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Friday, May 4, 2018

कालिंजर

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आज खजुराहो में मेरा तीसरा दिन था। वैसे तो खजुराहो आने वाले पर्यटक एक या दो दिन यहाँ ठहरने के बाद यहीं से वापस लौट जाते हैं अर्थात खजुराहो आने का मतलब यहाँ मंदिरों की दीवारों पर बनी बहुचर्चित मूर्तियों का दर्शन और फिर जल्दी से खजुराहो से पलायन,लेकिन मेरा कार्यक्रम कुछ और ही था। खजुराहो आने का मतलब ही क्या जब तक कि चंदेलों के इतिहास को अच्छी तरह से न खंगालें। चूँकि कालिंजर अतीत में चंदेलों की राजधानी रहा है और एक ऐसा भी दौर गुजरा जबकि कालिंजर का किला सत्ता का केन्द्र रहा। तो बिना कालिंजर की यात्रा किये खजुराहो यात्रा अधूरी रहती।

कालिंजर पर कब्जे के लिए तमाम लड़ाइयां लड़ी गयीं। अतः मेरे मन में इस किले के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण था तो आज मैं कालिंजर के रास्ते पर था। इतिहास में कालिंजर और खजुराहो भले ही परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रहे हों लेकिन वर्तमान में राजनीतिक रूप से कालिंजर उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश का भाग होने के बावजूद इसकी लोकेशन बिल्कुल उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर है। मैंने गूगल मैप पर चेक किया तो इसकी खजुराहो से दूरी 127 किलोमीटर पता चली। और इतनी दूरी एक दिन में घूम कर वापस आना कोई असम्भव कार्य नहीं है। हाँ मुश्किल हो सकती है। मैंने एक दिन पूर्व ही खजुराहो के बस स्टैण्ड पर कालिंजर जाने के लिए बसों के बारे में पूछताछ की थी तो पता चला कि यहाँ से तो कोई बस नहीं है लेकिन पन्ना से जरूर मिल जायेगी। मुझे भी यह ठीक लगा। किसी बस के एक स्टाफ ने यह भी बताया कि सुबह सात बजे पन्ना के लिए बस मिलेगी। मैं बिल्कुल आश्वस्त हो गया। खजुराहो इतना बड़ा शहर या कस्बा नहीं है कि यहाँ से हर जगह के लिए गाड़ियां मिल सकें। वैसे मैंने अपने लॉज मैनेजर से कालिंजर के बारे में पूछा तो उसकी प्रतिक्रिया अधिक सकारात्मक नहीं थी। उसने जानकारी दी कि वहाँ कोई जाता नहीं है इसलिए गाड़ियां भी कम जाती हैं। आप अपनी गाड़ी बुक कर सकते हैं। विदेशी लोग तो वहाँ बिल्कुल नहीं जाते हैं। मुझे कुछ अजीब सा लगा। हो सकता है कालिंजर के किले में खण्डहर ही अधिक हों जिससे कोई उन्हें देखने न जाता हो। लेकिन खण्डहर हो जाने से इमारत का महत्व कम नहीं हो जाता। खण्डहर ही तो बताते हैं कि इमारत कितनी आलीशान थी। मेरा कालिंजर जाने का निश्चय और दृढ़ हो गया।
सुबह पन्ना की बस पकड़ने के लिए मैं 6.30 बजे कमरे से निकल पड़ा। लॉज से निकला तो रिसेप्शन हॉल में बैठे एक विदेशी पर्यटक से रोज की तरह हाय–हेलो हुई। वैसे खजुराहो में यह आम बात है कि सड़क पर चलते विदेशी मेहमान आपको हाय–हेलो बोल दें और लॉज के रिसेप्शन हॉल में तो इक्के–दुक्के विदेशी पर्यटक बैठे ही रहते थे– कोई अपना बैग सँभालते हुए तो कोई मोबाइल पर नजर गड़ाये हुए तो कोई टाइम पास करते हुए। हाँ इतना तय था बिना मुस्करा कर हेलो बोले बिना आपको जाने नहीं देंगे। मुझे यह अंदाज बहुत अच्छा लगा। भागते हुए दस मिनट में बस स्टैण्ड पहुँच गया। बस स्टैण्ड पर एक–दो बसें लगी थीं लेकिन पन्ना की बस का कहीं अता–पता नहीं था। पूछने पर पता चला कि पन्ना के लिए बमीठा से बस मिलेगी। मेरे मन के किसी कोने में इस बात का संदेह पहले से ही था। अब बमीठा के लिए ऑटो या जीप का इंतजार करना था। वैसे ये सब तो यात्रा का हिस्सा है। समय बिताने के लिए मैंने पास की दुकानों पर चाय का सहारा लिया।

