Friday, June 7, 2019

देवघर

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15 अप्रैल
सुबह के 5.15 बजे मैं लालगंज से अपने मित्र के घर से रवाना हो गया। मेरी अगली मंजिल थी–बाबा वैद्यनाथ का घर यानी देवघर। लेकिन मंजिल तक पहुँचने से पहले लम्बी यात्रा करनी थी। प्राथमिकता थी कि सुबह के ठण्डे मौसम में जितनी भी अधिक दूरी तय करनी संभव हो,तय हो जाय। उसके बाद तो धूप में जलना ही था। मुझे हाजीपुर व पटना के अलावा दोनों शहरों के बीच गंगा नदी पर बने गाँधी सेतु को भी पार करना था। सुबह के समय भी सड़कों पर काफी ट्रैफिक था जिस कारण स्पीड नहीं बन पा रही थी। गाँधी सेतु पर तो जाम ही लगा था क्योंकि एक तरफ की लेन की मरम्मत चल रही थी।
फिर भी बाइक दौड़ती रही– ʺघनी आबादीʺ वाली चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए। लालगंज से लेकर बख्तियारपुर तक काफी घनी आबादी बसी है। गंगा के किनारे,गंगा के सबसे उपजाऊ मैदान में,घनी आबादी नहीं होगी तो कहाँ होगी। पटना में गंगा को पार करने के बाद सड़क बख्तियारपुर तक गंगा के किनारे–किनारे ही चलती जाती है। बिल्कुल गाँवों के बीच से होते हुए। पटना के बाद देवघर के रास्ते में कोई भी बड़ा शहर नहीं पड़ता। एक–दो छोटे शहर हैं भी तो बाई–पास कर दिये जाते हैं। इस लिहाज से इस रूट से होकर देवघर की यात्रा,कम से कम ट्रैफिक के मामले में काफी आसान हो जाती है। बख्तियारपुर के बाद ʺदायें मुड़ʺ और ʺबायें मुड़ʺ वाली कहानी शुरू हो जाती है। पटना जिले से नाता टूट जाता है और नालन्दा जिला शुरू हो जाता है।
बख्तियारपुर में एक स्थान पर पशुओं का मेला लगा था। बल्कि ये कहें कि जमावड़ा लगा था। लोग वहाँ से गाय–भैंस खरीद रहे थे। मैंने सड़क किनारे रूक कर यह मेला देखने की कोशिश लेकिन इस मेले में खरीदे–बेचे गये जानवरों को ढोने वाली गाड़ियाँ इतनी धक्कम–धक्का कर रही थीं कि मुझे अपना बोरिया–बिस्तर समेट कर भागना पड़ा। अपना यूपी होता तो बवाल हो जाता। कारण कि गोवंश का व्यापार काफी कठिन हो चुका है। ठीक उसी तरह से जैसे कि बिहार में शराब दुर्लभ वस्तु बन गयी है।
बख्तियारपुर से थोड़ा सा आगे,सुबह के 7.30 बजे चाय की दुकान दिखायी पड़ी। यहाँ वो चाय मिली जैसी मैंने अब तक की उम्र में कभी नहीं पी थी। यह मिट्टी के पुरवों में तो मिलती ही है,बनती भी मिट्टी के बर्तन में है। ऐसी सोंधी सुगन्ध और स्वाद मिलता है कि दिल बाग–बाग हो उठता है। मैंने एक की बजाय दो चाय पी।

