Friday, May 31, 2019

वैशाली–इतिहास का गौरव (दूसरा भाग)

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धूप में यहाँ काफी देर तक चक्कर लगाने के बाद मैं कोल्हुआ के स्तूप परिसर से बाहर निकला– वैशाली के दूसरे स्मारकों की ओर। गूगल मैप तो मदद कर ही रहा था फिर भी मैं स्थानीय लोगों से रास्ता पूछ ले रहा था। इसके अलावा यहाँं रास्ते की खोज में एक और बात मदद करती है। और वो है पतली सी सड़क के दोनों ओर बनी सफेद पट्टी। सीधी सी बात है कि इस पट्टी का अनुसरण करते चले जाइये,किसी न किसी स्मारक तक पहुँच जायेंगे। तो 3-4 किमी चलने के बाद अब मैं एक पुराने स्तूप परिसर में था।
इसके पहले 10 रूपये भुगत कर बाइक को स्टैण्ड में खड़ा किया। स्टैण्ड जैसी कोई चीज कहीं नहीं है लेकिन गाड़ी खड़ी करने को लेकर वसूली का धन्धा जोरों पर है। कहीं भी गाड़ी खड़ी करिये,कुछ देना पड़ेगा या फिर अपने रिस्क पर छोड़कर चले जाइये।
यह स्तूप बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर बने आठ स्तूपों में से एक है। यह स्तूप वैशाली के लिच्छिवियों द्वारा बनवाया गया था। इस स्तूप के कुछ अवशेष मात्र ही अब बचे हैं। स्तूप के चारों ओर पुरातत्व विभाग द्वारा हरा–भरा पार्क बनाया गया है। स्मारक के पास की ग्रामीण बस्ती में भजन–कीतन का कार्यक्रम चल रहा था। लाउडस्पीकर की कर्कश ध्वनि दूर–दूर तक गूँज रही थी। स्मारक के सामने सड़क के दूसरी तरफ वैशाली से सम्बन्धित किताबों,गिफ्ट आइटमों और कोल्ड ड्रिंक की कई दुकानें हैं जिनमें से अधिकांश इस समय बन्द थीं।

कुशीनगर में जब भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ तो उनके अस्थि अवशेषों पर अधिकार के लिए विवाद उत्पन्न हो गया। कुशीनगर के मल्लों के अतिरिक्त पावा के मल्ल,मगध के अजातशत्रु,रामग्राम के कोलिय,कपिलवस्तु के शाक्य,अलकप्प के बुलि,वेठद्वीप के ब्राह्मण और वैशाली के लिच्छिवियों ने भी उस पर अपना अधिकार जताया। युद्ध की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गयीं। ऐसी स्थिति में कुशीनगर के ही एक ब्राह्मण द्रोण ने समाधान निकाला। बुद्ध की अस्थि अवशेषों के आठ भाग करके सभी को बाँट दिया गया। अंत में पिप्पलिवन के मोरिय भी पहुँचे। उन्हें कुछ राख ही मिल सकी। वैशाली का पार्थिव स्तूप प्रारम्भ में मिट्टी का बना था जिसे कालान्तर में ईंटों से आच्छादित कर दिया गया। उत्खनन में इस स्तूप के भीतर से सेलखड़ी पत्थर की बनी एक मंजूषा प्राप्त हुई जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेषों के रूप में कुछ राख तथा कुछ मनके रखे हुए थे। वर्तमान में यह मंजूषा पटना संग्रहालय में रखी गयी है।

इस स्मारक से आधे किमी से भी कम दूरी पर पश्चिम की तरफ एक तालाब है। इसका नाम अभिषेक पुष्करणी है। यह और बात है कि अप्रैल के महीने में इसमें पानी की बजाय धूल उड़ रही है। खरौना पोखर की पहचान प्राचीन ʺअभिषेक पुष्करणीʺ से की जाती है जिसके पवित्र जल से लिच्छिवि गणों का अभिषेक किया जाता था। 1957-58 में डा. अल्तेकर द्वारा इसकी खुदाई की गयी थी। खुदाई के दौरान इस तालाब के चारों ओर 3.25 फीट मोटी पक्की ईंटों की दीवार मिली। साथ ही शु्ंग काल के कुछ सिक्के तथा मूर्तियां भी प्राप्त हुईं। वैसे आज के दिन इस तालाब के पानी की ही तरह मुझे वैशाली के किसी भी स्मारक में,भीड़ भी गायब नजर आ रही थी। इस तालाब के उत्तरी किनारे से सड़क गुजरती है जिससे होकर मैं आया था। इस सड़क के उत्तरी किनारे पर वैशाली का म्यूजियम है जिसमें वैशाली के इतिहास से सम्बन्धित बहुत सारी वस्तुएं संग्रहीत हैं। म्यूजियम में भी दो–चार लोग ही भटक रहे थे।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा वैशाली संग्रहालय की स्थापना सन् 1971 ई. में की गई जिसमें इस क्षेत्र के अन्वेषण व उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के साथ साथ पूर्ववर्ती वैशाली संघ संग्रहालय की पुरा सामग्री भी संग्रहीत है। ये पुरावशेष छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर बारहवीं शताब्दी ई. तक के विभिन्न कालखण्डों से सम्बन्धित हैं।

