Friday, April 27, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

कल दिन भर मैंने खजुराहो की सड़कों पर डांडी मार्च किया था। दिन भर बिना कहीं बैठे लगातार खड़े रहने व चलते रहने की वजह से थक गया था। खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह तो कस्बे के बिलकुल पास में ही हैं,इसलिए इन तक पहुँचने के लिए ग्यारह नम्बर की जोड़ी ही पर्याप्त है। लेकिन पूर्वी मंदिर समूह तथा दक्षिणी मंदिर समूह तक पहुँचने के लिए कोई न कोई छोटा–मोटा साधन जरूरी है। हालाँकि दूरी इनकी भी बहुत अधिक नहीं है लेकिन व्यस्त जिंदगी में से किसी तरह बचा कर निकाला हुआ समय बहुत ज्यादा खर्च हो जायेगा। आज मैं इसी थ्योरी पर सोच रहा था। थोड़ा–बहुत घूमना शेष रह गया है। ऑटो वाले 'ऑटोमैटिकली' पूरा किराया वसूलेंगे। कल वाला युवक जो मोटरसाइकिल दे रहा था उसे भी मैंने फोन पर ही मना कर दिया था। फोन काटते समय उसने एक बहुत अजीब सा कमेंट किया जिस पर मैं काफी देर तक सोचता रहा– 'सिंगल परसन।'
अचानक एक बात दिमाग में आयी। कहीं पर मैंने पढ़ रखा था कि खजुराहो में साइकिलें किराये पर मिलती हैं। अपने लॉज में मैंने इस बारे में पूछताछ की तो बात सही निकली। बहुत पछतावा हुआ कि यही बात कल मेरे दिमाग में क्यों नहीं आयी। शायद अच्छी बातें हमेशा ही दिमाग में बाद में आती हैं। कितना अच्छा होता यदि हर टूरिस्ट प्लेस पर साइकिलें किराये पर मिलतीं। ऑटो वालों की दादागिरी कुछ तो कम होती। खजुराहो में साइकिल का रेट है 100 रूपये प्रतिदिन। अब दिन भर के लिए भी साइकिल ले जायेंगे तो कितना चलायेंगे। और चला कर जायेंगे भी तो कहाँǃ खजुराहो में घूमने या फिर साइकिल चलाने की भी अपनी सीमाएं हैं। वैसे अधिक सोच–विचार करने का मेरे पास विकल्प नहीं था। लॉज मैनेजर मुझे अपने साथ लेकर गेट के सामने खड़ी साइकिलों के पास गया मानो कोई बहुत बड़ा म्यूजियम दिखाने जा रहा हो। तीन साइकिलें थीं और तीनों अनलाक्ड। ऐसा नहीं कि उनमें ताले नहीं थे लेकिन ताला बंद किसी का नहीं था। अपने यूपी में तो ऐसा आदर्शवाद असंभव है कि बिना ताले की साइकिल आपके दरवाजे पर आपकी मर्जी से खड़ी रहे। मैंने अपनी आशंका लॉज मैनेजर से प्रकट की तो उसने पूरा साइकिल दर्शन ही झाड़ दिया– नहीं जी,कोई दिक्कत नहीं। हमारी साइकिलें ऐसे ही रहती हैं। आप भी बस फीस जमा कर दीजिए। उसके बाद कोई भी साइकिल कभी भी ले जाइए। दिनभर में कभी भी लाइए–ले जाइए। किसी भी मंदिर के गेट के बाहर खड़ी कर दीजिए। हाँ,जहाँ भी खड़ी कीजिए,ताला लगा दीजिए। मैंने सोचा कि ताला यहाँ भले जरूरी न हो,मंदिर के पास जरूरी है। अपनी लम्बाई के हिसाब से मैंने एक साइकिल चुन ली और सुबह के लगभग 7 बजे खजुराहो की सड़कों पर निकल पड़ा।