हाजीपुर और पटना के बीच गंगा नदी पर बने गाँधी सेतु को पार कर,लगभग 50 किमी चलने के बाद बख्तियारपुर में ʺदायें मुड़ʺ होता है। फिर 11 किमी दक्षिण की ओर चलने के बाद हरनौत में ʺबायें मुड़ʺ हो जाता है। यहाँ से 18 किमी पूरब की ओर चलने के बाद फिर से सक्सोहरा में ʺदायें मुड़ʺ हो जाता है। लेकिन इस दायें मुड़ और बायें मुड़ के खेल में,सक्सोहरा से कुछ आगे बींद नामक स्थान पर बाइक का अगला पहिया पंक्चर हो गया। दोनों हाथों के तोते उड़ गये। पूरी हवा निकल गयी। बाइक ने हिलने से भी इन्कार कर दिया। गनीमत यह रही कि लगभग 200 मीटर की दूरी पर ही पंक्चर बनाने वाला मिल गया। वो बिचारा भी अभी दुकान लगा ही रहा था।
बख्तियारपुर से आगे अब मैं उन सड़कों से होकर गुजर रहा था जिन पर हाल ही में विकास का रंग चढ़ा है। सड़कें चौड़ी हो गयी हैं,चिकनी हो गयी हैं लेकिन सड़क के किनारे लगे पेड़ चौड़ीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। धूप की तपन से परेशान होकर छाँव खोजते आदमी को शरण देने वाला एक भी पेड़ नहीं है। लोहे की जालियों से घिरे छोटे–छोटे पौधे अभी खुद ही छाँव के लिए तरस रहे हैं।

वैसे बख्तियारपुर के बाद मैं कभी दक्षिण तो कभी पूरब चलते हुए ʺफाइनलीʺ दक्षिण पूरब की ओर चल रहा हूँ। आबादी का घनत्व अत्यधिक नहीं है। सड़क से दूर इक्का–दुक्का गाँव दिखाई पड़ते हैं। खेतों में लगा गेहूँ घरों तक पहुँच चुका है। खेत उजले–उजले से दिख रहे हैं। तेज पछुआ हवा थोक के भाव में धूल और गर्द को उड़ाकर मस्ती कर रही है। हरनौत से सक्सोहरा के बीच मिट्टी का रंग भी मुझे कुछ बदलता हुआ सा प्रतीत हो रहा है। यह कुछ–कुछ ललछौंहा रंग ले रही है। यह बिहार के झारखण्ड में बदलने की धीमी आहट है। वैसे झारखण्ड की सीमा अभी यहाँ से काफी दूर है।
सक्सोहरा से 27 किमी दक्षिण में बड़बीघा है जो शेखपुरा जिले में पड़ता है। कुछ ही दूरी पर शेखपुरा भी है। शेखपुरा के बाद सड़क दक्षिण–पूर्व दिशा में जमुई जिले की धरती से गुजरते हुए बिहार की सीमा लाँघ जाती है। बड़बीघा से 44 किमी की दूरी पर जमुई जिले का सिकन्दरा कस्बा पड़ता है। यहाँ गूगल मैप ने मुझे भ्रम में डाल दिया। इसके अनुसार सिकन्दरा के पास ही गहलौर गाँव है। गहलौर के नाम पर मुझे दशरथ माँझी की याद हो आयी। लेकिन थोड़ी सी ही पूछताछ के बाद भेद खुल गया। पता चला कि ये वो वाला गहलौर नहीं। वो तो गया जिले में पड़ता है। मैंने गूगल मैप को धन्यवाद देकर हल्की पेटपूजा की और आगे बढ़ गया।

