Friday, March 29, 2019

बालाजी दर्शन

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हमारी यात्रा का अगला चरण था रात के 11.55 बजे चेन्नई सेंट्रल से मुम्बई मेल द्वारा तिरूपति के पास रेनीगुंटा पहुँचना। लेकिन उसके पहले एयरपोर्ट से चेन्नई सेंट्रल स्टेशन पहुँचकर पेट–पूजा करनी थी। क्योंकि जितनी देर प्लेन चलता रहा,हर समय मुँह चलाने वाली भेड़–बकरियों का मुँह बन्द ही रहा। तो अब हमने मेट्रो की सहायता ली और 70 रूपये का किराया चुकाकर चेन्नई एयरपोर्ट से चेन्नई सेंट्रल पहुँच गये। मेट्रो 7.50 पर हवाई अड्डे से चलकर 8.30 पर चेन्नई सेन्ट्रल पहुँची। मेट्रो ट्रेन भी हमारे स्वागत के लिए खुले दिल से तैयार बैठी थी क्योंकि इसकी दो तिहाई से भी अधिक सीटें खाली थीं।
वैसे हवाई अड्डे से अपना बैग इकट्ठा लेेने और मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में भी काफी समय लगा। क्योंकि हवाई अड्डे में बेल्ट पर भागते हमारे बैग हमें चकमा दे रहे थे।
चेन्नई सेन्ट्रल पहुँचे तो भोजन की समस्या उत्पन्न हुई। सीधे–सीधे चावल–दाल–सब्जी खाने वाले जीवों को जटिल नामों व रंग–रूप वाले भोजन के ऑफर मिल रहे थे। शुद्ध दक्षिण भारतीय भोजन से पहली बार साबका पड़ा था। फिर भी यात्रा करनी थी तो खाना तो खाना ही था। चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के दाहिनी तरफ से गुजरने वाली सड़क के किनारे एक रेस्टोरण्ट पसंद किया गया। रोटी,पनीर और दाल फ्राई के आर्डर दिये गये लेकिन जब सामने प्लेटें आयीं तो दिमाग चकरा गया। प्लेटों में उन्हीं के आकार के केले के पत्ते रखे गये थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें शाकाहारी समझ कर यह केले के पत्ते ही खिलायेगाǃ लेकिन शायद नहीं। यही तो दक्षिण भारतीय परंपरा है। हमारे यहाँ भी केले के पत्ते या पलाश के पत्तों से बनी पत्तलों में खाना खाने की परम्परा रही है जो अब क्रमशः लुप्त हाेती जा रही है।
खाना सामने आया तो बाकी सब तो ठीक लगा लेकिन मैदे की बनी रोटियां,जिन्हें परांठे की तरह संभवतः नारियल का तेल लगाकर पकाया गया था,हमें अच्छी नहीं लगीं। तो तंदूरी रोटियों की मांग की गयी। भोजन पूरी तरह जीभ के अनुसार तो नहीं लेकिन पेट के अनुसार हो गया। पूरे झुण्ड का भोजन होने में लगभग 11 बज गये। इस बीच रेनीगुंटा की तरफ जाने वाली मुंबई मेल भी प्लेटफार्म पर आ लगी। हमारी सारी सीटें थीं तो एक ही बोगी में लेकिन इधर–उधर। फिर भी पूरी बोगी की बीस प्रतिशत तो हमारी ही थीं। दक्षिण भारत की ट्रेन– ʺबिल्कुल समय से चली।ʺ डर भी लगा कि कहीं यह रेनीगुंटा भी बिल्कुल समय से पहुँची और पूरा झुण्ड सोता रह गया तो लगे हाथ मुंबई की भी यात्रा हो जायेगी। ट्रेन का समय 2.35 पर था तो सबने अपनी–अपनी समझ के अनुसार दो बजे,सवा दो बजे या ढाई बजे का अलार्म लगा लिया। पर ट्रेन भी जिद्दी ही निकली। कुछ मिनट पहले ही रेनीगुंटा पहुँच गयी।

ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म से लगे हुए एक छोटे से वेटिंग हॉल में हमारे बेडशीट धड़ाधड़ बिछने लगे। अब अलार्म लगाकर सोने की कोई जरूरत नहीं थी। कम से कम तीन–चार घण्टे तक सोने का समय तो था ही। सुबह उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद हमने तिरूपति जाने के विकल्पों पर विचार किया। रेनीगुंटा से तिरूपति के लिये कई पैसेंजर ट्रेनें जाने वाली थीं लेकिन हमें तत्काल ही तिरूमला जाना था और वहाँ कोई ट्रेन जाती नहीं। फिर हमने सड़क मार्ग से ही जाने का निश्चय किया और स्टेशन से बाहर निकल गये। स्टेशन से निकलने के बाद वही "फर्रूखाबादी खेल" शुरू हुआ जो हमेशा से होता आया है। प्राइवेट गाड़ी वालों ने हमें मूर्ख बनाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन जो पहले से ही मूर्ख हो उसे भला कोई क्या मूर्ख बनायेगा। हमने स्थानीय परिवहन सेवा की बस पकड़ी जो तुलनात्मक रूप से किसी भी निजी साधन से सस्ती और आरामदायक थी।
रेनीगुंटा से तिरूपति की दूरी लगभग 10 किमी तथा वहाँ से तिरूमला की दूरी लगभग 20 किमी है। कुल तीस किमी की दूरी तय कर हम लगभग 9 बजे तिरूमला पहुँच गये। तिरूमला एक 976 मीटर या 3200 फीट की ऊँची पहाड़ी पर बसा है। उतनी ऊँचाई है तो चढ़ाई वाला रास्ता भी है और रास्ते में बहुत सारे मोड़ भी हैं। तिरूमला की चढ़ाई से पहले एक चेक–पोस्ट पर चेकिंग होती है। इस चेक–पोस्ट पर जब बस रूकी तो कुछ लड़के बस में चढ़ गये जिन्हें तिरूमला जाना था और पीछे की खाली सीटों पर बैठ गये। अब किस मक्सद से जाना था ये नहीं पता। नीचे से तिरूमला जाने और ऊपर से नीचे आने के रास्ते अलग–अलग हैं। सो ड्राइवर पूरी उड़ान भरने के लिए आज़ाद था। अब बस मोड़ों पर भी पूरी गति से कुलांचे भरने लगी। नतीजा यह हुआ कि ऊपर के रैक में रखे हुए हमारे बैग झूला झूलने लगे और हमारे ऊपर गिरने लगे। पीछे बैठे लड़के बस के चलने की लय और बैग्स के झूलने की ताल के साथ मुँह से "हे....." की आवाज निकालते हुए ताल से ताल मिलाने लगे। बस में हँसी की महफिल जम गयी। अंत में परेशान होकर कंडक्टर को उन लड़कों को डाँटकर चुप कराना पड़ा।

