Friday, January 10, 2020

तटीय मैदान और द्वीप समूह (1)

भारत के प्रायद्वीपीय पठार के दोनों तरफ सँकरे मैदानी भाग पाए जाते हैं। अरब सागर की ओर स्थित मैदान को पश्चिमी तटीय मैदान तथा बंगाल की खाड़ी की ओर स्थित मैदानी भाग को पूर्वी तटीय मैदान कहा जाता है। इन मैदानों और अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी में अवस्थित द्वीप समूहों का भूगोल में एक साथ अध्ययन किया जाता है। इन सभी को सम्मिलित करते हुए भारत की सम्पूर्ण तट रेखा की लम्बाई 7517 किलोमीटर है। माना जाता है कि पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के कुछ भागों का बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की ओर अवतलन या धँसाव हो गया जिससे घाटों के किनारे कगार की भाँति खड़े हो गए।

कालान्तर में इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियों द्वारा निक्षेप के जमावों और सागर की लहरों द्वारा अपरदन के फलस्वरूप इन जलोढ़ मैदानों की रचना हुई।
इन मैदानों को दो बड़े भागों में विभाजित किया जा सकता है–
A. पश्चिमी तटीय मैदान
B. पूर्वी तटीय मैदान

पश्चिमी तटीय मैदान

पश्चिमी घाट के मैदान,पश्चिम में कच्छ की खाड़ी से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक विस्तृत हैं। इस मैदान की लम्बाई 1400 किलोमीटर और चौड़ाई 10 से 80 किलाेमीटर के बीच है। मैदान की औसत चौड़ाई 64 किलोमीटर है लेकिन कई स्थानों पर यह 50 किलोमीटर से भी कम चौड़ा है। इसकी अधिकतम चौड़ाई 80 किलोमीटर है। इस तटीय मैदान की समुद्रतल से ऊँचाई 150 मीटर है जो कहीं–कहीं 300 मीटर तक पाई जाती है। रेत के पुलिन (beach),तटीय बालुका स्तूप,दलदली मैदान,लैगून,नदियों के जलोढ़ क्षेत्र,ज्वारनदमुख तथा अवशिष्ट पहाड़ियाँ,इस मैदान में पाई जाने वाली प्रमुख भूआकृतिक विशेषताएँ हैं। इस मैदान में अनेक छोटी व तीव्रगामी नदियाँ प्रवाहित होती हैं जो जल परिवहन,सिंचाई या जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से अनुपयुक्त हैं। अपनी तीव्रता के कारण वे इस मैदान में निक्षेपों का जमाव भी नहीं कर पातीं। फलस्वरूप इस मैदान का विस्तार नहीं हो पाता। इस मैदान के साथ साथ सह्याद्रि या पश्चिमी घाट का विस्तार है जो इन मैदानों की ओर तीखा ढाल बनाता है। पश्चिमी तटीय मैदान के पूर्व में,पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ दीवार की तरह खड़ी दिखायी पड़ती हैं। ये पहाड़ियाँ भूगर्भिक हलचलों के कारण ऊपर उठ गयीं जबकि इन पहाड़ियों के पश्चिम का भू–भाग नीचे धँस गया। इस नीचे धँसे भाग पर समुद्री लहरों ने काट–छांट और अपरदन क्रिया द्वारा तटीय मैदानों का निर्माण किया। भारत के दक्षिणी पठारी भाग पर क्रीटैशियस युग में लावा का विस्तृत प्रवाह हुआ जिससे लावा की अनेक परतें बिछ गयीं। इन लावा परतों के कारण पश्चिमी घाट की ऊँचाई बढ़ गयी। पश्चिमी घाट की यह दीवार कुछ स्थानों पर भंजित हो गयी है जिस कारण पश्चिमी तटीय मैदान प्रायद्वीपीय पठारी भाग से जुड़ गए हैं। तटीय मैदानों के बाद समुद्र की ओर विस्तृत उस भाग को,जो प्रायः समुद्र में डूबा रहता है,महाद्वीपीय मग्नतट कहते हैं। काठियावाड़,गुजरात और कोंकण तट के किनारे महाद्वीपीय मग्नतट चौड़े पाए जाते हैं जबकि गोआ से केरल तक इनकी चौड़ाई कम हो गयी है। मग्नतटों का ढाल धीमा होता है लेकिन समुद्र की ओर बढ़ने पर यह तीव्र हो जाता है। इस मैदान के निम्न उपविभाग किए जा सकते हैं–
1. कच्छ का प्रायद्वीपीय मैदान
2. गुजरात मैदान
3. कोंकण मैदान
4. कनारा तटीय मैदान
5. मालाबार तटीय मैदान
1. कच्छ का प्रायद्वीपीय मैदान– कच्छ एक द्वीप के रूप में है। इसके और मुख्य भूमि के मध्य एक उथली खाड़ी है जो वर्षा ऋतु में पानी से भर जाती है। शुष्क मौसम में इस खाड़ी के सूख जाने पर कच्छ का द्वीप मुख्य भूमि से जुड़ जाता है। कच्छ का मैदान एक शुष्क और अर्द्ध शुष्क नमकीन रेतीला मैदान है जो कभी समुद्र के नीचे रहा था। इसके धरातल पर कहीं–कहीं बालू व चट्टानों के उभरे द्वीप दिखायी पड़ते हैं। इस दलदली नमकीन मैदान को कच्छ का रण कहा जाता है। कच्छ के रण को कच्छ की खाड़ी काठियावाड़ प्रायद्वीप से अलग करती है। कच्छ के रण की निम्न स्थलीय दलदली मृदाओं में नमक की उच्च मात्रा पाए जाने के कारण यह पूरा क्षेत्र लगभग बंजर और अनुपजाऊ है। नमक की सफेद रीढ़दार आकृतियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे हड्डी से बनी हुई संरचनाएं हों। काठियावाड़ प्रायद्वीप के मध्य में गिरनार की पहाड़ियाँ पायी जाती हैं।