कल मैं पश्चिमी और पूर्वी मंदिर समूह तक पहुँच चुका था। लेकिन आज पूरे दिन इसका रिवीजन करना था क्योंकि बिना रिवीजन किये मेरा मन नहीं भरता और कुछ बारीकियां भी पता नहीं चलतीं। दक्षिणी समूह पूरी तरह बाकी था तो सबसे पहले दक्षिणी मंदिर समूह की ओर निकल पड़ा। दक्षिणी मंदिर समूह में मुख्य रूप से दो मंदिर हैं– दूल्हादेव मंदिर व चतुर्भुज मंदिर। साथ ही बीजामण्डल मंदिर के अवशेष भी इसी के अन्तर्गत सम्मिलित हैं। दक्षिणी मंदिर समूह में भी सबसे पहले दूल्हादेव मंदिर। पश्चिमी मंदिर समूह से दूल्हादेव मंदिर की दूरी 2 किलोमीटर से कुछ अधिक है। दूल्हादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। चंदेल शासकों द्वारा निर्मित कराये गये मंदिरों में से यह सर्वाधिक बाद का मंदिर है लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसका निर्माण 1100 से 1150 ई0 के मध्य कराया गया। कालान्तर में इस मंदिर का जीर्णाेद्धार भी कराया गया। यह एक निरंधार शैली का मंदिर है अर्थात इसमें प्रदक्षिणापथ रहित गर्भगृह,अंतराल,महामण्डप तथा अर्द्धमण्डप हैं। इसका महामण्डप विशिष्ट प्रकार का है जो कि अष्टकोणीय आकृति का बना है। मंदिर के गर्भगृह में सहस्रमुखी शिवलिंग स्थापित है अर्थात मुख्य शिवलिंग पर 1000 अन्य छोटे–छोटे शिवलिंग अंकित किये गये हैं। इसके बारे में कहा जाता है कि इसके दर्शन से एक हजार शिवलिंगों के दर्शन का फल प्राप्त होता है तो मैंने तो यह फल प्राप्त कर लिया।
इस मंदिर का स्थापत्य और मूर्तिकला खजुराहो के अन्य मंदिरों की तुलना में कुछ साधारण सा लगता है। वैसे यह मंदिर काफी क्षतिग्रस्त भी है। क्योंकि इसकी दीवारों पर कारीगरी से रहित साधारण पत्थर काफी अधिक लगे हैं। उल्लेखनीय है कि खजुराहो के मंदिरों की मरम्मत के दौरान पुरातत्व विभाग ने क्षतिग्रस्त भागों पर उसी आकार तथा आकृति के पत्थरों को फिट किया है। अंतर सिर्फ इतना है कि पुरातत्व विभाग द्वारा लगाये गये ये पत्थर सपाट या चिकने हैं और इन पर मूल निर्मिति की भाँति कारीगरी नहीं की गयी है। वैसे तो दूल्हादेव मंदिर में भी पूजा नहीं होती लेकिन मंदिर के पास बसे किसी छोटे से गाँव के निवासी और खासतौर से महिलाएं भला कहाँ मानने वाली। कई महिलाएं हाथ में लोटे का जल लेकर मंदिर में पूजा करने आ पहुँची थीं। शायद इसी वजह से मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे में ताला लगा था। मेरे लिए थोड़ी सी असहज स्थिति तब उत्पन्न हो गयी जब ऐसी ही एक पूजा करने आयी महिला मेरे सामने हाथ फैलाकर मुझसे पैसे की याचना करना लगी। मैंने किसी तरह उसके हाथ में कुछ रखकर उसे टरकाने की कोशिश की। दूल्हादेव मंदिर में जब मैं पहुँचा था तो कोई भी दर्शनार्थी यहाँ नहीं दिख रहा था लेकिन जब मैं निकलने लगा तो एक–दो लोग पहुॅंच गये थे।

दूल्हादेव मंदिर एक छोटी सी बरसाती नदी खुदार के किनारे बना है। मंदिर के पास नदी पर बिना रेलिंग का का एक छोटा एवं सँकरा पुल बना है जिससे होकर आगे जाया जा सकता है। इस नदी में पानी बिल्कुल भी नहीं था। हाँ,बरसात में अवश्य ही इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता में वृद्धि हो जाती होगी। दूल्हादेव मंदिर के बाद अब मेरा लक्ष्‍य चतुर्भुज मंदिर था। दूल्हादेव मंदिर से इस मंदिर की दूरी लगभग 2 किमी है। दूरियां वैसे तो अधिक नहीं थीं लेकिन चढ़ाई–उतराई वाली सड़क पर साइकिल चलाने में काफी जोर लगाना पड़ रहा था।  ज्यादा जोर लगाने पर साइकिल भी भाँति–भाँति की आवाजें निकालने लग जा रही थी। थोड़ी ही देर में मैं चतुर्भुज मंदिर पहुँच गया। यह मंदिर सड़क के किनारे बिल्कुल एकांत में स्‍िथत है। इस मंदिर के पास केवल एक सरकारी स्कूल दिखायी पड़ रहा था। हाँ,यहाँ भीड़–भाड़ न होने का फायदा मुझे यह मिला कि मंदिर में लगे वाटर–कूलर का पानी बिल्कुल ठंडा था जिसे मैंने बोतल में भर लिया।
चतुर्भुज मंदिर भी निरंधार शैली का मंदिर है। यह एक छोटा मंदिर है जिसमें केवल गर्भगृह तथा प्रवेश द्वार ही बने हैं। यह मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। यह खजुराहो का एक ऐसा मंदिर है जिसमें मिथुन मूर्तियों का अभाव है। इसकी दीवारों पर चारों ओर मूर्तियों की तीन श्रृंखलाएं हैं जिनमें से ऊपर की पंक्ति में अंकित विद्याधरों की प्रतिमाओं के अलावा सभी प्रतिमाएं एक समान हैं जो शिल्पकला के पतन का द्योतक हैं। इस मंदिर का निर्माण काल 1100 र्इ0 माना जाता है। यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। इसके अलावा लालगुंवा का महादेव मंदिर भी पश्चिमाभिमुखी है। चतुर्भुज मंदिर के गर्भगृह में चार भुजाओं वाली भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित है। 2.7 मीटर ऊँची यह एकाश्मक प्रतिमा शिव के त्रिभंगी स्वरूप के लिए जानी जाती है।

