Friday, April 12, 2019

तिरूमला टु मदुरई

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आज यात्रा का तीसरा दिन था। कल शाम के समय जब हम भगवान वेंकटेश के दर्शन कर कमरे लौटे तो एक और घटना हुई। और वो ये कि आगे की ʺयात्राʺ करने वाले ʺयात्रियोंʺ के लिए "ट्रैवलर" गाड़ी की बुकिंग की गयी। तिरूमला के सीमित दायरे में ट्रैवेल एजेंट भी संभवतः सीमित ही हैं। हमारे सामने तिरूपति पहुँचकर भी गाड़ी बुक करने का विकल्प था लेकिन हमें यहीं से बेहतर लगा सो कर लिया।
एक छोटी सी भूल हो गयी और वो ये कि हमें पूरी गाड़ी का रेट पूछना चाहिए था लेकिन गाड़ी वाले ने हमसे प्रति व्यक्ति की दर से किराया तय कर दिया। गाड़ी का किराया कुछ महँगा पड़ गया। वैसे भूलों से ही सीखने को मिलता है।
अब आन्ध्र प्रदेश के एकमात्र लक्ष्‍य बालाजी के बाद,तमिलनाडु में हमारी आगे की यात्रा मदुरई,कन्याकुमारी,रामेश्वरम,महाबलिपुरम और कांची की होनी थी और इसी क्रम में होनी थी। कम से कम मेरा तो ऐसा ही सोचना था। अन्त में चेन्नई पहुँचना था जहाँ से हमें वापसी की ट्रेन पकड़नी थी। यह दूरी लगभग 1800 किलोमीटर या 2000 किलोमीटर भी हो सकती थी। मेरी समझ से यह बेहतर क्रम था क्योंकि अंत में समय न मिलने पर कांची को ड्राॅप भी किया जा सकता था लेकिन गाड़ी वाले ने अपने हिसाब से हमारे कार्यक्रम में कुछ परिवर्तन कर दिया। उसने तिरूचनूर के पद्मावती मंदिर और वेल्लोर के गोल्डेन टेम्पल को भी जोड़ दिया और कांची को सबसे पहले कर एक पैकेज तैयार कर दिया। यदि परिवार और छोटे बच्चे साथ न हों तो पैकेज में यात्रा करना मेरे उसूलों के खिलाफ है। फिर भी उसने अपने अनुभव का हवाला देते हुए अपनी बात मनवा ली। हमारे पास इतने तर्क नहीं थे कि अपनी बात मनवा पाते। इतना निश्चित हो गया कि हमारे मदुरई पहुँचने से पहले ही यात्रा का एक महत्वपूर्ण दिन खत्म हो जायेगा। समय कम था और हम मदुरई,कन्याकुमारी,रामेश्वरम और महाबलिपुरम में से किसी को नहीं छोड़ना चाहते थे। अगले दिन सुबह 8 बजे निकलने की बात पक्की हुई लेकिन आवारा मन कहाँ मानता हैǃ कुछ लोग सुबह भी पहुँच गये मंदिर के पास,जिनमें मैं भी शामिल था। वेंकटेश्वर मन्दिर के अंदर जाना तो इस समय सम्भव नहीं था लेकिन बाहर से फोटो खींचने से कोई रोक–टोक नहीं है। तो कुछ देर होनी स्वाभाविक थी और तिरूमला से निकलने में 9.30 बज गये।

गाड़ी थोड़ी ही आगे बढ़ी तो ड्राइवर की पहली चालाकी सामने आ गयी। गाड़ी में हमारे समूह के बैठने के लिए भले ही पर्याप्त जगह थी,तकनीकी रूप से गाड़ी में एक सवारी अधिक थी। आखिर हमारे एक साथी को,पुलिस चेक पोस्ट पर उतरना पड़ा जिसे गाड़ी का स्वीपर,बाद में अपने साथ तिरूमला से नीचे लेकर आया। रास्ते में एक जगह ड्राइवर ने गाड़ी रोककर गरूण शिला के दर्शन कराये। तिरूमला से नीचे आकर कुछ समय चाय के हवाले किया गया। केले भी खाये गये। पेट के लिए कुछ करना जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि तिरूपति से 5 किमी की दूरी पर तिरूचनूर के पद्मावती मंदिर तक पहुँचने में 11 बज गये। वैसे यहाँ आने में गाड़ी वाले का भी कुछ प्रयोजन था। उसे गाड़ी में कुछ मरम्मत करानी थी। तो हमें मंदिर के पास छोड़कर वह अंतर्ध्यान हो गया। मेरे अलावा सारे मित्रों ने तिरूचनूर में भगवान वेंकटेश की पत्नी अर्थात देवी पद्मावती के दर्शन किए और मैं बाहर सड़क पर स्थानीय लोगों से हिंदी में बातें करने की असफल कोशिश करता रहा। किसी भी अनजाने स्थान पर वहाँ के स्थानीय लोगों से बातें करना मेरी प्राथमिकता में शामिल रहता है।

