Friday, April 26, 2019

रामेश्वरम

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सुबह के 10 बजे मदुरई से चलने के बाद हम चलते ही रहे। 2 बजे तक हम 165 किमी की दूरी तय कर भारत की मुख्य भूमि को छोड़कर,पंबन ब्रिज पर पहुँच चुके थे। चारों तरफ पानी ही पानी देखकर गाड़ी रोकी गयी। समु्द्र को हनुमान की तरह लांघता पुल रोमांच पैदा कर रहा था। वैसे पुल से गुजरते हुए यह कतई महसूस नहीं हो रहा था कि हम समुद्र के ऊपर से गुजर रहे हैं। खट्टे–मीठे अनन्नास की फांके खाते हुए इस पुल पर टहलना और फोटो खींचना कितना आनन्ददायक है,यह यहाँ पहुॅंच कर ही जाना जा सकता है। गाड़ी का ड्राइवर लाख शोर मचाये,हम तो अपनी वाली ही करेंगे।
ऐसी जगह खड़े होने पर,जहाँ दोनों ओर सागर का पानी ही पानी दिख रहा हो,प्रकृति अपनी सर्वशक्तिमानता का आभास तो करा ही देती है।
पंबन ब्रिज से हमें अभी और आगे जाना था। उस अंतिम छोर तक,जहाँ कभी त्रेतायुग में भारत के उस महापुरूष ने,जो आज भी हमारा आदर्श है,पत्थरों के सेतु का निर्माण किया था– अर्थात धनुषकोडि। रामेश्वरम से लगभग 20 किमी आगे। ड्राइवर जल्दी करने की जिद लगाए हुए था लेकिन इधर तो आँखें थी कि तृप्त ही नहीं हो रही थीं। पंबन ब्रिज देश का एकमात्र ऐसा पुल है जो समुद्र से गुजरने वाले जहाजों को रास्ता देने के लिए खुल जाता है। यह रामेश्वरम को शेष भारत से जोड़ता है। इसका निर्माण 1914 में हुआ था। पंबन ब्रिज पार करने के बाद हम रामेश्वरम पहुँचे। रामेश्वरम एक छोटा सा द्वीप है जो तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में पड़ता है। भूगर्भिक इतिहास में यह द्वीप पहले भारत की मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ था। बाद में भूगर्भिक हलचलों एवं सागर की लहरों ने इसे काटकर मुख्य भूमि से अलग कर दिया। वैसे रामेश्वरम या धनुषकोडि पहुँचने से पहले हमारा ड्राइवर हमें रामेश्वरम द्वीप के पश्चिमी कोने में बने विवेकानन्द मेमोरियल हाउस में ले गया। यह समुद्र के किनारे बिल्कुल एकांत में बना एक सु्ंदर स्मारक है जिसके आस–पास फुर्सत के कुछ पल गुजारे जा सकते हैं। थोड़ी देर यहाँ मस्ती करने के बाद हम आगे बढ़े। कुछ ही देर में रामेश्वरम को पार करके हम धनुषकोडि की ओर निकल पड़े। रामेश्वरम द्वीप पार करने के बाद तो लग रहा था कि जैसे हम समु्द्र के बीच में चल रहे हैं। समुद्र ने बस सड़क बनाने और उसके दोनों किनारे झोपड़ियों में दुकानें सजाने भर की जगह छोड़ रखी है। रोमांचक दृश्य है। रामेश्वरम से धनुषकोडि के उस अंतिम छोर तक सड़क मानो समुद्र में धँसती चली गयी है। नदियों के संगम को देखते आये मेरे जैसे आदमी के लिए बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर के संगम को बिल्कुल संगम के किनारे खड़े होकर आँखों के सामने देखना वास्तव में अत्यधिक रोमांचक था।
कहते हैं कि लंका पर आक्रमण के समय समुद्र पर पुल बाँधने के लिए भगवान राम ने अपने धनुष की कोटि (नोक) से इस स्थान की ओर इशारा किया था। इसी कारण इसे ʺधनुष कोटिʺ कहा जाता है। वैसे इस सम्बन्ध में एक और बात भी कही जाती है। लंका विजय के पश्चात् विभीषण ने भगवान राम से समुद्र पर बने पुल के दुरूपयाेग की आशंका व्यक्त की। राम ने अपने धनुष से उस सेतु को तोड़ डाला। इस कारण इस स्थान को धनुषकाेटि कहा गया। वैसे इस स्थान का नाम पड़ने के पीछे जो भी कारण हों,समु्द्र के अन्दर लगभग 30 किमी की लम्बाई में किसी सेतु जैसी चीज के अवशेष आज भी दिखायी पड़ते हैं।

