Thursday, August 25, 2016

गंगोत्री

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26 मई को जानकी चट्टी से दिन में 1 बजे हम वापस पुराने रास्ते पर ही चल दिये और बड़कोट पहुंचे। बड़कोट से हमने गंगोत्री के लिए रास्ता बदला और धरासू की ओर चल दिये। बड़कोट से धरासू के रास्ते में कोई बड़ी नदी नहीं है पर पहाड़ों से घिरा घुमावदार रास्ता और घने जंगल बहुत अच्छे लगे। रास्ते में कई जगह सीढ़ीदार खेतों का मनमोहक दृश्य मिला जहां रूककर फोटो खींचे गये। इसी साल की गर्मियों में ही उत्तराखण्ड के जंगलों में लगी आग से बरबाद हुए जंगलों का दृश्य भी मिला। देखकर मन बहुत खिन्न हुआ। फिर ध्ररासू से उत्तरकाशी। यमुनोत्री से गंगोत्री की कुल दूरी लगभग 228 किमी है। उत्तरकाशी गंगोत्री से 100 किमी पहले स्थित है एवं यमुनोत्री से गंगोत्री यात्रा का मुख्य पड़ाव है।
हमारे ड्राइवर ने उत्तरकाशी से 4–5 किमी और आगे नेताला में हमें कमरा दिलवाया। नेताला हम शाम 5.30 बजे पहुंचे। नेताला एक छोटी सी और बहुत ही सुन्दर जगह है। उत्तरकाशी शहर की भीड़ और कोलाहल से दूर यह एक छोटा सा कस्बा है और भागीरथी किनारे घूमने–टहलने के लिए एक आदर्श स्थान है। हमारा होटल मुख्य मार्ग और भागीरथी नदी के बीच में स्थित था और हमारा कमरा ठीक नदी के सामने और इस वजह से नदी का बहुत ही मनमाेहक दृश्य कमरे में से ही दिख रहा था। खिड़कियां–दरवाजे बन्द कर लेने के बाद भी नदी का शोर जबरदस्ती कमरे में आ रहा था और यह बहुत ही रोमांचक क्षण था।
कमरा लेने के बाद यहां पर एक डाक्टर से हमने परामर्श लिया और दवा ली, तब जाकर बच्चियों की तबियत कुछ ठीक हुई। यहां हमारा तीन बेड का कमरा 1000 रूपये में था। लगा कि उत्तराखण्ड में महंगाई का ऊंचाई के साथ समानुपातिक सम्बन्ध है। अर्थात ऊंचाई बढ़ने के साथ–साथ महंगाई भी बढ़ती जाती है और ऊंचाई कम होने पर महंगाई भी कम हो जाती है। हरिद्वार में इसी तरह का कमरा 650 में,यहां 1000 में तथा जानकी चट्टी में 1200 में।

यमुनोत्री

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25 मई को सुबह 7.10 बजे हमारी इण्डिगो कार यमुनोत्री के लिये रवाना हो गयी और शाम 5 बजे जानकी चट्टी पहुंच गयी। लगभग पूरा रास्ता पहाड़ी है और साथ ही चढ़ाई वाला भी। हम देहरादून–मसूरी–बड़कोट के रास्ते होकर गये। मई का महीना था लेकिन सफर बहुत ही आनन्ददायक रहा। ऊंचे पहाड़, नदी, झरने इत्यादि ने मन मोह लिया।
हरिद्वार या ऋषिकेश से यमुनाेत्री जाने के दो रास्ते हैं– पहला ऋषिकेश से देहरादून,मसूरी,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी तथा दूसरा ऋषिकेश से नरेन्द्रनगर,चम्बा,टिहरी,धरासू,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी। हम पहले रास्ते से गये तथा दूसरे रास्ते से वापस आये। इसको यह फायदा है कि देहरादून–मसूरी भी घूम लेते हैं तथा वापसी में टिहरी झील भी देख लेते हैं।
रास्ते में मसूरी के निकट कैम्पटी फाल पर भी हम रूके व रोपवे की सवारी भी की। अच्छा रहता यदि हम पैदल ही नीचे जाते और थोड़ा टहलते–घूमते। लेकिन समय की कमी थी क्योंकि हमें यमुनोत्री पहुंचना था इसलिए हमने रोपवे का सहारा लिया और बचा हुआ समय नीचे घूमने और फोटो खींचने में लगाया। नीचे झरने का दृश्य तो बहुत ही सुन्दर है लेकिन भीड़ बहुत थी। हवा भरी ट्यूब पर बैठ कर लोग झरने का आनन्द ले रहे थे। लोगों के आने–जाने की वजह से चारों तरफ पानी और फिसलन हो गयी थी। बहुत संभलकर चलना पड़ रहा था। थोड़ी भी असावधानी हुई नहीं कि गये पानी में और बिना मेहनत के झरना स्नान हाे गया। वास्तव में कैम्पटी फाल पर जाने वाले लोग केवल फाल के लिए ही आये थे और हमारी तरह कहीं और जाने का उनका प्लान नहीं था और यही ठीक भी था। क्योंकि यहां सुबह पहुंच कर शाम तक रहा जाय और टहला–घूमा जाय तो बहुत मजा आयेगा। सन्दर्भ के लिए यहां बता दूं कि इस कैम्पटी फाल से भी बहुत सुन्दर झरने हर्सिल में हैं जिसकी लोकेशन बहुत अच्छी है और वहां भीड़ भी नहीं है लेकिन हर्सिल है बहुत दूर और केवल झरना देखने के लिए वहां जाना थोड़ा मुश्किल है।

