Friday, April 13, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)

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टिकट और बैग चेकिंग की सारी औपचारिकताएं पूरी करने और बैग चेक करने वाले सुरक्षाकर्मी से बैग में रखा खाने–पीने का सामान मंदिर परिसर के अंदर प्रयोग न करने का वादा करने के बाद मैं पश्चिमी मंदिर समूह के मंदिरों का बारीक निरीक्षण करने में लग गया। परिसर के अंदर बहुत अधिक भीड़ नहीं थी लेकिन जो भी थी आश्चर्यजनक थी। क्योंकि अधिकांश दर्शनार्थी,जो कि पूजार्थी न होकर केवल पर्यटक थे,विदेशी थे। अब हिन्दू मंदिरों के अधिकांश दर्शक विदेशी हों तो थोड़ा सा आश्चर्य तो पैदा होगा ही।
भेड़–बकरियों के झुण्ड की तरह गाइड इन्हें अपने पीछे इधर से उधर घुमा रहे थे। अंतर केवल इतना ही था कि भेड़–बकरियों के झुण्ड में चरवाहे भरसक पीछे रहते हैं जबकि यहाँ गाइड आगे–आगे चल रहे थे और पर्यटकों की भीड़ उनके पीछे। वैसे एक अनजाने देश में जहाँ भाषा सहित अनेक मजबूरियां हों वहाँ बगैर गाइड के काम चलना भी काफी मुश्किल है। वैसे इनमें कुछ ऐसे भी थे जो बिना किसी गाइड के ही घूम रहे थे। मैं भी बिना गाइड वाला ही था और एक–एक करके बारी बारी से सारे मंदिरों के चक्कर लगा रहा था। शुरू–शुरू में मैं काफी आश्चर्यचकित हुआ यह देखकर कि इस छोटी सी जगह पर भी कई विदेशी भाषाएं बोलने वाले गाइड उपलब्ध हैं।
खजुराहो मध्य प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित छतरपुर जिले में छतरपुर एवं पन्ना को जोड़ने वाले मुख्य सड़क मार्ग से कुछ हटकर बसा है। छतरपुर और पन्ना से खजुराहो की दूरी लगभग बराबर है जो 44 किलोमीटर है। खजुराहो का इतिहास स्वर्णिम रहा है लेकिन वर्तमान बहुत ही साधारण है। अब यह साधारण वर्तमान वाली जगह भारत में कितनी प्रसिद्ध है यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन पूरी दुनिया में कितनी प्रसिद्ध है,यह यहाँ आकर सहज ही जाना जा सकता है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र तंत्र साधकों एवं तपस्वियों की वजह से जाना जाता रहा है। आस–पास के क्षेत्रों में शिल्पकला एवं मूर्तिकला के विकास के भी छ्टिपुट उदाहरण मिलते रहे हैं। लेकिन चंदेल शासकों ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाकर इसे इतिहास में अमर कर दिया। बाद के इतिहास में दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा खजुराहो के मंदिरों को क्षति पहुँचाने के भी उदाहरण मिलते हैं लेकिन इसके बावजूद और सैकड़ों वर्षाें तक उपेक्षित पड़े रहने के बाद भी यहाँ की अमर कृतियां नष्ट नहीं हुईं और जंगलों के बीच संरक्षित रहीं। 1818 में एक अंग्रेज खोजकर्ता फ्रेंकलिन ने इस स्थान की यात्रा की और तब जाकर यह रहस्यपूर्ण स्थान शेष दुनिया के सामने आ सका।