इन सबसे अलग एक और दृश्य भी सामने था। हमारे कुछ साथी सब कुछ छोड़कर इसी दृश्य को देख रहे थे। सड़क किनारे झोपड़ियों में बनी दुकानों में समुद्र से पकड़ी गयीं मछलियां तली जा रही थीं। अब आँखों के सामने ऐसा दृश्य भला किससे सहन होगा। वैसे मैं इन शुभ कार्याें से दूर ही रहता हूँ। तय यह हुआ कि धनुषकोडि से लौटकर ʺडिनरʺ यहीं किया जायेगा। तो हम धनुषकोडि की ओर बढ़ते गए। तली हुई मछलियों के अलावा समुद्री उत्पादों जैसे शंख व मोतियों की कच्ची दुकानों की भी भरमार दिख रही थी। अब यहाँ बिक रहे सामान असली हैं या नकली,यह तो कोई विशेषज्ञ ही बता पायेगा। हाँ,बेवकूफ बनने के लिए हमारे जैसे लोग चले ही आते हैं।
कहीं इधर–उधर मुड़ना नहीं था। कहीं इधर–उधर देखना नहीं था। बस उधर ही चलते जाना था जिधर सड़क सीधी चलती जाती है। र फिर एक जगह सड़क बिल्कुल खत्म हो गयी। मजबूर होकर बस रोकनी पड़ी। यह धनुषकाेडि है। भारत की अंतिम सीमा। पहचान के रूप में भारत सरकार का चिह्न एक स्तम्भ पर लगा हुआ है। जिसके चारों ओर सड़क बनी हुई है। लोग–बाग इसकी परिक्रमा कर लौट आते हैं। शाम के चार बज रहे थे। चारों तरफ फैली अथाह जलराशि हमें हमारी लघुता का एहसास करा रही थी। कुछ और लोग भी समुद्र के किनारे उछल–कूद मचा रहे थे। लेकिन चाहते हुए भी समुद्र के अन्दर जाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। कारण था बोर्ड पर लिखी चेतावनी। इस चेतावनी के अनुसार यहाँ के समुद्र तट पर शार्क मछलियों की उपस्थिति है जो मनुष्यों की जान भी ले सकती हैं। इसलिए धनुषकोडि के समुद्र तट पर समुद्र में नहाने की मनाही है। वैसे धनुषकोडि के समुद्री किनारों पर बिछी लाल बालू और बिखरे पत्थरों पर बैठकर अनन्त और असीम महासागर को निहारना अपने आप में सबसे बड़ा आनन्द है,चिन्तन है,दर्शन है। मौके पर मोबाइल नेटवर्क शार्क मछलियों की तरह ही गायब हो चुका था।
यहाँ केवल समुद्र का पानी ही पानी है चारों तरफ। किनारों पर बालू है या फिर बड़ी–बड़ी चट्टानें। आस–पास न तो बाजार है न कोई दुकान। हाँ एक साइकिल पर एक दुकान अवश्य खड़ी थी। तो साइकिल पर लगी दुकान पर चाय और पकौड़ियां खाने के बाद हम वापस लौटे तो तली हुई मछलियां हमारा इन्तजार करते–करते थक कर लौट चुकी थीं। अलबत्ता शंख और मोती जरूर हमारा इन्तजार कर रहे थे। वजह यह थी कि पाँच बजे के उपरान्त,एक सीमा के बाद धनुषकाेडि का रास्ता सुरक्षा के दृष्टिकोण से बन्द कर दिया जाता है। तो इस सीमा के बाद बनी मछलियों की दुकानें भी बन्द हो रही थीं। दो दुकानों पर खोजबीन करने के बाद काम भर की मछलियां मिल सकीं। समूह के अधिकांश लोग बस से नीचे उतरकर मछलियों पर लार टपका रहे थे। काफी जोड़–घटाना करने के बाद मछली–चावल का संयाेग बैठ गया। दावत शुरू हो गयी। कुछ लोग मेरी श्रेणी के भी थे जो बस में ही बैठे–बैठे खिड़कियों से,मछलियों को चबाते,मांसभक्षी प्राणियों को कातर निगाहों से देख रहे थे।