Sunday, August 21, 2016

हरिद्वार–यात्रा का आरम्भ

हरिद्वार कहिए या हरद्वार या और कुछ भी। हरिद्वार तो इसलिए कहा जाता है कि श्री बद्रीनारायण की यात्रा या चार धाम यात्रा का शुभारम्भ इसी स्थान से होता है और उनके हरि नाम के कारण इसको हरिद्वार कहा जाता है। शिवजी के परमधाम केदारनाथ की यात्रा भी यहीं से आरम्भ होती है।
हर की पैड़ी हरिद्वार का सबसे प्रसिद्ध स्थान है। इसके अतिरिक्त हरिद्वार में पर्यटन की दृष्टि से दक्ष प्रजापति का मन्दिर,मनसा देवी,चण्डी देवी व माया देवी के मन्दिर,भीमगोडा मन्दिर व कुण्ड,सप्तर्षि आश्रम,परमार्थ आश्रम,भारत माता मन्दिर तथा शान्ति कुंज आदि प्रमुख स्थल हैं। लेकिन हम तो इनमें से किसी को भी लक्ष्‍य बनाकर नहीं चले थे। हमारा लक्ष्‍य तो कहीं और था और वह था सुरम्य प्रकृति की गोद में,पहाड़ों की शीतल घाटियों में बसे यमुनोत्री व गंगोत्री मन्दिर। ये वे स्थान हैं जहां देवदार के जंगल से ढके तथा बर्फीली चोटियों वाले पहाड़ उत्साही पर्यटकों को मूक भाव से,इशारों ही इशारों में बुलाते रहते हैं।
मेरा यह कार्यक्रम बहुत सोच विचार कर बना। क्योंकि यह पारिवारिक यात्रा थी। साथ में पत्नी संगीता व दोनेा बच्चियां सौम्या व स्नेहा थीं। परिवार और बच्चों के साथ यात्रा करना कितने झमेले वाला काम है, यह इस यात्रा में तो समझ में आ ही गया। पूरी यात्रा 23 मई 2016 से 2 जून 2016 तक कुल 11 दिन की थी। हरिद्वार जाने के लिए हमने हरिहरनाथ एक्सप्रेस में बलिया से लक्सर के लिए रिजर्वेशन कराया था।

गुलमर्ग

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23 जून को हम गुलमर्ग की तरफ चले। 18 में से 2 लोग स्वास्थ्य वगैरह कारणों से होटल में ही रूक गये। जिससे बस में जो हमारी एडजस्ट करने वाली समस्या थी वह समाप्त हो गयी। श्रीनगर से तंगमर्ग होते हुए गुलमर्ग की दूरी 50 किमी है।
कश्मीर में फूलों की घाटी के नाम से जाना जाने वाला यह सुन्दर पर्वतीय स्थल हरे–भरे मैदानों के साथ साथ गोल्फ का सर्वश्रेष्ठ मैदान भी है। कहा जाता है कि इसका नाम शिव की पत्नी गौरी के नाम पर था। सन् 1581 में यूसुफशाह द्वारा इसका नाम बदलकर गुलमर्ग कर दिया गया।
श्रीनगर शहर से बाहर निकलते हुए स्थानीय निवासयों के रहन सहन का दर्शन हुआ। वैसे तो श्रीनगर शहर में रहते हुए कई बार इच्छा हुई कि थोड़ा पैदल चलकर घूमा जाय लेकिन मन में कश्मीर के नाम जो इमेज बनी है उसने पैदल घूमने के लिए बाहर नहीं निकलने दिया। बस में बैठे–बैठे कई जगह झेलम नदी व डल झील दिखाई पड़ी लेकिन यह समझ में नहीं आया कि इनमें से कौन सी डल झील है,कौन सी झेलम नदी है और कौन सी इनमें से निकाली गयी नहर है।

