Friday, May 11, 2018

अजयगढ़

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अपनी इस खजुराहो यात्रा में खजुराहो के मंदिर और खजुराहो के निर्माणकर्ता चंदेल शासकों की प्राचीन राजधानी कालिंजर घूम लेने के बाद आज मैं खजुराहो के पास स्थित एक और किले अजयगढ़ की ओर निकल रहा था। वैसे तो कल कालिंजर जाते समय मैं अजयगढ़ होकर ही गया था लेकिन रास्ते में इतना समय नहीं था कि अजयगढ़ की भी हाल–चाल ली जा सके। केवल कालिंजर घूम कर आने में ही नानी याद आ गयी थी। हाँ,आज अजयगढ़ से ही घूमकर लौटना था तो समय की समस्या नहीं होनी थी।
कल कालिंजर किले की लगभग हजार सीढ़ियां चढ़ने और फिर सड़क के रास्ते उतरने में काफी थक गया था तो सुबह देर से सोकर उठा। फिर भी सात बजे तक तैयार होकर कमरे से चेकआउट कर लिया क्योंकि आज रात ही मुझे वापसी के लिए ट्रेन पकड़नी थी। लॉज मैनेजर का वादा था कि मैं अपना बैग जब तक चाहूँ उसके कमरे में रख सकता हूँ। कमरा छोड़कर स्टैण्ड पर पहुँचा तो कुछ देर तक ऑटो का इंतजार करना पड़ा और 7.45 तक मैं  पन्ना की बस पकड़ने के लिए बमीठा पहुँच गया।
बमीठा में ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा और 8 बजे पन्ना के लिए बस मिल गयी। बस में काफी भीड़ थी लेकिन मैं कल की तरह ही आज भी विण्ड स्क्रीन के पास वाली सीट हथियाने में सफल रहा। कुछ ही सेकेण्ड में बस पूरी तरह स्टैण्डिंग हो गयी। बस के बोनट पर एक महिला आकर बैठ गयी जिसे बमीठा से 9 किमी दूर चंद्रनगर तक जाना था। तभी बस के ड्राइवर ने उद्घोषणा कर दी कि केवल पन्ना जाने वाले वाले यात्रियों को ही सीट मिलेगी। बाकी लोगों को खड़ा होना पड़ेगा। और इस घोषणा पर बस के ड्राइवर और उस महिला में अच्छी–खासी झड़प हो गयी लेकिन महिला भी दृढ़ निश्चयी थी और उसने सीट नहीं छोड़ी। अब अगली झड़प कण्डक्टर से होनी थी। कल मैं इसी रूट पर पन्ना तक 30 रूपये किराया देकर गया था लेकिन आज इस बस का कण्डक्टर 35 रूपये माँग रहा था। समस्या यह थी कि मेरे पास फुटकर पैसे नहीं थे। कई और यात्रियों के हल्ला–गुल्ला करने के बाद भी कण्डक्टर ने अपनी वाली ही की। मध्य प्रदेश में रोडवेज के निजीकरण के दो साइड इफेक्ट सामने दिख गये– एक तो सीट के लिए किच–किच और दूसरा किराये के लिए झिक–झिक। कारण सिर्फ एक– बस ऑपरेटरों की मनमानी।