रामेश्वरम से धनुषकोडि जाते और आते समय सड़क से कुछ दूर कुछ खण्डहर दिखायी पड़ते हैं। इन खण्डहरों के आस–पास मछुआरों की झोपड़ियाँ दिखायी पड़ती हैं। ये खण्डहर पुराने धनुषकोडि कस्बे के हैं। यहाँ कभी तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की आवश्यकता और सुविधा के लिए एक शहर बसा हुआ था। बात उस जमाने की है जब रामेश्वरम एक छोटा सा गाँव हुआ करता था और धनुषकोडि तक रेल लाइन जाती थी। 22 दिसम्बर 1964 में आये एक समुद्री तूफान ने धनुषकोडि कस्बे का नामोनिशान ही मिटा दिया। यहाँ तक कि रामेश्वरम से धनुषकोडि की ओर जा रही पैसेन्जर ट्रेन भी लगभग 100 यात्रियों और रेलवे के स्टाफ के साथ तूफान की भेंट चढ़ गयी। हजारों लोग इस आपदा में मारे गये जिनकी स्मृति में एक छोटा सा एक स्मारक भी बना हुआ है। इस तूफान द्वारा मचायी गयी बरबादी के चिह्न आज भी इस जगह दिखायी देते हैं। वर्तमान में अवशेष खण्डहर इस स्थान को भुतहे की श्रेणी में रखने के लिए काफी हैं। इस तूफान ने पंबन पुल को भी हिला दिया था जिसकी मरम्मत बाद में इंजीनियर श्रीधरन की टीम ने किया। रामेश्वरम से धनुषकोडि लगभग 20 किमी की दूरी पर है जबकि धनुषकोडि से श्रीलंका के तलैमन्नार की दूरी 30 किमी है। धनुषकाेडि और तलैमन्नार के मध्य छ्छिले समुद्र के नीचे चट्टानों और टापुओं की एक प्राचीन लहरदार श्रृंखला के अवशेष पाये जाते हैं। इसे ही रामसेतु कहा जाता है। अंग्रेजों के समय में चेन्नई के ʺमद्रास–एग्मोरʺ से धनुषकोडि तक बोट मेल नाम से रेल चलती थी। उस समय रेल लाइन रामेश्वरम होकर नहीं जाती थी वरन भारत की मुख्य भूमि पर बने स्टेशन मण्डपम के बाद पंबन ब्रिज होते हुए धनुषकोडि चली जाती थी। उस समय लोग धनुषकोडि तक रेल से आकर नावों के सहारे तलैमन्नार तक चले जाते थे लेकिन तूफान के बाद यह सिलसिला खत्म हो गया। कहते हैं कि 1897 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेकर लौटने पर स्वामी विवेकानन्द भी धनुषकाेडि में ही उतरे थे। रामेश्वरम से धनुषकोडि तक जाने के लिए कोई सार्वजनिक वाहन उपलब्ध नहीं है। इस लिए ऑटो वाले मनमर्जी किराया वसूलते हैं। चूँकि हमारे पास रिजर्व गाड़ी थी तो कोई समस्या नहीं थी।

