Friday, April 19, 2019

मदुरई

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वेल्लोर से शाम के 7.30 बजे हम मदुरई के लिए रवाना हो गये। अब रात भर चलना था। सोच कर ही चक्कर आ रहे थे। ड्राइवर भी जुनूनी था। चल पड़े तो चल पड़े। सुबह के समय ही तिरूमला से सीधे मदुरई के लिए निकल लिए होते तो शाम तक या 8-9 बजे तक मदुरई में होते। दिनभर बस की खिड़की से तमिलनाडु का जनजीवन देखने को मिला होता और रात मदुरई के किसी होटल में बीतती। लेकिन ऐसा होना किस्मत में नहीं था। प्लान ड्राइवर का था। छोटी सी ट्रैवलर गाड़ी। पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी तो पैरों को सूजन झेलनी ही थी।
गाड़ी में एल.ई.डी. टीवी लगा था। लेकिन ड्राइवर के पास न तो हिन्दी फिल्में थीं न हिन्दी गाने। तमिल और तेलगू इधर किसी के पल्ले पड़ने वाली नहीं थी। लेकिन हम लोगों के मोबाइल में तो हिन्दी और भोजपुरी गानों के खजाने थे। क्योंकि तमिलनाडु में हमने जितनी भी यात्रा की,किसी भी हाइवे के साथ 4जी नेटवर्क कहीं भी धीमा नहीं हुआ। तो यूट्यूब जिन्दाबाद। बस शुरू हुआ ब्लूटूथ कनेक्टिविटी का दौर और बजने लगे भोजपुरिया गाने। कमी बस डांसर की रह गयी थी नहीं तो गाने तो ऐसे बज रहे थे कि बस भी नाचने लगे। वो तो गाड़ी आन्ध्र प्रदेश की थी,हिन्दी नहीं जानती थी,सो सीधी चलती रही। अब नींद की रही–सही संभावना भी जाती रही।

समूह में चलना था सो सबकी बात भी माननी थी। किसी ने कहा कि खाना अभी नहीं खायेंगे तो किसी ने बिल्कुल ही इन्कार कर दिया– ʺरात भर बैठ कर यात्रा करनी है तो भरपेट खाना खाकर चलना ठीक नहीं रहेगा।ʺ इसी उधेड़बुन में भाेजन भी नसीब नहीं हुआ। ड्राइवर ने अपने हिसाब से एक जगह गाड़ी रोकी और स्वयं खाना खा लिया। हमें तो चाय–काफी के सहारे ही मन को मनाना पड़ा। और तो और रात के एक बजे ड्राइवर ने गाड़ी चलाने से ही इन्कार कर दिया। पता चला कि अब वो आराम करेगा। अब ड्राइवर की बात माननी ही थी नहीं तो रास्ते में बिचारेे को कहीं झपकी आ गयी तो हॉस्पिटल में आराम करना पड़ जायेगा। एक रेस्टोरेण्ट के बाहर गाड़ी रोकी गयी। ड्राइवर दरवाजा बन्द कर अन्दर सो गया और हमें ʺदीपावली के दलिद्दरʺ की तरह बाहर खदेड़ दिया। हम सब "चाय" की शरण में चले गये। तमाम टूरिस्ट बसें आ रही थीं,जा रही थीं। एक हम ही थे जो किस्मत के मारे,सड़क के किनारे,बिना किसी सहारे,भटकने को मजबूर थे। आखिर एक–सवा घण्टे में ड्राइवर की नींद पूरी हो गयी। इस घनघोर कलियुग में "श्वान निद्रा" का पहला उदाहरण मुझे दिखाई दिया। ड्राइवर ने हाथ मुँह धोया और आगे चल पड़ा।
3 बजे के आसपास,वेल्लोर से मदुरई तक की 405 किमी की दूरी तय कर हम मदुरई शहर में थे। वैसे चेन्नई से मदुरई की सीधी दूरी लगभग 500 किमी है। इतना तो साबित हो ही गया कि ड्राइवर ने अपनी श्वान निद्रा पूरी करने के लिए हमें मदुरई शहर से थोड़ा सा पहले ही रोका था। लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि ड्राइवर को सचमुच नींद आ रही थी या फिर उसने हमें बेवकूफ बनाया था।