6.55 पर मुझे बमीठा के लिए एक हरहराती हुई जीप मिली। किराया 20 रूपये। बस स्टैण्ड परिसर में ही एक तरफ ऑटो या टैक्सी स्टैण्ड है। जीप में कुछ ऐसी भी सवारियां बैठी थीं जिनका 'यात्रा–भविष्य' अनिश्चित था। स्थानीय भाषा में इनके मुख से निकलते हरहराते शोर को मैं कुछ खास समझ नहीं पा रहा था। सम्भवतः उन्होंने अभी यह तय नहीं किया था कि उन्हें बमीठा जाकर बस पकड़नी है या फिर बमीठा से 4 किमी पहले बने खजुराहो रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन पकड़नी है। इसलिए जब जीप खजुराहो रेलवे स्टेशन के करीब पहुँची तो पीछे बैठी सवारियों ने हरहराना शुरू किया और ड्राइवर ने जीप को रेलवे स्टेशन की ओर मोड़ लिया। जीप वाले का सौभाग्य और मेरा दुर्भाग्य कि सारी सवारियां वहीं उतर गयीं और मैं पैदल हो गया। अब जीपवाला बमीठा जाने को तैयार नहीं था। हाँ दूसरी गाड़ी पकड़ाने में उसने जरूर सहयोग किया। गनीमत यही थी कि मैंने किराया अभी नहीं दिया था। जल्दी ही एक 'जादू–गाड़ी' जिसे लोग मैजिक के नाम से भी जानते हैं, मिल गयी और 7.25 पर मैं हरहराते हुए खजुराहो से 11 किमी दूर बमीठा पहुँच गया।
बमीठा छतरपुर और पन्ना को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित है और खजुराहो के लिए प्रवेश द्वार का कार्य करता है। मैजिक से मेरे साथ ही उतरा एक व्यक्ति मुझे बार–बार दिलासा दे रहा था कि बहुत जल्दी ही बस मिल जायेगी। मेरी समझ में वह मु्झे कम और खुद को अधिक दिलासा दे रहा था। अपने काफी भारी–भरकम साजो–सामान के साथ कुछ स्थानीय लोग भी बस का इंतजार कर रहे थे। ज्यों–ज्यों देर हो रही थी त्यों–त्यों भीड़ बढ़ती जा रही थी। वैसे मेरे पास सामान अधिक न होने के कारण इस ओर से तो मैं निश्चिंत था लेकिन समय का नुकसान बहुत खल रहा था क्योंकि आज काफी यात्रा करनी थी और टुकड़ों में करनी थी।बमीठा में 15 मिनट के इंतजार के बाद मुझे पन्ना के लिए बस मिल गयी और आसानी से सीट भी मिल गयी। बमीठा से पन्ना की 36 किमी की दूरी का किराया 30 रूपये। मैंने जानबूझकर बस के केबिन में बिल्कुल आगे वाली सीट यानी बस की विण्ड स्क्रीन के पास वाली सीट कब्जा की ताकि सड़क के किनारे के कुछ दृश्य भी अासानी से दिखते रहें। वैसे इस सीट पर बैठने पर मन में काफी डर बना रहता है। बस के बगल से सटकर गुजरते लोगों को देखकर तो लगता है कि ये बिचारे तो बस के नीचे ही गये। बस के पिछले हिस्से में सीटों पर कब्जे के लिए पानीपत की लड़ाई चल रही थी। बस का कण्डक्टर बीच–बचाव कर रहा था।

