Friday, August 2, 2019

रूद्रनाथ के द्वार पर

जय रूद्रनाथǃ
यह ऐसा नाम है जिससे थोड़ा सा डर तो लगता ही है। रूद्र से भला कौन न डरे। और शायद इसी बात को समझते हुए बाबा रूद्रनाथ ऐसी जगह बसे हैं जहाँ हर कोई न पहुँच सके। मेरे मन में भी इच्छा थी बाबा रूद्रनाथ के दर पर जाने की लेकिन मन में संशय भी था कि पहुँच पाऊँगा कि नहीं। ऐसे में संस्कृत की एक उक्ति याद आई– "संशयात्मा विनश्यति।" तो मन से सारे संशय त्यागकर व दृढ़ निश्चय कर 23 मई को हरिद्वार के लिए ट्रेन पकड़ ली– "हरिहर एक्सप्रेस।" मेरे दृढ़ निश्चय को देखते हुए ट्रेन की टिकट भी,जो आर.ए.सी मिली थी,कन्फर्म हो चुकी थी।
इतना ही नहीं,ट्रेन भी लगभग समय से रूड़की पहुँच गयी। सारे जतन करके,जितनी भी तेजी हो सकती थी,मैंने की और जल्दी से बस पकड़ कर हरिद्वार पहुँचा। हरिद्वार पहुँचने में 7.30 बज गये और साथ ही यह भी लगभग तय हो गया कि मुझे आगे जाने के लिए रोडवेज की कोई बस नहीं मिलेगी। बाहर निकलकर प्राइवेट स्टैण्ड पर पहुँचा ताे श्रीनगर की एक बस लगी थी। थोड़ा इधर–उधर खोजबीन की तो रूद्रप्रयाग की एक बस मिल गयी। कुछ तो आगे तक पहुँचायेगी। 8.10 पर रूद्रप्रयाग के लिए बस रवाना हो गयी। इधर–उधर की भागदौड़ में खाना भी नहीं खा पाया। तो बस की खिड़की से ही दो क्रीमरोल खरीद लिये। जीवित रहने के लिए इतना काफी था। रूद्रप्रयाग का किराया मुझे पहले से पता था– 235 रूपये। ड्राइवर ठीक–ठाक था और तेजी से भागता रहा। ये अनुमान भी सही था कि बस नाश्ते–पानी के लिए ʺतीन धाराʺ में रूकेगी। सो रूकी। यहाँ सड़क किनारे एक लाइन में कई सारे रेस्टोरेण्ट बने हुए हैं। यहाँ हमेशा ही गाड़ियों की लाइन लगी रहती है। एक रेस्टोरेण्ट में घुसा तो थालियाँ पहले से ही सजा कर रखी हुई थीं। यही यहाँ का तरीका है। होटल वाले पहले से थालियों में सूखी सब्जी और खीरे के सलाद के साथ चटनी परोस कर रखते हैं। होटल में यात्रियों के प्रवेश करते ही दाल और सब्जी परोसना शुरू कर देते हैं। आर्डर मिलते ही थालियों में रोटियाँ या आलू के परांठे परोस कर आपके सामने पहुँचाना शुरू कर देते हैं। दो परांठे वाली थाली 50 और एक परांठे वाली थाली 25 या 30 में। मेरा एक ही परांठे में काम तमाम हो जाता है।
तीन धारा की सेवा लेने के बाद मेरी बस लगभग 12 बजे आगे के लिए रवाना हो गयी। 2.45 पर जब मैं रूद्रप्रयाग में उतरा तो गोपेश्वर जाने के फेर में पड़ा क्योंकि मुझे आज ही सगर तक पहुँचना था। एक बस पर गोपेश्वर लिखा देख सिर पर बैग रखकर भागा। पता चला कि यह कर्णप्रयाग तक ही जायेगी। मुझे पहले से ही पता था कि पहाड़ी इलाके में बैठकर गाड़ी का इन्तजार करने की बजाय चलते रहना ही बेहतर है। मैं बस में सवार हो गया। 2.55 पर बस रवाना भी हो गयी। किराया 50 रूपये। बैठने की जगह बस के बोनट पर ही मिली वह भी उल्टी दिशा में मुँह करके। बोनट पर ही सीधी दिशा में मुँह करके एक महिला भी बैठी थी जिसने मेरी पीठ को कुर्सी की पीठ बना लिया था। रास्ते भर मुझे धक्का लगाते हुए चलती रही। चार धाम परियोजना के ʺसाइड इफेक्टʺ की वजह से बस सड़क पर उछलती हुई चल रही थी या फुदकती हुई,मैं निर्णय नहीं कर सका। चार–धाम यात्रा से सम्बन्धित हर सड़क पर काम चल रहा है। पहाड़ों और नदियों,दोनों से जमीन छीनी जा रही है। हर तरफ जे.सी.बी. मशीनों का आतंक व्याप्त है। इस आतंक से पहाड़ व नदियाँ,दोनों ही डरे हुए हैं। पहाड़ों की सारी हरियाली धूल के गुबार में दफन हो गयी है। बस में अधिकांशतः स्थानीय लोग ही सवार हैं और सड़क के गड्ढों और धूल–धक्कड़ से संभवतः उन्हें कोई भी आपत्ति नहीं है।