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रात के 3 बजे मदुरई पहुँचने के बाद लगभग आधे घण्टे का समय कमरा वगैरह खोजने में लग गया। रात भर जागकर बस में यात्रा करने के बाद कुछ लोगों को नींद की शरण में जाने की इच्छा थी लेकिन ड्राइवर ने ʺअंग्रेजों के जमाने वाले जेलरʺ का सख्त फरमान सुना दिया–
ʺसोना नहीं है। मदुरई घूमने के बाद तुरन्त हमें रामेश्वरम चलना है।ʺ तो अब आँखो की नींद गायब हो चुकी थी क्योंकि मन में डर था कि आज भी देर हुई तो फिर से रात में जगना पड़ सकता है।
वैसे अभी मदुरई। रात भर जगे रहने से सुबह नहाने–धोने की स्पीड कम हो गयी थी। फिर भी सुबह के लगभग 6.30 बजे तक हम लोग नहा–धोकर बस में सवार हो चुके थे और 7 बजे तक मदुरई के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर के अन्दर थे। जहाँ हम ठहरे थे वहाँ से मीनाक्षी मंदिर की पैदल दूरी अधिक नहीं थी लेकिन बस काफी घूमते–फिरते गयी जिससे काफी समय लग गया। मुख्य मंदिर में दर्शन के लिए लाइन लगी थी। हम भी खाली हाथ दर्शन की लाइन में लग गये जबकि हमारा ड्राइवर हाथों में फूलों की डलिया लिए लाइन में खड़ा था। अभी भीड़–भाड़ काफी कम थी और लाइन छोटी थी फिर भी दर्शन होने में डेढ़ से दो घण्टे लग गये। वैसे नोटों की सिफारिश पर दर्शन करने की व्यवस्था भी थी और ऐसे लोग सीधे दर्शन पा जा रहे थे। उनके लिए हमारे जैसे अन्धभक्तों की लाइन को रोक दिया जा रहा था। तिरूमला के वेंकटेश्वर मंदिर में भी ऐसी व्यवस्था दिखी थी। वैसे तो अतिरिक्त शुल्क चुकाकर भगवान के शीघ्र दर्शन की व्यवस्था हमारे देश के भीड़भाड़ वाले अधिकांश मंदिरों में है लेकिन संभवतः दक्षिण भारत में यह एक आम बात है। इसके अतिरिक्त मीनाक्षी मंदिर सर्वाधिक दर्शनार्थियों को आकर्षित करने वाले मंदिरों में से एक है।