धनुषकोटि से लौटकर शाम के 6 बजे रामेश्वरम में कमरा लिया गया। लेकिन मेरे पाँवों का सनीचर मुझे शान्ति से रहने नहीं देता। टीम के अधिकांश बुद्धिमान सदस्य तो आराम के मूड में थे लेकिन मैं अपने जैसे ही कुछ मित्रों के साथ रामेश्वरम की सड़कों पर निकल पड़ा। शाम का समय था तो लक्ष्‍य सीधा सा था और वह था ʺरामनाथस्वामीʺ मंदिर या रामेश्वरम मंदिर। मंदिर के अंदर अँधेरा होना शुरू हो गया था तो रामेश्वरम मंदिर के विश्वप्रसिद्ध गलियारों में लाइटें जल उठीं थीं। दीवारों पर बनी आकृतियां जगमगा रही थीं। और चित्राें में देखे जाने वाले दृश्य आज हमारी आँखों के सामने साकार हो उठे थे। सारे गलियारों में चक्कर लगाते हुए हमने दर्शन किये। बाहर निकलकर रामेश्वरम के स्नान घाट अग्नितीर्थम तक गये। वापस लौटने में 8.30 बज गये। रामेश्वरम में रहने और खाने के विकल्प इतने हैं कि शायद ही किसी को शिकायत का मौका मिले। अधिकांश लोगों के पेट में तो मछलियां तैर रही थीं तो कुछ ही लोग बचे थे जिन्हें रामेश्वरम की 80 रूपये वाली थालियों का स्वाद लेने का अवसर मिला। चेन्नई,तिरूमला और मदुरई के दक्षिण भारतीय भोजन के बाद आज के दिन रामेश्वरम के उत्तर भारतीय भोजन से मन संतृप्त हुआ।