मंदिर में बहुत अधिक भीड़ नहीं थी। एक घण्टे में ही दर्शन का पुण्य प्राप्त हो गया। मैं बाहर घूमता रहा सो मुझे वह भी नसीब नहीं हुआ। फरवरी के महीने में भी धूप काफी तेज लग रही थी। मुख्य मंदिर के चारों ओर के खाली स्थान में लोगबाग धूप से बचने के लिए छाये की तलाश कर रहे थे। मंदिर के बाहरी गेट से अन्दर की ओर जाने वाले रास्ते के दोनों तरफ फूल–माला बेचने वालों की भारी गहमागहमी थी। डलिये में सजाये गये फूल बहुत सुंदर दिखायी पड़ रहे थे।
तिरूचनूर,तिरूक्कनूर से व्युत्पन्न माना जाता है। आरम्भ में तिरूक्कनूर,शुकपुरी या शुकग्राम के नाम से जाना जाता था। यह नाम महर्षि शुक के नाम पर पड़ा। तिरूचनूर में श्री पद्मावती अम्मावरी मन्दिर के नाम से पद्मावती या लक्ष्‍मी का मन्दिर है। मन्दिर में यही मुख्य आराध्य हैं। यहाँ यह ʺअलारमेल–मंगाʺ के नाम से भी जानी जाती हैं। परम्परा के अनुसार मन्दिर के पास ही एक तालाब भी है। माना जाता है कि देवी पद्मावती के दर्शन के बिना भगवान वेंकटेश्वर का दर्शन अधूरा है। मंदिर के गर्भगृह में देवी पद्मावती या लक्ष्‍मी की चार भुजाओं वाली पाषाण प्रतिमा,पद्मासन में स्थापित है। पद्मावती मंदिर के दक्षिण में कृष्णस्वामी या कृष्ण का मन्दिर भी बना हुआ है। इस मन्दिर के गर्भगृह में श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलभद्र की मूर्तियाँ स्थापित हैं। पद्मावती मन्दिर का निर्माण 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ।

हमारे ड्राइवर को इससे मतलब नहीं था कि हम लोग दर्शन में कितना समय लगाते हैं। उसे अपनी गाड़ी रिपेयर करानी थी,सो थी। हम भले जल्दी में हों,वह जल्दबाजी में नहीं था।
वैसे इस बीच गाँधी जी के भी दर्शन हो गयेǃ
मन्दिर के गेट के सामने वाले चौराहे पर एक व्यक्ति,जो गाँधीजी की कद–काठी का ही था,पूरे शरीर पर सिल्वर पेंट लगाए,घुटनों के कुछ ऊपर तक धोती पहने,एक हाथ में लाठी लिए और दूसरे में एक किताब की प्रतिकृति के रूप में कार्डबोर्ड लिए,आँखों पर गोलवाला चश्मा लगाए,दम साधे,मूर्तिवत यूँ खड़ा था मानो गाँधी जी की पाषाण प्रतिमा हो। वैसे उसके सामने रखी प्लास्टिक की बाल्टी और उसमें पड़ी कुछ नोटें यह बताने के लिए काफी थीं कि यह बिचारा गाँधीजी बनने के लिए नहीं वरन अपनी रोजी–रोटी कमाने के लिए खड़ा है। बेहतर है आप भी इस आजाद भारत के गाँधी के साथ सेल्फी लें और उसकी बाल्टी में 10 रूपये का एक नोट डालकर चले जायें। पहला काम अर्थात सेल्फी लेना तो सभी कर रहे थे लेकिन 10 रूपये की नोट डालने वाला काम इक्के–दुक्के लोग ही कर रहे थे। अब केवल सेल्फी लेते लोगों पर आजाद भारत के ये गाँधी थोड़ा नाराज हो जायें तो कोई हैरत की बात नहीं। मैंने भी सेल्फी ली,फोटो खींचे और धीरे से किनारे हो गया।
वैसे इतना कुछ देखने–सुनने में देर भी हो रही थी और भूख भी लगी थी। गुस्सा भी आ रहा था। पेट की आग को हमने ठण्डे खीरे से बुझाने की अपर्याप्त कोशिश की। ड्राइवर 1 बजे गाड़ी लेकर आया। हिदायत दी गयी कि जल्दी से कहीं भोजन की व्यवस्था करो। एक घण्टे चलने के बाद हम एक ʺरसतुरंतʺ से जा लगे। 100 रूपये का खाना थोड़ा महँगा तो लगा लेकिन जब थाली सामने आयी तो सारी महँगाई और भूख का गुस्सा कपूर के धुएँ की भाँति उड़ गये। स्टील की थाली में दक्षिण भारत की परम्परा को प्रदर्शित करता,थाली के आकार का गोल कटा केले का पत्ता और उसमें करीने से सजाई गयी छोटी–छोटी कटोरियों में रखे,कुछ दक्षिण भारतीय तो कुछ उत्तर भारतीय व्यंजन। वाहǃ अब व्यंजनों के नाम के लिए अधिक मगजमारी करना जरूरी नहीं। वेटर से धीरे से नाम पूछ लीजिए। जिनका नाम समझ में आ जाय वो उत्तर भारतीय और जिनका नाम समझ में न आये वो दक्षिण भारतीय। वैसे आदमी दिन के 2 बजे तक भूखा रहे तो खाना अपने आप स्वादिष्ट लगेगा।

