Friday, May 25, 2018

बुरहानपुर–यहाँ कुछ खो गया है

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27 मार्च
आज मुझे बुरहानपुर घूमना था। सो 7 बजते–बजते कमरे से निकल पड़ा। पुराने बसे बुरहानपुर की गलियों से होते हुए मुझे तापी नदी के किनारे बने बुरहानपुर किले की ओर जाना था। तापी के किनारे भी टहलना था और बन सके तो कलेजा कड़ा करके कुछ भुतहे खण्डहरों की टोह भी लेनी थी। पूछते–पूछते किले की ओर चल पड़ा। लगभग दो किलोमीटर की दूरी है। मन उछल रहा था कि इठलाती तापी से मुलाकात होगी। क्योंकि ओरछा में बेतवा ने मन को सम्मोहित कर लिया था। वही उम्मीद आज बुरहानपुर में तापी से भी थी।
लेकिन आधे घण्टे बाद जब तापी किनारे पहुँचा तो कराहती हुई तापी दिखी और मन खिन्न हो गया। लगा कि यहाँ कुछ खो गया है। यहाँ एक छोटी सी बात स्पष्ट कर दूँ कि इस नदी का नाम हिन्दी में ताप्ती है लेकिन मराठी में इसे तापी ही कहते हैं। बुरहानपुर भले ही मध्य प्रदेश का जिला है लेकिन इस पर अधिक प्रभाव महाराष्ट्र का ही दिखाई पड़ रहा था। क्योंकि इसकी सीमाएं चारों ओर से मराठी इलाकों से ही मिलती हैं। तापी के उस पार जाने के लिए पुल का निर्माण कार्य चल रहा है। भयानक धूल–धक्कड़ है। मैं किले की ओर लौट पड़ा। किला नदी के किनारे पर ही है लेकिन इसका प्रवेश शहर की ओर से है। इसलिए मुझे कुछ दूर चलकर वापस आना पड़ा। रास्ता पूछा तो पता चला कि किले के गेट तक पहुँचने के लिए आधे किलाेमीटर का चक्कर लगाना पड़ेगा। लेकिन एक व्यक्ति ने शार्टकट बता दिया– वो धूलभरी पगडण्डी से होकर ऊपर चढ़ जाइए। पाँच मिनट में पहुँच जायेंगे। मुझे पगडण्डी और पक्की सड़क से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। पगडण्डी किले की दीवार के बगल में ही है। पगडण्डी के दोनों ओर झोपड़ियां बनी हुई हैं। सँकरी गलियाें से होते हुए बैकडोर से मैं किले के गेट तक पहुँचा। किले के अन्दर बने पार्क में काफी भीड़ दिख रही थी। मैं बहुत आश्चर्य में पड़ा कि मुझसे पहले इतने लोग यहाँ कैसे पहुँच गये। बगल में ही टिकट काउण्टर बना हुआ है। टिकट की दर 15 रूपये। मैंने पैसे बढ़ाये तो काउण्टर पर बैठे कर्मचारी ने पैसे जेब में रख लिए और मुझे जानकारी दी– "सर्वर डाउन होने की वजह से टिकट नहीं निकल रहा है। आप वैसे ही अन्दर ही चले जाइए। जैसे ही सर्वर ठीक होगा मैं आपको टिकट दे दूँगा।" यह कहते हुए उसने गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी को कुछ इशारा किया और मैं गेट से अन्दर दाखिल हो गया। वैसे मैं यह भी सोच रहा था कि जब सर्वर नहीं काम रहा है तो पैसे लेने का क्या तुक है।

जब मैंने किले के अन्दर प्रवेश किया तो यहाँ का नजारा कुछ अजीब सा था। प्रायः किलों में पायी जाने वाली विशाल खण्डहरनुमा इमारतें गायब हैं। कुछ इमारतें हैं लेकिन काफी सूना–सूना सा लगता है। लगा कि यहाँ कुछ खो गया है। बस सुबह के समय टहलने वालों ने किले को गुलजार कर रखा था। किले के नीचे तापी में पानी पर्याप्त दिख रहा था लेकिन बिना प्रवाह के। किले की चारदीवारी के अन्दर बने पार्क के रास्तों पर लोग टहल रहे थे यानी मार्निंग वाक कर रहे थे। कुछ लोग योगासन कर रहे थे तो कुछ बाबा रामदेव की भाँति "फूँ–फाँ" कर रहे थे। कुछ भारी शरीर वाली महिलाओं के लिए तो सीढ़ियां चढ़ना भी मुश्किल हो रहा था। और मैं इन सबसे अलग इसी पशोपेश में था कि इन टहलने वालों के बीच में मैं एक बेवकूफ घुमक्कड़ कहाँ से आ गया। लेकिन अब तो आ गया था।