कहते हैं कि काशी की यात्रा तभी सफल होती है जब धनुषकाेडि में स्नान और रामेश्वरम में पूजा की जाय। रामेश्वरम भी उतना ही पुराना है जितना कि रामायण। भगवान राम ने जब रावण का बध किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा। ऋषियों की सलाह के अनुसार राम ने ब्रह्महत्या से मुक्त होने के लिए शिवलिंग की स्थापना का निश्चय किया। उपयुक्त शिवलिंग की खोज में हनुमान जी को कैलाश पर्वत भेजा गया। इधर उन्हें लौटने में देर होने लगी जिससे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को निर्धारित शिवलिंग की स्थापना का मुहूर्त बीतने लगा। तब माता सीता ने समुद्र के किनारे रेत से ही एक शिवलिंग बना दिया और उसी की स्थापना कर दी गयी। हनुमान जब लौटे तो यह देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्हें दुःखी देखकर प्रभु श्रीराम ने हनुमान द्वारा लाये शिवलिंग को भी पास में ही स्थापित कर दिया। इस तरह हनुमान जी द्वारा लाये गये शिवलिंग को हनुमदीश्वर या विश्वलिंगम कहा जाता है जबकि पूर्व में स्थापित रेत के शिवलिंग को रामनाथस्वामी कहा जाता है। प्रभु राम के आदेशानुसार हनुमान द्वारा स्थापित लिंग की पूजा पहले की जाती है। ये दोनों शिवलिंग आज भी रामनास्‍वामी के मुख्य मंदिर में स्थापित हैं। रामनास्‍वामी मंदिर में स्थापित शिवलिंग भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है जबकि यह मंदिर भारत के चार धामों में से एक है।
रामेश्वरम या रामनस्‍वामी मंदिर दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम प्राचीन है। ऐतिहासिक साक्ष्‍यों के अनुसार रामनस्‍वामी मंदिर के गर्भगृह का निर्माण श्रीलंका के राजा पराक्रमबाहु ने कराया था। इस गर्भगृह का धीरे–धीरे विस्तार होकर मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है। 15वीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति ने इसके गोपुरम का निर्माण कराया। इसी काल में नंदी मण्डप का भी निर्माण भी किया गया। बाद में 18वीं,19वीं,तथा 20वीं शताब्दियों में भी कई स्थानीय राजाओं और व्यापारियों ने इस मंदिर के अन्य भागों का निर्माण कराया।
रामनाथस्वामी मंदिर पूर्व–पश्चिम में 865 फीट की लम्बाई और उत्तर–दक्षिण में 657 फीट की चौड़ाई में विस्तृत है। मंदिर के चारों तरफ गोपुरम या प्रवेश द्वार बने हुए हैं जिनमें से पूर्व और पश्चिम के गोपुरम काफी ऊँचे बने हुए हैं जबकि उत्तर और दक्षिण के गोपुरम अधूरे हैं। मंदिर के चारों तरफ 22 फीट ऊँची चारदीवारी बनी हुई है। मुख्य मंदिर 120 फीट ऊँचा है। गर्भगृह की परिक्रमा के लिए चारों ओर त्रिस्तरीय प्राकार या गलियारे बने हुए हैं। इन गलियारों के दोनों ओर 5 फीट ऊँचे चबूतरे पर बरामदे बने हुए हैं जिनकी चौड़ाई 8 फीट है। इन बरामदों में पत्थर के सुंदर स्तम्भ बने हुए हैं जो दर्शनीय हैं। तीसरा प्राकार या सबसे बाहरी गलियारा अपनी लम्बाई के लिए विश्व प्रसिद्ध है। तीसरे गलियारे की उत्तर–दक्षिण की लम्बाई 640 फीट तथा पूर्व–पश्चिम की लम्बाई 400 फीट है। भीतरी गलियारा पूर्व–पश्चिम की ओर 224 फीट जबकि उत्तर–दक्षिण की ओर 352 फीट लम्बा है। इन गलियारों की चौड़ाई 14.5 से 17 फीट तक है। मंदिर के सारे गलियारों की लम्बई 3850 फीट है जिसमें 1212 स्तम्भ बने हुए हैं। मंदिर परिसर के अन्दर 24 कुण्डों का निर्माण कराया गया है जिन्हें तीर्थ कहा जाता है। इन कुण्डों का जल मीठा है जिनमें विभिन्न तीर्थाें का जल लाकर छोड़ा गया है।
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यात्रा का पाँचवाँ दिन। सुबह के समय सबके साथ फिर से रामेश्वरम मंदिर में दर्शन करना था। समय इतना नहीं था कि पूरा रामेश्वर घूम पाते क्योंकि शाम को कन्याकुमारी में सनसेट देखना था। तो भागते हुए एक नये तीर्थ का दर्शन करने पहुँचे। यह नया तीर्थ है भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ0 ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का घर। कलाम साहब के घर की सबसे निचली मंजिल उनके परिवारीजन का निवास है जबकि उसके ऊपर की मंजिल को म्यूजियम बना दिया गया है। इस म्यूजियम में कलाम साहब और उनके जीवन से संबंधित वस्तुओं और कार्याें को प्रदर्शित किया गया है। तीसरी मंजिल पर समुद्री उत्पादों की दुकान सजाई गयी है। इस दुकान को डॉ. कलाम के भाई या भतीजे संचालित करते हैं।
तो ड्राइवर के आदेशानुसार खाना खाने के बाद हम तेजी से होटल पहुँचे और 11.30 बजे कन्याकुमारी के लिए रवाना हाे गये।

पंबन ब्रिज
पंबन ब्रिज के पास शान्त समुद्र

विवेकानन्द मेमाेरियल हाउस के पास

धनुषकोडि के अंतिम छोर पर भारत सरकार का चिह्न








रामनास्‍वामी मंदिर का गोपुरम



अगला भाग ः कन्याकुमारी

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. जब मैं उड़ चला
2. बालाजी दर्शन
3. जय वेंकटेश्वर
4. तिरूमला टु मदुरई
5. मदुरई
6. रामेश्वरम
7. कन्याकुमारी
8. महाबलिपुरम

4 comments:

  1. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी ब्लॉग पर आने के लिए। आगे भी आते रहिए।

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  2. रोचक यात्रा वृत्तांत...

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    1. धन्यवाद,ब्लॉग पर आने के लिए। आगे भी उत्साहवर्धन करते रहिए।

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