सब कुछ के बावजूद केवल एक घण्टे में बस पन्ना पहुँच गयी। वहाँ अजयगढ़ के लिए बस लगी थी वह भी स्लीपर वाली तो इधर–उधर करने का कोई सवाल ही नहीं था। बस भले ही स्लीपर वाली थी लेकिन व्यवस्था केवल बैठने की ही थी। अब ज्यादा सीटें खाली हाें तो बेशक आप सोइए या फिर कबड्डी खेलिए। 9.15 बजे बस अजयगढ़ के लिए रवाना हो गयी। इस बस के कण्डक्टर ने भी किराया 35 रूपये वसूलने की कोशिश की लेकिन मैं भी लड़ाई करने के लिए तैयार बैठा था और पाँच रूपये बचा लिए। कल की तुलना में आज की बसें तेज थीं और समय कम लगा रही थीं। 10.15 बजे मैं अजयगढ़ पहुँच गया। बस से उतरकर जल्दी से मैंने पेट के इंजन में ईंधन भरा,पीठ पर टँगे बैग को भी बिस्किट–पानी से भरा और 10.30 बजे रास्ता पूछते हुए अजयगढ़ किले की अोर चल दिया। अजयगढ़ के छोटे से स्टेशन परिसर में एक आम भारतीय यात्री के लिए आवश्यक खाना–पानी आसानी से उपलब्ध है लेकिन किला परिसर में अगर अपने पास कुछ न हो तो पानी के लिए भी तरसना पड़ जायेगा। अगर तालाब का पानी पीने की हिम्मत हो तो कोई समस्या नहीं।
अजयगढ़ बस स्टैण्ड से किले की चढ़ाई तक पहुँचने के लिए लगभग डेढ़ किमी पैदल चलना ही एकमात्र विकल्प है। अब अजयगढ़ इतना विकसित टूरिस्ट स्पॉट नहीें है कि किले तक जाने के लिए ऑटो मिलेगी। अजयगढ़ किला कालिंजर के किले की ही तरह कस्बे से दूर पहाड़ी पर बना किला है तो यहाँ पहुँचने के लिए जंगलों के बीच एकान्त यात्रा ही करनी पड़ेगी। कालिंजर के किले की प्रसिद्धि की वजह से इसका जिक्र इतिहास की किताबों में मिलता है तथा इसके बारे इधर–उधर से भी कुछ छ्टिपुट जानकारी मिलती है लेकिन अजयगढ़ के बारे में इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसके बारे में या तो यहाँ के स्थानीय निवासी ही कुछ बता सकते हैं या फिर किले के अंंदर ही जाना पड़ेगा।

तो मैंने भी अजयगढ़ किले की ओर जाती सीढ़ियों का रास्ता पकड़ लिया। सीढ़ियां तो मैं कल से ही चढ़ रहा था। लेकिन आज की सीढ़ियां कम यानी 500 के आस–पास थीं। अजयगढ़ की यह पहाड़ी भी जंगलों से ढकी है लेकिन मौसम ने पेड़ों की पत्तियां गिरा कर उन्हें नंगा कर दिया था। मैं इन सीढ़ियों पर अकेला ही जा रहा था कि तबतक नीचे से एक दुबला–पतला युवक हाथ में झोला टाँगे आता दिखायी पड़ा। वह एक स्थानीय युवक ही था और किला घूमने तो कतई नहीं जा रहा था। धीरे–धीरे वह मेरे पास आ गया। कुछ देर तक तो वह मेरे साथ साथ चलता रहा लेकिन उसके झोले का भार उसे पीछे करने लगा। मैंने रूककर किले और सीढ़ियों के बारे में कुछ बातें पूछते हुए उसका परिचय जानने की कोशिश की। पता चला कि वह किले के अंदर बने एक मंदिर का पुजारी था। मुझे लगा कि यह तो काम का आदमी हो सकता है। मैं अकेला किले में जा रहा हूँ और वहाँ यह मेरे लिए गाइड का काम कर सकता है। मैंने कुछ देर धीमे चलकर उसका साथ देने की कोशिश की लेकिन जब वह पिछड़ने लगा तो मैं कुछ आगे हो गया।
बस स्टैण्ड से चलने के लगभग एक घण्टे के बाद अर्थात 11.30 बजे मैं किले के गेट तक पहुँच गया। यह किला एक त्रिभुज के आकार की पहाड़ी पर बना है जिसके उत्तरी–पश्चिमी कोने पर यह गेट बना है। गेट के आस–पास की दीवारों पर काफी संख्या में मूर्तियां अंकित की गयी हैं। मैं रूककर इन मूर्तियों के फोटो खींचने में लग गया तब तक पीछे छूटा मंदिर का पुजारी भी ऊपर आ गया। किले के गेट से प्रवेश करते ही एक लम्बी जंजीर में बंधी एक घण्टी टँगी है। पुजारी ने जोर से घण्टी बजार्इ। उसके पीछे मैंने भी प्रवेश किया और उसकी देखा–देखी मैने भी जोर से घण्टी बजाई। घण्टी बजते ही गेट के पीछे बने झोपड़ीनुमा घर में से एक दुबला–पतला सा व्यक्ति हाथ में रजिस्टर लिए बाहर निकला। मुझसे संक्षिप्त सा परिचय लिया और रजिस्टर में इंट्री करायी। साथ ही उसने मुझसे गाइड सुविधा लेने के बारे में पूछा जिसे मैंने इन्कार कर दिया। अब उसका ध्यान मेरे गले में लटके कैमरे पर गया और उसने 25 रूपये इसका भी चार्ज वसूलने का प्रयास किया। कैमरे की फीस पर मैं थोड़ा टाइट हुआ और उसे बताया कि खजुराहो और कालिंजर में इसका कोई चार्ज नहीं लगा था। तब जाकर मेरे 25 रूपयों की जान बची।