4.15 पर मैं कर्णप्रयाग पहुँचता हूँ। यहाँ से गोपेश्वर के लिए कोई गाड़ी नहीं दिख रही लेकिन अचानक एक जीप वाला सड़क पर कहीं से प्रकट हो जाता है। बीच में बैठने की जगह मिल जाती है। मेरे लिए फायदा यह है कि यह जीप चमोली से आगे गोपेश्वर तक जा रही है,नहीं तो चमोली से गोपेश्वर के लिए एक और गाड़ी खोजनी पड़ती। चमोली से गोपेश्वर की दूरी है 10 किमी और किराया 20 रूपये। 6.15 बजे मैं 80 रूपये किराया चुकाकर गोपेश्वर पहुँच जाता हूँ। गोपेश्वर पहुँचते ही मेरी चिंता काफी कुछ खत्म हो चुकी है। गोपेश्वर से सगर की दूरी केवल 5 किमी है जहाँ मैं अगले दिन सुबह भी पहुँच सकता हूँ। अब मैं गोपेश्वर में भी रात बिताने लिए कोई होटल ढूँढ़ सकता हूँ। फिर भी दिन अभी काफी शेष है और मैं चाय पीने के बाद सगर के लिए गाड़ी ढूँढ़नी शुरू कर देता हूँ। पता चलता है कि गोपेश्वर टैक्सी स्टैण्ड से मण्डल के लिए गाड़ियाँ जाती हैं। मण्डल वाली कोई गाड़ी होगी तो ठीक नहीं तो गाड़ी बुक करनी पड़ेगी। दिन भर बस में बैठे–बैठे पैर टेढ़े हो गये हैं। मैं अपने दोनों बैग्स के साथ साथ दोनों पैरों को भी घसीटते हुए स्टैण्ड पर पहुँचता हूँ तो एक ड्राइवर मुझे पहले ही लपक लेता है। पहले तो मुझसे मेरा गंतव्य पूछता है और फिर थोड़ा उचक कर,50 मीटर की दूरी पर उधर देखता है जहाँ से सगर की गाड़ी मिलती है।
"सगर की तो कोई गाड़ी नहीं है। आपको गाड़ी बुक करनी पड़ेगी।"
"कितना लगेगा?"
"300 रूपये।"
"इतने में तो मैं यहाँ होटल भी ले लूँगा,खाना भी खा लूँगा और फिर सबेरे सगर भी पहुँच जाऊँगा",कहते हुए मैं आगे बढ़ जाता हूँ। 20-30 कदम ही चलता हूँ तो सगर की एक गाड़ी खड़ी मिल जाती है। समझ में आ जाता है कि मैदानों से भाग कर पहाड़ों पर छ्पिी,ईमानदारी और सच्चाई अब यहाँ से भी विदा ले रही है। गाड़ी के ड्राइवर से ही पता चलता है कि वह सगर का ही रहने वाला है और अब घर जा रहा है। मैंने उससे बातें करना शुरू करता हूँ। पता चलता है कि गूगल मैप पर जो नाम सागर या सगर है,स्थानीय बोलचाल की भाषा में वह सग्गर है। कुछ देर तक सवारियों का इंतजार करने के बाद गाड़ी सगर के लिए रवाना हो जाती है। 