब्राह्मण या बौद्ध भिक्षु थे। सभी सिर मुड़ाए हुए थे। इन सबको तलवार के घाट उतार दिया गया। हिन्दू धर्म से सम्बन्धित सैकड़ों पुस्तकें भी थीं,जिन्हें समझाने के लिए मुसलमानों ने बचे हुए अन्य पण्डितों को बुलाया लेकिन कोई भी पण्डित अर्थ को ठीक से न समझ पाया क्योंकि सभी विद्वान मारे जा चुके थे। सब कुछ देखने–समझने के बाद मन में दो मिनट के लिए अवसाद भर गया। आज जो खण्डहर दिख रहा था उसका अतीत बहुत ही गौरवशाली था। इसने सम्पन्न वैभव भी देखा और विपन्न विनाश भी। हम इसकी यादों को सँजो पायें,हमारे लिए यही बहुत है।

वर्तमान स्थल पर उत्खनन का कार्य सर्वप्रथम पटना विश्वविद्यालय द्वारा 1960-69 के बीच कराया गया। तत्पश्चात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1972-82 में उत्खनन कार्य कराया गया जिसके फलस्वरूप एक विशाल वर्गाकार महाविहार,केन्द्र में क्रॉस के आकार का स्तूप,एक ग्रंथागार तथा मनौती स्तूपों के समूहों के भग्नावशेष प्रकाश में आए। विहार के उत्तर में एक तिब्बती मंदिर व एक हिन्दू मंदिर सहित अन्य अनेक भवनों के अवशेष भी प्राप्त हुए। इसी क्रम में स्थापत्य शिलाखण्ड,बौद्ध एवं हिन्दू धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ,पकी मिट्टी से बनी मानव,पशु व पक्षी आकृतियाँ,मुद्राएँ,खिलौने,मनके,मृद्भाण्ड,अभिलेख,चाँदी एवं ताँबे के सिक्के व मृण्मय फलक सहित पत्थर,लोहे,ताँबे,काँसे,सोने,चाँदी,हड्डी एवं हाथी दाँत से निर्मित अनेकों पुरावशेष प्राप्त हुए हैं जिनसे पालयुगीन इतिहास,कला,स्थापत्य एवं संस्कृति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

लगभग दो घण्टे तक अर्थात 11 बजे से 1 बजे तक खड़ी धूप की दोपहरी विक्रमशिला के खण्डहरों में बिताकर मैं बाहर निकला। पुरातत्व विभाग ने पीने का पानी उपलब्ध करा दिया था जो मैंने बोतल में भर लिया था। बाइक और उस पर बँधा बैग धूप की वजह से इतने गर्म हो गये थे कि छूना भी मुश्किल लग रहा था। वैसे मेरा रूकना भी मुश्किल था। उसी तेज धूप में मैं वापस लौट चला। विक्रमशिला से 2-3 किलोमीटर पहले बटेश्वर स्थान नामक जगह पर,बिल्कुल गंगा किनारे एक शिव मंदिर है। स्थानीय भाषा में यह बटेसर–थान है। धूप से बेहाल मैं थोड़ी देर आराम करने की नीयत से इस मंदिर में पहुँच गया। मंदिर में तो कुछ खास देखने लायक नहीं है लेकिन मंदिर के पीछे गंगा का विस्तृत पाट और पास में दिखतीं टीलेनुमा पहाड़ियाँ सुंदर दिखती हैं। पिकनिक मनाने लायक अच्छा स्थान है। पास के गाँव के बच्चे और जवान नदी के किनारे पत्थरों पर उछलते–कूदते पिकनिक मना रहे थे। कहीं दूर से आया एक युगल नदी में नहा लेने के बाद कपड़े बदलने की जद्दोजहद में बुरी तरह से परेशान था। चूँकि मेरा दर्शन और स्नान से कोई खास लगाव नहीं रहता,तो कुछ देर छाँव में बिताने के बाद मैं आगे बढ़ चला।

बटेश्वर स्थान के पास गंगा नदी



विक्रमशिला के मुख्य स्तूप के खण्डहर




















अगला भाग ः मंदार पहाड़ी पर

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