मुझे पहले से ही पता था कि यह सड़क पन्ना नेशनल पार्क के कुछ हिस्सों से होकर गुजरती है। शायद कुछ वन्यजीव देखने को मिल जायें। बस चली तो सरपट भागते हुए लेकिन ज्यों–ज्यों राष्ट्रीय उद्यान नजदीक आता गया सड़क की दशा खराब होती गयी। बमीठा से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर केन नदी को पार करने के बाद बस पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश कर गयी। लेकिन मार्च का महीना और पथरीला धरातल। सूर्य की किरणों ने शायद यहाँ की सारी नमी सोख ली थी ओर पतझड़ ने पेड़ों से पत्ते छीन लिये थे। जंगल का रंग हरे से पीले या फिर भूरे में बदल चुका था। हाँ केन नदी जरूर अभी अपनी गति से पत्थरों से संघर्ष कर रही थी। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान विन्ध्य के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है और इस कारण सड़क में काफी मोड़ व चढ़ाई–उतराई है। जंगल में जगह–जगह सावधान करते वन विभाग के बोर्ड लगे थे। कहीं–कहीं तो वन विभाग द्वारा लिखी सूचनाएं पढ़कर हँसी छूट जा रही थी। कई जगह बोर्डाें पर लिखा था कि यहाँ झरने में स्नान करना मना है जबकि वहाँ झरने का नामोनिशान तक नहीं था। वस्तुतः मानसून के मौसम में यहाँ अनेकों तीव्र जलधाराएं उत्पन्न हो जाती होंगी और इन्हीं से सावधान करने के लिए यहाँ सूचना पट्ट लगे थे लेकिन इस समय तो ये बोर्ड हँसी के पात्र ही बने हुए थे।

8.30 बजे बस पन्ना पहुँची। हल्के नाश्ते का समय तो हो चुका था लेकिन प्राथमिकता बस की थी। इस बस से उतरकर मैं कालिंजर जाने वाली बस के फेर में पड़ा लेकिन पता लगा कि सीधे कालिंजर के लिए अभी कोई बस नहीं मिलेगी और मैं इंतजार करने के मूड में बिल्कुल भी नहीं था। कुछ बस कण्डक्टरों ने सलाह दी कि यहाँ से अजयगढ़ चले जाइये और वहाॅं से कालिंजर की बस मिल जायेगी। एक ने तो अागे बढ़कर यहाँ तक बताया कि, 'आप यूँ बस से उतरेंगे और वो बस बगल में लगी मिलेगी।' ऐसी आशावादिता मैंने और कहीं नहीं देखी थी। आगे बढ़ते जाओ इस आशा में कि वहाँ से आगे की बस मिल जायेगी। लेकिन वास्तविकता में ऐसा होता नहीं दिख रहा था। अजयगढ़ के लिए एक बस लगी थी तो मैं बिना वक्त गँवाये उसमे चढ़ लिया। 20 मिनट पन्ना में रूकने के बाद मेरी बस 8.50 पर अजयगढ़ के लिए चल पड़ी। अगर ऐसे ही बसों में चढ़ते–उतरते रहना होता और मध्य प्रदेश की सड़कों पर दौड़ते रहना हाेता तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन यहाँ तो घूम–फिर कर लौटना भी था क्योंकि मेरा साजो–सामान खजुराहो में ही मेरा इंतजार कर रहा था। पन्ना से अजयगढ़ की दूरी 33 किलोमीटर तथा किराया 30 रूपये। कुछ दूरी तक तो बस विरल आबादी वाले इलाके में चलती रही लेकिन उसके बाद आबादी विहीन इलाके में पहुँच गयी। यह क्षेत्र पन्ना राष्ट्रीय उद्यान का बफर जोन था। सड़क के किनारे यह सूचना प्रदान करते बोर्ड दिखायी पड़ रहे थे। सड़क में चढ़ाई–उतराई तो अधिक नहीं थी लेकिन मोड़ काफी थे। अजयगढ़ विन्ध्य पर्वत की तलहटी में बसा है इसलिए अजयगढ़ पहुँचने से कुछ किलोमीटर पहले सड़क तीखी उतराई उतरती है और हिमालयी मोड़ों जैसा आनन्द आता है। वैसे जंगलों के बीच चढ़ाई–उतराई वाले ये मोड़ बड़े–बड़े ट्रकों व बसों के लिए काफी खतरनाक हैं। कुछ मोड़ तो ऐसे मिले कि बिना एक बार बैक किये बस मुड़ ही नहीं सकी। मानसून के मौसम में यहाँ के जंगल तो हरे–भरे हो जाते होंगे लेकिन ये मोड़ और भी खतरनाक हो जाते होंगे।