छोटी कक्षाओं की इतिहास की किताबों में,भारत के मानचित्र में,सुदूर दक्षिणी कोने में लिखे तीन शब्द मुझे काफी आकर्षित करते थे। ये तीन शब्द थे–
ʺचेर,चोल और पाण्ड्य।ʺ
वैसे इन शब्दों की वास्तविकता समझने में मुझे काफी समय लग गया। क्योंकि प्रारम्भिक कक्षाओं की इतिहास की किताबों में इनके बारे में बहुत ही कम लिखा गया है। अधिकांश इतिहास उत्तर भारत या फिर दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता के आस–पास सिमट कर रह जाता है। इसके अतिरिक्त इनके बारे में जुबानी कुछ बताने वाला भी कोई नहीं था। वस्तुतः इन शासकों का इतिहास काफी सीमित रहा है अथवा कम महत्वपूर्ण रहा है। इस वजह से भारतीय इतिहास के अन्य शासकों की तुलना में इनकी चर्चा कम ही हुई है। लेकिन आज मैं इन्हीं तीन में से एक पाण्ड्य शासकों की राजधानी में था। वैसे इस यात्रा में आने के पहले और यात्रा पूरी होने के बाद भी मैंने इनके इतिहास के बारे में काफी खोजबीन की।
कृष्णा और तुंगभद्रा नदियाें से लेकर कुमारी अन्तरीप तक का विस्तृत भूभाग प्राचीन काल में तमिल प्रदेश का निर्माण करता था। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण केरल व तमिलनाडु तथा आधुनिक आन्ध्र प्रदेश व कर्नाटक का अधिकांश भाग सम्मिलित है। इस प्रदेश में तीन प्रमुख राज्य अवस्थित थे– चेर,चोल व पाण्ड्य। अति–प्राचीन काल में इन तीनों राज्यों का अस्तित्व रहा है। अशोक के तेरहवें शिलालेख में भी इन तीनों राज्याें का स्वतन्त्र रूप से उल्लेख किया गया है जो उसके साम्राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित थे। कालान्तर में चोल राजाओं ने अपने लिए एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। उनके उत्कर्ष का केन्द्र तंजौर था और यही चोल साम्राज्य की राजधानी भी थी।
दूसरा राज्य चेर आधुनिक केरल में स्थित था जिसके अन्तर्गत त्रावणकोर,कोचीन तथा मालाबार का कुछ भाग सम्मिलित था। चोल राज्य के समान यह भी एक प्राचीन तमिल राज्य था। वैसे चेर राजवंश का इतिहास अधिक लम्बा नहीं रहा। पहली और दूसरी शताब्दियों के संक्षिप्त स्वतंत्र इतिहास के बाद 12वीं शताब्दी तक यह राज्य चोल या पाण्ड्य शासकों के अधीन रहा। कोल्लम या क्विलन इनकी राजधानी थी।

तमिल प्रदेश का तीसरा राज्य पाण्ड्य था जिसकी राजधानी मदुरई में आज हम उपस्थित थे। प्रारम्भ में पाण्ड्य राज्य के अन्तर्गत तिनेवेली,रामनाड और मदुरा का क्षेत्र सम्मिलित था। पाण्ड्य शासकों का भी इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। भारत के प्राचीन ग्रन्थों जैसे रामायण,महाभारत,काैटिल्य के अर्थशास्त्र तथा अशोक के लेखों के साथ साथ यूनानी–रोमन विवरणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से भी पता चलता है कि उसने अपने शासन के बारहवें वर्ष में पाण्ड्य शासक को पराजित कर उससे उपहार प्राप्त किया। तमिल भाषा की प्राचीनतम रचना ʺसंगम साहित्यʺ से पाण्ड्य इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।
तमिलनाडु का मदुरई या मदुरै शहर प्राचीन काल में मदुरा या मदुरानगर था। यह शहर पाण्ड्य शासकों की राजधानी थी। संस्कृत साहित्य में इसे दक्षिणी मधुरा अर्थात् मथुरा कहा गया है। यह नगर वैगाई नदी के किनारे बसा हुआ था। कहते हैं कि इस नगर के स्थान पर पहले कदम्बवृक्षों का एक वन था। पाण्ड्यों की राजधानी इसके पहले इसके पूर्व में ʺमणवूरʺ नामक स्थान पर थी। कालान्तर में वन को काटकर पाण्ड्यों ने एक सुन्दर नगर बसाया और अपनी राजधानी मणवूर से लाकर यहाँ बसाई। यह नगरा मदुरा कहा गया। इसे ʺकदम्बवनʺ भी कहा जाता था। यहाँ सुन्दरेश्वर का एक भव्य मंदिर भी था। तमिल ग्रन्थाें से मदुरा नगर की समृद्धि के बारे में पता चलता है। नगर की चौड़ी सड़कों के दोनों किनारों पर भव्य भवन बने हुए थे। अलग–अलग जातियों के लिए अलग–अलग बस्तियों बनी हुई थीं। राज्य की ओर से नगर में स्नानागार,विद्यालय,बाजार,क्रीड़स्थल तथा व्यायामशालाएं बनी हुई थीं। नगर में स्वच्छता की समुचित व्यवस्था भी थी। यद्यपि मदुरा एक प्राचीन नगर है लेकिन यहाँ के वर्तमान स्मारक 16वीं शताब्दी में निर्मित हुए। इनमें मीनाक्षी मंदिर सर्वप्रमुख है।
पल्लव तथा चोल शासकों द्वारा बनवाये गये मंदिरों में द्रविड़ वास्तु का चरम विकास देखने को मिलता है। लेकिन चोलों को अपदस्थ करने वाले पाण्ड्य राजवंश के समय (13वीं–14वीं शताब्दी) द्रविड़ शैली में कुछ नये तत्व समाविष्ट हो गये। 12वीं सदी के बाद से मंदिरों में शिखर के स्थान पर उन्हें चारों ओर से घेरने वाली दीवारों के प्रवेश द्वारों को महत्व प्रदान किया गया। इस समय प्रवेश द्वार चारों दिशाओं में बनाये जाते थे। इनके ऊपर पहरेदारों के लिए कक्ष बनाये जाते थे। बाद में इन पर ऊँचे शिखर बनाये जाने लगे जिन्हें गोपुरम् कहा जाने लगा। पाण्ड्य राजाओं के काल में मदुरै,श्रीरंगम आदि स्थानों पर गोपुरम्–युक्त मंदिरों का निर्माण कराया गया। अपने वर्तमान स्वरूप में ये मंदिर आधुनिक युग की कृतियाँ हैं।

