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Friday, July 26, 2019

बोधगया से सासाराम


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बराबर से गया की ओर जाने के लिए मुझे हाइवे पकड़ना था। पतली सड़कों से रास्ता पूछते हुए चलने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। तो फिर से फल्गू नदी में उड़ती धूल को पार कर खिज्रसराय पहुँचा और वहाँ से फल्गू नदी के किनारे–किनारे गया की ओर। जेब के पैसे खत्म हो चुके थे तो मैंने खिज्रसराय में ही ए.टी.एम. की मदद ली। धूप ने पेट की भूख को भी समाप्त कर दिया था। तो खाने की कोई जरूरत नहीं थी। केवल पीते हुए ही चलना था। शाम के 4 बजे मैं गया रेलवे स्टेशन के पास पहुॅंच गया।
काफी मेहनत से 300 में एक कमरा मिला। कुछ देर तक आराम करने के बाद गया के भ्रमण पर निकल पड़ा। गया में मुझे अधिक भागदौड़ नहीं करनी थी। गया मोक्ष नगरी है और मुझे अभी मोक्ष की कोई जरूरत नहीं। यहाँ दो प्रसिद्ध एवं दर्शनीय मंदिर हैं– एक फल्गू नदी के किनारे विष्णुपद मंदिर और दूसरा मंगला गौरी मंदिर। रेलवे स्टेशन के पास जहाँ मैं ठहरा था,वहाँ से विष्णुपद मंदिर लगभग 4 किमी की दूरी पर है। तो रास्ता पूछते,गलियों में बाइक दौड़ाते मैं मंदिर पहुँच गया। दर्शनार्थियों की भारी भीड़ थी।
अपने पौराणिक महत्व के अतिरिक्त स्थापत्य की दृष्टि से भी विष्णुपद मंदिर एक सुंदर मंदिर है। यह एक प्राचीन मंदिर है जिसका जीर्णोद्धार इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1766 में कराया था। मंदिर की ऊँचाई लगभग 100 फीट है। मंदिर का शीर्ष अष्टकोणीय है। मंदिर के शीर्ष पर 50 किग्रा सोने का ध्वजकलश लगा है। मंदिर के गर्भगृह में 13 इंच लम्बा भगवान विष्णु का चरण चिह्न अंकित है। गर्भगृह में चाँदी का अष्टकोणीय कुण्ड बना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मंदिर के गर्भगृह में जिस पत्थर पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न बने हैं उसे स्वर्ग से लाया गया था। इसे धर्मशिला भी कहते हैं।

मंदिर में टहलते हुए मैंने दर्शन किये। पता चला कि यहाँ पिण्डदान का कार्यक्रम सालभर चलता रहता है। मंदिर के बाहर मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों लायक अच्छा खासा बाजार है जहाँ खाने–पीने की चीजें भी मिलती हैं। जिस समय मैं बिहार की यात्रा कर रहा था,शादी–विवाह का समय भी अपने चरम पर था। तो मंदिर से सटे हुए एक प्रांगण में शादी–विवाह से सम्बन्धित कार्यक्रम भी जमकर चल रहे थे।
विष्णुपद मंदिर से निकलकर मैंने मंगला गौरी मंदिर का पता लगाया। विष्णुपद मंदिर से मंगला गौरी मंदिर की दूरी है तो लगभग 1 किमी लेकिन इतनी गलियों से होकर जाना है कि दसियों जगह रास्ता पूछना पड़ा। यह मंदिर बहुत ही सँकरे स्थान में बना है जहाँ गलियों और सीढ़ियों से होकर जाना पड़ता है। मंदिर का गर्भगृह भी बहुत छोटा सा है जिसमें बहुत ही छोटा सा दरवाजा है। माना जाता है कि यह मंदिर 18 महाशक्तिपीठों में से एक है। कहते हैं कि यह मंदिर भस्मकूट नामक पहाड़ी पर बना है और इस स्थान पर सती का वक्षस्थल या स्तन कट कर गिरा था। इस कारण इसे पालनहार पीठ के नाम से भी जाना जाता है। इन मंदिर में दर्शन करने वालों में तीन–चौथाई महिलाएं ही दिख रही थीं।
उक्त दोनों मंदिरों के दर्शन करने में शाम हो गयी और मैं कमरे लौट आया। इस बीच एक दुकान पर गया का प्रसिद्ध तिलकुट भी खाया। मेरा कमरा चूँकि गया रेलवे स्टेशन के पास ही था तो खाना खाने के लिए रेस्टोरेण्ट की कमी नहीं थी।