10 बजे मैं अजयगढ़ पहुँचा। कालिंजर की बस के बारे में पता किया कि तो एक बस लगी थी। यह भी मालूम हुआ कि यह 10.30 बजे रवाना होगी। बड़ी उम्मीद में,लगे हाथ मैंने यह भी पूछ लिया कि यह कालिंजर कितने बजे पहुँचेगी। लेकिन जब बस के ड्राइवर ने 12 बजे का समय बजाया तो मेरा दिल बैठ गया। 30 किमी की दूरी,किराया 30 रूपया और समय डेढ़ घण्टा। ये किराये का 30 सुबह से ही पीछे पड़ा हुआ था। एक सीट पर बैग रखकर मैंने सीट कब्जा किया और ड्राइवर की अनुमति लेकर पेटपूजा करने के लिए उतर गया। बस स्टेशन परिसर में ही जलपान की तमाम दुकानें हैं। साथ ही खाना खिलाने वाले एक दो ढाबे भी हैं। और एक कोने में पब्लिक टायलेट भी है इसलिए निश्चिंत होकर जी भरकर खा सकते हैं। वैसे मैंने हल्का नाश्ता ही किया क्योंकि मुझे यात्रा करनी थी। साढ़े दस बजे बस कालिंजर के लिए रवाना हो गयी। थोड़ी ही देर में बस के लटके–झटके पता चल गये। इसका डेढ़ घण्टे का टाइम अन्यथा नहीं था। इसे प्रत्येक आधे–एक किलोमीटर पर रूकना था। अब डेढ़ की बजाय दो घण्टे भी लग जाएं तो इसमें बस का कोई गुनाह नहीं।
अजयगढ़ से कालिंजर के इस रास्ते में मध्य प्रदेश का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा था। सघन आबादी और इसी के अनुरूप सघन कृषि। मार्च के पहले सप्ताह में गेहँ की फसल अपने पूरे शबाब पर हवा के साथ लहरा रही थी। इकहरे बदन की सड़क के दोनों ओर बसे गाँव और गाँव में अधिकांशतः खपरैलों के घर। मेरी तरफ के गाँवों से खपरैलों की भरसक विदाई हो रही है लेकिन यहाँ ऐसी कोई बात नहीं लग रही थी। मिट्टी और खपरैल के घरों की दीवारों पर गहरा आसमानी रंग और दरवाजे के बाहर रंगोली तो नहीं लेकिन सुंदर आकृतियां बनाकर संवारने की कोशिश– बहुत अच्छा लग रहा था। भारत के वास्तविक गाँवों जैसा लग रहा था। बस की चाल से उत्पन्न तनाव इन्हीं दृश्यों में घुल रहा था।

