Friday, June 14, 2019

राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (पहला भाग)

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दिन के 2 बजे जब राजगीर पहुँचा तो सुबह के 7 बजे देवघर से निकलने के बाद 290 किमी बाइक चला चुका था। यह दूरी बहुत अधिक नहीं थी लेकिन तेज धूप में यह दूरी दुगुनी महसूस हो रही थी। शरीर की सारी ताकत को धूप ने सोख लिया था। पानी का बोझ सँभालते–सँभालते पेट थक गया था। फिर भी पहले राजगीर में रहने का ठिकाना ढूँढ़ना था। क्योंकि दिन भर की यात्रा के बाद आराम की जरूरत महसूस हो रही थी। मेरी समझ से यह ऑफ सीजन था फिर भी एक सस्ता कमरा ढूँढ़ने में पसीने छूट गये। पर्यटकों के लिए यह भले ही ऑफ सीजन था लेकिन शादी–विवाह के लिए यह पीक सीजन था।
कई जैन एवं मारवाड़ी लाॅज हैं लेकिन मेरे लिए आउट ऑफ बजट हो जा रहे थे। कई लॉज,धर्मशालाओं का दरवाजा खटखटाया तब जाकर 300 में एक कमरा मिल सका। काफी बकझक और इन्तजार के बाद। लेकिन होटल के बिल्कुल सामने बाइक खड़ी करना मना था। होटल के सामने चाऊमीन और चाट की दुकान चल सकती है,दोने और पत्तल फेंके जा सकते हैं,लेकिन होटल के सामने बाइक खड़ी करना मना है। बाइक खड़ी तो होटल के सामने ही हुई लेकिन थोड़ा पीछे हटकर बिल्कुल सड़क के किनारे,धूप में। होटल के बिल्कुल सामने बाइक खड़ी देखकर होटल के ग्राहक भड़क सकते हैं। या फिर बाइक से डरकर बेहाेश भी हो सकते हैं। ऐसी काली बाइक को कौन अपने घर के सामने खड़ी करने देता है। मैं बाइक को छाया में रखकर धूप से बचाना चाहता था लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका।
कमरा मिला तो फिर वही कल वाली कहानी दुहराई। तुरंत बिस्तर पर लेट गया। एक घण्टे सोने के बाद शरीर कुछ हल्का हुआ। धूप भी कुछ हल्की हो गयी थी। तो मैं अजातशत्रु की राजधानी के भ्रमण पर निकल पड़ा।
राजगीर के लगभग सभी प्राचीन स्मारक राजगीर से गया जाने वाली सड़क के किनारे ही बसे हैं। तो बहुत अधिक खोजने की जरूरत नहीं है। गया जाने वाली सड़के के किनारे चलते जाइये। कहीं अजातशत्रु तो कहीं बिम्बसार मिल ही जायेंगे। वैसे राजगीर अजातशत्रु और बिम्बसार से भी अधिक प्राचीन है। जहाँ तक हम सोच सकते हैं शायद उससे भी अधिक प्राचीन। लेकिन राजगीर की सड़काें पर घूमते हुए लगता है कि हम उसी इतिहास में चल रहे हैं। इतिहास ज़िंदा हो उठता है।
भारतीय इतिहास के आदिग्रन्थ ऋग्वेद में मगध या राजगृह का कोई उल्लेख नहीं मिलता लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मगध या राजगृह का अस्तित्व नहीं रहा हाेगा। क्या पता कोई संस्कृति यहाँ भी फल–फूल रही हो। ऋग्वैदिक सभ्यता भी तो केवल पंजाब और सिन्ध में ही सीमित थी। ऋग्वैदिक काल के बाद उत्तरवैदिक काल (1000 ई.पू. से 600 ई.पू.) में जब आर्यसंस्कृति का भारत के अन्य भागों में विस्तार हुआ तो मध्य और पूर्वी भारत में बड़े–बड़े राज्यों की स्थापना हुई। इस समय आर्य सभ्यता के केन्द्र में कुरू और पांचाल जैसे बड़े राज्य थे जिनका विस्तार पश्चिम में सरस्वती नदी से लेकर पूर्व में गंगा के दोआब तक था। यहीं से आर्य संस्कृति का विस्तार कोशल काशी तथा विदेह की ओर ओर हुआ। मगध और अंग अभी भी आर्य संस्कृति के दायरे से बाहर थे। सर्वप्रथम इनका उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है जिसमें मगध के निवासियों को ʺव्रात्यʺ कहा गया है जो प्राकृत भाषा बोलते हैं। इसके अलावा इनके प्रति तिरस्कार का भाव भी प्रदर्शित किया गया है।