चतुर्भुज मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक और मंदिर के अवशेष हैं। चतुर्भुज मंदिर से इसकी दूरी एक किलोमीटर के आस–पास होगी। मैं खेतों के बीच बनी पगडंडी पर अपनी साइकिल दौड़ाते हुए यहाँ भी पहुँच गया। यह मंदिर पूरी तरह से खण्डहर हो चुका है। इसके अवशेषों को देखकर लगता है कि यह भी एक बड़ा मंदिर रहा होगा। वैसे इसके बारे में मैं ज्यादा कुछ अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं था। बीजामण्डल के खण्डहरों के कुछ फोटो खींचने के बाद जब मैं वापस लौट रहा था तो वही मोटरसाइकिल वाला लड़का किसी विदेशी सैलानी को बाइक पर बिठाकर कर बी की ओर जा रहा था। मुझे देखकर वह हँसा और अपना सीधा सा कमेण्ट दुहराया– 'सिंगल परसन।' मैं भी उसके कमेण्ट पर हँस दिया।
मैं कल वाले पुराने रास्ते पर आज साइकिल दौड़ाता हुआ दुबारा पूर्वी मंदिर समूह के मंदिरों तक पहुँच गया। एक बार फिर से जैन मंदिर समूह के पार्श्वनाथ मंदिर,आदिनाथ मंदिर,शांतिनाथ मंदिर तथा जवारी मंदिर व वामन मंदिर का बारीकी से निरीक्षण करते हुए दोपहर से काफी पहले ही मैं खजुराहो के मुख्य चौराहे तक पहुँच गया। इसी बीच जब मैं वामन मंदिर से बाहर निकला रहा था तो  वही मोटरसाइकिल वाला लड़का एक विदेशी पर्यटक को लेकर वहाँ पहुँचा और एक बार फिर से अपना वही सिंगल परसन वाला कमेण्ट दुहराया। इस बार मुझे गुस्सा आया लेकिन तब तक वह अपनी मोटरसाइकिल दौड़ाता हुआ आगे निकल गया। मैं उसे बताना चाह रहा था कि मैं सिंगल परसन नहीं हूँ बल्कि असली सिंगल परसन तुम हो।

अब फिर से तीस रूपये का टिकट लेकर पश्चिमी मंदिर समूह परिसर में प्रवेश करने की बारी थी क्योंकि इन मंदिरों की कुछ और बारीकियों काे देखना समझना था। इस परिसर में लगभग तीन घण्टे का समय बिताने के बाद मैं बाहर निकला और पुरातत्व विभाग के संग्रहालय के बारे में पता किया। पुरातत्व विभाग का संग्रहालय यहाँ दो जगह है। एक तो दक्षिण की ओर बमीठा जाने वाली रोड पर शिवसागर तालाब से थोड़ा पहले पुराना संग्रहालय है और दूसरा उत्तर की ओर थोड़ी दूरी पर राजनगर जाने वाली रोड पर नये बने विशाल भवन में अवस्थित है। मैं पहले पुराने संग्रहालय में पहुँचा। यह एक छोटा सा संग्रहालय है और इसमें दो–तीन गैलरियां ही हैं। अगर आपने पश्चिमी मंदिर समूह में प्रवेश के लिए टिकट लिया है तो वही टिकट यहाँ भी मान्य है और अलग से टिकट लेने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन यह बात मुझे संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद ही पता चली। यहाँ संभवतः दो कर्मचारी ही तैनात है जो इसकी देखभाल का सारा काम करते हैं। राजनगर रोड वाला संग्रहालय एक नये भवन में बना है जहाँ खजुराहो और इसके आस–पास के क्षेत्रों से प्राप्त मूर्तियों और शिलालेखों को कई गैलरियों में व्यवस्थित करके रखा गया है। इसके अतिरिक्त खजुराहो के बारे में काफी जानकारी भी उपलब्ध करायी गयी है। यहाँ घूमने के बाद मुझे महसूस हुआ कि यदि खजुराहो के मंदिरों को देखने से पहले इस संग्रहालय में घूम लिया जाय तो मंदिरों से सम्बन्धित बारीकियों को समझने में काफी सहूलियत हो जायेगी। मंदिरों में बनी मूर्तियों के प्रकार के बारे में संग्रहालय में काफी जानकारी दी गयी है जिससे मूर्तियों को पहचानने में मदद मिलती है। इस संग्रहालय में पुरातत्व विभाग का कार्यालय भी है। इन दोनों संग्रहालयों में से किसी के लिए अलग से टिकट लेने की जरूरत नहीं है।