12 बजे के आस–पास बस कालिंजर पहुँची। एक छोटे से चौराहे पर बस रूकी। छोटा सा कस्बा जैसा लग रहा था। या फिर मध्य प्रदेश के गाँवों जैसा कोई गाँव ही होगा। सड़क से कुछ हटकर कालिंजर का किला एक पहाड़ी की चोटी पर सीना ताने खड़ा था। अब चुनौती मेरे सामने थी कि इसे कैसे फतह किया जाय। मैंने कुछ गुणा–भाग किया तो समझ में आया कि सुबह 7 बजे मुझे जीप मिलने से लेकर कालिंजर पहुँचने तक 5 घण्टे बीत गये थे। अब दिन के शेष बचे समय में ही मुझे किला फतह कर वापस खजुराहो लौटना भी था। गाड़ियां मेरी मर्जी से मिलनी नहीं थीं। अपना माल–असबाब साथ लेकर निकला होता तो पन्ना में भी रूक सकता था लेकिन अब तो यह संभव नहीं था। मैंने किले  में पहुँचने के विकल्पों के बारे में पता करना शुरू किया। संयोग से जानकारी देने वाला सही आदमी मिल गया। वह कालिंजर चौराहे से चलने वाली गाड़ियों की नम्बरिंग करने वाला नम्बर टेकर था। उसने बताया कि अधिक चढ़ाई होने के कारण ऑटो ऊपर जा नहीं पायेगी और जीप वाले बहुत अधिक पैसा लेंगे। अगर आप पैदल चल सकते हैं तो सीढ़ियों से चढ़ जाइए और उतरते समय सड़क से नीचे चले आइए। पाँच किमी की दूरी है। और अगर तीन बजे तक आ जायेंगे तो अजयगढ़ के लिए बस भी मिल जायेगी क्योंकि उसके बाद बस साढ़ चार बजे है। मुझे बात जँच गयी। मैंने बिना समय गंवाये झटपट दो समोसे खाये,10 रूपये वाली एक कुल्फी खाई और रास्ता पूछते हुए कालिंजर किले की सीढ़ियों की ओर चल पड़ा।
शुरू–शुरू में तो सीढ़ियां चढ़ने में काफी मजा आ रहा था और समय की कमी होने के कारण मैं तेजी से ऊपर चढ़ा जा रहा था लेकिन सीढ़ियों की चढ़ाई ने थोड़ी ही देर में सारा जोश ठंडा कर दिया। ऊँची–ऊँची सीढ़ियां,तेज धूप,पतझड़ की मार से अधमरे पेड़ों से भरा सुनसान जंगल,पीठ पर पिट्ठू बैग और हजार के आस–पास सीढ़ियां– ये किसी को भी थका सकते हैं। और अब तो कुछ–कुछ डर भी लगने लगा था– इस सुनसान जगह में कोई आकर दो–चार तमाचे लगाये और कैमरा और मोबाइल छीन कर ले जाए तो.........।

सीढ़ियों पर बैठकर सुस्ताने भर का न तो समय था न ही जगह। पेड़ों में छाया बिल्कुल ही नहीं थी तो कहीं भी खड़े होने या बैठने का कोई मतलब नहीं था। एकाध मिनट तक रूककर थोड़ा विराम लेते हुए मैं सीढ़ियां चढ़ता गया और जब चलता गया तो अंत में मंजिल तक पहुँचना ही था। जब बिल्कुल किले के पास पहुँचा तो तीन–चार लड़के किले के गेट के पास सीढ़ियों पर टहलते हुए दिखाई पड़े। मन खुश हुआ कि चलो आदमी तो दिखे। दो मिनट बाद ही गेट से प्रवेश करके मैं किले के अंदर था और सामने था नीलकण्ठ मंदिर। यहाँ कुछ और लोग–बाग दिखे। एक ने तो मुझे फोटोवाला समझकर मुझसे फोटो बनवाने की फरमाइश भी कर डाली। पास में ही टोंटियां लगी दिखीं तो मैं उधर दौड़ा क्योंकि बोतल का पानी कब का खत्म हो चुका था और जोर की प्यास लगी थी। हाथ मुँह धाेकर तरोताजा होने और पानी पीने के बाद मैंने शिव जी का दर्शन किया,मंदिर के पुजारी से प्रसाद लिया और किले की ओर चल दिया। लेकिन सीढ़ियां अभी खत्म नहीं हुई थीं अर्थात पहाड़ी की चोटी अभी बाकी थी। जल्दी ही मैं चोटी पर भी पहुँच गया और अब कालिंजर का नक्शा कुछ–कुछ समझ आने लगा था। पुरातत्व विभाग द्वारा बनवाया हुआ पक्का रास्ता मिल गया और मैं उसी पर आगे बढ़ने लगा लेकिन जंगल की वजह से दूर तक कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। थोड़ी दूर बाद वह रास्ता दो भागों में बँट गया। मुझे जाना तो दाहिनी ओर चाहिए था लेकिन मैं बायीं ओर चल पड़ा। दाहिने जाने का फायदा यह रहा होता कि मैं किले की सारी इमारतों को क्रमवार देखते हुए सड़क मार्ग से बाहर निकल गया होता।