खैर किसी तरह तिरूमला पहुँचकर जब हम बस स्टेशन से बाहर निकले तो एक ट्रैवल एजेण्ट ने जोरदार हमला किया। इतना बड़ा झुण्ड किसी की निगाह में भी आसानी से आ सकता है। और इस झुण्ड को भी रामेश्वरम,कन्याकुमारी,मदुरई वगैरह–वगैरह घूमना ही था। वैसे उसके हमले को निष्क्रिय करते हुए हमने पहले तो सर्वदर्शन के लिये काउण्टर से पंजीकरण कराया और फिर वहीं पास में कमरे के लिये भी बुकिंग करायी। जब पता चला कि कमरे केवल 50 या 100 रूपये में ही मिल रहे हैं तो हमने 6 कमरे की बुकिंग करा ली। केवल आधार कार्ड की जरूरत थी जो हमारे पास पर्याप्त संख्या में थे। मात्र 50 रूपये की फीस में हमें इतने बड़े–बड़े कमरे मिले कि हमने सपने में भी नहीं सोचा था। वैसे हमारी इस मुफ्तखोरी से शायद भगवान वेंकटेश्वर भी कुछ–कुछ नाराज से हो गये क्योंकि एक मित्र के पास से एक पर्ची खो गयी और अब हमारे पास पाँच कमरों की पर्चियाँ ही थीं। 14 लोगों के लिए पाँच कमरे कम नहीं थे और हमने छठीं पर्ची खोजने की जहमत नहीं उठाई।
एक बात और वो ये कि अब हमें नहा–धो कर भगवान वेंकटेश के दर्शन करने थे। अनुमान था कि दर्शन करने में शाम हो जायेगी। तो भगवान की पूजा के पहले कुछ पेट–पूजा भी आवश्यक थी। रजिस्ट्रेशन ऑफिस के पास ही कुछ चाय–नाश्ते की दुकानें हैं जहाँ रंग–बिरंगे कई तरह के चावल मिल रहे थे। कुछ लोग दर्शन के पहले कुछ भी खाने के इच्छुक नहीं थे। लेकिन मैं इतना धार्मिक कभी नहीं रहा। भगवान कभी नहीं चाहेंगे कि उनका भक्त उनके दर्शन के लिए सुबह से शाम तक भूख से छटपटाता रहे। कई लोग खाना खाने के लिए तैयार हो गये। घोषणा कर दी गयी– जिसकी जो इच्छा हो खा सकता है। तो फिर मैंने भी बड़ा,साँभर और नारियल की चटनी का भोग लगा दिया।
तिरूमला में ट्रस्ट के द्वारा तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बहुत सी इमारतें बनवायी गयी हैं जिन्हें पहचान के लिए नम्बर दिये गये हैं। ये इमारतें भरसक दुमंजिली हैं। प्रत्येक इमारत में छः–छः कमरे हैं,जिन्हें अंग्रेजी के A से F अक्षरों द्वारा चिह्नांकित किया गया है। बहुत सी इमारतों के समूह को भी कुछ खास कोड के रूप में नाम दिया गया है। किसी तीर्थस्थान पर,तीर्थयात्रियों की सहूलियत के लिए ऐसी व्यवस्था मैं पहली बार देख रहा था। हमारे साथ थोड़ी सी गड़बड़ यह हो गयी कि हमारे कमरे,इमारतों के एक समूह में न होकर कई जगहों पर अलग–अलग मिल गये और हमारा झुण्ड बिखर गया।