Friday, August 19, 2016

श्रीनगर

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21 जून 2014 को सुबह 8.30 बजे हमारी मिनी बस श्रीनगर के लिए रवाना हुई। हमलोगों की संख्या जो कि 18 थी, के हिसाब से यह थोड़ी छोटी थी क्योंकि इसमें 17 यात्रियों के बैठने के लिए पर्याप्त जगह थी। इस वजह से इसमें एडजस्ट करने में कुछ दिक्कतें आने लगीं। कटरा से यह उसी सड़क से होकर निकली जिधर हम ठहरे थे। कटरा से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1A को पकड़ने के लिए लगभग 15 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यह राजमार्ग जालन्धर (राष्ट्रीय राजमार्ग सं0 1) से आरम्भ होकर पठानकोट,कठुआ, जम्मू, उधमपुर, कुड, बटोट, रामबन, अनन्तनाग, अवन्तीपुरा, श्रीनगर, बारामूला होते हुए उड़ी तक जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर 157 किमी की दूरी पर रामबन पड़ता है। रामबन के पहले सड़क चेनाब नदी को पार करती है। बटोट में दायें से राष्ट्रीय राजमार्ग सं0 1B निकलता है जो डोडा, किश्तवार हुए अनन्तनाग में पुनः 1A से मिल जाता है।

शिव खोड़ी

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19 जून की शाम को ही हम अगले दिन का कार्यक्रम तय करने निकले,ट्रैवल एजेन्सी में। बस स्टैण्ड के सामने स्थित मूनलाइट एजेंसी में 200 रूपये प्रति व्यक्ति की दर से सीट बुक हुई। अगले दिन 20 जून की सुबह 9 बजे से बस कटरा से शिवखोड़ी के लिए रवाना हुई। कटरा से राजौरी 154 किमी दूर है तथा शिवखोड़ी 85 किमी दूर है। जम्मू से शिवखोड़ी 100 किमी दूर है। कटरा से राजौरी जाने वाले मुख्य मार्ग में ही बीच से दाहिने कटकर एक लिंक रोड शिवखोड़ी के लिए जाती है। शिवखोड़ी में पहाड़ के अन्दर एक बहुत ही संकरी गुफा है जो देखने लायक है। वैसे तो शिवालिक हिमालय की पहाड़ियों में अनेकों गुफाएं हैं और लगभग हर गुफा का सम्बन्ध किसी न किसी देवता से है लेकिन शिवखोड़ी की गुफा का अपना विशेष महत्व है। गुफा की लम्बाई लगभग 200 मीटर तथा ऊंचाई 4 फीट है और इस गुफा से होकर गुजरना ही हमारी आज की यात्रा का मुख्य उद्देश्य था। हममें से कुछ मित्र पहले भी शिवखोड़ी गुफा देख चुके थे अतः शेष लोगों के लिए वे मार्गदर्शक का कार्य कर रहे थे।

Thursday, August 18, 2016

वैष्णो देवी दर्शन

जम्मू कश्मीर यात्रा का कार्यक्रम 17 जून 2014 से 25 जून 2014 तक कुल 9 दिनों का था और दसवें दिन की सुबह में यात्री वापस घर आ गये। यह एक बड़े समूह के साथ की गयी यात्रा थी। कुछ अध्यापक मित्रों एवं कुछ स्थानीय लोगों को शामिल करते हुए कुल 18 लाेग समूह में थे। यात्रा का मुख्य उद्देश्य वैष्णो देवी का दर्शन था लेकिन साथ ही कश्मीर का दर्शन भी हो गया। सर्वप्रथम हम बेगमपुरा एक्सप्रेस से वाराणसी से हमने 17 जून को 12.50 पर प्रस्थान किया और लगभग 24 घण्टे चलकर अगले दिन अर्थात 18 जून को दोपहर 12.10 बजे जम्मू पहुंचे। चूंकि हमारी संख्या 18 थी अतः वह सारी समस्याएं जो एक बड़े समूह को संयोजित करने में आ सकती थीं,अानी शुरू हो गयी थीं लेकिन इस तरह की यात्रा का भी एक अलग ही आनन्द था। हमलोगों का पहला कार्यक्रम वैष्णो देवी का दर्शन था अतः हमलोग जम्मू से बस पकड़कर सीधे कटरा पहुंचे। कटरा की जम्मू से दूरी 49 किमी तथा किराया 60 रूपये है। जम्मू से 1 बजे चलकर हम 3.30 बजे कटरा पहुंच गये। कटरा पहुंच कर बस चौराहे पर बायें मुड़ती है जहां बस स्टैण्ड है। सीधी सड़क बाजार में चली जाती है। इन दोनों सड़कों के बीच में से वैष्णो देवी के लिए रास्ता जाता है। दायें की सड़क शहर से होती हुई श्रीनगर चली जाती है। कटरा बस स्टैण्ड के पास ही यात्रा पर्ची काउण्टर है जहां कैमरे से फोटो लेने एवं नाम नोट करने के बाद निःशुल्क पर्ची जारी की जाती है जो बाणगंगा चेक पोस्ट तक छः घण्टे के लिए वैध होती है। यह पर्ची हमने कमरा खोजने से पहले ही बुक करा ली थी।