अब हमारी अगली मंजिल थी कांचीपुरम। तिरूचनूर के पद्मावती मंदिर से इसकी दूरी लगभग 105 किमी है। बेहतर तो यही रहा होता कि हम तिरूचनूर,कांचीपुरम और वेल्लोर को छोड़कर तिरूमला से सीधे मदुरई के लिए चले होते लेकिन अब प्लानिंग गाड़ी वाले की थी तो चुपचाप सब कुछ सहन करना था। कांची पहुँचते–पहुँचते शाम के 4.15 बज गये।
तिरूपति से कांची के रास्ते में लाल मिट्टी में पले–बढ़े आम के पेड़ व बगीचे हमें लुभाते रहे। बगीचों के आस–पास आम के पौधे भी तैयार किये जा रहे थे। एक नयी बात और दिखी और वो ये कि छोटे पौधों की जड़ों में पानी देने के लिए टोंटियां लगायी गयी थीं। और हाँ,रास्ते के किनारे स्थानीय भाषा में,जलेबी छाप अक्षरों में लिखी बातें हमारे पल्ले बिल्कुल भी नहीं पड़ रही थीं। कहीं–कहीं अंग्रेजी में लिखे कुछ शब्द दिखायी पड़ते तो हमें लगता कि हम भी कुछ पढ़ सकते हैं।
कांची का कामाक्षी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव ने सती के शरीर के 51 टुकड़े कर उन्हें चारों दिशाओं में बिखेर दिया। ये टुकड़े जिन स्थानों पर गिरे वे पवित्र तीर्थस्थान बन गये और शक्तिपीठ कहलाये। यह मंदिर जिस स्थान पर बना है वहाँ सती का अस्थिपंजर गिरा था। यह मंदिर दक्षिण भारत का प्रमुख शक्तिपीठ है। यह कांचीपुरम शहर के लगभग केन्द्र में अवस्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण शंकराचार्य द्वारा किया गया। यहाँ देवी पार्वती को कामाक्षी या कामकोटि भी कहा जाता है। स्थानीय रूप से देवी को कामाक्षी अम्मा भी कहा जाता है। मंदिर में देवी की पद्मासन में भव्य प्रतिमा स्थापित है। अत्यन्त सुंदर नेत्रों के कारण यहाँ देवी को कामाक्षी कहा गया है। कामाक्षी को त्रिपुरसुंदरी भी कहा जाता है।