खजुराहो के पश्चिमी समूह के मंदिरों को एक लाइन में बायीं या दायीं तरफ से चलते हुए क्रमवार देखा जा सकता है लेकिन आप अपनी मर्जी से कैसे भी इन्हें देख सकते हैं। मुख्य गेट से प्रवेश करने पर थोड़ी ही दूरी पर एक चौराहा मिलता है जहाँ बायीं तरफ विश्व विरासत स्थल को इंगित करता सूचना पट्ट लगा है। अब अगर बायीं तरफ से चलते हैं तो सबसे पहले लक्ष्‍मण मंदिर और इसके सामने बने पश्चिमाभिमुख लक्ष्‍मी मंदिर और वाराह मंदिर दिखते हैं। यहाँ से आगे बढ़ने पर लक्ष्‍मण मंदिर के ठीक पीछे या पश्चिम की ओर कुछ दूरी पर स्थित कंदरिया महादेव मंदिर। कंदरिया महादेव मंदिर के बिल्कुल पास में ही उत्तर की तरफ स्थित देवी जगदम्बी मंदिर। कंदरिया महादेव मंदिर और देवी जगदम्बी मंदिर के बीच में एक छोटे से मंदिर में शेर से लड़ते हुए चंदेल वंश के आदिपुरूष चंद्रवर्मन की मूर्ति। जगदम्बी देवी मंदिर से कुछ दूरी पर उत्तर की ओर चित्रगुप्त मंदिर। चित्रगुप्त मंदिर से पूरब की ओर कुछ दूरी पर विश्वनाथ मंदिर और इसके सामने पश्चिमाभिमुख नंदी मण्डप। विश्वनाथ मंदिर के दक्षिणी–पश्चिमी कोने पर पार्वती मंदिर। विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण में लक्ष्‍मण मंदिर। साथ ही विश्वनाथ मंदिर और लक्ष्‍मण मंदिर के बीच में एक इस्लामिक मंदिर। कुल मिलाकर पश्चिमी मंदिर समूह परिसर के चार बड़े मंदिर बायें से क्रमशः लक्ष्‍मण मंदिर,कंदरिया महादेव मंदिर,चित्रगुप्त मंदिर और विश्वनाथ मंदिर इसके चार कोने बनाते हैं और इन मुख्य मंदिरों के आस–पास कुछ और छोटे मंदिर भी अवस्थित हैं। इस परिसर से बाहर पश्चिमी मंदिर समूह के तीन और मंदिर हैं– मातंगेश्वर मंदिर,चौंसठ योगिनी मंदिर तथा ललगुंवा का महादेव मंदिर।
पूर्वी मंदिर समूह में सात मंदिर हैं– तीन हिंदू मंदिर जिनमें ब्रह्मा मंदिर,वामन मंदिर व जवारी मंदिर हैं तथा चार जैन मंदिर जिनमें पार्श्वनाथ मंदिर,आदिनाथ मंदिर,शांतिनाथ मंदिर तथा घंटाई मंदिर सम्मिलित हैं।
दक्षिणी मंदिर समूह में दूल्हादेव मंदिर व चतुर्भुज मंदिर के अलावा बीजामण्डल मंदिर के अवशेष सम्मिलित हैं। अधिकांश मंदिर पूर्वाभिमुख हैं जबकि चतुर्भुज मंदिर,ललगुंवा महादेव मंदिर पश्चिमाभिमुख व चौंसठ योगिनी मंदिर उत्तराभिमुख हैं।

