Friday, April 5, 2019

जय वेंकटेश्वर

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बालाजी या तिरूपति श्री वेंकटेश्वर भगवान का मन्दिर आन्ध्र प्रदेश के सुदूर दक्षिणी छोर पर बसे चित्तूर जिले के उत्तरी छोर पर अवस्थित है। तिरूपति कस्बे से सटे हुए,इसके ठीक उत्तर में पूरब से पश्चिम को फैली हुई पूर्वी घाट की पहाड़ियाँ नजर आती हैं। ये श्रृंखलाएं यहाँ से उत्तर की ओर बढ़ती जाती हैं। तिरूपति के उत्तर में सर्पाकार रूप में फैली इन पहाड़ियों के भाग को शेषाचल कहा जाता है जो आदिशेष या शेषनाग को प्रदर्शित करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार आदिशेष ने संसार को अपने हजारों फनों वाले शीर्ष पर धारण कर रखा है।
तिरूपति के सन्दर्भ में,परम्परागत रूप से माना जाता है कि आदिशेष ने अपने सात फनों पर तिरूपति की पहाड़ियों पर बसे वेंकटेश्वर को धारण कर रखा है। इस मान्यता के अनुसार आदिशेष के शरीर की कुण्डली पर अहोबाला नामक स्थान पर नरसिंह स्थित हैं जबकि उनकी मुड़ी हुई पूँछ पर कृष्णा नदी के दक्षिणी तट पर,श्रीसैलम पर्वत पर मल्लिकार्जुन निवास करते हैं। भौगोलिक रूप से ये दोनों स्थान नल्लामलाई की पहाड़ियों पर स्थित हैं।
तिरूपति पहाड़ियों की समुद्रतल से ऊँचाई 2820 फीट है जबकि इनका विस्तार लगभग 100 वर्गमील तक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी 7 प्रमुख चोटियाँ हैं जो आदिशेष के सात शीर्षाें को प्रदर्शित करती हैं। इनमें से प्रथम चार समतल चोटियों वाली पहाड़ियाँ पास–पास अवस्थित हैं जबकि शेष तीन नदियों द्वारा बनाये गये गहरे गार्जाें द्वारा अलग हो जाती हैं। इन चोटियों के नाम हैं– शेषाचल,वेदाचल,गरूड़ाचल,अंजनाचल,वृषभाचल,नारायणाचल और वेंकटाचल। इनमें से अन्तिम शीर्ष वेंकटाचल पर वेंकटेश्वर भगवान निवास करते हैं। दरअसल वेंकटगिरि पर निवास करने वाले भगवान को ही वेंकटेश्वर कहा जाता है।

ʺतिरूपतिʺ या ʺश्रीपतिपुरʺ का अर्थ है– लक्ष्‍मी के पति का नगर। और इस नगर से तात्पर्य वेंकटाचल पहाड़ी पर बसे उस गाँव से लगाया जाता है जहाँ भगवान वेंकटेश्वर का मन्दिर है। वैसे प्रशासनिक दृष्टि से यह स्थान पहाड़ी के नीचे बसे शहर तिरूपति या लोअर तिरूपति के स्थानीय प्रशासन के अंतर्गत सम्मिलित है। पहाड़ी के ऊपर बसे इस गाँव को ʺतिरूमलाʺ या ʺअपर तिरूपतिʺ नाम से भी जाना जाता है। तिरूमला में वेंकटेश्वर का मन्दिर है तो तिरूपति में गोविन्दराजा और कोदण्डराम का मन्दिर है। तिरूपति से कुछ दूरी पर तिरूचनूर में श्री पद्मावती या वेंकटेश्वर भगवान की पत्नी का एक मन्दिर बना हुआ है। तिरूपति की पहाड़ी वेंकटाचल के अलावा वेंकटाद्रि या वेंकटम के नाम से भी जानी जाती है।