विन्ध्य पर्वत श्रृंखला में अवस्थित कालिंजर का किला कभी चंदेल राजवंश की सत्ता का केन्द्र रहा है। इसकी पश्चिम दिशा में यमुना की सहायक बाघिन नदी प्रवाहित होती है। कालिंजर शब्द कालंजर का अपभ्रंश है और कालंजर शिव का एक नाम है। पद्मपुराण के अनुसार यह स्थान शिव के सान्निध्य के कारण मोक्ष प्रदान करने वाला है। कालिंजर किले की समुद्रतल से ऊँचाई 375 मीटर है। आरम्भ में कालिंजर किले पर चेदि शासकों का आधिपत्य रहा। कालान्तर में यहाँ पाण्डु राष्ट्रकूट,गुर्जर प्रतिहार व कलचुरियों का भी शासन रहा। कुछ अन्य साक्ष्‍यों के अनुसार इस दुर्ग की नींव 978 ई0 में चंदेल शासक चन्द्रवर्मन नन्नुक ने रखी। इसके बाद यह लम्बे समय तक चंदेल शासन सत्ता का केन्द्र रहा। 1545 में शेरशाह सूरी ने कालिंजर पर आक्रमण किया और इसे अपने अधिकार में कर लिया किन्तु इसी अभियान में उसकी मृत्यु भी हो गयी। शेरशाह सूरी के बाद यह किला मुगलों के अधिकार में रहा। औरंगजेब के समय महाराजा छत्रसाल के नेतृत्व में बुन्देलों ने 18 दिन के घेरे के बाद किले पर अधिकार कर लिया। छत्रसाल ने मान्धाता चौबे को इस दुर्ग का दुर्गपति नियुक्त किया।
दुर्ग की आन्तरिक सुरक्षा प्राचीर लगभग 5 मीटर चौड़ी है। दुर्ग में प्रवेश हेतु मुख्य द्वार कालिंजर ग्राम की ओर से है जबकि दूसरा द्वार पन्ना द्वार था जो वर्तमान में बन्द है। मुख्य मार्ग पर सुरक्षा हेतु सात द्वार– आलमगीर द्वार,गणेश द्वार,चौबुर्जी द्वार,बुध–भद्र द्वार,हनुमान द्वार,लाल दरवाजा तथा बड़ा दरवाजा थे। दुर्ग के उत्तर–पश्चिम में नीलकंठ मंदिर नाम से भगवान शिव का मंदिर है। इसका गर्भगृह वृत्ताकार है जिसके सामने मण्डप बना हुआ है। दुर्ग की जलापूर्ति हेतु अनेक तालाब हैं। दुर्ग का सबसे बड़ा तालाब कोटितीर्थ सरोवर है जिसके पास अमान सिंह महल बना हुआ है। इस महल का निर्माण छत्रसाल के वंशज अमान सिंह ने कराया था।

नीलकंठ मंदिर से लगभग एक किमी की दूरी पर पूर्व दिशा में रानी महल तथा वेंकट बिहारी मंदिर के अवशेष हैं। वेंकट बिहारी मंदिर एक बुंदेलकालीन मंदिर है जो किले के लगभग बीच में अवस्थित है। मंदिर में एक गर्भगृह तथा उसके आगे एक आयताकार मण्डप बना है। गर्भगृह की छत के ऊपर बीचोबीच एक गुम्बदाकार शिखर बना है जो काफी दूर से ही दिख जाता है। छत के किनारों पर स्तंभयुक्त छोटी–छोटी छतरियां निर्मित की गयी हैं। शिखर के साथ ये छतरियां काफी सुंदर दृश्य उपस्थित करती हैं। मंदिर की पूर्व दिशा में रानी महल के खण्डहर हैं। यह एक बुंदेलकालीन दुमंजिला महल है जो अपने विशाल आकार और ऊँचाई के लिए प्रसिद्ध था। महल के अंदर एक खुला बरामदा है जो स्तम्भों पर टिका है। इन स्तम्भों पर विभिन्न प्रकार ज्यामितीय आकृतियां,फूल व बूटे बनाये गये हैं। महल के दुमंजिले प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग में स्तम्भों पर टिका एक छज्जा बनाया गया है जो प्रवेश द्वार को भव्यता प्रदान करता है। 
बांके बिहारी मंदिर की उत्तर दिशा में कुछ और पुरानी इमारतें दिखायी पड़ रही थीं तो मैं उधर ही बढ़ गया। यहाँ चौबे महल का बोर्ड लगा हुआ है। यह एक छोटे आकार का किन्तु दुमंजिला और आकर्षक भवन है जो खण्डहर में बदल चुका है। इसका प्रवेश द्वार सुंदर है। इसके अंदर रानी महल की ही तरह स्तम्भों पर टिके बरामदे बने हैं। चौबे महल के पास ही किले का सातवां या बड़ा दरवाजा अवस्‍िथत है। इन भवनों के बीच से गुजरती पक्की सड़क बनी है जो किले से बाहर निकलकर नीचे उतर जाती है। मुझे भी इसी सड़क से होकर जाना था लेकिन पीछे की ओर या दक्षिण दिशा में कुछ और भवन बने हुए हैं जिन्हें मैं अभी नहीं देख सका था इसलिए मैं उधर ही चल पड़ा। मेरे साथ साथ कुछ और भी लोग किले में टहल रहे थे जो अपनी दुपहिया या चारपहिया गाड़ियों से आये थे। सीढ़ियां चढ़कर आया हुआ मैं अकेला ही था।