खजुराहो को चन्देल शासकों ने नवीं सदी से लेकर बारहवीं सदी के बीच में अनेक सुंदर एवं भव्य मंदिरों से सजाया–सँवारा। नागर शैली में निर्मित वर्तमान में खजुराहो में 22 मंदिर अस्तित्व में हैं। इन मंदिरों की कुछ सामान्य विशेषताएं हैं जो प्रायः कम या अधिक मात्रा में लगभग सभी मंदिरों में पायी जाती हैं। इन मंदिरों का निर्माण ग्रेनाइट एवं लाल बलुआ पत्थर की सहायता से किया गया है। इन मंदिरों में शैव तथा वैष्णव मत के अलावा जैन धर्म से सम्बन्धित मंदिर भी हैं। वैसे तो यहाँ के गाइड पर्यटकाें को सीधे–सीधे इन मंदिरों को हिंदू धर्म से सम्बन्धित बता रहे थे। खजुराहो के मंदिर नागर शैली में बने हैं। भारत की स्थापत्य कला क्षेत्रीय विविधता और विशालता की वजह से तीन रूपों में विकसित हुई। उत्तर भारत में विकसित स्वरूप को नागर शैली,दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली तथा इन दोनों के बीच मध्य भारत में पनपी कला को बेसर शैली के नाम से जाना जाता है। खजुराहो के मंदिर नागर शैली के सर्वाेत्कृष्ट उदाहरण हैं। खजुराहो के लगभग सभी मंदिराें का निर्माण एक ऊँचे चबूतरे पर किया गया है जिसे जगतीपीठ के नाम से जाना जाता है। इन चबूतरों की वाह्य दीवारों को अनेक प्रकार से सजाया गया है। इन चबूतरों के ऊपर ही मंदिर के विभिन्न अंगों जैसे गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ,अन्तराल,महामण्डप तथा अर्द्धमण्डप का निर्माण किया गया है। अर्द्धमण्डप को मंदिर को प्रवेश द्वार कहा जाता है जबकि इसके बाद स्थित महामण्डप मंदिर का वह भाग है जिसका प्रयोग नृत्यांगनाएँ धार्मिक नृत्यों के लिए करती थीं। महामण्डप और मंदिर के गर्भगृह के बीच के भाग को अंतराल कहा जाता है। इस भाग का उपयोग पूजा–पाठ जैसी धार्मिक क्रियाआें के लिए किया जाता था। मंदिर के मुख्य भाग गर्भगृह में मंदिर के इष्टदेवता की मूर्ति स्थापित होती है तथा गर्भगृह के चारों ओर बने खाली स्थान को प्रदक्षिणा पथ कहा जाता है। इन भागों के ऊपर शिखरों का निर्माण किया गया है और इन शिखरों की संख्या के आधार पर ही मंदिरों की विशालता का निर्णय किया जाता है। गर्भगृह के ऊपर का शिखर सबसे ऊँचा होता है जबकि प्रवेश द्वार के ऊपर का शिखर सबसे छोटा होता है। बीच के शिखर लगभग एक सीधी रेखा में बने होते हैं। मंदिरों के प्रवेश द्वार के ऊपर मकर के मुख जैसी आकृति बनी होने के कारण इन्हें मकर–ताेरण भी कहा जाता है। खजुराहो के किसी भी मंदिर के चारों ओर चारदीवारी जैसी कोई संरचना अस्तित्व में नहीं है।

बाहर से क्रमशः उन्नत होते पर्वत शिखरों की भाँति दिखायी देने वाले खजुराहो के मंदिर दो प्रकार के हैं। ऊपर बताये गये मंदिरों के पाँचों भाग यथा गर्भगृह,प्रदक्षिणा पथ,अन्तराल,महामण्डप तथा अर्द्धमण्डप जिन मंदिरों में उपस्थित हैं उन्हें पंचरथ मंदिर कहा जाता है। इनके ऊपर चार शिखर बने हुए हैं। इनमें गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है। इन्हें सांधार मंदिर भी कहा जाता है। जिन मंदिराें में वाह्यरूप से केवल तीन या उससे कम शिखर बने हुए हैं तथा आंतरिक रूप से अर्द्धमण्डप,महामण्डप,अंतराल व गर्भगृह सहित चार या उससे कम भाग हैं तथा प्रदक्षिण पथ अनुपस्थित है इन्हें निरंधार मंदिर कहा जाता है। उक्त तथ्यों की पुष्टि खजुराहो के एक गाइड ने भी की। इतनी जानकारी तो उसने फ्री में दी लेकिन इससे अधिक जानकारी देने से उसने इन्कार कर दिया क्योंकि इसके लिए उसे पैसे देने पड़ते।
उर्ध्वाधर रूप में नींव के अतिरिक्त मंदिरों के चार भाग हैं। लावा पत्थर की बनी नींव के ऊपर ऊँचे चबूतरे बनाये गये हैं जिन्हें जगती या जगतीपीठ कहा जाता है। इसके ऊपर लगभग दाे गज की ऊँचाई तक के भाग को वेदीबन्ध कहा जाता है। यही भाग मंदिर का आधार है। इसके ऊपर मंदिर की दीवारें बनी हुई हैं। इन्हें मंदिर का मध्य भाग या जंघा कहा जाता है। मंदिर के इस भाग पर ही अनेक प्रकार की मूर्तियाें का निर्माण किया गया है। मंदिर के इस मध्य भाग के ऊपर शिखर बने हुए हैं। शिखर के ऊपर आमलक,आमलक के ऊपर अमृत कलश तथा अमृत कलश के ऊपर नारियल की आकृतियां बनायी गयी हैं।
रथ शैली के आधार पर खजुराहो के जगदम्बी देवी मंदिर,चित्रगुप्त मंदिर,दूल्हादेव मंदिर तथा चतुर्भुज मंदिर छोटे मंदिर हैं और त्रिरथ शैली में बने हुए हैं। लक्ष्‍मण मंदिर,विश्वनाथ मंदिर,पार्श्वनाथ मंदिर बड़े मंदिर हैं तथा पंचरथ शैली में बने हुए हैं। कंदरिया महादेव मंदिर सर्वाधिक विशाल मंदिर है तथा सप्तरथ शैली में बना हुआ है। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण मुख्य रूप से बलुआ पत्थर से किया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन पत्थरों को खजुराहो से 30 किमी दूर स्थित केन नदी के पास तराशा गया तथा इनमें खाँचे बनाये गये। बाद में इन्हें ढोकर अभीष्ट जगह पर लाया गया तथा खाँचों में फिट कर मंदिरों का निर्माण किया गया।