मीनाक्षी मंदिर देश के विशालतम मंदिरों में से एक है। यह लगभग 65000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसका दक्षिणी गोपुरम सर्वाधिक ऊॅंचा है जिसकी ऊँचाई 170 फीट है। मंदिर में सुन्दरेश्वर के रूप में भगवान शिव और मीनाक्षी के रूप में देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। मीनाक्षी का अर्थ है मछली की तरह आँख वाली। उल्लेखनीय है कि पांड्य शासकों का राजचिह्न मछली ही था। मंदिर के विशाल गर्भ गृह में देवी मीनाक्षी के अतिरिक्त अन्य कई देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। विशाल मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अति मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त अन्य कई मंदिर बने हुए हैं जिन्हें मण्डप कहा जाता है। द्रविड़ शैली की परम्परा के अनुसार एक तालाब भी है जिसे स्वर्णकमल जलाशय भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में एक अत्यन्त उत्कृष्ट शिल्प वाला ʺस्तम्भ मण्डपʺ है। इसके हर स्तम्भ पर बारीक शिल्प उत्कीर्ण किया गया है। इसे सहस्र स्तम्भ मण्डप कहा जाता है। वैसे इस मण्डप में 1000 की बजाय 985 स्तम्भ बने हुए हैं। मंदिर के निर्माण काल के बारे में कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाता। वैसे मंदिर की अधिकांश बाहरी इमारतों और वर्तमान स्वरूप का निर्माण काल 13वीं से 16वीं शताब्दी के मध्य का माना जाता है।
काफी देर तक हम मुख्य मंदिर के अलावा अन्य मंदिरों की गणेश परिक्रमा करते रहे।