अब तक मंदिर का पुजारी वहीं खड़ा अपनी थकान मिटा रहा था। साथ ही उसने एक और काम किया और वो ये कि अपने झोले में रखा एक पीले रंग का कुरता निकाला ओर अपनी शर्ट के ऊपर पहन लिया। शायद यह उसका ड्रेस कोड था। सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद मैं किले के गेट के आस–पास कुछ फोटो खींचने लगा और इतने में पुजारी कुछ आगे बढ़ गया। उसे आगे जाता देख मैं भी जल्दी से उसके पीछे लपका। मुझे डर लग रहा था कि अगर यह जंगलों में कहीं गुम हो गया तो मैं यहाँ अकेले जाऊँगा कहाँ। तो अब पुजारी आगे–आगे और मैं पीछे–पीछे। पथरीली पगडंडी। कहीं ऊँची कहीं नीची। बारिश में शायद ये भी न दिखती हो। मौसम की मार से उजड़ा जंगल। कहीं–कहीं कुछ पंछ्यिों की आवाज,जो इस वीराने में गूँज कर अजीब तरह की तरंगें पैदा कर रही थी,और कहीं झटके से उछल कर पेड़ों को खड़खड़ाते–चौंकाते बंदर। अगर आदमी बिल्कुल अकेले हो तो दिन में भी डराने का पूरा इंतजाम है। रात की कौन कहेǃ और इस पर अगर जगह–जगह झड़ियों से ढके खण्डहर भी दिख रहे हों तो फिर क्या पूछना। सोने पे सुहागा। हॉरर का एहसास करना हो तो अकेले यहाँ चले आइए। भूतिया हिन्दी फिल्में देखने की कोई जरूरत नहीं। और डर के मारे जान कैसे निकलती है,ये जानना हो तो फिर रात में यहाँ चले आना सबसे ठीक रहेगा। इस मामले में अजयगढ़ और कालिंजर में अंतर ये है कि कालिंजर में किले तक पहुँचने के लिए और किले के अंदर भी,पक्की सड़क बनी है और इस वजह से आदमी नामक जीव का आवागमन वहाँ बना रहता है। साथ ही पक्के रास्ते को देखकर यह संतोष बना रहता है कि रास्ता है तो लोग भी आते ही होंगे लेकिन अजयगढ़ में तो सिर्फ पैदल रास्ता ही है और किले के अंदर तो ढंग की पगडण्डी भी नहीं है। सिर्फ खण्डहर देखने के लिए कौन इतनी चढ़ाई चढ़ेगा। वैसे ऐसी जगह पर घूमने का मजा भी आ रहा था और यदि मानसून का मौसम होता तो और भी मजा आता क्योंकि बारिश की फुहाराें के बीच पर्याप्त हरियाली भी दिखती।