खजुराहो की सर्वाधिक विशिष्टता इसकी मूर्तिकला में है। खजुराहो की मूर्तिकला अपनी उन्नति के सर्वाेच्च शिखर पर है। यहाँ मूर्तियां कई प्रकार की हैं। गर्भगृह की मूर्तियां आकार में बड़ी हैं तथा इन्हें चारों ओर से सम्पूर्ण रूप से गढ़ा गया है। दीवारों पर अंकित मूर्तियों को केवल सामने से गढ़ा गया है। दीवारों पर अंकित इन मूर्तियों में पौराणिक आख्यानों से सम्बन्धित देवी–देवताओं,अप्सराओं,नाग कन्याआें,देवदासियों,गंधर्वाें,विद्याधरों इत्यादि का अंकन किया गया है। एक काल्पनिक जीव शार्दूल की मूर्तियां भी बहुलता से अंकित की गयी हैं। मंदिरों की वाह्य दीवारों पर दो या तीन पंक्तियों में मूर्तियों का अंकन किया गया है। कुछ मंदिरों पर ये मूर्तियां विरल रूप में या कम संख्या में हैं लेकिन विकसित शैली के मंदिरों में ये अत्यन्त सघन रूप में अंकित की गयी हैं। इन मूर्तियों की लम्बाई दो से तीन फीट तक है। मंदिरों की उत्तरी और दक्षिणी दीवारों पर बनी कामकला की मूर्तियां सर्वाधिक रूचि और रहस्य का विषय हैं जिन्होंने खजुराहो के मंदिरों को एक अलग पहचान प्रदान की है। 