5 किमी का किराया 20 रूपये। शाम के सवा सात बजे मैं सगर पहुँचता हूँ। ड्राइवर मुझे एक सस्ते होटल के सामने उतार देता है और फिर कहीं और निकल जाता है। पता चलता है कि होटल का रेट 500 रूपये है और 500 मेरे लिए सस्ता नहीं है। साथ ही इसमें थोड़ी सी भी गुंजाइश नहीं दिखाई पड़ रही है तो मैं आगे बढ़ जाता हूँ। हरियाली लॉज का नाम मैंने पहले से सुन रखा है। मौके पर मुझे थोड़ा दूर दिखाई पड़ रहा है फिर भी मैं चल पड़ता हूँ। थोड़ी सी बातचीत के बाद हरियाली रिजार्ट में 400 में,सिंगल आदमी के लिए,एक डबल रूम मिल जाता है।
अब तक साढ़े सात बज चुके हैं। पहाड़ों ने शाम के धुँधलके की चादर ओढ़नी शुरू कर दी है। मैं अपने घर से यह देख कर आया था कि शाम के 7 बजे ही धुँधलका छाना शुरू हो जाता है लेकिन पहाड़ों पर ऊँचाई वाले भागों में दिन संभवतः कुछ लम्बे हो जाते हैं। आधे घण्टे का ʺप्राॅफिटʺ है। मैं 100 रूपये की थाली के लिए भी तत्काल ही आर्डर कर देता हूँ। पता नहीं कितना समय लगेगा। लॉज मैनेजर से मैं रूद्रनाथ की चढ़ाई के बारे में काफी जानकारी इकट्ठी करने की कोशिश करता हूँ। क्योंकि मैंने सुन रखा है– ʺजर्मनी की लड़ाई और रूद्रनाथ की चढ़ाईʺ,बहुत ही कठिन है। वह सलाह देता है कि सुबह 5 बजे ही निकल जाना ठीक रहेगा। मैं थोड़ा और सोकर 6 बजे निकलना चाहता हूँ लेकिन वह दुबारा 5 बजे ही निकलने की सलाह देता है। मेरे पास चढ़ाई के वक्त इस 70 किलो के शरीर को सहारा देने वाली छड़ी भी नहीं है। मैं यह समस्या उसके सामने रखता हूँ तो वह हँसने लगता है। भला ये भी कोई हँसने वाली बात है। जर्मनी की लड़ाई के लिए कम से कम एक डण्डा तो हाेना ही चाहिए। वह मुझे निश्चिंत होकर सोने की सलाह देता है।
ʺआप सो जाइए। रात में आपके कमरे के दरवाजे पर मैं छड़ी रख दूँगा। सुबह आप ले लेना।ʺ वैसे अभी एक और समस्या है और वह है बैग रखने की। सुबह के समय जब मैं कमरा छोड़कर निकलूूँगा तो बैग कहाँ रखूँगाǃ आदेश मिलता है कि बैग काउण्टर पर बैठे किसी भी आदमी के हवाले किया जा सकता है। सुबह की सारी व्यवस्था करने के बाद मैं पूरी तरह निश्चिंत होकर साे जाता हूँ।
वैसे तो रूद्रप्रयाग से आगे बढ़ते ही मौसम की ठण्डक का एहसास होना शुरू हो गया था लेकिन यहाँ पर मौसम पूरी तरह से ठण्डा है। सगर समुद्र तल से 1745 मीटर या लगभग 5725 फीट की ऊँचाई पर स्थित एक पहाड़ी गाँव है। इस ऊँचाई पर आमतौर पर मौसम गर्मी के महीनों में भी ठण्डा ही रहता है।