मगध की राजधानी राजगृह इतिहास में कई नामों से जानी गयी– यथा वसुमति,बार्हद्रथपुर,गिरिव्रज,कुशाग्रपुर,राजगृह। रामायण के अनुसार ब्रह्मा के चौथे पुत्र वसु ने गिरिव्रज नामक नगर की स्थापना की। पुराणों के अनुसार मगध पर सर्वप्रथम बार्हद्रथ वंश का शासन था। इसी वंश का राजा जरासंध था जिसने गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाया। तत्पश्चात् वहाँ प्रद्योत वंश का शासन स्थापित हुआ। प्रद्योत वंश का अन्त करके शिशुनाग ने अपने वंश की स्थापना की। शिशुनाग वंश के बाद नन्द वंश ने शासन किया।
बौद्ध ग्रन्थाें के अनुसार बार्हद्रथ वंश का कोई अस्तित्व ही नहीं है जबकि प्रद्योत का सम्बन्ध अवन्ति से था। इनके अनुसार मगध का सर्वप्रथम शासक बिम्बसार ही था। बिम्बिसार हर्यंक वंश का शासक था जिसने 544-492 ई.पू. के मध्य शासन किया। बिम्बिसार का विवाह तत्कालीन प्रभावशाली गणराज्य वैशाली के शासक चेटक की पुत्री चेलना से हुआ था। गंगा नदी इन दोनों राज्यों के बीच की सीमा बनाती थी।
बिम्बिसार का अन्त बहुत दुःखद हुआ। उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया जहाँ भीषण यातनाएं देकर उसे मार डाला गया। अजातशत्रु ने 492-460 ई.पू. तक शासन किया। वह अतिसाम्राज्यवादी था। अन्य राज्यों के अलावा उसने अपनी कूटनीति के बल पर वज्जि संघ को पराजित किया। लिच्छिवियों से अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए उसने पाटलिग्राम में दुर्ग का निर्माण कराया। इसके अलावा उसने अपनी राजधानी राजगृह के चारों तरफ सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया। अजातशत्रु के शासन के आठवें वर्ष में भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ। महापरिनिर्वाण के पश्चात् बुद्ध के अवशेषों पर उसने राजगृह में स्तूप का निर्माण कराया। अजातशत्रु के शासन काल में सप्तपर्णि गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्तपिटक तथा विनयपिटक में विभाजित किया गया।
अजातशत्रु के पुत्र उदायिन या उदयभद्र ने उसकी हत्या कर दी और शासक बना। उदायिन ने गंगा और सोन नदियों के संगम पर पाटलिपुत्र नामक नगर की स्थापना की। उदायिन ने 460-444 ई.पू. तक शासन किया।
अब इतने पुराने इतिहास से होकर कभी गुजरने का अवसर मिले तो मन में रोमांच तो होगा ही। वैसे तो ये मगध के इतिहास के आरम्भ की कहानी है। आगे आने वाले समय में शिशुनाग वंश और नंद वंश के शासन के दौरान मगध का अत्यधिक विस्तार हुआ लेकिन राजगीर के साथ जितनी नजदीकी से बिम्बिसार और अजातशत्रु का नाम जुड़ा है उतना और किसी का नहीं। वैशाली में उसकी प्राचीनता के जो भी अवशेष पाये जाते हैं उनमें से अधिकांश बिम्बिसार और अजातशत्रु से ही जुड़े हैं। और इन अवशेषों के पास से गुजरते हुए लगता है कि इतिहास अभी ज़िंदा है।