वर्तमान में खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह के मंदिरों में से लक्ष्‍मण मंदिर सर्वाधिक सुरक्षित स्थिति में है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है तथा मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।इसका निर्माण 930 ई0 में यशोवर्मन ने कराया था। यशोवर्मन का एक नाम लक्ष्‍मणवर्मन भी था और संभवतः इसी कारण इसे लक्ष्‍मण मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर मातंगेश्वर के बिल्कुल पास और लगभग सटे हुए ही स्थित है लेकिन पुरातत्व विभाग की चारदीवारी इन दोनाें को अलग कर देती है। लक्ष्‍मण मंदिर के चबूतरे के चारों कोनो पर चार उपमंदिर भी बने हुए हैं। इसके सामने एक और उपमंदिर बना हुआ जिसे लक्ष्‍मी मंदिर कहा जाता है। इस तरह के पाँच उपमंदिरों वाले बड़े मंदिर को पंचायतन मंदिर भी कहा जाता था। खजुराहो के अन्य बड़े मंदिरों के भी उपमंदिर थे जो वर्तमान में सुरक्षित नहीं बचे हैं। मंदिर के चबूतरे से ऊपर की ओर अर्थात वेदीबन्ध तक बेलबूटों एवं अन्य आकृतियों के अलावा हाथियों की एक लगातार पंक्ति दिखायी पड़ती है। इसके ऊपर लगभग 2 फीट ऊँची प्रतिमाओं की दो पंक्तियों बनी हुई हैं। इनमें विभिन्न भावों को प्रकट करती नायिकाओं और अप्सराओं की प्रतिमाएं काफी आकर्षक हैं। वैसे विदेशी पर्यटकों के गाइड यहाँ और सब कुछ छोड़ केवल कामकला वाली मूर्तियों की ही विस्तृत व्याख्या करते दिखायी पड़ रहे थे।
लक्ष्‍मण मंदिर के पीछे की ओर विश्व प्रसिद्ध कंदरिया महादेव मंदिर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1025 से 1040 ई0 के मध्य चंदेल शासक विद्याधर के द्वारा करवाया गया। विद्याधर ने दूसरी बार मुहम्मद गजनी को पराजित करने के उपलक्ष्‍य में यह मंदिर बनवाया। यह खजुराहो का विशालतम मंदिर है। सप्तरथ शैली में बना यह मंदिर तत्कालीन स्थापत्य कला का सर्वाेत्कृष्ट उदाहरण है। भगवान शिव को समर्पित यह विशाल मंदिर 117 फुट ऊँचा,इतना ही लम्बा तथा 66 फुट चौड़ा है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार को सामने से देखने पर किसी कंदरा या गुफा की आकृति जैसा आभास होता है और संभवतः इसी कारण से इसे कंदरिया महादेव मंदिर कहा जाता है। मंदिर के चबूतरे की दीवारों पर हाथी,घोड़े,आयुध तथा शिकार व नृत्य करते मनुष्यों के दृश्य अंकित किये गये हैं। कंदरिया महादेव मंदिर काफी बड़ा है इसलिए इसकी दीवारों पर देवी–देवताओं,नायिकाओं और अप्सराओं की प्रतिमाओं की तीन पंक्तियां हैं। कामकला की कुछ बहुत ही प्रसिद्ध मूर्तियां इस मंदिर की दीवारों पर बनी हैं। यह मंदिर भी सांधार मंदिर है और सांधार मंदिरों की भाँति पाँच भागों से मिलकर बना है। कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के विस्तार पर ही इसके उत्तर में व जगदम्बी देवी मंदिर के दक्षिण में एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है जिसे महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में चंदेल साम्राज्य के आदिपुरूष चंद्रवर्मन को सिंह से लड़ते हुए प्रदर्शित किया गया है। इस मूर्ति से मिलती–जुलती कई आकृतियाँ कंदरिया महादेव मंदिर और जगदम्बी देवी मंदिर के चबूतरों पर बनी हुई हैं। यह आकृति चंदेल शासकों का राजकीय चिह्न भी थी। कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे से सटे एक चबूतरे पर जगदम्बी देवी मंदिर निर्मित है। यह एक निरंधार शैली का मंदिर है अर्थात इसमें गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ नहीं बना है। इसके ऊपर तीन शिखर हैं। इस मंदिर का निर्माण गण्डदेव वर्मन ने कराया था। मूल रूप से यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था लेकिन 1880 में छतरपुर के महाराजा ने पार्वती की मूर्ति इसमें स्थापित करायी और इस कारण इसे जगदम्बी देवी मंदिर कहा जाता है।