25 मई
लॉज मैनेजर के निर्देश के अनुसार मैंने तय कर लिया था कि सुबह के पाँच बजते ही रूद्रनाथ के लिए निकल जाऊँगा। मेरी तैयारी बिल्कुल ठीक है। छन–छन करते ठण्डे पानी को जल्दी–जल्दी शरीर पर डाल कर शुद्धिकरण कर लेता हूँ। मुँह से तेजी से राम–नाम निकलना शुरू हो जाता है। मतलब ये कि अब मैं यात्रा के लिए तैयार हूँ। पिट्ठू बैग को तैयार करने में पाँच मिनट लगते हैं। बैग में कुछ ऊनी कपड़ों और रेनकोट के अलावा डीएसएलआर कैमरा भी समा जाता है। पानी की बोतल के अलावा पावर बैंक और कुछ अन्य फुटकर सामान भी हैं। कुल मिलाकर पीठ पर ढोने भर का पर्याप्त सामान हो गया है। लेकिन लॉज मैनेजर के सारे वादे झूठे निकलते हैं। उसने मेरे दरवाजे पर छड़ी नहीं रखी है। इसके अलावा जब मैं बैग लेकर बाहर निकलता हूँ तो हरियाली रिजार्ट से सम्बन्धित रेस्टोरेण्ट,दुकान वगैरह सभी कुछ बंद हैं। मैं सम्पूर्ण रूप से बेवकूफ बन गया हूँ। कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद अन्दर से एक आदमी की आवाज तो सुनाई देती है लेकिन कितनी भी रिक्वेस्ट करने के बाद दरवाजा नहीं खुलता है। मैं तुरंत निर्णय लेता हूँ। बैग को अपने कमरे में रखकर दरवाजे का हैण्डल बन्द कर देता हूँ। बैग की समस्या का तो समाधान हो जाता है लेकिन छड़ी की समस्या अभी छड़ी की तरह से ही खड़ी है। मैं इधर–उधर नजर दौड़ाता हूँ तो मुझे वायरिंग में प्रयोग की जाने वाली पाइप का एक लगभग 4 फीट का टुकड़ा दिखता है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। अब मेरी इस समस्या का भी समाधान हो गया है। रात की पूछताछ से मुझे ये अनुमान तो लग चुका है कि सड़क को कहाँ से छोड़कर ट्रेकिंग वाले रास्ते पर जाना है लेकिन बिल्कुल सटीक जगह मुझे अभी भी मालूम नहीं है। लेकिन बाबा रूद्रनाथ की कृपाǃ बिना किसी प्रयास के मेरी इस समस्या का भी समाधान हो जाता है। लॉज से बाहर निकलते समय एक झबरे बालों वाला,काले रंग का कुत्ता बिल्कुल रास्ते में ही बैठा हुआ मिलता है। मैं उससे थोड़ा डरते हुए बच कर निकलता हूँ लेकिन यह क्याǃ यह कुत्ता तो बिल्कुल मेरे आगे–आगे ही चलने लगता है। मानो उसे भी पता हो कि मुझे कहाँ जाना है। थोड़ा सा ही आगे बढ़कर यह कुत्ता सड़क छोड़कर बायीं तरफ दिख रही सीढ़ियों पर चढ़ जाता है। मैं भी उसके पीछे चल पड़ता हूँ। 100 मीटर आगे एक झोपड़ी के पास एक महिला खड़ी है जिससे मैं रूद्रनाथ का रास्ता पूछता हूँ। पता चलता है कि मैं ठीक रास्ते पर ही जा रहा हूँ। सीढ़ियों पर मेरी स्पीड कुत्ते की तुलना में धीमी है। ऐसी स्थिति में वह थोड़ी देर के लिए खड़ा हो जा रहा है। लगभग 10 मिनट चलने के बाद मेरी समझ में आ जाता है कि यह कुत्ता मेरे लिए गाइड का काम करेगा। तो अब मेरी सारी समस्याओं का समाधान हो चुका है। फ्री की छड़ी और फ्री का गाइड। अब मुझे रूद्रनाथ की चढ़ाई वाले रास्ते पर केवल चलते जाना है।


रूद्रनाथ के रास्ते पर मेरा गाइड




अगला भाग ः सगर से पनार बुग्याल

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. रूद्रनाथ के द्वार पर
2. सगर से पनार बुग्याल
3. पनार बुग्याल से रूद्रनाथ
4. रूद्रनाथ से वापसी
5. काण्डई बुग्याल से नीचे
6. कल्पेश्वर–पंचम केदार

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया शुरुआत, वैसे दिनभर बस में या किसी अन्य सवारी में बैठे-2 कमर की क्या हालत होती है ये तो मैं समझ सकता हूँ !

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    1. धन्यवाद जी। पहाड़ी मोड़ों की वजह से पहाड़ की दूरियाँ बहुत ही लम्बी लगने लगती हैं। और उस पर भी दिन भर बस में यात्रा करनी हो तो हालत और भी बुरी हो जाती है।

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