लगभग आधे किलोमीटर चलने के बाद पुजारी जी महाराज को मंजिल मिल गयी। एक तालाब के किनारे कुछ खण्डहर जैसी इमारतें दिख रही थीं। तालाब के पूर्वी किनारे पर इन्हीं में से एक में मंदिर भी बना था। पुजारी जी इसी में प्रवेश कर गये और मैं तालाब के पश्चिमी किनारे पर खण्डहरों के पास रूक गया। यहाँ तालाब के किनारे भारी मात्रा में पुरानी इमारतों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। तमाम मूर्तियाँ भी खण्डित अवस्था में बिखरी पड़ी हैं। पुजारी जिस मंदिर में गया था वह बाद के समय का बना मंदिर है जिसमें राधा–कृष्ण की एक छोटी सी प्रतिमा स्थापित है। साथ ही अगल–बगल के खाली स्थान में किले के पुराने खण्डहरों से प्राप्त कई तरह की टूटी मूर्तियों को सजा दिया गया है। पेड़ों की छाया में कुछ गायें बैठी थीं जो मुझे देखकर बिदक उठीं। पहाड़ी पर निवास करने वाले जंगली जीव–जंतुओं के लिए यह तालाब ही पानी का स्रोत है तो वो भी छ्पिते–लुकते पानी पीने की कोशिश कर रहे थे। और अगर आदमी भी नीचे से पीने का पानी लेकर न आया हो तो उसके लिए भी पानी का स्रोत यह तालाब ही है। वैसे मैं दो लीटर पानी लेकर आया था जो अब धीरे–धीरे गर्म हो रहा था लेकिन फिर भी पानी तो था। यह स्थान पहाड़ी पर बने किले के लगभग बीच में है।
अब मैं आस–पास के खण्डहरों का निरीक्षण करने में लग गया। पुजारी मंदिर में प्रवेश कर मंदिर के देवता को जगाने की कोशिश कर रहा होगा। मैं भी मंदिर के पास पहुँच गया। मंदिर के आस–पास के क्षेत्र में अनेकों जगह आग जलाने के निशान दिख रहे थे। मैंने मंदिर के दरवाजे पर खड़े होकर पुजारी से पूछा तो भेद खुला कि यह पिकनिक मनाने वालों का काम है। अर्थात यहाँ पिकनिक मनाने वाले भी आते हैं। पत्थरों को इकट्ठा कर चूल्हा बनाया जाता है और उनमें आग जलाकर नाश्ते पानी का इंतजाम किया जाता है। और फिर जंगल में मंगल होता है। मैंने पुजारी से जानना चाहा कि किले में और कौन सी जगह देखने लायक है। पुजारी अनमने ढंग से बोला– "यही सब है और क्या है।" पुजारी के शब्दों और लहजे से मुझे अनुमान लग गया कि कुछ तो है जिसे यह बताना नहीं चाह रहा है। मैंने दिमाग दौड़ाया,मंदिर में प्रवेश किया और देवता पर 10 रूपये की नोट अर्पित कर दी। अब पुजारी को मुझ पर कुछ दया आई और उसके तिलिस्म का दरवाजा खुला– "इस साइड जाएंगे तो रंगमहल है और उसके पास दो तालाब हैं। ये सब मैं किसी को बताता नहीं लेकिन आपको बता दिया",हाथ से एक पगडंडी की ओर इशारा करते हुए उसने मुझे बताया। अब वास्तविकता क्या थी ये तो मैं बखूबी समझ रहा था। मेरी बांछें खिल उठीं क्योंकि मैंने उसकी कमजोर नस पकड़ ली थी।
मैंने जल्दी से पुजारी द्वारा बतायी गयी दिशा यानी त्रिभुजाकार पहाड़ी के दक्षिणी कोने की ओर कदम बढ़ाये। अब तक तो पुजारी का सहारा था लेकिन अब केवल बंदरों का ही सहारा रह गया था और मैं उनका सहारा नहीं लेना चाह रहा था। डर था कि कहीं मेरे गले में लटकते "लटकू" यानी कैमरे को कोई झटक न ले जाय इसलिए मैंने पास की झाड़ियों से 4–5 फुट का एक डंडा तोड़ लिया और इस डंडे के सहारे ही सही,कुछ सुरक्षित महसूस करने लगा। किसी आदमी के सामने आने की संभावना तो कम ही थी क्यों आज किले में उस पुजारी,गेटकीपर और मेरे अलावा कोई चौथा आदमी नहीं था। हाँ,कोई जीव–जंतु या फिर खण्डहरों में रहने वाले किसी भूत से पाला पड़ सकता था। तिसपर भी मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था। बचपन में सुनी हुई राजा–रानी की कहानियां याद आ रही थीं कि कैसे बड़ों की बातों को अनसुना कर जंगल की दक्षिण दिशा में जाते राजकुमार भारी मुसीबतों में फँस जाते थे। तो मैं काफी सतर्क होकर और धीमी गति से चल रहा था।