जगदम्बी देवी मंदिर के उत्तर में चित्रगुप्त मंदिर स्थित है। यह मंदिर भी जगदम्बी देवी मंदिर के सदृश ही है और इसका निर्माण भी गण्डदेव वर्मन ने ही ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कराया था। यह एक निरंधार शैली का मंदिर है जिसमें प्रदक्षिणा पथ अनुपस्थित है तथा ऊपर तीन शिखर हैं। मंदिर के गर्भगृह में रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा है जिसकी दाहिनी ओर चित्रगुप्त की खण्डित प्रतिमा बनी हुई है। इस मंदिर के काफी कुछ हिस्से का जीर्णाेद्धार छतरपुर के महाराजा द्वारा कराया गया।
चित्रगुप्त मंदिर के पूर्व की ओर विश्वनाथ मंदिर अवस्थित है। विश्वनाथ मंदिर के पास लगे पुरातत्व विभाग के सूचना पट्ट के अनुसार यह मंदिर खजुराहो के शिव को समर्पित मंदिरों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह भी चार लघु मंदिरों से युक्त पंचायतन शैली का मंदिर था जिसमें से उत्तर–पूर्व तथा दक्षिण–पश्चिम पार्श्वों के मंदिर ही अब शेष बचे हैं। खजुराहो में एक विकसित मंदिर में पाये जाने वाले सभी भाग इस मंदिर में देखे जा सकते हैं। इस मंदिर का स्वरूप काफी कुछ लक्ष्‍मण मंदिर से मिलता–जुलता है। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह लक्ष्‍मण मंदिर और कंदरिया महादेव मंदिर के मध्य निर्मित माना जाता है। 1002 ई0 में चंदेल शासक धंगदेव द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया जिसमें दो शिवलिंग एक पन्ना तथा एक पाषाण के स्थापित किये गये।
उपर्युक्त बड़े मंदिरों के अतिरिक्त पश्चिमी मंदिर समूह समूह के अंतर्गत कुछ छोटे मंदिर भी अवस्थित हैं। लक्ष्‍मण मंदिर के सामने वाराह मंदिर है। यह एक शिखर वाला साधारण मंदिर है जो एक आयताकार चबूतरे पर निर्मित है और जिसकी छत 14 स्तम्भों पर टिकी है। शिखर की आकृति पिरामिडनुमा है। मंदिर में विष्णु के वाराह अवतार की 2.6 मीटर लम्बी एकाश्मक विशाल प्रतिमा स्थापित है। बलुआ पत्थर से निर्मित इस मंदिर का निर्माण 900 से 925 ई0 के मध्य हुआ माना जाता है। इस वाराह मूर्ति के शरीर पर अनेक देवी–देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। जिस समय मैं इस मंदिर में पहुँचा था यहाँ मरम्मत का कार्य चल रहा था।
विश्वनाथ मंदिर के दक्षिणी–पश्चिमी कोने पर पार्वती मंदिर के नाम से एक और छोटा मंदिर बना है। यह एक नया मंदिर है तथा ईंट व चूने से इसका निर्माण किया गया है। इस मंदिर के ऊपर केवल एक शिखर है तथा खजुराहो के अन्य मंदिरों की तरह इसे भी एक ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है।

गाइडों की बात मानें तो खजुराहो के सारे मंदिरों को आधे दिन या फिर अधिक से अधिक एक दिन में देखा जा सकता है लेकिन मंदिर परिसर में प्रवेश कर जाने के बाद मुझे व्यक्तिगत रूप से अपने संदर्भ में यह बात असंभव लगने लगी और अंततः मैंने खजुराहो के सारे मंदिरों को देखने में लगभग दो दिन का समय लगा दिया। आज मेरा खजुराहो में मेरा पहला दिन था और सुबह के 9.30 बजे से दोपहर के 2 बजे तक मैं इन्हीं मंदिरों के चक्कर लगाता रहा। मेरे अलावा शायद ही कोई व्यक्ति रहा हाेगा जो इतनी देर तक मगजमारी कर रहा हो। बल्कि इतनी देर में तो मैं यह भी पहचानने लग गया कि किस सुरक्षा गार्ड की ड्यूटी किस स्थान पर लगी है। लेकिन अब तक पेट के विभिन्न कोनों से मस्तिष्क तक कई तरह के संदेश पहुँचने शुरू हो गये थे। इशारा साफ था कि अगर तुम मेरी मदद नहीं करोगे तो मैं भी तुम्हारी सारी बौद्धिकता की पोल खोल दूँगा। पसीने से सिर पर लगी टोपी भी भीग रही थी। पैर भी हड़ताल की धमकी दे रहे थे। इधर मस्तिष्क गुणा–गणित करके यह बता रहा था कि खाना खाने के लिए बाहर जाओगे तो फिर अंदर घुसने में 30 रूपये का चूना लग जायेगा और यहाँ कहीं बैठकर बैग में रखा बिस्किट खाने की कोशिश करोगे तो 800 रूपये फाइन लगने का डर है। शरीर रूपी इस संसद भवन के अंदर भारी हंगामे को देखते हुए वाक–आउट करने का निर्णय लिया गया। अब इस परिसर में कल फिर से 30 रूपये का टिकट लिया जायेगा।