दोपहर बाद के 2 बज रहे थे। सिकन्दरा से लगभग 3 घण्टे बाइक पर चलने के बाद छोटा नागपुर पठार का वो हिस्सा दिखाई पड़ने लगा जो झारखण्ड को छोड़कर बिहार से मिलने चला आया था। अर्थात् बिहार के दक्षिणी भाग का पठारी क्षेत्र शुरू हो गया और जब पठारी इलाका शुरू हुआ तो पहाड़ियों को देखकर मेरा मन उछलने लगा। पहाड़ों से किसी दूसरे जन्म का प्रेम है जो उन्हें कहीं भी देखकर उमड़ पड़ता है। वैसे ये पहाड़ियाँ हिमालय की निचली पहाड़ियों की तरह से आबाद नहीं हैं वरन उजाड़ सी दिखती हैं। शायद पानी की कमी की वजह से। उस पर भी अप्रैल का महीना। अब तक धरती की काफी कुछ नमी भाप बन कर उड़ चुकी है। छोटी–छोटी पहाड़ियों की ढलानों पर झाड़ियाँ ही दिखाई पड़ रही हैं। हरे पेड़ों की संख्या कम ही है। पानी की कमी ने इन पहाड़ों को हरे से भूरे रंग में बदल दिया है। एक महीने के बाद तो यहाँ संभवतः हरियाली का निशान भी मिट जायेगा। इन पहाड़ियों के बीच में छोटे–छोटे इक्का–दुक्का गाँव बसे हैं। इन गाँवों के ही कुछ लोग सड़क किनारे झोपड़ियाँ बनाकर मेरे जैसे यात्रियों की सेवा और अपनी रोजी–रोटी की तलाश में लगे हैं। ऐसी ही एक झोपड़ी में मैं भी रूका क्योंकि धूप ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया। खाने की इच्छा नहीं कर रही थी वरन प्यास लगी थी। तो मैंने कोल्ड ड्रिंक लेना ही बेहतर समझा। शरीर की जलापूर्ति व्यवस्था पूरी तरह बहाल रहनी चाहिए। थोड़ी देर आराम करने के बाद मैंने आगे घोड़ा दौड़ाया। इक्का–दुक्का गाँवों के अतिरिक्त पूरा क्षेत्र निर्जन ही लग रहा था। डर भी लग रहा था– ऐसी जगह पर बाइक पंक्चर हो जाये तो......ǃ

4 बजे के आस–पास मैं देवघर पहुँच गया। बिहार–झारखण्ड के बार्डर से बाबा वैद्यनाथ का मंदिर लगभग 18 किमी की दूरी पर ही है। सुबह लालगंज से चलने के बाद अबतक मैं लगभग 290 किमी बाइक चला चुका था। 11 घण्टे का समय बीत चुका था। रास्ते में एक–डेढ़ घण्टे आराम करने के अलावा चलता ही रहा। तेज धूप और गर्म हवा ने अच्छी खातिरदारी की थी। पिछली रात मच्छरों ने भी अच्छी खातिरदारी की थी। नतीजा यह हुआ कि बाइक चलाते हुए ही नींद आनी शुरू हो गयी थी। किसी तरह कमरा खोजने में 10-15 मिनट गुजर गये। 300 में एक कमरा मिला। बाइक होटल वाले के हवाले कर मैं बिस्तर पर ढेर हो गया। बाहर जाकर चाय पीने की भी हिम्मत नहीं रह गयी थी। तेज धूप ने शरीर का सब कुछ सोख लिया था। बाबा वैद्यनाथ के दर्शन के लिए तो लाइन लगानी पड़ती। देर तक खड़ा रहना पड़ता। लेकिन इतनी कुव्वत नहीं बची थी। दो घण्टे तक आराम करने के बाद बाहर निकला।