पाँच मिनट चलने के बाद मुझे पगडण्डी के दाहिनी तरफ कँटीले तारों से बनायी गयी एक बाड़ दिखी जिसमें प्रवेश करने की कोई जगह नहीं दिख रही थी। तो मैं आगे बढ़ता गया और थोड़ी ही दूर बाद पहाड़ी की कगार पर बनी कुछ इमारतों के खण्डहर में पहुँच गया। इन खण्डहरों के उस पार पहाड़ी के पास की तलहटी दिखाई पड़ रही थी। इन खण्डहरों में भटकने के बाद मैं वापस लौटा और कँटीले तारों की बाड़ में घुसने का रास्ता तलाशने लगा। आखिर एक ऐसी जगह मिल ही गयी। मैंने अपना बैग पीठ पर से उतारकर हाथ में लिया और अपने कपड़े बचाते हुए तारों के बीच से उस पर चला गया। दो–तीन मिनट चलने के बाद ही कुछ ऐसी इमारतें दिखीं की इनकी दीवारों पर की गयी कारीगरी देखकर आँखें खुली की खुली रह गयीं। अजयगढ़ किले में इस स्थान पर बने एक सीढ़ीदार तालाब और उसके पास बनी ये दो इमारतें जंगल की अनोखी शांति के बीच अनूठे सौन्दर्य का सृजन कर रही थीं। इस जंगल की खाक छानना मेरे लिए सफल हो गया था। इन इमारतों की हम खजुराहो से तुलना नहीं कर सकते लेकिन सामरिक तथ्यों को ध्यान में रखकर बनाये गये किले के बीच में इतनी कलात्मकता आश्चर्यजनक है। किले को सम्भवतः पुरातत्व विभाग द्वारा कब्जे में तो ले लिया गया है लेकिन काम कुछ भी नहीं किया गया है। किले और इसकी इमारतों के बारे में सूचना प्रदान करने वाला कोई भी सूचनापट्ट उपलब्ध नहीं है। किले में आने–जाने या फिर किले के अन्दर घूमने के लिए किसी भी तरह के रास्ते का निर्माण नहीं किया गया है।
इन इमारतों से लगभग दो मिनट की पैदल दूरी पर एक और तालाब दिखाई पड़ रहा था। इसकी सीढ़ियों पर बन्दर मामा अपने पूरे कुटुम्ब के साथ जमे हुए थे तो उधर जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। अब मुझे कँटीले तारों की बाड़ का मतलब समझ आ रहा था। यहाँ के खण्डहरों को सुरक्षित रखने के लिए ही ये बाड़ लगायी गयी थी। एक जगह गेट भी लगाया गया था लेकिन इसमें सम्भवतः स्थायी रूप से ताला लगा था और यहाँ पहुँचने के लिए कँटीले तारों के बीच से होकर गुजरना आवश्यक था। अब तक 1.30 बज चुके थे। अजयगढ़ किले में आने का मेरा मकसद अब पूरा हो चुका था और अब मैं वापस लौट पड़ा। लेकिन किले से बाहर निकलने से पहले थोड़ा आराम करना भी जरूरी था तो मैं उसी मंदिर के पास पहुँच गया जहाँ पुजारी रूका था। मंदिर के पास एक बरगद के विशाल वृक्ष के चारों और बने चबूतरे पर मैंने बड़ी ही शान से कुछ देर आराम किया और फिर बाहर की ओर चला। किले के गेट से कुछ पहले एक लकड़हारा जैसा आदमी मिला। यह हाथ में कुल्हाड़ी लिए सम्भवतः जंगलों की सेवा करने जा रहा था। इस समय किले के गेट पर चेक करने वाला कोई नहीं था। वापस जाने वाले को कौन पूछता है। हाँ तीन और लोग,जो पूरी तरह स्थानीय थे,किले में प्रवेश कर चुके थे और किले की दीवार के पास खड़े होकर नीचे तलहटी में बसे अजयगढ़ कस्बे को निहार रहे थे। किले केे खुलने–बन्द होने में समय का कोई प्रतिबन्ध नहीं है अर्थात यह सुबह से शाम तक खुला रहता है। हो सकता है कि यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ जाय तो यहाँ भी टाइम निर्धारित हो जाय।