बाहर निकला तो धूप और थकान के कारण खाने की इच्छा भी कम हो गयी थी। तो भर पेट खाने से बेहतर था कि 25 रूपये वाले आलू परांठे या 30 रूपये वाले गोभी परांठे या फिर 40 रूपये वाले पनीर परांठे का भोग लगाया जाए। शरीर और मन दोनों के देवता खुश रहेंगे। वैसे भी खजुराहो के अधिकांश होटल व रेस्टोरेण्ट विदेशी पर्यटकों को ध्यान में रखकर बने हैं और एक साधारण भारतीय व्यक्ति को यहाँ एक साधारण रेस्टोरेण्ट खोजने में कुछ न कुछ मगजमारी तो करनी ही पड़ेगी। परांठों का भोग लगाने के बाद अब मैंने खजुराहो के दूसरे मंदिरों के बारे में पूछताछ करना शुरू किया। पता चला कि पूर्वी मंदिर समूह तो थोड़ी ही दूरी पर है। थोड़ी ही दूरी का मतलब एक से डेढ़ किलोमीटर या दो किलोमीटर। लेकिन दक्षिणी मंदिर समूह अधिक दूर है। अधिक दूर का मतलब तीन या चार किलोमीटर। हाँ चौंसठ योगिनी मंदिर आधा किलोमीटर की दूरी पर ही है। तो चौंसठ योगिनी मंदिर की ओर चल पड़ा। पश्चिमी मंदिर समूह से दक्षिण की ओर यानी खजुराहो के मुख्य मार्ग जो बमीठा की ओर जाता है,उसी पर पाँच मिनट चलने पर शिवसागर झील के कोने से दाहिने एक सड़क कटी है। यह एक गाँव की तरफ चली जाती है। इसी पर कुछ दूर चलने पर सड़क के बायें किनारे पर चौंसठ योगिनी मंदिर स्थित है। पूछताछ करते समय एक व्यक्ति ने मुझे सलाह दी थी कि चौंसठ योगिनी मंदिर में कुछ देखने लायक नहीं है। सब खण्डहर हो चुका है। जाने का कोई फायदा नहीं। मैंने भी उसे आश्वस्त किया कि भाई मैं भी तो वही देखने आया हूँ जो पहले कभी रहा होगा। वर्तमान में वहाँ कुछ है या नहीं इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता।


लक्ष्‍मण मंदिर की वाह्य दीवार
लक्ष्‍मण मंदिर के अंदर की छत
लक्ष्‍मण मंदिर का गर्भगृह
लक्ष्‍मण मंदिर
लक्ष्‍मण मंदिर का शिखर
कंदरिया महादेव मंदिर की दीवारों पर मूर्तियों का सघन अंकन
कंदिरया महादेव मंदिर का मकर तोरण
अंदर की छत
कंदरिया महादेव महादेव का गर्भगृह
कंदरिया महादेव मंदिर के अंदर की छत
कंदरिया महादेव मंदिर
जगदंबी देवी मंदिर
जगदंबी देवी मंदिर के चबूतरे के कोने पर बना चंदेलों का राजकीय चिह्न
जगदंबी देवी मंदिर का गर्भगृह
शार्दूल 
जगदंबी देवी मंदिर
चित्रगुप्त मंदिर
चित्रगुप्त मंदिर के अंदर की छत
चित्रगुप्त मंदिर का गर्भगृह
चित्रगुप्त मंदिर का प्रवेश द्वार
विश्वनाथ मंदिर की वाह्य दीवार
विश्वनाथ मंदिर का गर्भगृह
विश्वनाथ मंदिर
विश्वनाथ मंदिर का शिखर
विश्वनाथ मंदिर के सामने नंदी मण्डप में नंदी की मूर्ति
वाराह मंदिर में वाराह प्रतिमा
लक्ष्‍मी मंदिर
इस्लामिक मंदिर
पार्वती मंदिर
पार्वती मंदिर
अगला भाग ः खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. खजुराहो–एक अलग परम्परा (पहला भाग)
2. खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)
3. खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)
4. खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)
5. कालिंजर
6. अजयगढ़

खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह का गूगल मैप–

4 comments:

  1. 2 दिन तक खजुराहो घूमने वाले आप बहुत सारे घुमक्कडों में एक मीले....अच्छा लगा इतनी विस्तृत जानकारी पढ़कर

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई। खजुराहो के मंदिरों को बारीकी से देखना मुझे अच्छा लगा। फायर एण्ड फार्गेट वाला तरीका मुझे कुछ जमता नहीं।

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  2. नरेश सहगलApril 21, 2018 at 12:34 PM

    Quite informative post with a lot of beautiful pictures.

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    1. धन्यवाद नरेश जी। आगे भी प्रोत्साहन देते रहिए।

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