Sunday, August 7, 2016

हरिद्वार–मसूरी

26 मई 2010 को जी.आर्इ.सी़ प्रवक्ता की मेरी हरिद्वार में परीक्षा थी। दो मित्र और भी मिल गये जिनका भी लक्ष्‍य यही था। फिर क्या था, बन गया कार्यक्रम हरिद्वार और मसूरी की यात्रा का। अत्यधिक भीड़ होने के कारण ट्रेन में आरक्षण नहीं हो पाया और हरिहरनाथ एक्सप्रेस (मुजफ्फरपुर–अम्बाला कैण्ट) में आर.ए.सी. टिकट ही मिल पाया। हमारी ट्रेन बलिया से 24 मई को दिन में लगभग 1 बजे रवाना हुई। यह हरिद्वार होकर नहीं जाती अतः 25 मई को सुबह 7 बजे के आस–पास  हमने लक्सर में इसे छोड़ दिया। लक्सर पहुंचने के पहले ही ट्रेन में अपने क्षेत्र की तुलना में मौसम में हल्के–फुल्के अन्तर का आभास हो रहा था। चूंकि हमारी ट्रेन समय से थी अतः हमने सोच रखा था कि लक्सर से तत्काल आरक्षण द्वारा वापसी का टिकट ले लिया जाय। परन्तु लक्सर एक छोटा सा कस्बा है और इण्टरनेट द्वारा आरक्ष्‍ाण करने वाली एक ही दुकान थी जो उस दिन बन्द थी और रेलवे काउण्टर के क्लर्क की घूसखोरी की वजह से लाइन में लगे किसी भी व्यक्ति का आरक्षण नहीं हो सका। हम बेवकूफ बन कर रह गये। अन्ततः हमने हरिद्वार जाने का निश्चय किया।

Saturday, August 6, 2016

अभिलाषा

आशा की डाली हुई पल्लवित औ
प्रकाशित हुई रवि किरण हर कली में,
जगी भावनायें किसी प्रिय वरण की
सजाये सुमन उर की प्रेमांजली में,
अरेǃ तुम अभी आ गये क्रूर पतझड़
सुरभि उड़ गई, जा मिली रज तली में।

हुआ दग्ध अन्तर, उड़ा जल गगन में
बना वाष्प संग्रह, उठा भाव मन में,
कि हो इन्द्रधनु सप्तरंगी मिलन का
रहे सर्वदा रूप भासित नयन मेंं,
बरस ही गया टूट कर आसमां से
सजल कल्पना का भवन ध्वस्त क्षण में।

छ्पिाये हुए उर में पावक विरह का
चला अभ्र धारण किये मन में आशा,
ये वाहक पवन भी तो है किंतु निष्ठुर
उड़ाये निरूद्देश्य होती निराशा,
ह्रदय चीरकर के किया जग उजाला
नहीं बुझ सकी किन्तु दर्शन पिपासा।

उषा के नयन से बरसते तुहिन कण
सजा सुप्त सरसिज, हुआ गात कम्पित,
पवन भी चला मंदरव में सुगन्धित
जगी चेतना तब हुए पत्र पुलकित,
किया दृग अनावृत न देखा किसी को
मिला अश्रुकण भी न, है पुष्प कुसुमित।

छ्पिा शुभ्र दिनकर, घना श्याम अम्बर,
उठा कंप  मन में, उठी एक ईहा,
बुझे प्यास मन की, मिले एक जीवन
सुखद अनुभवों की करूं फिर समीहा,
गिरा सीप में बन गया बिन्दु मोती
तृषित रह गया चिरतृषित ही पपीहा।

Thursday, August 4, 2016

ठूंठ

त्याग दिये पत्ते क्यों, हे तरूǃ
हारे बाजी जीवन की।
क्यों उजाड़ते हो धरती को,
हरते शोभा उपवन की।
हुए अचानक क्यों तुम निष्ठुर,
बहुत सुना तेरा गुणगान,
पर उपकारी, बहु गुणकारी,
तरू धरती का पुत्र महान।
सोच लिया क्या करूं पलायन,
देख विकट इस जग की मार,
छाेड़ चले ‘तरू बन्धु‘, ‘धरा मां‘,
‘पिता व्योम‘ का अनुपम प्यार।
धैर्य, अचलता और उदारता,
बिखर गये तेेरे आदर्श।
पश्चाताप नहीं थोड़ा भी,
कर तो लेते जरा विमर्श।
शायद, असली रूप यही है,
पार्थǃ देख लो ‘माधव‘ का,
ढोंग नहीं आता है, जिसको
‘ठूंठ‘ नाम उस मानव का।