Friday, February 14, 2020

भारत की भूगर्भिक संरचना (4)

क्वाटर्नरी समूह की शैलें– इसके अन्तर्गत प्लीस्टोसीन तथा वर्तमान काल (होलोसीन) में निर्मित शैलों को सम्मिलित किया जाता है। इन दोनों कालों के आधार पर इस समूह की शैलों को दो भागों में बाँटा जाता है–

(i) प्लीस्टोसीन क्रम की शैलें– क्वाटर्नरी युग का आरम्भ व्यापक हिमावरण के साथ हुआ। इस कारण मौसम अत्यन्त ठण्डा हो गया। पृथ्वी के कई भागों में हिमनदों का विस्तार हो गया। तापमान में अधिक गिरावट के कारण बहुत से प्राणियों का अन्त हो गया और बहुत सारे अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों में प्रवास कर गए। हिमालय के निचले प्रदेशों में भी हिमानियों का विस्तार हो गया। इसके निशान हिमालय में मिलते हैं। हिमानियों द्वारा किये गए निक्षेपों,जिन्हें हिमोढ़ कहते हैं,के कारण झीलों का निर्माण हो गया।


(a) कारेवाँ निक्षेप– प्लीस्टाेसीन काल में ही कारेवाँ  नाम विस्तृत सरोवर में हिमानियों द्वारा अत्यधिक निक्षेपण किया गया। इस निक्षेप राशि को कारेवाँ राशि  कहा जाता है। यह सरोवर उत्तर में महान हिमालय श्रेणी और दक्षिण में स्थित एक दूसरी श्रेणी के मध्य अवस्थित था। कालान्तर में भूगर्भिग हलचलों के कारण कारेवाँ सरोवर के तल के ऊपर उठने के कारण पीर पंजाल श्रेणी और कश्मीर घाटी का निर्माण हुआ। यह प्रक्रिया प्लीटोसीन काल में हुई। वर्तमान झेलम नदी की घाटी और पीर पंजाल श्रेणी के किनारों पर बने चपटे चबूतरे,कारेवाँ राशि के ही बने हुए हैं। ये श्रीनगर और गुलमर्ग के बीच पाए जाते हैं। इस कारेवाँ राशि में चीका,बालू,दोमट और गोलाश्म मिले हुए हैं। कारेवाँ शैलें नदीय और सरोवरीय प्रकार की हैं। इनमें सीप,मछलियों और स्तनपायी जीवों के अवशेष मिलते हैं। निचली कारेवाँ शैलों में,इस क्षेत्र में पाए जाने वाले वृक्षों जैसे चीड़,ओक,विल्लो,एल्डर,बीच आदि के अवशेष मिलते हैं। कारेवाँ शैलें लगभग 7500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली हुई हैं तथा 1600 मीटर तक मोटी है। इसकी ऊपरी परतें,निचली परतों की तुलना में अधिक मोटी हैं तथा इन परतों में लिगनाइट (निम्न कोटि का कोयला) के भण्डार भी मिलते हैं। पीर पंजाल श्रेणी में भी कारेवाँ शैलों की मोटाई 1600 मीटर तक पायी जाती है। इससे यह तथ्य प्रमाणित होता है कि इस श्रेणी का निर्माण कश्मीर घाटी में जमा हुए अवसादों से ही हुआ है।

(b) पुरातन काँप– गंगा,ब्रह्मपुत्र,सतलज,नर्मदा,ताप्ती,गा्ेदावरी तथा कृष्णा नदियों की ऊपरी घाटी में प्लीस्टोसीन कालीन पुरातन काँप मिलती है। इस काँप की परतों में स्तनपायी जीवों के अवशेष भी मिलते हैं। गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की ऊपरी घाटियों में कंकड़,बालू व चीकायुक्त प्लीस्टोसीन काल के अवसाद मिलते हैं। ऊपरी गंगा घाटी में पुरातन काँप सर्वाधिक विस्तृत हैं। सिन्धु–गंगा के मैदान में काँप की गहराई में पर्याप्त विभिन्नता पायी जाती है। राजमहल और गारो पहाड़ियों के बीच इसकी अधिकतम गहराई 1800 से 2100 मीटर तक मानी जाती है। वैसे अभी भी विभिन्न भागों में इसकी वास्तविक गहराई का ठीक–ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सका है। पुरातन काँप को बांगड़  भी कहा जाता है। यह कंकड़ युक्त और काले रंग की होती है।