बुरहानपुर वैसे तो काफी पुराना बसा शहर है लेकिन इसका प्राचीन इतिहास पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। प्राचीन भारत के इतिहास में राष्ट्रकूट शासकों के समय भी सम्भवतः बुरहानपुर का अस्तित्व किसी और नाम से था। मध्य काल में यह एक प्रमुख शहर के रूप में अस्तित्व में आया। 1388 ई0 में खानदेश के फारूकी वंश के सुल्तान मलिक नासिर खान ने बुरहानपुर को अपने अधिकार में ले लिया और प्रसिद्ध सूफी संत बुरहान–उद्दीन के नाम पर इसका नामकरण किया। बाद में यह शहर खानदेश सल्तनत की राजधानी बना। कालान्तर में इसी वंश के मीरन आदिल खान दि्वतीय ने यहाँ एक किले और कुछ महलों का निर्माण कराया। इस सुल्तान के शासन काल में ही बुरहानपुर एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ। 1601 में मुगल शासक अकबर ने खानदेश सल्तनत पर अधिकार कर लिया। बुरहानपुर के शाही महल में 1631 में चौदहवीं संतान के जन्म के समय मुगल बादशाह शाहजहाँ की बेगम मुमताज महल की मृत्यु हो गयी। ऐसा माना जाता है कि मुमताज महल के शरीर को छः महीने तक बुरहानपुर में ही सुरक्षित रखा गया और उसके बाद आगरा ले जाया गया जहाँ उसे अन्तिम रूप से दफनाया गया और उसी स्थान पर ताजमहल का निर्माण हुआ। वैसे मुमताज महल के शरीर को छः महीने तक बुरहानपुर में रखने पर तो विवाद नहीं है लेकिन किस स्थान पर रखा गया,इस पर विवाद है। भारतीय पुरातत्व विभाग भी इस तथ्य पर स्पष्ट नहीं है। क्योंकि राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार मुमताज महल का शव अहूखाना में रखा गया था जबकि भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार अहूखाना से कुछ दूरी पर एक दूसरे स्थान पर यह कार्य किया गया था। इन दोनों स्थानों पर तत्कालीन समय की पुरानी इमारतें बनी हुई हैं।