मैं जिस सड़क के किनारे बने होटल में रूका था,उसे गया–मोकामा वाली सड़क,काटते हुए चौराहा बनाती है। मैं इस चौराहे के बिल्कुल पास ही ठहरा हुआ था। चौराहे के बिल्कुल पास ही,गया वाली सड़क पर राजगीर का बस स्टैण्ड भी है। इसी गया जाने वाली सड़क पर मेरी बाइक आगे बढ़ गयी।
3.30 बज चुके हैं। कुछ ही आगे बढ़ने पर सड़क किनारे बायें हाथ एक बड़ा मैदान दिखायी पड़ता है। एक दो जगह टूटी–फूटी दीवारों के अवशेष भी दिखायी पड़ते हैं। एक बोर्ड भी लगा हुआ है– अजातशत्रु का किला। वैसे किले जैसा कुछ दिखता नहीं है। अब खाली मैदान है तो इसका उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। तो अब हर उस तरीके से इसका उपयोग किया जा रहा है। मैं बाइक की स्पीड थोड़ी धीमी करके आगे बढ़ता रहा। लगभग आधे किमी के बाद दाहिनी तरफ एक और बोर्ड दिखायी पड़ता है– वेणु वन। यह मेरे काम की चीज हो सकती है। लेकिन इसका गेट बन्द दिख रहा था। मैंने बिल्कुल गेट से सटाकर बाइक खड़ी कर दी। मुझे बहुत अच्छी तरीके से पता है कि यूपी या फिर बिहार में बाइक किस जगह खड़ी की जाती है। एक बार राजस्थान के जयपुर में बाइक खड़ी करने के लिए काफी पूछताछ करनी पड़ी थी। क्योंकि वो राजस्थान था। लेकिन यूपी और बिहार में बाइक खड़ी करने का ढंग मुझे अच्छी तरह से पता है। वेणुवन के अन्दर न तो कोई पूछने वाला था न ही कोई बाइक की पर्ची काटने वाला। मुख्य गेट के बगल में बने छोटे से गेट से अन्दर प्रवेश किया तो दाहिनी तरफ टिकट घर दिखा। दो लाेग कुर्सियों पर बैठे हुए किसी गहन विचार–विमर्श में मशगूल दिखे। मैंने सोचा,इन्हें डिस्टर्ब करने की जरूरत ही क्या है। दबे कदमों से आगे बढ़ा ही था कि पीछे से आवाज आयी–
ʺबिना टिकट लिये ही अन्दर चले जाइयेगा क्या?ʺ
ʺटिकट दीजियेगा तब न लेंगेʺ– कहते हुए मैं पीछे मुड़ा। दस रूपये की बलि चढ़ गयी। मेन गेट से आगे बढ़ते ही बायें हाथ भगवान बुद्ध को समर्पित एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है। सीधे आगे साफ–सुथरे रास्ते के दोनों ओर घनी हरियाली। यह वास्तव में वन है। आधुनिक जमाने का वन। वेणु तो इसमें हैं नहीं। वैसे अपने जमाने में यह वेणु वन ही था। वेणु वन अर्थात् बाँसों का वन। यह भगवान बुद्ध की तपस्थली थी जो उन्हें बहुत ही प्रिय थी। भगवान बुद्ध और उनके भक्तों के लिए मगध नरेश बिम्बिसार ने यह वेणु वन उन्हें भेंट में दिया था। बिम्बिसार द्वारा बुद्ध को दी गयी यह पहली भेंट,बौद्ध धर्म की पहली सम्पत्ति थी। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला वर्षावास वेणुवन में ही व्यतीत किया।
वैसे वर्तमान में दिख रहा यह सुंदर उद्यान वो पुराना वाला वेणुवन नहीं है वरन इसे नये ढंग से विकसित किया गया है। इसके मध्य में एक तालाब भी बना हुआ है। आज के दिन इस वेणुवन में मेरे अलावा बाँसों के झुरमुट में लैला–मजनूं का एक जोड़ा दिखायी पड़ रहा था। इसके अलावा चारों तरफ उछल–कूद मचा रहे बन्दर भी फैले हुए थे जिनकी गतिविधियों से बहुत डर लग रहा था। निश्चिन्तता इस बात से थी कि उस गार्डन में मरम्मत का कुछ काम चल रहा था जिसमें मजदूर लगे हुए थे।