(c) नवीन काँप– नदियों की निचली घाटियों में नवीन अवसादों से निर्मित काँप का विस्तार पाया जाता है। बालू और कंकड़ से युक्त हल्के रंग की यह काँप खादर  कहलाती है। इसमें भूमिगत जल का अच्छा भण्डार पाया जाता है। यह प्लीस्टोसीन काल के उत्तरार्द्ध में निक्षेपित आधुनिक अवसादों से निर्मित है। प्रायद्वीप के तटीय भागों में भी प्लीस्टोसीन कालीन निक्षेप मिलते हैं। इन तटीय भागों में पायी जाने वाली बालू में प्लीस्टोसीन काल के उत्तरार्द्ध और आधुनिक काल के मोलस्क जीव मिलते हैं। ओडिशा,तमिलनाडु और गुजरात में ये निक्षेप पाए जाते हैं। गुजरात में कच्छ का रन आधुनिक अवसादों से निर्मित है। यह प्लीस्टोसीन युग में समुद्र का भाग था। पश्चिमी राजस्थान में थार के मरूस्थल में भी प्लीस्टोसीन कालीन जमाव पाए जाते हैं। ओडिशा के तट पर चिल्का झील का निर्माण महानदी द्वारा बहा कर लाए गए अवसादों के निक्षेप से हुआ है।

(ii) आधुनिक क्रम (हाेलोसीन) की शैलें– इन शैलों की निर्माण प्रक्रिया वर्तमान समय में चल रही है। गंगा और सतलज नदियों के अतिरिक्त प्रायद्वीपीय नदियों– नर्मदा,ताप्ती,गोदावरी,महानदी,कृष्णा,कावेरी,पेरियार आदि के मुहानों पर काँप के निक्षेप पाए जाते हैं। बंगाल की खाड़ी के तटीय भागों में बालुका स्तूपों के विस्तृत निक्षेप पाए जाते हैं। सारांशतः भारत का प्रायद्वीपीय भाग प्राचीनतम से लेकर आधुनिकतम शैलों के जमाव से निर्मित हुआ है। यहाँ ऐसी भी शैलें पायी जाती हैं जो अब अपने मूल स्वरूप को खो चुकी हैं।

भारत में हिमयुग

भूवैज्ञानिक इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि भारत में कई हिमयुग हुए हैं। यद्यपि भारत में सभी हिमयुगों के अस्तित्व के प्रमाण नहीं मिलते फिर भी धारवाड़,गोण्डवाना और प्लीस्टोसीन कालों में हिमनदन के चिह्न मिलते हैं।
1. धारवाड़ हिमयुग– धारवाड़युगीन हिमनदन के निशान भारत में कालदुर्ग के निकट कंकड़ों द्वारा निर्मित शैलों में मिलते हैं। हिम की परतों की वजह से उत्पन्न निशान भी यहाँ दिखायी पड़ते हैं। इन निशानों के आधार पर इसकी कालावधि का अनुमान लगाते हुए इसे धारवाड़ हिमयुग कहा जाता है।
2. गाेण्डवाना हिमयुग– ओडिशा की महानदी घाटी में स्थित तालचेर क्रम में गोण्डवाना युगीन हिमनदन के चिह्न पाये जाते हैं। तत्कालीन समय की हिमनदियों द्वारा निक्षेपित किये गये शिलाखण्ड तालचेर से प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार के अवशेष शिमला,हजारा और साल्टरेंज में भी मिलते हैं। पश्चिमोत्तर भारत के पोटवार क्षेत्र में भी कुछ ऐसे शिलाखण्ड मिलते हैं जो स्थानीय भूसंरचना से मेल नहीं खाते। ये अवशेष गोण्डवाना युग की हिमनदियों द्वारा यहाँ निक्षेपित किए गए हैं।
3. प्लीस्टोसीन हिमयुग– इस हिमयुग के निशान विश्व–स्तर पर पाए जाते हैं। इस समय हिमालय के हिमनद काफी नीचे तक उतर गए। एक अनुमान के अनुसार ये हिमनद कश्मीर में 2700 मीटर तक,डलहौजी में 1500 मीटर तक और धर्मशाला में 900 मीटर की ऊँचाई तक उतर आए थे। दक्षिण भारत की जलवायु भी इसी अनुपात में ठण्डी हो गयी।