किले की शेष इमारतों की ओर बढ़ा तो एक बोर्ड दिखा जिसपर कुछ इमारतों के नाम जैसे रंग महल,मोती महल,जकीरा महल तथा शनिचरी तलैया लिखा हुआ था। बोर्ड पर बने तीराें की दिशा में कई खण्डहर दिखायी पड़ रहे थे। उधर बढ़ा तो इन खण्डहरों को देखने वाले मेरे अलावा सिर्फ बंदर थे। इन खण्डहरों में इतने झाड़–झंखाड़ उगे हुए थे कि इनमें अंदर घुसना कठिन के अलावा डरावना भी है। इन खण्डहरों के बगल से बनी एक पगडंडी किले के किनारे–किनारे चलती हुई अमान सिंह महल की ओर चली जाती है। वैसे मैं पगडंडी छोड़कर मुख्य सड़क के रास्ते अमान सिंह महल की ओर चला।
बुंदेला राजा अमान सिंह का महल कोटितीर्थ जलाशय के पास स्थित है। महल के गेट में ताला बन्द था तथा गेट के पास एक चारपहिया गाड़ी व दो मोटरसाइकिलें खड़ीं थीं। यह इस बात का प्रमाण था कि अंदर कुछ कर्मचारीगण हैं लेकिन उनसे सम्पर्क करना और महल में प्रवेश करना संभव नहीं दिख रहा था। कालिंजर के किले में अनेक तालाब हैं जिनमें से अमान सिंह महल के पास बना कोटितीर्थ जलाशय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वैसे मौसम की वजह से इन तालाबों में इस समय पानी नाममात्र का ही दिखायी पड़ रहा था।

अब तक ढाई बज गये थे। अब मुझे बस की चिंता सताने लगी थी क्योंकि वापस भी लौटना था। किले का भ्रमण भी अब पूरा हो चुका था तो मैं सिर पर पैर रखकर भागा। वैसे तो मैं सीढ़ियों से भी उतर सकता था जिसमें समय कम लगता लेकिन रास्ते की जाँच करनी भी जरूरी थी तो मैं सड़क मार्ग से नीचे उतर पड़ा। और जितनी तेज मैं चल सकता था उतनी तेज चला। पाँच किमी की दूरी तय करनी थी। सीढ़ियों की चढ़ाई में सारी ऊर्जा खत्म हो गयी थी। गनीमत यही थी कि अब नीचे उतरना था। किले से नीचे उतरने के बाद बस स्टैण्ड तक पहुँचने के लिए भी एक किमी से कुछ अधिक ही दूरी तय करनी थी। मैं जी–जान से भाग रहा था और लगभग आधी दूरी तय भी कर चुका था तभी एक मोटरसाइकिल सवार मिल गया जिसने मुझे बस स्टैण्ड तक पहुँचाया। लेकिन तब तक 3.15 बज चुके थे और बस निकल चुकी थी। चौराहे पर उत्तर प्रदेश के बाँदा डिपो की दो रोडवेज बसें दिखायी पड़ रही थीं। अब अगली बस का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था और खजुराहो पहुँचना भी अब मुश्किल दिख रहा था कि तभी एक ऑटो वाला प्रकट हुआ जो अजयगढ़ जा रहा था। डूबते को तिनके का सहारा। मैं उसी ऑटो में सवार हो गया। कुछ और लोग भी आ गये। अजयगढ़ से कुछ किमी पहले इस ऑटो का भी तेल खत्म हो गया। कोढ़ में खाज वाली स्थिति पैदा हो गयी। किसी तरह से कहीं से डीजल की व्यवस्था हुई और 4.50 बजे मैं अजयगढ़ पहुँचा। अजयगढ़ पहुँचने से पहले ही पन्ना की एक बस निकलती दिखी और किसी तरह उसे रोक कर मैं बस में चढ़ा। साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिली। बस में काफी भीड़ थी और मैं किसी तरह खड़ा हो सका लेकिन इतनी तो आशा बँधी कि अब शायद खजुराहो पहुँच जाऊँगा। पौने छः बजे मैं पन्ना पहुँचा तो वहाँ भी छतरपुर के लिए बस लगी थी। चाय पीने भर का टाइम था। छः बजे यह बस भी चली और एक घण्टे में बमीठा पहुँच गयी। बमीठा से आटो से मैं 7.30 तक खजुराहो पहुँच गया। और दिन भर की मारामारी व भूखे रहने के बाद कम से कम डिनर के वक्त तो भरपेट वाली दावत बनती ही थी।