किले के कर्मचारियों से पूछने पर पता चला कि बुरहानपुर किले के इस भाग में शाही हमाम भी है। इस शाही हमाम का निर्माण मुमताज महल के शाही स्नान के लिए किया गया था। किले की बाकी इमारतें साधारण ही हैं या फिर सम्भवतः साधारण इसलिए लगती हैं कि ये अब खण्डहर के रूप में ही बची हैं। ऐसा लगता है जैसे कुछ खो गया है। दरअसल जहाँ मैं आज घूमने के लिए पहुँचा था वह किला न होकर किले में ही बना शाही महल है। यह शाही महल तापी के दाहिने किनारे पर 80 फीट की ऊँचाई पर बना है। इस महल का निर्माण आदिल शाह दि्वतीय ने कराया था। प्रारम्भ में इस महल में सात मंजिलें थीं जो अब नष्ट हो चुकीं हैं। महल के पूर्व की ओर ईंटों से बना विशाल द्वार है जहाँ से तापी नदी दिखाई पड़ती है। पुराना बुरहानपुर शहर ही किले के अन्दर बसा है। शहर के कई भागों में किले की दीवारों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। लेकिन वर्तमान में किले जैसा कुछ अगर दिखता है तो वह तापी के किनारे इसी स्थान पर जहाँ मैं वर्तमान में खड़ा था। तो जो भी इमारतें यहाँ बची–खुची हैं और पुरातत्व विभाग ने उन्हें संरक्षित कर रखा है,वही अब किले के नाम से प्रसिद्ध हो गयी हैं। इन्हीं इमारतों को कैमरे में कैद करने के बाद मैं किले से बाहर निकल पड़ा। अब तक किले में टहलने आए लोग भी बाहर निकलने लगे। बाहर आकर जब मैंने टिकट काउण्टर पर बैठे व्यक्ति से बहस की तो पता चला कि किले में टहलने के लिए सालाना पास भी बनता है। और तब मुझे समझ में आया कि पुरातत्व विभाग किले के नाम का अच्छा सदुपयोग कर रहा है। इसी आदमी से पता चला कि नदी के उस पार के गाँवों के बीच में भी कुछ पुरानी इमारतें हैं जो देखने लायक हैं।
अब मैं किले से निकल कर तापी किनारे आ गया और तापी के उस पार जाने की जुगत में लगा। दाहिनी तरफ कुछ दूरी पर पक्के पुल का निर्माण कार्य चल रहा था और इससे कुछ और आगे एक कच्चा पुल भी दिखाई पड़ रहा था। कच्चा पुल क्या था,कच्चा रास्ता था और इसी रास्ते के बीच में एक स्थान पर लगे कुछ पाइपों के बीच में से तापी नालियों की तरह चुपके से सरक कर निकल जा रही थी। नदी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था। तापी की यह दशा देखकर बहुत दुख हुआ। इसी कच्चे रास्ते से होकर मैं उस पार चला गया। अब नदी के इस पार तो शहर बसा है तो शहर जैसा लगता है। उस पार गाँव बसा है तो गाँव जैसा ही लगेगा। और नदी के किनारे के गाँव और रास्ते कैसे होते हैं यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। एक कच्चा रास्ता गाँव की ओर जा रहा था और चूँकि रास्ता ढलान वाला है तो उस पार से नदी में आकर मिलने वाला नाला भी इस रास्ते से होकर ही आएगा और नदी पर पुल का निर्माण कार्य जारी है तो ट्रैक्टर वगैरह भी इसी रास्ते से होकर आएंगे तो फिर इस रास्ते के सौन्दर्य का क्या पूछनाǃ इस रास्ते पर चलना किसी कठिन हिमालयी ट्रेक पर चलने से कम नहीं था। मैं इसी पर थोड़ी दूर आगे बढ़ा तो नाले से मुक्ति मिली और धूल का साथ मिला। गाँव में प्रवेश करने से पहले कुछ दूरी के लिए पक्के रास्ते से मुलाकात हुई। पीठ पर बैग और गले में कैमरा देखते ही गाँव के युवकों ने मोटरसाइकिल का आॅफर देना शुरू कर दिया। मुझे लगा कि सारा गाँव ही बेरोजगार है और टूरिस्ट गाइड बनने के फेर में है। गाँव से बाहर का रास्ता फिर वही धूल वाला ही है। वैसे मुझे जाना तो ग्यारह नम्बर की जोड़ी पर ही था सो सारे ऑफर को नजरअंदाज करता हुआ मैं धूल भरे रास्ते पर अपने जूतों और घुटने से नीचे की पैंट को धूल के रंग में रंगता हुआ और रास्ता पूछते हुए चलता रहा।