भारत में ज्वालामुखी क्रियाएँ

भारत के भूवैज्ञानिक इतिहास में,विद्वानों के अनुसार टर्शियरी युग में बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी क्रिया हुई। यह क्रिया बलूचिस्तान,म्यांमार और हिमालय के क्षेत्रों में हुई। पहला ज्वालामुखी उद्गार धारवाड़ युग में हुआ। इसके पश्चात कुडप्पा,विन्ध्यन,उत्तर कार्बोनिफेरस काल और टर्शियरी युग के आरम्भ में व्यापक स्तर पर ज्वालामुखी क्रिया हुई। इस अन्तिम ज्वालामुखी क्रिया से ही प्रायद्वीपीय भारत के 5 लाख वर्ग किलाेमीटर क्षेत्रफल में लावा का विस्तार हो गया।
भारत में वर्तमान में सक्रिय ज्वालामुखियों का प्रायः अभाव है। भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी बैरेन द्वीप पर है जो अण्डमान–निकोबार द्वीप समूहों के अन्तर्गत आता है। इसमें अन्तिम बार उद्गार 1991 में हुआ और 2006 तक लावा का उद्गार होता रहा। इसके पहले इसमें 1787,1798 और 1803 में उद्गार हुए थे। इस द्वीप पर स्थित गन्धकीय ज्वालामुखी से निर्मित शंकु,समुद्रतल से 310 मीटर की ऊँचाई पर 7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है।

गर्म जल के सोते

भूगर्भिक शैलों में उपस्थित जल स्रोत,ज्वालामुखी क्रिया से सम्बद्ध होते हैं। अतः बहुत से ज्वालामुखी क्षेत्रों में गर्म जल के सोते पाए जाते हैं। इनमें गन्धक की पर्याप्त मात्रा उपस्थित होती है। भारत में कई स्थानों पर गर्म जल के सोते मिलते हैं।
1. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में मणिकर्ण नामक स्थान पर गन्धक युक्त और औषधीय गुण वाला गर्म जल का स्रोत मिलता है। कांगड़ा में ज्वालामुखी नामक स्थान पर भी औषधीय गुणों और क्षार तत्वों से युक्त गर्म जल स्रोत पाए जाते हैं। सतलज घाटी में शिमला से 48 किलोमीटर की दूरी पर गर्म जल स्रोत मिलता है।
2. बिहार में राजगीर शहर के पास ब्रह्मकुण्ड  नामक गर्म जलस्रोत मिलता है। मु्ंगेर जिले में श्रृंगी ऋषि,रामेश्वर कुण्ड,सीताकुण्ड,लक्ष्‍मी कुण्ड,भीमबन्ध,पंचवट आदि गर्म जल के सोते मिलते हैं जिनमें जल का तापमान 60 डिग्री सेण्टीग्रेड तक पाया जाता है।
3. झारखण्ड के हजारीबाग में केशवडीह,सूरजकुण्ड,बेलकापी,लुरगरथा,द्वारी तथा पिण्डारी के गर्म जल स्रोत प्रसिद्ध हैं। इनमें गन्धक का अंश भी पाया जाता है। इनके जल का तापमान 50 से 70 डिग्री सेण्टीग्रेड तक पाया जाता है। संथाल परगना जिले के तातापानी,नूनबिल,सिद्धपुर व ततलोई में गंधकयुक्त गर्म जल के सोते मिलते हैं। इनका तापमान 60 डिग्री सेण्टीग्रेड से भी अधिक रहता है।
4. जम्मू और कश्मीर में कश्मीर घाटी,वर्द्धमान घाटी,पूगा घाटी व लद्दाख में गर्म जल के स्रोत पाए जाते हैं। लद्दाख के पनामिक नामक स्थान पर गर्म जल का तापमान 75 डिग्री सेण्टीग्रेड से भी अधिक मिलता है। पूगा घाटी में इन स्रोतों से गन्धक और सुहागा प्राप्त होता है।
5. उत्तराखण्ड में देहरादून के पास सहस्रधारा  नामक स्थान पर गन्धक युक्त गर्म जल का स्रोत पाया जाता है। यमुनोत्री और बद्रीनाथ में भी औषधीय गुणों से युक्त गर्म जल के स्रोत पाए जाते हैं।
6. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में अनहोनी और बेमनी  नामक गन्धकीय गर्म जल के स्रोत मिलते हैं। ग्वालियर के निकट सिपरी  नामक गर्म जल स्रोत स्थित है। 
7. गुजरात के पंचमहल में तवा  नामक स्रोत है। इसके पास ही लसुंदरा  नामक स्रोत स्थित है। बड़ोदरा के पास ऊनी  नामक गर्म जल स्रोत पाया जाता है।