वैसे वर्तमान भौगोलिक परिप्रेक्ष्‍य के अतिरिक्त कुछ पौराणिक आख्यान भी हैं।

हम जिस वर्तमान काल में रह रहे हैं,पुराणों के अनुसार वह विशद् कालगणना का एक अंश मात्र है। हमारे चार युगों– सतयुग,त्रेता,द्वापर और कलियुग को मिलाकर एक चतुर्युग कहा जाता है। ऐसे एक हजार चतुर्युग मिलकर ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं। ब्रह्मा के इस एक दिन में चौदह मनु होते हैं। यह एक मन्वन्तर ही समस्त देवगणों,इन्द्र,सप्तर्षियों,मनु और मनु के पुत्र के रूप में विभिन्न राजाओं का जीवनकाल होता है। इसी काल में इनकी रचना होती है और विनाश भी हो जाता है। इन चौदह मनुओं का काल सम्पूर्ण होने पर ब्रह्मा का एक दिन पूर्ण होता है और तत्पश्चात् ब्रह्मा की रात्रि का आरम्भ होता है। ब्रह्मा के दिन का अन्त होने पर प्रलयकाल की स्थिति उत्पन्न होती है। इस समय तीनों लोक जलमय हो जाते हैं। दिन के समान परिमाणवाली रात्रि में ब्रह्मा शयन करते हैं और उसके बीत जाने पर पुनः सृष्टि का सृजन करते हैं। इस तरह ब्रह्मा का एक दिन–रात सम्पन्न होता है। इसी तरह क्रमशः दिनों के योग से ब्रह्मा का एक वर्ष निर्मित होता है। इसी काल गणना के हिसाब से ब्रह्मा की आयु 100 वर्षाें की होती है।

वर्तमान में ब्रह्मा की सम्पूर्ण आयु का एक परार्द्ध बीत चुका है। दूसरा परार्द्ध आरम्भ हुआ है और अभी पहला दिन या प्रथम कल्प चल रहा जिसे श्वेत वाराह कल्प के नाम से जाना जाता है। इस श्वेत वाराह कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) के आरम्भ होने के पूर्व जब चारों ओर जल प्रलय का समय था,पाताल लोग के स्वामी,दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी का हरण कर पाताल लोक में रख लिया था। तब भगवान विष्णु ने श्वेत वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष का दमन किया और अपनी सींगों पर पृथ्वी को रखकर इस जल प्रलय से बाहर निकाला और शेषनाग के फन पर स्थापित किया। साथ ही वाराह ने सप्त–लोकों और सप्त–सागरों को भी स्थापित किया। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने इस पृथ्वी पर सृष्टि सृजन का कार्य आरम्भ किया।
इस तरह जल प्रलय से पृथ्वी के उद्धार के पश्चात् वाराहावतार ने पृथ्वी पर ही निवास करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने वाहन गरूड़ को वैकुण्ठ धाम से क्रीड़ाचल पर्वत को पृथ्वी पर लाने का आदेश दिया। इस पर्वत को पृथ्वी पर स्थापित करने के लिए,वाराह ने सुवर्णमुखरि या रूक्मा नदी के उत्तरी किनारे पर एक स्थान का चयन किया। इस पहाड़ी की आकृति आदिशेष के सात शीर्षाें की तरह थी। इस पहाड़ी पर वाराह ने देवताओं,ऋषि–मुनियों और भक्तगणों के साथ राजा शंख को साक्षात् दर्शन दिया और उनकी प्रार्थना के पश्चात वाराहावतार ने अपना वाराह स्वरूप त्याग कर सामान्य चतुर्भुज स्वरूप ग्रहण कर लिया। इसके पश्चात् वाराह भूदेवी के साथ इसी पहाड़ी पर रहने लगे। कालान्तर में,चन्द्रवंशी राजा आकाशराज की पुत्री पद्मावती (पद्मा या पद्मालया) के साथ वेंकटाचल पर निवास करने वाले वेंकटेश्वर का विवाह सम्पन्न हुआ। वाराह के निवास–स्थान के कारण यह पहाड़ी वाराह क्षेत्र के नाम से भी जानी जाती है।