2. गुजरात मैदान– यह मैदान कच्छ और सौराष्ट्र के पूर्व में विस्तृत है। इसके अन्तर्गत आन्तरिक गुजरात और खम्भात की खाड़ी के तटीय भाग सम्मिलित हैं। इस मैदान का ढाल पश्चिम और दक्षिण–पश्चिम की ओर है। इस मैदान में साबरमती,माही,नर्मदा व ताप्ती नदियाँ प्रवाहित होती हुई मुहाना बनाती हैं। वैसे यह मैदान समुद्रतल से अधिक ऊँचा नहीं है। साबरमती के मुहाने पर तो यह केवल 12 मीटर ऊँचा है। फलतः तटीय क्षेत्राें में ज्वार का जल भर जाने के कारण नमकीन दलदलों की उत्पत्ति हो जाती है। इस मैदान के भीतरी भाग उपजाऊ काँप से निर्मित होने के कारण कृषि के लिए उपयुक्त हैं।

3. कोंकण का मैदान– दमन से लेकर गोआ तक फैले समुद्रतटीय मैदान को कोंकण का मैदान कहा जाता है। सम्पूर्ण महाराष्ट्र इसके अन्तर्गत आता है। इस मैदान की लम्बाई 500 किलोमीटर तथा चौड़ाई 50 से 80 किलोमीटर तक है। इस मैदान के किनारे अत्यधिक कटे–फटे हैं। मुम्बई के निकट इस मैदान की चौड़ाई सर्वाधिक है। मुम्बई द्वीप के चारों ओर फैली थाणे की संकीर्ण खाड़ी सबसे महत्वपूर्ण वृत्ताकार खुली हुई खाड़ी है। इस मैदान की मिट्टी में लावा का अंश होने के कारण यह अत्यधिक उपजाऊ है। इस वजह से यहाँ साल और सागौन के घने वन पाए जाते हैं। इस तट पर रेत के टीलों के अवरोध के कारण नदियों का जल एकत्र हो जाता है जिससे छोटी–छोटी झीलें बन गयी हैं। इन झीलों के किनारे नारियल के वृक्ष पाए जाते हैं।

4. कनारा तटीय मैदान– गोआ से लेकर मंगलौर तक 225 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत यह मैदान कनारा मैदान कहा जाता है। इसकी चौड़ाई 8 से 25 किलोमीटर तक है। पश्चिमी तटीय मैदानों का यह सबसे सँकरा भाग है। सम्पूर्ण कर्नाटक का तट इसके अन्तर्गत आता है। प्राचीन रूपान्तरित शैलों से निर्मित यह तट काफी कटा–फटा है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से उतरने वाली नदियों ने यहाँ उर्वर काँप मिट्टी का निक्षेप किया है। सागरीय लहरों ने भी यहाँ काफी काट–छाँट की है। तट पर रेत के टीले या बालुका स्तूप भी पाए जाते हैं। गोवा में स्थित मांडवी–जुआरी की संकीर्ण खाड़ी सबसे महत्वपूर्ण खुली खाड़ी के रूप में है। वर्षा अधिक होने तथा सामान्य तापमान अनुकूल होने के कारण यहाँ सुपारी,गरम मसाले,चावल,आम,केला व नारियल की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है।