शाम गहरा रही थी। बाबा के मंदिर में रंग–बिरंगी बिजली की बत्तियाँ जल चुकी थीं। मंदिर की सफेद दीवारों पर रंगीन रोशनियाँ दीवाली मना रही थीं। आरती में शामिल होने के लिए भक्तगण मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में खड़े थे। बाबा के दरबार में कैमरे और मोबाइल को भी पूरी छूट है। हो भी क्यों नǃ बाबा किसी को निराश जो नहीं करते। मैं भी मंदिर परिसर में प्रवेश कर गया। तभी एक पण्डे की नजर मेरे जूताें पर पड़ी। वो मुँह बनाते हुए बोला–
ʺमंदिर है मंदिर। कोई पार्क नहीं है। कहाँ से आये हो? किसके जजमान हो?ʺ
मुझे भी अपनी गलती का एहसास हुआ। झट से बाहर आकर जूते निकाले और फिर से अन्दर पहुँचा। थोड़ी देर तक टहलने के बाद मैं भी बाबा की आरती में शामिल हुआ और दर्शन किये।
बाबा का मंदिर चारों तरफ से पतली गलियों से घिरा हुआ है। गलियाँ दुकानों से अटी पड़ी हैं। और दुकानें भी किस चीज की? पेड़े की। जिधर देखिये पेड़े ही पेड़े। पूरा देवघर पेड़ामय है। पेड़े की इतनी दुकानें हैं कि मैं तो कन्फ्यूज हो गया कि एक ही मिठाई की इतनी सारी दुकानों के नाम कैसे रखे जाते होंगेǃ इन्हें पहचानते कैसे होंगेǃ फलां पेड़ा भण्डारǃ ठिकां पेड़ा भण्डारǃ अच्छे–बुरे की पहचान कैसे होती होगीǃ
वैसे इन दुकानों की एक और खासियत है और वो ये कि पेड़ा खरीदने से पहले आपको ʺटेस्टʺ करने का अवसर भी मिलता है। बहुत से ग्राहक ऐसे भी होते हैं जो एक पाव पेड़ा खरीदने के पहले कई दुकानों में टेस्ट करते हुए ही एक पाव पेड़ा खा जाते हैं। वैसे मैंने अभी पेड़ा खरीदने का प्रयास नहीं किया क्योंकि मुझे सुबह भी दर्शन करना था। पास के ही एक रेस्टोरेण्ट में रात का खाना खाकर मैं जल्दी ही सोने चला गया।

16 अप्रैल
रात को नींद अच्छी आयी थी। शरीर कुछ आराम महसूस कर रहा था। नित्यकर्म से निवृत होने के बाद मैं बाहर निकला। गली में ही चाय की दुकान थी। चाय वाला बिना पूछे ही मेरे सिर पड़ गया। चाय की जरूरत मुझे भी थी। वैसे तो बाबा वैद्यनाथ के दर्शन करने से पहले भक्तगण मंदिर से कुछ ही दूरी पर बने शिवगंगा नामक पोखरे में स्नान करते हैं लेकिन मैं बाथरूम से ही शुद्ध होकर आया था। मंदिर में काफी भीड़ हो चुकी थी। गर्भगृह के दरवाजे तक तो आसानी से पहुँच गया लेकिन अन्दर भारी मारामारी चल रही थी। इस मारामारी की वजह पण्डे थे। मैं भी धक्के लगाते हुए अन्दर घुसा। एक पण्डा वेशधारी व्यक्ति अपनी मुण्डी शिवलिंग पर पटक कर घण्टों से जाम लगाये हुए था। मैंने अपने गाँव के मित्रों द्वारा सिखायी गयी बुद्धि का इस्तेमाल किया। शिवलिंग पर कब्जा किये पण्डे को धक्का देकर नीचे गिराया,बाबा को हाथ से स्पर्श कर प्रणाम किया और आगे भागा नहीं तो मुझे भी कोई धकियाता। मुख्य मंदिर के पास ही माँ पार्वमती का भी मंदिर है। एक–दो और भी मंदिर हैं। उनमें भी कम भीड़ नहीं थी। फिर भी धक्का–मुक्की करते हुए मैंने दर्शन किये और जल्दी से बाहर निकला।
अब मुझे वासुकिनाथ जाना था। वासुकिनाथ देवघर से 45 किमी है। तो मैं सुबह के 7 बजे वासुकिनाथ के लिए रवाना हो गया। वासुकिनाथ देवघर से दुमका जाने वाले मुख्य मार्ग पर पड़ता है। छ्टिपुट पहाड़ियाें के अलावा पूरा इलाका लगभग मैदानी है। वासुकिनाथ मंदिर में भी देवघर से कम भीड़ नहीं थी। परम्परा यह है कि जो भी बाबा वैद्यनाथ के दर्शन करने देवघर आता है वह वासुकिनाथ अवश्य आता है। तो इस वजह से यहाँ भी बराबरी की भीड़ रहती है। मैंने काफी तेजी दिखायी। आधे घण्टे के अन्दर मैं वासुकिनाथ के दर्शन करने के बाद वापस लौट पड़ा।