19 अप्रैल
सुबह जल्दी उठकर मैंने अपना साजो–सामान बाइक पर बाँधा और बोधगया के लिए रवाना हो गया। गया रेलवे स्टेशन से बोधगया की दूरी केवल 14 किमी है। सीधी सड़क फल्गू नदी के किनारे–किनारे चलती जाती है। यहाँ भी फल्गू की धारा में केवल धूल ही उड़ रही थी। बोधगया फल्गू नदी के बायें या पश्चिमी किनारे पर बसा हुआ है। बोधगया के बसने की मुख्य वजह बुद्ध हैं। बोधगया के आराध्य देव बुद्ध ही हैं। तो बोधगया की हर सड़क पर चलते हुए कहीं न कहीं बुद्ध दिख जाते हैं। बोधगया के लगभग हर हिस्से में बुद्ध का कोई न कोई मंदिर अवश्य बना हुआ है। कहीं कम्बोडियाई मंदिर तो कहीं मंगोलियाई मंदिर। कहीं थाई मंदिर तो कहीं जापानी मंदिर। कहीं तिब्बती मंदिर तो कहीं भूटानी मंदिर। अब इन सारे मंदिरों में घूम–घूम कर मुझे पूजा नहीं करनी थी। मुझे बुद्ध के भारतीय मंदिर या महाबोधि मंदिर का ही दर्शन करना था। तो मैं सर्वप्रथम महाबोधि मंदिर पहुँच गया। बाइक के लिए स्टैण्ड का कहीं अता–पता नहीं दिख रहा था। लोग इधर–उधर बाइक खड़ी करके चले गये थे और एक महिला पुलिसकर्मी इन बाइकों को हटाने को लेकर परेशान हो रही थी। मैंने भी अपनी बाइक के लिए एक सुरक्षित जगह ढूँढ़ी और उस पर बँधे बैग को वैसे ही छोड़ दिया। पीठ पर लदे बैग को लेकर अन्दर की ओर चला तो पता चला कि बैग को बाहर जमा करना पड़ेगा। मोबाइल भी जमा करना पड़ेगा। इतने तक तो गनीमत थी लेकिन उसके बाद पता चला कि कैमरा अंदर नहीं ले जा सकते। मैंने देखा तो कई लोग कैमरा लेकर अंदर जा रहे थे। मैंने फिर सवाल किया तो नयी बात पता चली और वो ये कि कैमरे का पास बनवाना पड़ेगा। इस पास के लिए 100 रूपये भुगतना पड़ेगा। मतलब ये कि केवल दर्शन करना है तो कोई समस्या नहीं लेकिन अगर कुछ फोटो खींचने हैं तो भुगतान करना पड़ेगा।