5. मालाबार तटीय मैदान– मंगलौर से कुमारी अन्तरीप तक 500 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत तटीय भाग को मालाबार तटीय मैदान कहा जाता है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण केरल का तटीय भाग सम्मिलित है। इस तट की चौड़ाई 20 से 100 किलोमीटर तक है। मालाबार तट का सर्वाधिक विस्तार बेपोर,पोन्नाई,पेरियार एवं पंबा अचनकोविल नदियों की घाटियों में दिखायी पड़ता है। यहाँ लम्बे व सँकरे अनूप या लैगून (Lagoon) झीलें पायी जाती हैं। इन्हें कयाल या पश्चजल (Backwaters) भी कहते हैं। वेम्बानाड और अष्टमुडी मालाबार तट की प्रमुख लैगून झीलें हैं। कोचीन का बन्दरगाह भी ऐसी ही झील के मुँह को गहरा करके बनाया गया है। इन झीलों को नहरों द्वारा जोड़ दिये जाने से यहाँ नौकारोहण की अच्छी सुविधा हो गयी है। बालुका स्तूपों की उपस्थिति इस तट की मुख्य विशेषता है जिन्हें यहाँ टेरिस  के नाम से जाना जाता है। इन तटीय मैदानों पर भी नारियल,चावल,सुपारी,केला व गर्म मसाले खूब उगाये जाते हैं।

पूर्वी तटीय मैदान

पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार उत्तर में सुवर्णरेखा नदी से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक है। यह तटीय मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है। इस भाग में कई नदियों के डेल्टा प्रदेश भी अवस्थित हैं। पूर्वी तटीय मैदान के उत्तरी भाग को उत्तरी सरकार  तथा दक्षिणी भाग को कोरोमण्डल तट  कहते हैं। भू–आकृतिक लक्षणों के आधार पर इस मैदान को दो रूपों में बाँटा जाता है– पहला  नदियों का डेल्टाई भाग और दूसरा भीतरी भाग। प्रायद्वीप की बड़ी नदियों यथा– गोदावरी,कृष्णा,कावेरी और महानदी ने अपने साथ बहाकर लाए गए अवसादों को जमा कर डेल्टाओं का निर्माण किया है। इन डेल्टा क्षेत्रों का निर्माण नदियों द्वारा लायी गयी काँप मिट्टी से हुआ है। इन डेल्टा क्षेत्रों के आस–पास बहुत सारे बालू के टीले या ढेर बन गए हैं। वैसे इन टीलों के निर्माण में समुद्री लहरों का भी हाथ होता है। कहीं–कहीं इन टीलों का निर्माण इस रूप में हुआ है कि स्थलीय किनारों और इन टीलों के बीच समुद्री जल घिरकर झीलों के रूप में परिवर्तित हो गया है। ये झीलें छ्छिली होती हैं। उड़ीसा के तट पर चिल्का और आन्ध्र प्रदेश के तट पर स्थित पुलीकट ऐसी ही झीलें हैं। दूसरा,नदियों के ऊपरी भाग हैं जो काँप मिट्टी के अवशिष्ट मैदान हैं। ये मैदान ऊँचे भूभागों के अपरदन से बने हैं। इन मैदानों में काँप मिट्टी की परत काफी हल्की होती है और कहीं–कहीं इस परत के हट जाने के कारण इनके नीचे की चट्टान भी दिखाई पड़ती है। पूर्वी तटीय मैदान के किनारे भी महाद्वीपीय मग्नतट पाए जाते हैं जो गंगा डेल्टा क्षेत्र में सर्वाधिक चौड़ाई में पाए जाते हैं। शेष तटीय भाग में मग्नतटों की चौड़ाई,पश्चिमी तटों की तुलना में कम पाई जाती है। पूर्वी तटीय मैदान के उत्तर से दक्षिण तक तीन भाग हैं–
1. उत्कल का मैदान
2. आन्ध्र का मैदान
3. तमिलनाडु का मैदान
1. उत्कल का मैदान– यह उत्तरी सरकार तट का उत्तरी भाग है जो ओडिशा के तटीय भागों में 400 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत है। महानदी के डेल्टाई भाग में यह मैदान काफी चौड़ा है। तट पर बालू का विस्तार पाया जाता है तथा तट रेखा बिल्कुल सीधी और सपाट है। महानदी डेल्टा के दक्षिण में चिल्का झील अवस्थित है जो 75 किलोमीटर की लम्बाई और 8 किलोमीटर की चौड़ाई में फैली हुई है। यह भारत की सबसे बड़े झील है। इस झील के उत्तर और पूर्व की ओर रेत के जमाव हैं जबकि दक्षिण की ओर चट्टानें मिलती हैं जो इसे समुद्र से अलग करती हैं। झील के दक्षिण की ओर पूर्वी घाट की पहाड़ियाँ तट के काफी समीप रहती हुई विशाखापट्टनम तक चली गयी हैं। विशाखापट्टनम बंदरगाह के सामने डाल्फिन नामक चट्टान समुद्र में स्थित है जिसकी आड़ में जलपोत सुरक्षित रूप से बंदरगाह में ठहरते हैं। पूर्वी घाट से निकलकर अनेक छोटी–छोटी नदियाँ समुद्र में गिरती हैं जिनके मुहानों पर कई बन्दरगाह विकसित हुए हैं। डेल्टा क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी का जमाव होने के कारण सघन कृषि की जाती है।