इतना सबकुछ घूमने के बाद अभी एक मंदिर मुझसे छूट रहा था और वह था– ललगुंवा का महादेव मंदिर। ललगुंवा महादेव मंदिर के बारे में मैंने पूछताछ की तो इसके बारे में हर कोई बताने की स्थिति में नहीं था और अगर किसी को इसके बारे में जानकारी थी भी तो सही रास्ते का पता लगना काफी मुश्किल लग रहा था। मेरे लॉज मैनेजर ने काफी घूम–फिरकर इसकी दूरी तीन–चार किलोमीटर बतायी और यह सही भी था लेकिन एक और विकल्प मेरे सामने था। कल जब मैं चौंसठ योगिनी मंदिर गया था तो वहाँ तैनात गार्ड ने इसका सही पता बताया था। चौंसठ योगिनी मंदिर से कुछ दूरी पर बनी इसकी चारदीवारी की ओर इशारा करते हुए उसने बताया था कि वो सामने दिख रही चारदीवारी एक स्थान पर टूटी है। वहाँ से इसे आप पार कर लेंगे तो उस पार एक गाँव पड़ेगा। उस गाँव को पार कर जायेंगे तो लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर चौंसठ योगिनी मंदिर की ठीक पश्चिम दिशा में खेतों के बीच में यह मंदिर बना है।
यह रास्ता बिल्कुल पगडंडियों वाला था और इस वजह से शायद ही कोई पर्यटक इस मंदिर तक जाता होगा। मैंने यही रास्ता पकड़ा। टूटी चारदीवारी को पार किया तो गाँव में रास्ता ही समझ नहीं आ रहा था। कई लोगों से पूछताछ की तो लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि मैं किस मंदिर की बात कर रहा हूँ। कुछ लोगों ने तो गाँव में बने एक–दो छोटे मंदिरों के बारे में बता दिया। लेकिन एक वृद्धा ने,जो काफी समझदार लग रही थी,मुझे ललगुंवा के मंदिर का ठीक रास्ता बताया। रास्ता क्या था केवल पगडंडियां थीं। अगर मानसून का मौसम होता तो ये पगडंडियां भी नहीं दिखतीं। आगे बढ़ा तो और भी कई लोगों से रास्ता पूछना पड़ा। लोग मंदिर की लाेकेशन तो बता रहे थे लेकिन इसके नाम से अनभिज्ञ थे। किसी तरह जब मैं मंदिर पहुँचा ताे यहाँ आदमी नाम का कोई जीव नहीं था।
ललगुंवा का मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह एक छोटा सा पश्चिमाभिमुख मंदिर है। इसके गर्भगृह में वर्तमान में कोई भी मूर्ति नहीं है। मंदिर के ठीक सामने नंदी की एक सुंदर मूर्ति विराजमान है। इसका शिखर पिरामिड के आकार का है अर्थात यह ब्रह्मा मंदिर,मातंगेश्वर मंदिर या वाराह मंदिर की श्रेणी का ही है। इस मंदिर का निर्माण 900 ई0 के आस–पास हुआ माना जाता है। मंदिर परिसर के आस–पास बड़े–बड़े पत्थर यत्र–तत्र बिखरे हुए हैं और शाम की पीली धूप में इन पत्थरों का नजारा बहुत ही सुंदर दिख रहा था।