साढ़े नौ बजे तक मंदिर से लौटने के बाद हमने चाय–नाश्ता किया। छोटी–छोटी दुकानों पर आलू का विभिन्न तरीकों से दुरूपयोग कर बनाये गये पकौड़े–पकौड़ियाँ बिक रहे थे। हमने इन्हीं का भोग लगाया। 10 बजे रामेश्वरम के लिए रवाना हो गये। अब 172 किमी की दूरी तय करनी थी। तो मन में दूरी का तनाव नहीं था। इतना तय था कि बस की खिड़की से बाहर के तमिलनाडु को देखते हुए हम समय से रामेश्वरम पहुँच जायेंगे।
मदुरई से आगे निकलकर जब हम रामेश्वरम की ओर बढ़े तो कुछ दूरी चलने के बाद लगने लगा कि हम नारियल के देश में आ गए हैं। सड़क किनारे नारियल,खेतों में नारियल,मानव बस्तियों के बीच नारियल। पेड़ नारियल के और जंगल भी नारियल का। फिर भी खाना तो चावल का ही होगा। गेहूँ लायक मौसम यहाँ होता नहीं। फरवरी में ही तेज गर्मी की शुरूआत हो जाती है। जंगलों में आग लगनी शुरू हो जाती है। फिर गेहूँ कहाँ से पैदा होगा। फिर रोटी कैसे बिन माँगे मिलेगी। उस पर भी आसानी से मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता। 11.45 बजे सड़क किनारे इकलौते ढाबे पर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी। उस जगह किसी गाँव या कस्बे के नाम पर यह ढाबा ही था। दुकानों के नाम पर यह ढाबा ही था। होटल या रेस्टोरेण्ट के नाम पर भी यह ढाबा ही था। इतने अकेले में और इतने शांतिपूर्ण स्थान पर यह ढाबा था कि हम फूले नहीं समा रहे थे। तीन महिलाएं इस ढाबे का संचालन कर रही थीं– यह देखकर हम लोग अभिभूत हो गए। हमारे उत्तर प्रदेश में तो ऐसा दृश्य दुर्लभ ही है। समस्या बस इतनी सी थी कि उन तीनों में से किसी को भी हिन्दी नहीं आती थी। हमारे ड्राइवर ने दुभाषिए का जिम्मा उठाया। सारी समस्याएं साॅल्व।
पता चला कि चावल,दाल,सब्जी मिल जाएगी।
"तथास्तु।"

बड़ी–बड़ी मेजों के चारों ओर लगी कुर्सियों पर हम विराजमान हो गए। बिना थाली के केले के पत्ते जब हमारे सामने आए तो हम उत्तर भारतीयों के मन में दबा हुआ "परम्परा–प्रेम" कुलांचे भरने लगा। पत्तों पर चावल और उसके ऊपर दाल और बगल में "पता नहीं कौन सी सब्जी" सामने आयी तो पेट की तीव्र भूख ने मुँह में अपने आप ही स्वाद पैदा कर दिया। बगल में रखी चटनी की तो जरूरत ही महसूस नहीं हुई। भूखे शेरों के आगे अदना सा चावल भला कितनी देर टिकता। चौदह के चौदह शेर भूखे थे। दुबारा की माँग हुई लेकिन यहाँ कोई द्रौपदी की बटलोई तो थी नहीं। इतना चावल कहाँ से आता। इतनी शांतिपूर्ण जगह पर होने का कुछ तो साइड–इफेक्ट होना ही था। खाली बर्तनों की आवाज आनी शुरू हो गयी। सारा माजरा समझ में आते ही पेट की भूख और तीव्र हो गयी। मुँह का स्वाद कसैला हो गया। न चाहते हुए भी कुर्सियां छोड़कर उठना पड़ा। रात भर के भूखे आदमी को जब दोपहर में भी भरपेट भोजन न मिले तो उसके दिल का हाल फिर वही बता सकता है जिसने कभी ऐसी परिस्थिति का अनुभव किया हो। वैसे यह खाना भी 80 रूपये वाला था। ढाबा चलाने वाली महिलाएं हिन्दी नहीं जानती थीं,सो कोई बात नहीं। पर जोड़–घटाने में भी कच्ची थीं इसका तो राम ही जाने। जब हिसाब भी हमारी गणना से ऊपर बताने लगीं तो दिमाग चकरा गया। अब वो जानबूझकर ऐसा कर रही थीं या फिर अन्जाने में,ये भी राम ही जाने। ड्राइवर की दखलंदाजी के बाद मामला रफा–दफा हुआ।
अब नारियल के पेड़ पर चढ़ने का हुनर सीखा होता तो कम से कम कुछ नारियल तोड़कर उसका पानी ही पिया जाता। इस शांतिपूर्ण जगह पर नारियल के पानी से भी कलेजे को जरूर कुछ शांति मिलती। लेकिन इधर तो सारे के सारे अवगुण ही भरे पड़े हैं। घुमक्कड़ी का गुण पैदा होने के पहले बहुत सारे गुणों को जन्म ले लेना चाहिए।

मदुरई के मीनाक्षी मंदिर में फोटो खींचने की मनाही है। अतः फोटो सीमित ही हैं।









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