अभिषेक पुष्करणी के दक्षिणी किनारे पर एक विश्व शांति स्तूप बना है। तो म्यूजियम से निकलकर मैं सूखे हुए तालाब के किनारे–किनारे होते हुए विश्व शांति स्तूप पहुँचा। यहाँ भी अन्दर प्रवेश करने से पहले बाइक को ठिकाने लगाना था। एक ʺमड़ईʺ के अन्दर स्टैण्ड बना हुआ था। स्तूप परिसर में पहुँचने पर पता चला कि वैशाली की सारी भीड़ इसी परिसर के अन्दर थी।
स्तूप का परिसर काफी बड़ा है जिसमें पेड़ वगैरह पर्याप्त संख्या में हैं। कुछ चबूतरे भी बने हुए हैं। खण्डहरों की बजाय देखने लायक सुंदर स्तूप भी बना हुआ है। तो वैशाली की सारी भीड़ यहीं होनी ही थी। डेढ़ बजे के आस–पास मैं यहाँ पहुँचा था। धूप काफी तेज थी। इसके पहले भी काफी देर से मैं धूप में टहल रहा था तो अब मेरे पास पर्याप्त समय था दोपहरी बिताने का। यहाँ रूक–रूक कर मैंने फोटो खींचते हुए स्तूप की कई परिक्रमा की। कई सारे लोगों की,उनके मोबाइल से फोटो भी खींची और वाटर–कूलर का कई बोतल ठण्डा पानी भी पिया। एक फोटोग्राफर ने फोटो खिंचवाने का दबाव डाला तो मैंने उसे अपना कैमरा पकड़ा दिया। बिचारा हाथ मलता रह गया।
इस विश्व शांति स्तूप का निर्माण जापान की एक संस्था निप्पोन्जन म्योहोजी द्वारा कराया गया है। इस संस्था की स्थापना सन 1918 में एक बौद्ध भिक्षु निचिदात्सो फुजी ने की थी। फुजी ने दूसरे विश्व युद्ध के विध्वंसक परिणामों को अपने सामने देखा था। और इस वजह से उन्होंने विश्व में शांति की स्थापना का संदेश देने के लिए जापान के एक शहर में,1954 में इस तरह का पहला विश्व शांति स्तूप बनवाया। इसके बाद इसी क्रम में विश्व में 100 शांति स्तूपों की स्थापना का निश्चय किया गया। वर्तमान में यही संस्था विश्व में शांति स्तूपों का निर्माण करा रही है। भारत में और भी कई स्थानों पर इस तरह के शांति स्तूपों की स्थापना की गयी है।

एक–डेढ़ घण्टे का समय बिताने के बाद मैं विश्व शांति स्तूप से निकलकर राजा विशाल के गढ़ की ओर चल पड़ा। मुख्य सड़क छोड़ने के बाद,कुछ दूर पतली पक्की सड़क पर चलने के अलावा कच्चे रास्ते पर भी चलना पड़ा। हो सकता है बारिश के मौसम में यहाँ पहुँचना भी मुश्किल हो जाय। यह स्मारक गाँवों से कुछ हटकर खेतों के बीच स्थित है। स्मारक की चारदीवारी के बाहर एक आइसक्रीम वाला खड़ा था जो यहाँ के माहौल का बखूबी फायदा उठा रहा था। वर्तमान अवशेषों को देखकर यह किसी गढ़ की बजाय महल जैसा प्रतीत हो रहा था। मेरे अलावा एक–दो लोग ही राजा विशाल के गढ़ तक पहुँचे थे लेकिन उनका ध्यान राजा विशाल के गढ़ पर नहीं बल्कि बाहर बिक रही आइसक्रीम पर ही था। अब राजा विशाल का गढ़ ऐसा कुछ खास नहीं बचा है कि वहाँ सेल्फी ली जाय।
राजा विशाल के गढ़ से लगभग 500X240 मीटर विस्तार वाले एक महत्वपूर्ण तथा विशाल दुर्ग के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये अवशेष एक ऊँचे टीले से प्राप्त हुये हैं जो आस–पास के धरातल से लगभग 10 फीट ऊँचा है। इस गढ़ के चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि से लगभग 20 फीट गहरी तथा 300 फीट चौड़ी खाई बनी हुई थी। यह गढ़ 60 एकड़ क्षेत्रफल में बना हुआ था। यह गढ़ ही वैशाली का सत्ता केन्द्र हुआ करता था। 1903-04 में डा. टी ब्लाश द्वारा की गयी खुदाई से ज्ञात हुआ कि इस किले की लम्बाई उत्तर से दक्षिण की ओर 1605 फीट तथा पूर्व से पश्चिम की चौड़ाई 750 फीट है। खुदाई से प्राप्त पुरावशेषों को पटना व कलकत्ता संग्रहालयों में रखा गया है।
राजा विशाल का गढ़ विश्व की प्राचीनतम संसद है। आज विश्व में जिस लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को श्रेष्ठ माना जाता है,ईसा से 725 वर्ष पूर्व उसका सूत्रपात यहीं पर हुआ था। जब यहाँ के संस्थागार में तत्कालीन वैशाली संघ के 7777 सदस्य इकट्ठा होकर बहुमत के आधार पर मानव जीवन की समस्याओं का समाधान निकालते थे। बुद्ध ने लिच्छिवि परिषद की तुलना देव परिषद से की थी।

