भारत में वर्षा का वितरण अत्यधिक असमान पाया जाता है। यद्यपि सम्पूर्ण देश में वर्षा का औसत 109 सेमी या 40 इंच रहता है लेकिन इस सामान्य वर्षा से 20 से 30 सेमी तक का विचलन भी देखने को मिलता है। पूरे देश में दक्षिणी–पश्चिमी मानसून से 86 सेमी,लौटते मानसून से 5 सेमी,ग्रीष्मकाल में 13 सेमी तथा शीतकाल में 2.5 सेमी औसत वर्षा होती है। स्टाम्प महोदय ने वर्षा की मात्रा के आधार पर भारत को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है–
1. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र– 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं। इसमें पश्चिमी घाट और पश्चिमी तट के कोंकण,मालाबार और दक्षिणी कनारा,उत्तराखण्ड,हिमाचल प्रदेश,हिमालय की तलहटी में अवस्थित बिहार,पश्चिमी बंगाल के कुछ भाग तथा पूर्वाेत्तर भारत में असम,नागालैण्ड,अरूणाचल प्रदेश,मिजोरम,मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि सम्मिलित हैं।
2. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। इसके अन्तर्गत पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल,प0 बंगाल के दक्षिणी–पश्चिमी भाग,ओडिशा,बिहार,दक्षिण–पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं हिमालय के दक्षिण में तराई के सँकरी पेटी वाले क्षेत्र सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में 15 से 20 प्रतिशत तक वर्षा की अनियमितता पायी जाती है। इन क्षेत्रों में अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण फसलों को बहुत हानि पहुँचती है।
3. न्यून वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का औसत 50 से 100 सेमी के बीच होता है। इसके अन्तर्गत अधिकांश दक्कन का पठारी भाग,गुजरात,मध्य प्रदेश,आन्ध्र प्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक,पूर्वी राजस्थान,दक्षिणी पंजाब,हरियाणा और दक्षिणी उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा अपर्याप्त और अनिश्चित होती है। यहाँ वर्षा की विषमता 20 से 25 प्रतिशत तक होती है। अतः ये क्षेत्र प्रायः अकालग्रस्त रहते हैं। कृषि के लिए यहाँ सिंचाई की व्यवस्था अपरिहार्य है।
4. अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। इसके अन्तर्गत पश्चिमी राजस्थान,महाराष्ट्र के विदर्भ और आन्ध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र सम्मिलित हैं। यहाँ सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था के बिना कृषि संभव नहीं है।
मानसून और भारत का आर्थिक जीवन
मनुष्य को प्रभावित करने वाले भौगोलिक वातावरण के समस्त कारकों में जलवायु का प्रभाव सर्वाेपरि माना जाता है। वास्तव में किसी भी देश का सम्पूर्ण आर्थिक विकास तथा जन–जीवन वहाँ की जलवायवीय दशाओं से ही नियंत्रित होता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहाँ कृषि ही राष्ट्र के अर्थतंत्र की धुरी है,जलवायु का महत्व और भी अधिक हो जाता है। कृषि के अतिरिक्त मनुष्य के अन्य क्रिया–कलाप जैसे– उद्योग,व्यवसाय,परिवहन एवं संचार–व्यवस्था आदि प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जलवायु से प्रभावित होते हैं। भारत की जलवायु मानसूनी है। मानसूनों की विलक्षणता के कारण इन्हें भारत के आर्थिक जीवन की धुरी कहा गया है। मानसून के देश के आर्थिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं–
1. भारत एक गर्म देश है। शीतकाल में भी पहाड़ी भागों को छोड़कर सभी भागों में तापमान 12⁰ सेग्रे से नीचे नहीं होते। पाले द्वारा हानि सीमित क्षेत्रों में होती है,इसलिए फसलें वर्ष भर उगायी जा सकती हैं। साधारणतया वर्ष में दो फसलें सर्वत्र उगा ली जाती हैं। किंतु बंगाल,असम,बिहार और उत्तर प्रदेश में तो तीन फसलें तक उगा ली जाती हैं।
2. भारत एक अत्यन्त विशाल देश है। इसके इस विस्तार का प्रभाव जलवायु की विविधता पर भी पड़ता है। जलवायु की विविधता के कारण यहाँ कई प्रकार की फसलें पैदा की जाती हैं। उदाहरण के लिए जौ,ज्वार,बाजरा,मक्का,चना,चावल,गेहूँ,जूट,कपास,कहवा,गन्ना,रबड़,तिलहन इत्यादि।
3. मानसूनी जलवायु के अन्तर्गत ग्रीष्मकालीन तापमान काफी ऊँचे होते हैं। इसका प्रभाव देश की फसलों की गुणवत्ता पर पड़ता है। फसलें घटिया प्रकार की होती हैं। अनाज के दाने छोटे और पतले होते हैं। इस प्रकार की स्थिति रबी और खरीफ दोनों प्रकार की फसलों के लिए लागू होती है। इसी कारण भारत गुणात्मक उत्पादक नहीं,वरन् परिमाणात्मक उत्पादक देश माना जाता है।