अब मुझे कुछ भी नहीं देखना था। सीधा लक्ष्‍य था राजगीर। कितने बजे पहुँचता हूँ,यह तो समय बतायेगा। लेकिन मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। देवघर जल्दी ही पार हो गया। देवघर से बिहार बार्डर की ओर समूहों में काफी सारे ब्रेकर बने हुए हैं। मुझे कल ही इनके बारे में पता चल गया था सो मैं इनसे बचते हुए निकल रहा था लेकिन मेरे पीछे झारखण्ड के नम्बर प्लेट वाली बहुत सी स्कार्पियो गाड़ियाँ आ रही थीं जिन्हें ब्रेकर के बारे में जानकारी न होने के कारण काफी परेशानी हो रही थी। रास्ता खोजने की भी जरूरत नहीं थी। शेखपुरा तक 190 किमी,कल वाले रास्ते पर ही चलते जाना था। इसके बाद गिरियक होते हुए लगभग 50 किमी राजगीर तक। इसका मतलब लगभग 285-290 किमी की दूरी आज भी तय करनी थी।
सुबह का समय था। आज मैं सड़क के किनारे,खेतों में,छोटे–छोटे गाँवों में वो सब कुछ देख रहा था जो कल धूप की तपिश में नहीं देख पाया था। छोटा नागपुर का पठार न होता तो शायद बिहार और झारखण्ड में कोई अन्तर न होता। तब शायद बिहार और झारखण्ड का बॅंटवारा भी न हुआ होता। वैसे बँटवारे के बाद भी जमुई की पहाड़ियाँ,राजगीर की पहाड़ियाँ,रोहतास और कैमूर की पहाड़ियाँ आज भी बिहार में पठार के होने का एहसास कराती ही हैं। नहीं तो बिहार केवल का गंगा,गण्डक और कोसी का कछार बन कर रह जाता।

बिहार में प्रवेश कर जाने के बाद वही गेहूँ के खाली हुए उजले खेत दिखने लगे। लेकिन जहाँ–तहाँ एक और फसल दिख रही थी। इस फसल के खेतों में लाल रंग के बड़े–बड़े ढेर दिखायी पड़ रहे थे। कहीं–कहीं तो बहुत दूर–दूर तक सारे खेत इसी से पटे हुए दिखायी पड़ रहे थे। आखिर जब रहा नहीं गया तो एक खेत के सामने,जहाँ कई लोग खेत में काम करते हुए दिख रहे थे,मैंने बाइक खड़ी की। कुछ दूर पैदल चल कर खेत में गया। लेकिन यह क्याǃ पास पहुँचते ही पूछने की जरूरत ही खत्म हो गयी। यह प्याज के ढेर थे। फिर भी झेंप मिटाने के लिये कुछ इधर–उधर की बातें पूछ ही लिया।
एक और नयी बात। बसों की छतों पर बैठकर लोगों को यात्रा करते मैंने अपने आस–पास भी देखा है। खुद भी एक बार बस की छत पर बैठकर यात्रा की थी। लेकिन छोटी–छोटी गाड़ियों की छतों पर बैठकर यात्रा करते पहली बार देखा। तेज धूप से बचने के लिए लोग गमछे का सहारा ले रहे थे जो अपर्याप्त साबित हो रहा था।

और अपराह्न के 2 बजे जब मैं राजगीर पहुँचा तो धूप में सारा शरीर निचुड़ गया था।












अगला भाग ः राजगीर–इतिहास अभी जिंदा हैǃ (पहला भाग)


सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. बिहार की धरती पर
2. वैशाली–इतिहास का गौरव (पहला भाग)
3. वैशाली–इतिहास का गौरव (दूसरा भाग)
4. देवघर
5. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (पहला भाग)
6. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (दूसरा भाग)
7. राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िन्दा हैǃ (तीसरा भाग)
8. नालन्दा–इतिहास का प्रज्ञा केन्द्र
9. पावापुरी से गहलौर
10. बराबर की गुफाएँ
11. बोधगया से सासाराम

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