2. आन्ध्र का मैदान– यह मैदान आन्ध्र प्रदेश के तटीय इलाके में फैला हुआ है। गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा इसी भाग में पाए जाते हैं। ये डेल्टाई प्रदेश एक दूसरे के काफी निकट स्थित हैं और 160 किलोमीटर की लम्बाई में फैले हुए हैं। इन दोनों डेल्टा क्षेत्रों के बीच में कोलेरू  नाम झील अवस्थित है जिसमें कई छोटी नदियाँ गिरती हैं। इस क्षेत्र में यह तटीय मैदान काफी चौड़ा है और कृष्णा नदी के सहारे यह 100 किलाेमीटर भीतर तक चला गया है। काकीनाड़ा और मछलीपट्टनम जैसे बन्दरगाह इसी भाग में स्थित हैं।

3. तमिलनाडु का मैदान– यह पूर्वी तटीय मैदान का दक्षिणी भाग है जिसे कोरोमण्डल तट  के नाम से जाना जाता है। यह मैदान पुलीकट झील से लेकर कुमारी अन्तरीप तक 675 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत है। यह भाग तमिलनाडु और पुद्दुचेरी के तटीय प्रदेशों में फैला हुआ है। इस मैदान की चौड़ाई 100 किलोमीटर है। वैसे कावेरी नदी के डेल्टाई क्षेत्र में यह 130 किलोमीटर की चौड़ाई में फैला हुुआ है। पुलीकट एक वलयाकार लैगून झील है जिसका 84 प्रतिशत हिस्सा आन्ध्र प्रदेश में है जबकि शेष तमिलनाडु में है। श्रीहरिकोटा नामक द्वीप इसे समुद्र से अलग कर झील का रूप दे देता है। प्राचीन चट्टानों से निर्मित यह द्वीप तटीय श्रेणी के रूप में है। कुमारी अन्तरीप और श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में कई छोटे–छोटे प्रवाल द्वीप पाए जाते हैं। इस तटीय मैदान में चावल और नारियल की खूब पैदावार होती है।

तटीय मैदानों की उपयोगिता–
1. तटीय मैदान सघन जनसंख्या को आश्रय देते हैं।
2. विदेशी व्यापार के लिए ये तट ही मार्ग प्रदान करते हैं। देश के सभी बड़े बन्दरगाह इन तटीय प्रदेशों में ही स्थित हैं। विदेशी कच्चे माल पर आधारित बड़े उद्योग भी तटवर्ती नगरों में स्थापित किए गए हैं।
3. तटीय मैदान पर्याप्त उपजाऊ हैं और यहाँ चावल,नारियल,केले और गरम मसालों की कृषि की जाती है। इन उपजों पर आधारित उद्योग भी यहाँ विकसित हुए हैं।
4. कच्चे तेल की दृष्टि से ये तटीय मैदान अत्यन्त सम्पन्न हैं। मुम्बई के अपतटीय क्षेत्र और कृष्णा–गोदावरी बेसिन में कच्चे तेल के विशाल भण्डार पाए जाते हैं। केरल तट की रेत में मोनाेजाइट  के प्रचुर निक्षेप मिलते हैं।
5. मत्स्य उत्पादन के लिए भी ये तट सर्वाधिक उपयुक्त हैं।


अन्य सम्बन्धित विवरण–

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