वेणुवन से थोड़ा सा आगे मुख्य मार्ग छोड़कर,दाहिने हाथ एक सड़क निकलती है जिस पर कई उद्यान और स्मारक हैं। कुछ ही आगे दाहिने हाथ जापानी मंदिर है जबकि बायें हाथ पाण्डु पाेखर नामक गार्डेन है। मैंने पाण्डु पोखर में अपनी बाइक खड़ी कर दी। पाण्डु पोखर एक आधुनिक जमाने का उद्यान है जिसमें टहलने–घूमने के अलावा एडवेंचर गेम्स की भी व्यवस्था की गयी है। उद्यान के बीच में एक तालाब है जिसमें महाराज पाण्डु की 40 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित की गयी है। तालाब  में नौकायन की सुविधा भी है। ये और बात है कि जब तक मैं इस उद्यान में था,कोई भी नौकायन करने नहीं आया। एक पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध की संगमरमर निर्मित बड़ी प्रतिमा भी स्थापित है जिसके आस–पास योग–ध्यान करने के लिए जगह बनायी गयी है। एडवेंचर के रूप में उद्यान में राफ्टिंग,बर्मा ब्रिज,स्लाइडिंग इत्यादि की व्यवस्था की गयी है। और तो और एक जापानी बागीचा भी बनाया गया है। इस उद्यान के ऐतिहासिक पक्ष के बारे में ये कहा जाता है कि महाभारतकालीन महाराज पाण्डु इस स्थान पर स्नान करने के लिए आया करते थे। इसके अलावा इस स्थान को वे अपने अस्तबल के रूप में भी प्रयोग करते थे। इस उद्यान की एक और विशेष बात यहाँ का टिकट है जो एक टैग के रूप में मिलता है जिसमें हाथ में पहनना होता है। इस टैग के रंग के हिसाब से इसकी फीस निर्धारित है। साथ ही इस टैग के आधार पर मिलने वाली सुविधाएं भी इसके रंग पर ही आधारित हैं। वैसे मैंने जो सफेद रंग का सबसे सस्ता वाला,40 रूपये का टैग लिया था वह केवल अन्दर प्रवेश कर घूमने–फिरने के लिए था। अन्य कोई दूसरी गतिविधि उसमें सम्मिलित नहीं थी। पाण्डु पोखर के पीछे खड़ा वैभार गिरि इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है।