भारत में महाभारत के युद्ध के पश्चात् जिन गणतंत्रों की स्थापना हुई या वज्जि संघ सर्वाधिक बलशाली,प्रतिष्ठित एवं समृद्ध था। वज्जि संघ का गौरवशाली इतिहास 725 ई0पू0 से 485 ई0पू0 तक कायम रहा। तत्कालीन वज्जि संघ की सीमा,वर्तमान के मुजफ्फरपुर,वैशाली,पूर्वी एवं पश्चिमी चम्पारन,दरभंगा,मधुबनी एवं समस्तीपुर जिलों तक विस्तृत थी। लिच्छिवियों की केन्द्रीय कार्यपालिका में एक गणपति (राजा) उपराजा,सेनापति तथा भांडागारिक होते थे। ये ही शासन का कार्य देखते थे। केवल 7777 कुलों को ही मताधिकार प्राप्त था। यही कुल केन्द्रीय शासन के लिए 7777 प्रतिनिधियों को चुनते थे। संस्थागार नामक भवन में इन प्रतिनिधियों की बैठक होती थी। न्याय व्यवस्था के लिए न्यायालयों की स्थापना की गयी थी तथा लिखित न्यायग्रंथ भी बनाया गया था।

धूप में पूरे दिन भटकते हुए मैं थक गया था। शरीर आराम खोज रहा था। वैशाली में तो ठहरने की जगह मिलने से रही। वैशाली से कुछ किमी की दूरी पर गंगा इस पार हाजीपुर तथा गंगा उस पार पटना में होटल मिल सकते हैं लेकिन मैं हाजीपुर से कुछ पहले लालगंज में अपने एक घनिष्ठ मित्र के यहाँ रूका। मित्र ने सपत्नीक मेरी जी–जान से सेवा की। मित्र से ही मुझे पता चला कि लालगंज बिहार की सबसे पुरानी नगर पंचायत है।



लिच्छिवियों द्वारा निर्मित पुराने स्तूप परिसर में बुद्ध की मूर्ति

इस टिन शेड के नीचे स्तूप के अवशेष सुरक्षित हैं
स्तूप के अवशेष
वैशाली का शांति स्तूप

शांति स्तूप के चारों ओर विभिन्न मुद्राओ में बनी बुद्ध की चार मूर्तियाँ–





राजा विशाल के गढ़ के अवशेष

अगला भाग ः देवघर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. बिहार की धरती पर
2. वैशाली–इतिहास का गौरव (पहला भाग)
3. वैशाली–इतिहास का गौरव (दूसरा भाग)
4. देवघर
5. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (पहला भाग)
6. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (दूसरा भाग)
7. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (तीसरा भाग)
8. नालन्दा–इतिहास का प्रज्ञा केन्द्र
9. पावापुरी से गहलौर
10. बराबर की गुफाएँ
11. बोधगया से सासाराम

2 comments:

  1. मेरा बहुत मन है ऐसे ऐतीहासिक स्थानों को देखने का जो आज भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप बनाये हुए हैं। आपने पुरानी वैशाली के घर बैठे दर्शन कराये आपका हार्दिक आभार।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद सुधीर भाई ब्लॉग पर आने के लिए। ऐतिहासिक स्थलों में मुझे भी बहुत रूचि है। उस पर भी बिहार मेरे लिए पड़ोसी है और भारतीय इतिहास के प्राचीनतम स्थलों में से एक है। मुझे बिहार बहुत अच्छा लगता है।

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