4. वर्षाकाल में जून,जुलाई और अगस्त माह में आर्द्रता की अधिकता के कारण फसलें तेजी से बढ़ती हैं और पर्याप्त चारा प्राप्त हो जाता है,जो पशुपालन के लिए उपयुक्त होता है। इसलिए भारत में पशुओं की संख्या बहुत अधिक पायी जाती है।
5. देश की सम्पूर्ण वर्षा कुछ सीमित महीनों में ही प्राप्त होती है और शेष वर्ष का अधिकतर भाग प्रायः सूखा रहता है। इस लम्बे शुष्क मौसम में घास भी उत्तम नहीं होती। वर्षाऋतु में उगी हुई घास वर्षा के उपरान्त तेज धूप से शीघ्र जल जाती है। इस कारण देश में हरे चारे की कमी रहती है,जिसका प्रभाव पशुओं पर पड़ता है और पशु उत्तम श्रेणी के नहीं होते। इनको वर्ष के अधिकांश समय सूखे चारे पर निर्भर रहना पड़ता है।
6. वर्षा की अनियमितता देश में आपदा कारण बन जाती है। किसी–किसी वर्ष जलवृष्टि बहुत कम होती है जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं और देश में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके विपरीत कभी–कभी वर्षा इतनी अधिक हो जाती है कि नदियों में बाढ़ें आ जाती हैं और इससे भी फसलें नष्ट हो जाती हैं। इसलिए भारत के वित्तीय बजट को मानसून का जुआ कहा जाता है। वर्षा की इस अनिश्चितता के कारण भारत के किसान भाग्यवादी और निराशावादी बन जाते हैं।
7. देश में यद्यपि शीतकाल में मौसम शुष्क होता है,तथापि उत्तरी भारत में साधारण वृष्टि चक्रवातों द्वारा भी हो जाती है। यह चक्रवातीय वर्षा गेहूँ और गन्ने की फसलों के लिए अत्यन्त लाभकारी होती है। देश के उत्तरी–पश्चिमी भाग और पंजाब में गेहँ और गन्ना बहुत अधिक पैदा किया जाता है।
8. ग्रीष्मकाल की अत्यधिक गर्मी के बाद घनघोर वर्षा का मौसम तत्काल शुरू हो जाता है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होता है। इससे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। देश के कुछ भागों में इस समय मलेरिया का प्रकोप हो जाता है। वर्षा जल के यत्र–तत्र संचयन के कारण विषैले कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं जिससे हैजा और चेचक जैसे खतरनाक रोग फैलते हैं।
9. अत्यधिक उष्णता और आर्द्रता न केवल बीमारियों को जन्म देती है,वरन मनुष्य इससे पुरूषार्थहीन और आलसी हो जाता है। इसका देशवासियों की कार्यक्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ग्रीष्मकाल में भारत की जलवायु अत्यधिक उष्ण और अस्वास्थ्यकर हो जाती है। गंगा–यमुना के दोआब में तापमान 42⁰ सेग्रे तक पहुँच जाता है। दोपहर में लू इतनी अधिक चलती है कि दिन के 9 बजे से ही सायंकाल तक घर के भीतर बन्द रहना पड़ता है। इसलिए हमारे देश में काम के घण्टे अन्य उन्नतिशील देशों की अपेक्षा कम होते हैं।
10. जलवायु सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करती है जिसका परोक्ष रूप से प्रभाव आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है। देश का अधिकतर भाग उष्णकटिबन्ध में स्थित है। वर्ष में अधिकांश समय तापमान उच्च रहता है,इस कारण मनुष्य शीघ्र परिपक्वावस्था को प्राप्त करते हैं। लड़के और लड़कियाँ शीघ्र किशोरावस्था को प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए बाल–विवाह की प्रथा प्रचलित है। कम उम्र में ही अपने देश के युवकों और युवतियों को आजीविका के प्रयत्नों का भार सहना पड़ता है जबकि वे व्यवसायों में प्रवेश करने के लिए पूर्ण रूप से दक्ष नहीं होते। इसका मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव पड़ता है।
11. जलवायु का प्रभाव मानव निवास पर भी पड़ता है। हमारे देश में मकानों को इस प्रकार बनाया जाता है कि खुली हवा अधिक से अधिक प्राप्त हो सके। मकानों में आँगन और बरामदों की आवश्यकता अधिक होती है। स्वाभाविक रूप से यहाँ के मकान ठण्डे पश्चिमी देशों की तुलना में भिन्न प्रकार के होते हैं।
12. मनुष्य का पहनावा और वेश–भूषा जलवायु से प्रभावित होती है। देश की जलवायु उष्ण और आर्द्र होने के कारण हल्के और बारीक कपड़ों की आवश्यकता होती है। इसी कारण पुरूषों के लिए धोती–कुर्ते और स्त्रियों के लिए साड़ी का प्रचलन अधिक है। केवल ठण्डे पहाड़ी भागों और शीतकाल में उत्तरी भारत में ऊनी वस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है।
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5. भारतीय मानसून

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