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Friday, April 24, 2020

भारत की जलवायु–3

 
2. शरद ऋतु (15 सितंबर से 15 दिसंबर)–  इस ऋतु का प्रभाव सितंबर के मध्य से दिखना शुरू हो जाता है। इस समय दक्षिणी–पश्चिमी मानसून उत्तरी भारत से लौटना शुरू कर देता है।

वायुदाब– सितंबर के अन्त तक सूर्य कर्क रेखा से लौटकर विषुवत् रेखा पर पहुँच जाता है। इसी के साथ कम वायुदाब का क्षेत्र भी अपना स्थान बदलने लगता है। अक्टूबर में यह बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ता है। इसके बढ़ने की गति का मानसूनी हवाएँ अनुसरण करती हैं। ऐसी अवस्था में मानसून लौटने लग जाता है। वैसे मानसूनी हवाएँ उतनी शीघ्रता से नहीं लौटती जितनी तेजी से वे आती हैं। पहले तो वर्षा की मात्रा कम होने लगती है,सितंबर के अन्त तक तो उत्तरी मैदानी भाग में वर्षा प्रायः बन्द ही हो जाती है।

Friday, April 17, 2020

भारत की जलवायु–2


 (B) दक्षिण–पश्चिमी मानसून काल


1. आर्द्र ग्रीष्म ऋतु (15 जून से 15 सितम्बर)– भारत में इसे वर्षा ऋतु भी कहा जाता है। इस समय भारत का मौसम उत्तरी–पूर्वी मानसून काल की तुलना में पूरी तरह परिवर्तित हो जाता है। मानसून के कारण भारत में वर्षा की उत्पत्ति होती है। 

वायुदाब– मई के अन्त और जून के आरम्भ में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकने लगता है। कम वायुदाब और भी कम हो जाता है। इस न्यून वायुदाब का केन्द्र उत्तरी–पश्चिमी भारत पर विकसित हो जाता है। अरब सागर के उत्तरी भाग में स्थित एक लघु न्यून वायुदाब का केन्द्र समाप्त हो जाता है।

Friday, April 10, 2020

भारत की जलवायु–1

किसी भी स्थान या भूभाग की जलवायु के अन्तर्गत तीन प्रमुख तत्व होते हैं–

    1. तापमान,
    2. वायुदाब एवं
    3. वर्षा

इन्हीं तीन मुख्य तत्वों की प्रकृति और वितरण के बारे में किसी देश की जलवायु के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। देश जितना विशाल हो,जलवायु की विभिन्नताएँ उतनी ही अधिक होती हैं। भारत की जलवायु भी अत्यन्त जटिल है। कर्क रेखा अर्थात 23.5⁰ अक्षांश,देश के लगभग मध्य भाग से गुजरती है। इसका परिणाम यह होता है कि तापीय दृष्टिकोण से कर्क रेखा से उत्तर स्थित देश का लगभग आधा भाग शीतोष्ण कटिबन्ध में आता है जबकि कर्क रेखा के दक्षिण स्थित आधा भाग उष्ण कटिबन्ध में आता है।

Friday, April 3, 2020

भारत का अपवाह तंत्र–7

 राजस्थान की झीलें–

राजस्थान राज्य का अधिकांश भाग एक अर्द्धशुष्क अथवा शुष्क मरूस्थल के रूप में है अतः यहाँ आन्तरायिक अपवाह देखने को मिलता है। अर्थात यहाँ की नदियाँ मरूस्थल के मध्य किसी गर्त या झील में समाप्त हो जाती हैं और समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं। यहाँ की झीलें प्रायः खारे जल की होती हैं। साँभर,डीडवाना,जयसमंद,पुष्कर,राजसमंद,लूनकरनसर,उदय सागर,पिछोला,फलोदी,कछोर,फतेह सागर आदि यहाँ की प्रमुख झीलें हैं।