मैं कैमरा लेकर गया था तो पास भी बनवाया और शान से अन्दर प्रवेश कर गया। रास्ते में सुरक्षा जाँच के बाद मुख्य द्वार से प्रवेश किया तो ठीक सामने भव्य महाबोधि मंदिर दिखायी पड़ा। गेट के दोनों तरफ भारी संख्या में फोटोग्राफर दिखायी पड़ रहे थे। मंदिर परिसर में भारतीय पर्यटक गिने–चुने ही दिखायी पड़ रहे थे। पूरा परिसर बुद्धमय दिखायी पड़ रहा था। मैं काफी देर तक परिसर में टहलता रहा। गर्भगृह में फोटो लेने पर कोई रोक नहीं है। इससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि कैमरे की फीस केवल पैसा कमाने के लिए रखी गयी है। मैं जिस समय पहुँचा,भगवान बुद्ध के परिधान बदले जा रहे थे। इसकी प्रक्रिया को देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ।
वर्तमान का महाबोधि मंदिर फल्गू नदी के किनारे बना हुआ है। इस नदी का प्राचीन नाम निरंजना भी है। यद्यपि बोधगया अत्यन्त प्राचीन काल से ही हिन्दुओं और बौद्धौं का तीर्थस्थल रहा है परन्तु प्राचीन काल में यहाँ कोई बड़ा नगर अवस्थित नहीं था। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहाँ गयासुर नामक दैत्य का निवास था जिसका विष्णु भगवान ने दमन किया। इस दैत्य के नाम पर ही इस स्थान का नाम गया पड़ा। चूँकि इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध को पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ अतः इस स्थान का नाम बोधगया पड़ गया। प्राचीन काल में इस स्थान पर उरूवेला नामक गाँव बसा हुआ था। महाभारत तथा अश्वघोषकृत बुद्धचरित से यह ज्ञात होता है कि यहाँ महर्षि गय का आश्रम था। संभव है उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम गया पड़ा हो। मौर्य सम्राट अशोक ने इस स्थान की यात्रा कर यहाँ एक स्तूप का निर्माण कराया। चीनी यात्री फाह्यान तथा ह्वेनसांग ने भी इस स्थान की यात्रा की तथा अशोक द्वारा बनवाये गये स्तूप को देखा। सिंघल या लंका के राजा मेघवर्ण ने यहाँ एक संघाराम का निर्माण करवाया।
वर्तमान मंदिर का निर्माण पाँचवीं शताब्दी के पूर्व गुप्तकाल में हुआ माना जाता है। मंदिर में पद्मासन में बैठी भगवान बुद्ध की आकर्षक मूर्ति स्थापित है। आर्य और द्रविड़ शैली में निर्मित यह मंदिर 170 फीट ऊँचा है। छठीं शताब्दी में बंगाल के गौड़ शासक शशांक ने बोधिवृक्ष का विनाश कर दिया। बाद में मगध नरेश ने इसका उद्धार किया। 12वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों में भी इस मंदिर को नुकसान पहुँचा।
मुख्य मंदिर के पश्चिम में बोधिवृक्ष है जिसे सतयुग के वृक्ष की शाखा कहा जाता है। वर्तमान बोधिवृक्ष मूल बोधिवृक्ष की पाँचवीं पीढ़ी है। इसी वृक्ष के नीचे पूर्वाभिमुख होकर बुद्ध ने तपस्या की थी और वैशाख मास की पूर्णिमा के दिन उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने दूसरा सप्ताह इस वृक्ष के सामने खड़े होकर बिताया। इस दौरान वे इसे अनिमेष होकर देखते रहे। इस स्थान पर,इसी अवस्था में बुद्ध की एक मूर्ति बनी हुई है जिसे अनिमेष लोचन कहा जाता है। मंदिर परिसर में एक छोटा सा तालाब भी है जिसके मध्य में बनी बुद्ध की मूर्ति को एक सर्प द्वारा अपने फन से ढककर रक्षा करते हुए दिखाया गया है। महाबोधि मंदिर परिसर से बिल्कुल सटे हुए एक सुंदर हिन्दू मंदिर भी है जिसे जगन्नाथ मंदिर कहा जाता है।
2002 में यूनेस्को द्वारा इस शहर को विश्व विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया गया।

महाबोधि मंदिर से लगभग 2 किमी की दूरी पर फल्गू नदी के उस पार एक स्तूप बना हुआ है जिसे सुजातागढ़ के स्तूप के नाम से जाना जाता है। यह फल्गू किनारे बसे एक गाँव के पास अवस्थित है। गूगल मैप की सहायता से मैं इस स्तूप के पास पहुँचा। यह स्तूप सुजाता नाम उस स्त्री की स्मृति में बनाया गया है जिसने तपस्या काल में भगवान बुद्ध को खीर खिलाया था। इस तथ्य की पुष्टि उत्खनन से प्राप्त 8वीं–9वीं शताब्दी के एक शिलालेख से हाेती है। यह स्तूप 1973-74 तथा 2001-06 के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराये गये उत्खनन से प्राप्त हुआ। यह एक गोलाकार स्तूप है जिसका निर्माण गुप्तकाल से लेकर पाल युग तक तीन चरणों में हुआ। इसका प्रदक्षिणा पथ काष्ठ वेदिका से घिरा था। मूल स्तूप पर चूना–प्लास्टर का लेप चढ़ा हुआ था।
सुजातागढ़ के पास सड़क किनारे छोटी–छोटी दुकानें हैं। इन्हीं दुकानों में से एक पर मैंने 20 रूपये में भरपेट जलेबी खायी। इसके बाद कुछ देर तक मैं बोधगया की सड़कों पर बाइक दौड़ाता रहा जिससे कि विभिन्न देशाें के बौद्ध समुदाय द्वारा बनवाये गये आधुनिक मंदिरों को देख सकूँ। इनमें से कुछ मंदिर बहुत ही सुंदर बन पड़े हैं।

