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कुछ देर में बारिश कुछ हल्की हो गयी। बादल भी छँटने शुरू हो गये थे। हिमालय की चोटियों के होने का कुछ–कुछ एहसास होना शुरू हो गया था। ये भी एहसास हो रहा था कि अगर बादल नहीं होते तो नजारा कैसा होताǃ
मंदिर परिसर में एक–दो चक्कर लगाने के बाद 5 बजे मैं वापस लौट पड़ा। वो चारों सतयुगी बन्दे भी मंदिर छोड़कर बाहर निकल चुके थे लेकिन मैं उनसे दूरी बनाए हुए था।