भारत की तटरेखा

पैलियोजोइक कल्प में गोण्डवानालैण्ड एक संयुक्त स्थलखण्ड के रूप में था। क्रिटैशियस काल में इसके खण्डित होने से भारतीय प्रायद्वीप की उत्पत्ति हुई। साथ ही भारतीय तटरेखाओं का भी निर्माण हुआ। एक महाद्वीप के खण्डित होने से निर्मित होने के कारण ये तटरेखाएँ बिल्कुल सीधी और सपाट हैं। इसी कारण भारतीय तट पर उच्च कोटि के प्राकृतिक पत्तनों का अभाव है। पश्चिमी तट तो बिल्कुल ही सीधा एवं सपाट है। पूर्वी तट पर भी नदियों द्वारा भारी मात्रा में अवसादों का निक्षेपण किए जाने के कारण समुद्र की गहराई कम हो जाती है और पत्तनों का विकास नहीं हो पाता। पश्चिमी तट पर महाद्वीपीय मग्नतटों की गहराई 200 मीटर तक है और इनकी चौड़ाई भी कम है। तट से थोड़ी ही दूर आगे बढ़ने पर समुद्र एकाएक अधिक गहरा हो जाता है। पूर्वी तट पर महाद्वीपीय मग्नतट अधिक गहरे हैं और यहाँ गर्त भी पाए जाते हैं। भारत की पूर्वी और पश्चिमी तटरेखाओं के समानान्तर फैली पहाड़ियाँ मिलती हैं जिन्हें घाट कहा जाता है। इन श्रेणियों और तटरेखाओं के मध्य तटवर्ती भूमि पायी जाती है। पश्चिमी भाग में यह बालू,मिट्टी और कंकड़ से बनी है। यह तटीय भाग सँकरा और ऊबड़–खाबड़ है। पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षाकृत चौड़ा है और कछारी मिट्टी से बना है। 
भारत के पश्चिमी तट पर कच्छ की खाड़ी,खम्भात की खाड़ी और मालाबार क्षेत्र में लैगून पाए जाते हैं। कच्छ की खाड़ी सबसे बड़ी खाड़ी है जिसका क्षेत्रफल 12260 वर्ग किलोमीटर है। इसका कुछ भाग जलमग्न और शेष भाग छिछला है। पूर्वी तट पर पुलीकट,कोलेरू और चिल्का झीलें पायी जाती हैं। ये वास्तव में आन्तरिक झीलें हैं और सँकरे भागों द्वारा समुद्र से जुड़ी हुई हैं।

भारत के समुद्रतट अस्थिर रहे हैं। यहाँ भूमि के जलमग्न और उन्मग्न होने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। उदाहरण के लिए कच्छ और काठियावाड़ के भाग उन्मग्न होकर ही वर्तमान स्वरूप में दिखायी पड़ते हैं। कच्छ प्रदेश की उन्मग्नता एक नवीन घटना है। पहले यह भाग एक खाड़ी के रूप में था जहाँ लूनी नदी अपना मुहाना बनाती थी। नदी और सागर के द्वारा किए जाने वाले निक्षेप और स्थल भाग के ऊपर उठने से कच्छ की खाड़ी एक दलदल के रूप में परिवर्तित हो गयी। वर्तमान में यह भूमि धीरे–धीरे दलदल से मुक्त होकर शुष्क हो गयी है। काठियावाड़ प्रायद्वीप के मध्य में 360 मीटर ऊँची चोटिला  नामक पहाड़ी पर चूने की शैलें मिलती हैं। अनुमान है कि ये किसी समय अवश्य ही समुद्र के नीचे रही होंगी। काठियावाड़ प्रायद्वीप के क्रमशः ऊपर उठने और समुद्र के पीछे हटने से ये समुद्र के बाहर आ गयीं। काठियावाड़ तट के समीप मिलियालाइट नामक चूने की शैलें,जो मिलियोला नामक जल–जीव के ढाँचे से बनी हैं,इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। केरल तट पर बालुका स्तूपों के पीछे बनी लैगून झीलें क्रमशः उथली होती जा रही हैं और स्थल का अंग बनती जा रही हैं। पूर्वी तट पर भी उन्मज्जन के प्रमाण मिलते हैं। इस तट पर नदियों द्वारा बनाए गए डेल्टाई क्षेत्र समुद्र की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। किसी समय गोदावरी नदी के मुहाने पर कलिंगपत्तनम नामक पत्तन स्थित था जो अब समुद्र तट के काफी भीतर स्थित है। तट के समीप स्थल के भीतरी भागों में 15 से 30 मीटर की ऊँचाई पर छोटे जल–जीवों के अवशेष पाए जाते हैं जो इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि ये भाग समुद्र में से ऊपर उठ कर स्थल का भाग बन गए हैं। यहाँ जलमग्नता के भी कुछ प्रमाण पाए जाते हैं। जैसे तिरूनेलवेली तट पर वलीमुखम की खाड़ी के नीचे तथा पाण्डिचेरी तट के निकट जलमग्न कोयला मिला है जिससे पता चलता है कि यह भाग किसी समय स्थल का अंग रहा होगा। संभवतः यह प्लीस्टोसीन काल में जलमग्न हुआ होगा।


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