10 बजे मैं बोधगया से सासाराम के लिए रवाना हो गया। बोधगया से 20 किमी दूर दक्षिण की तरफ डोभी नामक स्थान है जहाँ जी.टी. रोड मिल जाती है। डोभी से 115 किमी की दूरी पर इस हाइवे के किनारे सासाराम पड़ता है। सासाराम से बक्सर होते 140 किमी की दूरी तय कर मुझे आज ही अपने घर पहुँचना था लेकिन उसके पहले सासाराम।
सासाराम के 10 किमी पहले डेहरी नाम स्थान पड़ता है जहाँ सड़क सोन नदी को पार करती है। इसी पुल के समानान्तर रेल पुल भी बना हुआ है जो भारत का दूसरा सबसे लम्बा रेल पुल है। इस रेल पुल की लम्बाई 3059 मीटर है। वैसे सोन नदी को पार करने के पहले मुझे तेज बारिश का सामना करना पड़ा। बारिश के साथ जबरदस्त ओले भी पड़ने लगे। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं अभी डेहरी में ही था। अन्यथा पुल पर चढ़ जाने के बाद ओलों की मार सहनी पड़ती।
1.30 मैं सासाराम पहुँचा जहाँ शेरशाह सूरी का मकबरा बना हुआ है। सासाराम कस्बा बिहार के राेहतास जिले में पड़ता है। यह जी.टी. रोड के किनारे बसा हुआ है। शेरशाह का मकबरा हाइवे से लगभग 2 किमी की दूरी पर है। रास्ता पूछते हुए मैं मकबरे तक पहुँचा। सड़क के दाहिने किनारे तालाब के बीचोबीच भव्य मकबरा बना हुआ है जबकि दाहिने किनारे कार्यालय और स्टैण्ड वगैरह बने हुए हैं। मैंने स्टैण्ड में बाइक खड़ी की,टिकट लिया और मकबरे में प्रवेश कर गया। मकबरा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। परिसर में 20–25 लोग मौजूद थे लेकिन मेरे अतिरिक्त मकबरे में कोई भी बाहरी व्यक्ति नहीं दिख रहा था। खास बात यह थी कि मकबरा देखने कोई नहीं आया था। अधिकांश पर्यटक स्थानीय लैला–मजनूं ही थे जिनके लिए यह मकबरा काफी सुरक्षित पनाहगाह लग रहा था। मैं भी आधे घण्टे के आस–पास मकबरे में चहलकदमी करता रहा। मैंने पूरी झील की परिक्रमा करने की कोशिश भी की लेकिन ऐसा कोई रास्ता परिसर में नहीं बना हुआ है।
एक कृत्रिम झील के बीच में अवस्थित यह मकबरा दूर से देखने में बहुत आकर्षक प्रतीत होता है। इस मकबरे का निर्माण अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने जीवनकाल में ही शुरू कर दिया था। 1545 में कालिंजर के किले में बारूद के विस्फोट में शेरशाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र इस्लाम शाह ने मकबरे को पूरा किया। लाल बलुआ पत्थर से,भारतीय इस्लामिक शैली में बने,122 फीट ऊँचे इस मकबरे का निर्माण 1540-1545 के बीच पूरा हुआ। मुख्य मकबरा अष्टकोणीय आकृति का है जिसके ऊपर एक गुंबद बना हुआ है। झील के बीच बने मकबरे को मुख्य भूमि से जोड़ने के लिए एक सुंदर पुल का निर्माण भी किया गया है। मकबरे की डिजाइन वास्तुकार मीरमुहम्मद अलीवाल खान द्वारा बनायी गयी थी।

सासाराम में शेरशाह का मकबरा देख लेने के बाद अब मेरी बिहार की बाइक यात्रा समाप्त होने वाली थी। यहाँ से निकलकर मैं घर को रवाना हो गया।


विष्णुपद मंदिर
महाबोधि मंदिर में बुद्ध प्रतिमा

महाबोधि मंदिर








जगन्नाथ मंदिर

थाई मंदिर
सुजातागढ़ का स्तूप
मंगोलियाई मंदिर
80 फीट ऊँची बुद्ध प्रतिमा
शेरशाह सूरी का मकबरा


सम्बन्धित यात्रा विवरण–

2 comments:

  1. एकबार रोहतास गढ़ देखने की तमन्ना है, पिछली बार जब सासाराम गया था तब रोहतास गढ़ के पहाड़ तक पहुँच गया था परंतु अकेला होने के कारण किले तक नहीं जा पाया था

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    1. धन्यवाद सुधीर भाई। बिहार में बहुत सारे ऐतिहासिक स्थल ऐसे हैं जिनके बारे में हमें पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसके अलावा वहाँ पहुँचने के लिए साधन भी नहीं मिलते हैं। इसी कारण मैं बाइक से गया था।

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