नीलकंठ मंदिर में स्थापित शिवलिंग व मंदिर के पुजारी
नीलकंठ मंदिर का प्रवेश द्वार
नीलकंठ मंदिर से ऊपर जाती सीढ़ियां
मंदिर परिसर में अंकित मूर्तियां
मंदिर परिसर में स्थित एक खंडित प्रतिमा

किले की दीवारों पर अंकित प्रतिमाएं

नीलकंठ मंदिर के ऊपर से
किले में एक स्थान पर पड़ी एक खंडित प्रतिमा
वेंकट बिहारी मंदिर व रानी महल
वेंकट बिहारी मंदिर
रानी महल
वेंकट बिहारी मंदिर
रानी महल का प्रवेश द्वार
चौबे महल का प्रवेश द्वार
किले का बड़ा दरवाजा
किले से नीचे उतरती सड़क

जब इतनी सुंदर पगडंडी हो तो कौन नहीं चलना चाहेगा
अमान सिंह महल के पास कोटितीर्थ जलाशय
अमान सिंह महल की ओर जाने वाले रास्ते पर सरोवर पर बना पुल

अमान सिंह महल

कोटितीर्थ जलाशय
अगला भाग ः अजयगढ़

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. खजुराहो–एक अलग परम्परा (पहला भाग)
2. खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)
3. खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)
4. खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)
5. कालिंजर
6. अजयगढ़

कालिंजर किले का गूगल मैप–

8 comments:

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद बड़े भाई। आप आए यह मेरे लिए सम्मान की बात है।

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  2. बहुत ही सुन्दर और रोचक यात्रा वृतांत। पिछले साल जाने का सोचा था यहाँ किन्तु पूरा समय चित्रकूट में ही खर्च जो गया , अब फिर कभी देखते हैं !! लिखते रहिये

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    1. धन्यवाद भाई जी। आपका आदेश है तो लिखता रहूँगा। वैसे कालिंजर का किला देखने लायक जगह है।

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  3. दिन भर की मारामारी में यह सब हो गया, यही बडी बात रही। विस्तार से लिखा यात्रा विवरण भी शानदार..

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    1. धन्यवाद भाई जी। घुमक्कड़ी में थाेड़ी मारामारी हो तो उसका मजा कुछ और बढ़ जाता है। शरीर को भले ही थोड़ा कष्ट होता है लेकिन वास्तविक आनन्द तो मन को आता है।

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  4. नमन है भाई आपकी घुमक्कड़ी को और आपके खोजने के जज्बे को...ग़ज़्ज़ब लिखते नही है...धन्यबाद आप जैसे हीरे के लेख हमे GDS में पढ़ने को मिले है

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    1. आपका प्रोत्साहन वह पारस पत्थर है प्रतीक भाई जो लोहे को भी हीरा बना देता है।

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