अब सिर्फ नीचे ही उतरना था तो मैं तेजी से भागता गया और ढाई बजे के कुछ मिनट पहले अजयगढ़ बस स्टैण्ड पहुँच गया। यहाँ पन्ना के लिए एक बस लगी थी तो ज्यादा कुछ सोचने–समझने का समय नहीं था और बस पकड़ लेने में ही भलाई थी। कुछ समोसे–बिस्कुट–नमकीन तो बस की सीट पर बैठकर भी खाये जा सकते हैं। एक घण्टे बाद यानी 3.30 बजे मैं पन्ना पहुँच गया और अगले एक घण्टे बाद अर्थात 4.30 बजे बमीठा। आज का संयोग ही कुछ ऐसा था कि कहीं बैठ कर खाना खाने का समय ही नहीं मिला क्योंकि बसें एक के बाद एक मिलती गयीं। 5 बजे मैं खजुराहो पहुँच गया। और खजुराहो पहुँचने के बाद यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब काेई काम शेष न रह गया हो तो आदमी कहाँ जायेगा– मातंगेश्वर मंदिर की सीढ़ियों पर। क्योंकि पुरातत्व विभाग ने इसे खजुराहो निवासियों के लिए फ्री कर रखा है।
लगभग डेढ़ घण्टे का समय यहाँ बिताने के बाद मैंने एक रेस्टोरेण्ट में भरपेट थाली की दावत उड़ाई क्योंकि मुझे घर पहुँचने में चौबीस घण्टे लगने थे। सात बजे के आस–पास मैं ऑटो के फेर में पड़ा और अगर मैंने इससे अधिक देर की होती तो शायद आटो रिजर्व करके खजुराहो रेलवे स्टेशन जाना पड़ा होता। फिर भी ऑटो वाले ने मेरे जैसे ही कुछ अन्य यात्रियों से 10 रूपये की बजाय 20 रूपये का किराया पहले ही मुकर्रर कर लिया था। आठ बजे के पहले ही मैं खजुराहाे रेलवे स्टेशन पहुँच गया। और जैसा कि आते समय मैंने देखा था,जाते समय भी विदेशी पर्यटकों की अच्छी–खासी संख्या रेलवे स्टेशन पर दिख रही थी।

अजयगढ़ किले की ओर जाती सीढ़ियां
किले का बाहरी प्रवेश द्वार
किले की दीवारों पर बनी मूतियां



 



किले का मुख्य प्रवेश द्वार

पीले कुर्ते में मंदिर का पुजारी
तालाब के किनारे सफेद रंग की इमारत में स्थापित मंदिर

तालाब के किनारे खण्डहरों के अवशेष
मंदिर के अंदर स्थापित मूर्तियां

किले के दक्षिणी कोने में स्थित खूबसूरत इमारतों के खण्डहर
खजुराहो की कलाकृतियों से मेल खाती कारीगरी






उजाड़ जंगल
बियावान में पगडण्डी
किले के नीचे दिखता अजयगढ़ कस्बा


सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. खजुराहो–एक अलग परम्परा (पहला भाग)
2. खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)
3. खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)
4. खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)
5. कालिंजर
6. अजयगढ़

अजयगढ़ किले का गूगल मैप–

4 comments:

  1. सही कहा आपने कालिंजर घूमने में नानी दादी याद आ गयी आपको....अजयगढ़ की बढ़िया घुमक्कड़ी...5 rs बचाने के चक्कर मे लड़ाई मत किया करो...

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    1. थोड़ी बहुत किच किच तो यात्रा का अभिन्न हिस्सा है भाई। इसका भी अपना आनन्द है। वैसे यात्रा में घर से निकले हैं तो कुछ न कुछ तो एडजस्ट करना ही पड़ता है।

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  2. अजयगढ़ के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिली, धन्यवाद!
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद कविता जी। आगे भी आते रहिए अौर मेरा उत्साहवर्धन करते रहिए।

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