मेरा आज का पूरा दिन भी साइकिल चलाते या फिर खड़े–खड़े ही बीत गया था। बैठने का तो मैंने प्रयास ही नहीं किया था। ललगुंवा महादेव मंदिर देखने के बाद पूरी तरह शाम होने से कुछ पहले ही मैं खजुराहो लौट आया। लाॅज वाले को साइकिल लौटाई और पैदल चल पड़ा मातंगेश्वर मंदिर की ओर। आज मुझे मातंगेश्वर मंदिर का भी अच्छी तरह से निरीक्षण भी करना था।
वैसे तो खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर है लेकिन चंदेल शासकों द्वारा बनवाये गये मंदिरों में मातंगेश्वर मंदिर सर्वाधिक प्राचीन है। इस मंदिर का निर्माण हर्षवर्मन ने 920 ई0 के आस–पास कराया था। खजुराहो का यह एकमात्र ऐतिहासिक मंदिर है जिसमें पूजा होती है। इस मंदिर के बारे में एक किंवदंती है कि राजा हर्षवर्मन ने इस मंदिर में मरकतमणि नाम मणि की स्थापना भी की था। इस मणि को भगवान शिव ने स्वयं युधिष्ठिर को दिया था। इस मंदिर में विशाल शिवलिंग स्थापित है जिसकी ऊँचाई 2.5 मीटर तथा व्यास 1.1 मीटर है। इस शिवलिंग के जंघा का व्यास 7.2 मीटर है। बालू पत्थर से निर्मित यह मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से खजुराहो के अन्य मंदिरों की तुलना में साधारण है। इस मंदिर के बगल में पुरातत्व विभाग का भण्डार गृह बना हुआ है।
मातंगेश्वर मंदिर के चबूतरे व सीढ़ियों पर खजुराहो के काफी लोग शाम को इकट्ठे होते हैं– अध्यात्म गंगा में गोते भी लगाते हैं और साथ ही मन की भड़ास भी निकालते हैं। ये सब देखने में आनन्द आता है इसलिए मैं भी मातंगेश्वर मंदिर की सीढ़ियों में सबसे ऊपर की सीढ़ी पर जाकर बैठ गया।


दूल्हादेव मंदिर
दूल्हादेव मंदिर

दूल्हादेव मंदिर की बाहरी दीवार
मंदिर की छत
चतुर्भुज मंदिर
चतुर्भुज मंदिर का गर्भगृह
चतुर्भुज मंदिर की छत अंदर से
चतुर्भुज मंदिर
ललगुंवा महादेव मंदिर
ललगुंवा महादेव मंदिर के आस–पास बिखरे पत्थर
मातंगेश्वर मंदिर
मातंगेश्वर मंदिर में बना विशाल शिवलिंग


मातंगेश्वर मंदिर
बीजामण्डल मंदिर के खण्डहर
बीजामण्डल मंदिर

बीजामण्डल मंदिर की दीवारों पर बनी कलकृतियां
शिवसागर झील


अगला भाग ः कालिंजर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. खजुराहो–एक अलग परम्परा (पहला भाग)
2. खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)
3. खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)
4. खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)
5. कालिंजर
6. अजयगढ़

खजुराहो के दक्षिणी मंदिर समूह का गूगल मैप–

6 comments:

  1. आप यात्रा वृतांत जिस प्रकार लिखते हैं Lलगता है पुनः खजुराहो की यात्रा पे हूं। आपको ऑटो कर लेना चाहिए था। मैं 2014 में गया था तब शायद ऑटो वाला 3 या 4 सौ लिया था। सुबह 6 बजे से शाम तक घुमाया। 150 और एक्स्ट्रा देने पे एक पाताल पानी जैसी जगह भी घुमाया जो एक अनोखी जगह थी। वहां से स्टेशन। कोई महंगा सौदा न्हि लगा

    ReplyDelete
    Replies
    1. भाई बात दरअसल ये है कि हर महीने लगभग एक यात्रा हो ही जाती है। तो फिर अधिक से अधिक बचत करने पर ध्यान रहता है। और ऑटो वालों के साथ थोड़ा सा समय का बन्धन रहता है। पैदल या फिर साइकिल में अपनी सवारी जैसी बात होती है। निश्चिंत होकर घूमने का मजा ही कुछ और होता है।

      Delete
  2. पूरा दिन खड़े खड़े बीता दिया..वैसे यह साईकल का आईडिया सही हौ....हम्पी में 14 km घुमना होता है वहा भी ऐसे साईकल से बहुत घूमते है लोग

    ReplyDelete
    Replies
    1. साइकिल पर घूमने में बहुत आनन्द आता है प्रतीक भाई। अपनी शान की सवारी। माण्डू में भी साइकिलें मिलती हैं और लगभग बीस किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।

      Delete
  3. विस्तृत लेख पढ़कर आनंद आया ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद सन्तोष जी। आगे भी आते रहिए।

      Delete