Friday, August 30, 2019

काण्डई बुग्याल से नीचे

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काण्डई बुग्याल से थोड़ी ही दूर चलने के बाद जंगल फिर से शुरू हो गया। साथ चल रहे साधु महाराज ने बताया कि ये जंगल अब अंत तक साथ चलेगा। मतलब ये कि सगर वाले रास्ते की तुलना में इस रास्ते के अधिकांश भाग पर जंगल है और यह जंगल काफी घना भी है। वैसे जंगल का डर अब तक मन से निकल चुका था। अब जंगल में चलने में मजा भी आ रहा था। हाँ,रास्ते का तेज ढाल उतराई में भी दिक्कतें पैदा कर रहा था। वैसे जंगल का मौसम काफी सम रहता है। साधु महाराज को जंगल से डर लग रहा था जबकि मुझे मजा आ रहा था।

Friday, August 23, 2019

रूद्रनाथ से वापसी

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26 मई
रात में वास्तविक ठण्ड की बजाय ठण्ड का डर अधिक था। मैं दो रजाई ओढ़ कर सोया था लेकिन सोने के एक घण्टे बाद ही मुझे एक रजाई हटानी पड़ी। क्योंकि शरीर पर कपड़े काफी थे और कमरा भी गर्म हो गया था। थकान की वजह से भी कुछ अधिक ठण्ड महसूस हो रही थी। संभवतः थकान की वजह से ही,नींद भी ठीक से नहीं आ रही थी। मेरी बगल में सोये दो लड़के भी इस समस्या से परेशान थे। एक लड़का तो रात भर उठता–बैठता रहा और मुझे भी डिस्टर्ब करता रहा। इस सबके बावजूद भोर में 4.15 पर ही वह उठ गया और मुझे भी जगा दिया।

Friday, August 16, 2019

पनार बुग्याल से रूद्रनाथ

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मुझे पहले से ही पता है कि पित्रधार इस ट्रेक का सबसे ऊँचा स्थान है। पनार में मैं 3400 मीटर की ऊँचाई पर था और अभी इससे भी कुछ सौ मीटर ऊपर जाना है। मैं अपने जीवन में पहली बार इतनी ऊँचाई चढ़ने जा रहा हूॅं। मन में रोमांच भी है और कुछ–कुछ डर भी। इसके अलावा डर इस बात का भी है कि मैंने लगभग 1750 मीटर की ऊँचाई से चढ़ाई शुरू की थी और एक ही दिन में इतनी ऊँचाई तय करने जा रहा हूँ। मेरा शरीर एक्लाइमेटाइज हो पायेगा या नहीं– मन में शंका है। लेकिन जुनून अपने चरम पर है।

Friday, August 9, 2019

सगर से पनार बुग्याल

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तारीख 25 मई। सुबह के लगभग 5.30 बजे मैं रूद्रनाथ के ट्रेक पर चल पड़ता हूँ। ट्रेक की ऊँचाई धीरे–धीरे बढ़ रही है। बहुत तेज गति से चलकर एकाएक शरीर को थका डालने में बुद्धिमानी नहीं है। मैदानी इलाके तो सूरज की तपन से जल रहे हैं। लेकिन यहाँ का मौसम खुशगवार है। नीचे की घाटियों में बसे गाँव के छ्तिराये हुए घर बहुत ही सुंदर लग रहे हैं। सूरज अभी पहाड़ों की ओट में है। चोटियों के ऊपरी कोने पर थोड़ी–थोड़ी धूप अभी फैल रही है। कुछ ही ऊँचाई पर घने जंगल दिखायी पड़ रहे हैं। लगभग दो किलोमीटर की दूरी चलने के बाद जंगल का कोना शुरू हो गया है। मैं अपने झबरीले गाइड के साथ जंगल में प्रवेश कर रहा हूँ।

Friday, August 2, 2019

रूद्रनाथ के द्वार पर

जय रूद्रनाथǃ
यह ऐसा नाम है जिससे थोड़ा सा डर तो लगता ही है। रूद्र से भला कौन न डरे। और शायद इसी बात को समझते हुए बाबा रूद्रनाथ ऐसी जगह बसे हैं जहाँ हर कोई न पहुँच सके। मेरे मन में भी इच्छा थी बाबा रूद्रनाथ के दर पर जाने की लेकिन मन में संशय भी था कि पहुँच पाऊँगा कि नहीं। ऐसे में संस्कृत की एक उक्ति याद आई– "संशयात्मा विनश्यति।" तो मन से सारे संशय त्यागकर व दृढ़ निश्चय कर 23 मई को हरिद्वार के लिए ट्रेन पकड़ ली– "हरिहर एक्सप्रेस।" मेरे दृढ़ निश्चय को देखते हुए ट्रेन की टिकट भी,जो आर.ए.सी मिली थी,कन्फर्म हो चुकी थी।
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