सड़क के बायें पाण्डु पोखर घूम लेने के बाद मैं सड़क की दाहिनी ओर जापानी मंदिर की ओर चला। इस मंदिर का राजगीर के इतिहास से कम और वर्तमान से ही अधिक सम्बन्ध है। मंदिर के अन्दर भगवान बुद्ध की  सफेद रंग की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण जापान के बौद्ध संघ द्वारा कराया गया है। यह एक विशाल मंदिर है जिसके अग्र भाग का दर्शन ही मुख्य प्रवेश द्वार के पास से होता है। जबकि सम्पूर्ण मंदिर का सुंदर दर्शन पास के वैभार गिरि की ऊँचाई से होता है।
पाण्डु पोखर के कुछ और आगे वीरायतन नाम का एक जैन आश्रम है। इस आश्रम की स्थापना 1973 में श्री अमरमुनि जी महाराज की प्रेरणा से हुई। इस आश्रम द्वारा जरूरतमंदों को निःशुल्क स्वास्थ्य एवं शिक्षा सम्बन्धी सेवायें प्रदान की जाती हैं। इस आश्रम में एक संग्रहालय एवं एक मंदिर दर्शनीय है। संग्रहालय का नाम ब्राह्मी कला मंदिर है जिसमें हस्त शिल्प द्वारा जैन तीर्थंकरों के जीवन–दर्शन और अन्य कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। वीरायतन में प्रवेश के लिए 20 रूपये का शुल्क है। 5 रूपये जूते के भी देने पड़े। वास्तव में इस म्यूजियम में प्रदर्शित कलाकृतियां बहुत ही सुंदर हैं जिन्हें देखते मन नहीं भर रहा था। वैसे इसके साथ एक समस्या भी थी और वो ये कि यहाँ कैमरा प्रतिबन्धित है। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था और मैंने तय कर लिया कि चोरी ताे करनी ही है। तो मैंने कैमरा तो बैग में पैक कर लिया लेकिन मोबाइल पैण्ट की जेब में छ्पिा लिया। फिर अन्दर नजर बचा कर काफी फोटो खींचे। जैन आश्रम परिसर में पद्मावती मंदिर नाम से एक मंदिर भी बना है।

अभी शाम के 5 बज रहे थे। अप्रैल का दिन भी काफी लम्बा होता है। अभी धूप काफी थी। मैं गया वाली मुख्य सड़क पर आगे चलता रहा। थोड़ा ही आगे सड़क के दाहिने किनारे ब्रह्म कुण्ड है। राजगीर में गंधक युक्त गर्म जल के कई झरने पाये जाते हैं। ब्रह्मकुण्ड भी उनमें से एक है। गेट के बाहर बाइक खडा़ करते ही हाथ में पीली पर्ची लिये एक आदमी सिर पर सवार हो गया। पता चला कि 15 रूपये देने पड़ेंगे। वैसे तो बाइक चोरी की सम्भावना कम ही है लेकिन बिना किसी सुरक्षा के छोड़ भी नहीं सकते। इस मंदिर के आस–पास और सड़क के दूसरे किनारे पर अच्छा–खासा बाजार विकसित हो गया है। यहाँ एक मंदिर है जिसका नाम लक्ष्‍मी नारायण मंदिर है। इसी परिसर में परम्परा के अनुसार एक–दो अन्य मंदिर भी हैं। ब्रह्मकुण्ड इसी मंदिर परिसर में अवस्थित है। ब्रह्मकुण्ड में गर्म जल का स्रोत जैन परम्परा के पाँचवें पहाड़ वैभार गिरि में स्थित सप्तपर्णी गुफाओं के पास माना जाता है। प्राकृतिक झरनों का यह सल्फरयुक्त उष्ण जल चर्म रोगियों के लिए काफी स्वास्थ्यवर्धक है। कहते हैं कि ब्रह्मकुण्ड को गर्म जल की प्राप्ति सात जल धाराओं से होती है। महाभारत में भी राजगृह के उष्ण झरनों का उल्लेख है जहाँ इन्हें ʺतापदाʺ कहा गया है। इस मंदिर या ब्रह्मकुण्ड के पास से ही वैभार गिरि या सप्तपर्णी गुफाओं की तरफ रास्ता जाता है। वैसे आज शाम हो रही थी तो कल सुबह के समय वहाँ जाने का निश्चय कर मैं लक्ष्‍मी–नारायण मंदिर परिसर से बाहर निकल गया।


वेणु वन मे बुद्ध प्रतिमा




पाण्डु पोखर परिसर में बर्मा ब्रिज

तालाब में महाराज पाण्डु की प्रतिमा
पाण्डु पोखर
जापानी मंदिर में बुद्ध प्रतिमा
जापानी मंदिर

वैभार गिरि से पाण्डु पोखर का दृश्य
वैभार गिरि से दिखता जापानी मंदिर
ब्रह्म कुण्ड परिसर में लक्ष्‍मी नारायण मंदिर
वीरायतन आश्रम के म्यूजियम से कुछ दृश्य–














अगला भाग ः राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (दूसरा भाग)

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