अब मैं अपने दो मित्रों के साथ एक कमरे की पर्ची लेकर नम्बर ढूँढ़ता हुआ अपने कमरे तक पहुँचा। साढ़े दस बज रहे थे। एक महिला सफाईकर्मी मिली जिसने कमरे की चाभी दी लेकिन हमारी पर्ची देखते ही वह भड़क गयी और हमें कमरे से बाहर कर दिया और "सिक्का–सिक्का" चिल्लाने लगी।
हमारी जान साँसत में पड़ गयी। अब ये सिक्का कौन सी बला हैǃ
पता चला कि इमारतों के हर अलग–अलग समूह का अपना कार्यालय है जहाँ इस पर्ची पर मुहर लगायी जाती है,जो हमने नहीं लगवायी थी। वह महिला कर्मचारी मुहर को ही सिक्का चिल्ला रही थी। हम फिर भागते हुए सिक्का लगवाने आए और तब हमें कमरा मिल सका।
अब आगे का हमारा कार्यक्रम सीधे–सीधे एक सूत्रीय था– भगवान वेंकटेश के दर्शन करना। दर्शन के लिए कुछ लोगों ने सफेद शर्ट,लुंगी और गमछा भी खरीदा। मैंने सदाबहार जींस धारण किया। दर्शन के लिए निकलते समय सभी का आपस में संपर्क नहीं हो सका और हमारा पूरा समूह तीन भागों में बँट गया। मैं सबसे बड़े छः लोगों के समूह में था। बस स्टैण्ड के पास खड़े,छोटी गाड़ियों वाले बीस रूपये किराया लेकर वहाँ पहुँचा रहे थे जहाँ लाइन लगानी थी। वैसे हमने बहुत अधिक दिमाग नहीं लगाया और सीधे–सीधे रास्ता पूछते हुए मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुँच गये। मंदिर पहुँच कर लगा कि हम मूर्ख बन गये हैं। कारण कि वहाँ लाइन तो दिखाई पड़ रही थी लेकिन ऐसी किसी लाइन की पूँछ नहीं दिखायी पड़ रही थी जिसे हम पकड़ सकें। एक गेट से कुछ लोगों को अन्दर प्रवेश कराया जा रहा था तो हम वहाँ पहुँच गये। लेकिन हमें बड़ी बेरहमी से वहाँ से भगा दिया गया। पता चला कि ये विशेष दर्शन वाले लोग हैं। हम लोग सर्व दर्शन वाले थे। भगवान की इस लीला पर बहुत दुःख हुआ। फिर भी दर्शन तो करने ही थे। अब बारी भटकने की थी। लगभग आधे घण्टे तक हम रास्ता पूछते और भटकते हुए चलते रहे और तब जाकर हमेें लाइन की पूँछ मिल सकी। कुछ देर चलने के बाद लाइन को एक बड़े हॉल में प्रवेश मिला जहाँ लड्डू के लिए कूपन मिल रहे थे–
"20 के दो लड्डूʺ,
ʺ70 के चार।"
यहाँ तो सारा व्यवहार गणित ही गड़बड़ा गया।
पता चला कि दो लड्डू पर ट्रस्ट की ओर से सब्सिडी दी जाती है। चार लड्डू पर कोई छूट नहीं है। चार से अधिक लड्डू पर अतिरिक्त शुल्क वसूल किया जाता है। हाॅल में निःशुल्क दूध मिल रहा था तो इसमें हम भला कहाँ चूकने वाले थे। पता नहीं हमारे समूह से बिछड़ गए और व्रत रहने वाले साथियों को कुछ मिला या नहीं। फिर लम्बी गैलरियों को पार करने के बाद हम एक बड़े हॉल में पहुँचे जहाँ दर्शन के लिए प्रतीक्षारत सारे दर्शनार्थियों को बैठाया गया था। भगवान वेंकटेश की कृपा से यहाँ हमारे पाँच साथियों का एक और समूह मिल गया। तिरूमला में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऐसे बहुत सारे हॉल बनाये गये हैं। हॉल में काफी देर इंतजार के बाद आगे जाने वाला गेट खुला और हाॅल में भगदड़ मच गयी। इसके बाद भी बहुत देर तक लाइन में लगे रहने और जाँच पड़ताल के बाद दर्शन का अवसर मिला और अपने आराध्य के बहुप्रतीक्षित दर्शन के बाद हम भी कृतार्थ हुए।
लाइन में लगे हुए जब मंदिर की ओर बढ़ रहे थे उस समय मंदिर के आस–पास के प्रांगण का नजारा बहुत ही मनमोहक था। एक जैसी ड्रेस में पुरूषों और महिलाओं के कई समूह डांडिया और अन्य भाँति–भाँति की गतिविधियाँ और नृत्य प्रस्तुत कर रहे थे। कुछ विशेष उत्सव था या फिर हमेशा ही ये आयोजन होता है–हमें पता नहीं चला सका। पास में मोबाइल भी नहीं थी कि फोटो खींची जा सके। मन को "फिर कभी" का आश्वासन देते हुए हम दर्शन करने के बाद बाहर निकल गए।
रात भर के जगे–जगे और दिन भर के खड़े–खड़े,काफी थकान हो चुकी थी। दिमाग ने सोचना बन्द कर दिया था। फिर भी पैर मान नहीं रहे थे। कुछ लोगों को कुछ खरीदारी भी करनी थी। तो एक बार फिर से तिरूमला के रौनक भरे बाजार में टहलते हुए हमने एक चक्कर लगाया। कम से इतना तो चल ही लिया कि पेट ने गुहार लगानी शुरू कर दी। तो फिर से प्रस्ताव यही पास हुआ कि सुबह जिन "तुरंता रसतुरंतों" में नाश्ता किया गया था,वहीं डिनर भी होगा। (ये "रसतुरंत" रेस्टोरेण्ट का हिन्दी अनुवाद है,इसलिए भ्रमित न हों।)







अगला भाग ः जय वेंकटेश्वर

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