कांची में हम लगभग आधे घण्टे तक मंदिर में भ्रमण करते रहे और फिर 5 बजे वेल्लोर के लिए रवाना हो गये। कांचीपुरम से वेल्लोर गोल्डेन टेम्पल की दूरी 82 किमी है तो यहाँ पहुँचने में डेढ़ घण्टे लग गये और हम शाम 6.30 बजे तक वेल्लोर के सूर्य मंदिर पहुँच गये। पहुँच तो गये थे लेकिन गूगल मैप की बतायी एक ही बात दिमाग में दौड़ लगा रही थी कि वेल्लोर से मदुरई की दूरी 405 किमी है और शाम हो चुकी है।
कांची से वेल्लोर के रास्ते में सड़क किनारे और खेतों में बहुत सारे इमली के पेड़ दिखायी पड़ रहे थे। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि मेरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में कोयला बनाने के लिए इमली के पेड़ों का सर्वनाश कर दिया गया है।
वेल्लोर अपने स्वर्ण मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मल्लाईकोडि की पहाड़ियों पर बनाया गया है। यह मंदिर श्रीपुरम या महालक्ष्‍मी स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है जिसे विशुद्ध सोने के इस्तेमाल से बनाया गया है। इसके निर्माण में 15000 किलोग्राम सोने का प्रयोग किया गया है। माना जाता है कि इस मंदिर के निर्माण और सजावट में जितने सोने का इस्तेमाल किया गया है उतना विश्व की अन्य किसी इमारत में नहीं किया गया है। इस मंदिर का उद्घाटन 2007 में किया गया। मंदिर परिसर में एक सर्व तीर्थम सरोवर भी बनाया गया है जिसमें देश की सारी प्रमुख नदियों का जल एकत्र किया गया है।
चूँकि हम लोग शाम के समय पहुँचे थे और पूरी तरह से अँधेरा हो गया था। इस समय स्वर्ण मंदिर बिजली की लाइटों से जगमगा रहा था। सोने के पीले रंग में जगमगाता मंदिर जादुई आकर्षण उत्पन्न कर रहा था। समस्या यह थी कि मोबाइल वगैरह जमा हो गये थे तो फोटो खींचना भी असंभव था।
वैसे वेल्लोर के गोल्डेन टेम्पल के नखरे भी कम नहीं थे। पता चला कि मानव शरीर के अतिरिक्त अन्दर कुछ भी नहीं जाएगा तो बैग कैमरे वगैरह जमा करने पड़े। पहले से पता होता तो बस में ही छोड़कर आ गये होते। अन्दर दौड़ते हुए पहुँचे तो पता चला कि वेटिंग है। अब ऐसा थोड़े ही न है कि वेटिंग केवल रेलवे में ही होती है। वेटिंग भगवान के यहाँ भी होती है। यह भी ज्ञात हुआ कि 100 रूपये का टिकट ले लेते हैं तो तुरन्त आगे बढ़ जायेंगे अन्यथा वेटिंग में कब तक बैठे रहेंगे,पता नहीं। मरता क्या न करता। 100 रूपये का टिकट लेकर लम्बी गैलरियों से होते हुए आगे बढ़े तो पता चला कि भीड़ बिल्कुल भी नहीं है। 100 रूपये के टिकट के लिए कृत्रिम वेटिंग पैदा की गयी है। भगवान कसमǃ इन्हीं पाखण्डों ने भगवान की कसम खाने से भी विरक्ति पैदा कर दी है।

फिर भी दर्शन हुए। मंदिर के गर्भगृह के पास थोड़ी–बहुत लाइन लगी थी। हाथों–हाथ कुछ प्रसाद भी मिल रहा था। पास ही एक छोटे से कुण्ड के पानी में नोट तैर रहे थे। इस नये मंदिर में भी दर्शनार्थियों ने पानी में नोट चढ़ाने की यह एक नयी परम्परा शुरू कर दी थी। लोहे की रेलिंग लगी थी नहीं तो कुछ लोग नोट निकालने वाले भी जरूर आते होंगे। दर्शन करके बाहर निकले तो मदुरई के लिए रवाना होने में 7.30 बज गये। 

पक्षी के चोंच जैसी दिखती गरूड़ शिला
पद्मावती मंदिर का तालाब
पद्मावती मंदिर का गोपुरम

तिरूचनूर में मिले आजाद भारत के गाँधीजी
पद्मावती मंदिर में बिकते ये फूल भी कम सुंदर नहीं

कांची का कामाक्षी मंदिर





सौ रूपये वाली स्वादिष्ट थाली
अगला भाग ः मदुरई

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. जब मैं उड़ चला
2. बालाजी दर्शन
3. जय वेंकटेश्वर
4. तिरूमला टु मदुरई
5. मदुरई
6. रामेश्वरम
7. कन्याकुमारी
8. महाबलिपुरम

2 comments:

  1. शानदार पोस्ट . दो साल पहले की गयी अपनी यात्रा की यादें ताज़ा हो गयी . कांचीपुरम में आपने तिन अन्य बेहद खूबसूरत मंदिर मिस कर दिए . यहाँ के लिए एक दिन तो चाहिए ही यदि ठीक से देखना हो तो .पंचभूतों में शामिल एकम्बरनाथर मंदिर यहीं पर है .

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद नरेश जी ब्लॉग पर आने के लिए। कांचीपुरम में हम अधिक समय नहीं दे पाये इस कारण कांचीपुरम अनदेखा ही रह गया। समय की कमी के कारण ऐसा हुआ। फिर कभी पूरा समय देंगे।

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