क्रीड़ाद्रि नामक इस पहाड़ी का विभिन्न युगों में नाम परिवर्तन होता रहा। जैसे सतयुग में वृषभाचल,त्रेता में अंजनाचल,द्वापर में शेषाचल तथा कलियुग में वेंकटाचल। वर्तमान में इसी वेंकटाचल पर वाराहावतार भगवान विष्णु का निवास है। कहते हैं कि वेंकटगिरि पर भगवान के मंदिर की चारदीवारी और मुख्य गोपुरम का निर्माण तोण्डमाण नामक चन्द्रवंशी राजा ने किया था। इसके पश्चात् कई भक्त राजाओं द्वारा वेंकटेश्वर मन्दिर की प्राचीर के भीतर कई इमारतों का निर्माण कराया गया। भगवान के मुख्य विमान का निर्माण किसने किया,ये अज्ञात है। वैसे ऐतिहासिक रूप से वेंकटेश्वर मन्दिर का निर्माण सन 1417 में विजयनगर साम्राज्य के मुख्यमंत्री अमात्यशेखर मल्लना या श्री माधवदास द्वारा कराया गया। यद्यपि इसके पूर्व भी दसवीं सदी में पल्लव और चोल शासकों द्वारा कुछ निर्माण किये जाने के उल्लेख मिलते हैं लेकिन मन्दिर का वर्तमान स्वरूप विजयनगर साम्राज्य के अन्तर्गत ही विकसित हुआ। विजयनगर के प्रसिद्ध शासक कृष्णदेवराय ने 1517 मन्दिर के गर्भगृह अर्थात आनन्द निलयम के निर्माण के लिए पर्याप्त धन दिया।

वेंकटेश्वर मन्दिर द्रविड़ शैली में बना है। गोपुरम या प्रवेशद्वार,प्राकारम या प्राचीर,प्रदक्षिणाम या प्रदक्षिणापथ और गर्भगृह मन्दिर के प्रमुख भाग हैं। वाराहस्वामी मन्दिर पूर्वाभिमुख है जिसके पास स्वामी पुष्करिणी तालाब भी है। तालाब,द्रविड़ शैली के मन्दिरों का महत्वपूर्ण भाग होता है। मंदिर के तीन गोपुरम या प्रवेशद्वार हैं। मुख्य प्रवेशद्वार को महाद्वारम कहा जाता है जो पाँच मंजिला है और 50 फीट ऊँचा है। मुख्य प्रवेश द्वार भी तीन क्रमिक प्रवेश द्वारों से मिलकर बना है। सबसे बाहरी प्रवेशद्वार कांस्यद्वार है। इसके बाद एक प्रदक्षिणापथ है जिसे सम्पांगीप्रदक्षिणाम कहा जाता है। तत्पश्चात रजतद्वार है जिसके बाद मुख्य प्रदक्षिणापथ है जिसे विमान प्रदक्षिणाम कहा जाता है। अंत में स्वर्णद्वार है जो गर्भगृह का प्रवेशद्वार है। मन्दिर का गर्भगृह आनन्द निलयम के नाम से जाना जाता है। मन्दिर के गर्भगृह और अन्य भागों में मुख्य आराध्य वेंकटेश्वर भगवान के अतिरिक्त अन्य देवताओं के मण्डपम बने हुए हैं।
वेंकटेश्वर मंदिर के बारे में एक और तथ्य ये कि यह भारत का सर्वाधिक दर्शनार्थियों वाला मंदिर है। जबकि आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर के बाद इसका दूसरा स्थान है।





अगला भाग ः तिरूमला टु मदुरई

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. जब मैं उड़ चला
2. बालाजी दर्शन
3. जय वेंकटेश्वर
4. तिरूमला टु मदुरई
5. मदुरई
6. रामेश्वरम
7. कन्याकुमारी
8. महाबलिपुरम

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