नदी के इस पार मुझे दो स्थानों पर जाना था– एक तो था अहूखाना और दूसरा था मुमताज महल की कब्र। पुरातत्व विभाग ने इन स्थानों पर मरम्मत का काम किया तो है लेकिन पर्याप्त नहीं। रास्ते की तो बात ही छोड़ दीजिए। वैसे खेतों के बीच की मेड़ों और पतले कच्चे रास्तों पर चलना भी काफी आनन्ददायक है। थोड़ी दूरी पर एक जगह सरपत और झड़ियों भरी त्रिमुहानी मिली जहाँ से दाहिनी ओर अहूखाना के लिए रास्ता अलग हो गया था। सिर पर बोझ लेकर जाती एक महिला से रास्ता पूछकर मैं अहूखाना की ओर मुड़ गया।
अहूखाना एक काफी लम्बी–चौड़ी चारदीवारी से घिरा हुआ है। मैं वहाँ पहुँचा तो कोई नहीं था। थोड़ी देर बाद मेरा साथ देने के लिए कुछ बकरियों ने वहाँ प्रवेश किया। अहूखाने का निर्माण मध्य काल में फारूकी शासकों ने शिकारगाह के रूप में कराया था। अहूखाना का अर्थ है– हिरनों का बाड़ा। बाद में मुगल काल में भी कुछ निर्माण अहूखाने में कराए गए। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार मृत्यु के बाद मुमताज महल के शव को इसी स्थान पर सुरक्षित रखा गया था। लेकिन इस समय तो यही लगता है कि यहाँ कुछ खो सा गया है।
अहूखाना से निकलकर मैं वापस लौटा और मुमताज महल की कब्र की ओर जाने के लिए रास्ते की खोज में पड़ा। लेकिन न तो रास्ता मिल रहा था न ही कोई बताने वाला मिल रहा था। तभी खेतों में काम कर रही एक महिला दिखी जो मेरी गतिविधियों से मेरा मंतव्य समझ चुकी थी। उसकी बातें तो मैं ठीक से नहीं समझ रहा था फिर भी उसने इशारे से मुझे रास्ता बताया। रास्ता क्या था,खेतों के बीच बनी पगडण्डी थी। इन खेतों में गन्ना बोया गया था जिनको देखकर लग रहा था कि जल्दी ही इनकी सिंचाई की गयी है। महिला जिन खेतों में काम कर रही थी उनके बगल में कुछ महुए के पेड़ लगे थे। इन पेड़ाें की छाया में प्लास्टिक के कुछ बड़े–बड़े पीपे रखे हुए थे जिनमें से काफी तेज दुर्गन्ध आ रही थी। मैंने पास जाकर देखा तो इनमें महुआ सड़ रहा था। चांस तो अच्छा था लेकिन काफी रिस्क था।

मैं गीली मिट्टी में पैर रखने से डर रहा था लेकिन महिला के कहने पर मैं खेतों में घुस गया। दरअसल मेरा पाला कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध काली मिट्टी से पड़ा था। भूगोल की किताबों में आजतक काली मिट्टी के बारे में पढ़ता आया था लेकिन इसके दर्शन नहीं हुए थे। और जब अपनी समझ से गीली दिख रही मिट्टी पर पैर रखा तो वास्तविकता समझ में आई। इस मिट्टी के ढेले तो पत्थर की तरह कठोर थे और जब मैंने इनपर पैर रखा तो ये जूते के नीचे से भी चुभने लगे। वैसे समस्या अभी इतनी सी ही नहीं थी। थोड़ा ही आगे बढ़ने पर दो कुत्तों ने मेरे ऊपर हमला कर दिया। लेकिन मैं भी किसी यूनानी योद्धा की तरह उनसे भिड़ गया। देहाती कुत्ता विज्ञान का जानकार होने के कारण मैंने भी दोनों हाथों में काली मिट्टी के कई ढेले उठा लिए और उन कुत्तों से डरकर भागने की बजाय उन पर ताबड़तोड़ हमले कर दिये। कुछ सेकेण्डों के भीषण युद्ध के उपरान्त वे दोनों कुत्ते पीछे हट गये और मैं विजयी शाहजहाँ की भाँति मुमताज महल की कब्र की ओर बढ़ गया।
अहूखाने से कुछ ही दूरी पर खेतों के बीच में एक साधारण सी पुरानी इमारत खड़ी है। इसी परिसर में एक नई इमारत भी बनी हुई है। ऐसा माना जाता है कि आगरा में अन्तिम रूप से दफनाए जाने के पहले मुमताज महल के शव को इसी स्थान पर दफनाया गया था। इस आशय का एक बोर्ड भी इस परिसर के बाहर लगा है। लेकिन इस बोर्ड पर लिखी गई सूचना इतनी मिट गयी है कि पढ़ने लायक नहीं बची है। यहाँ तो शायद सब कुछ खो गया है।
नदी उस पार से लौटते समय मैं बुरहानपुर के बारे में ही सोच रहा था। मेरी तरह बुरहानपुर घूमने शायद ही कोई आता है। कोई आता भी है तो असीरगढ़ के नाम पर। बुरहानपुर तो अपना लम्बा–चौड़ा इतिहास रखने के बावजूद उसी इतिहास की गलियाें में कहीं खो गया है। मुमताज महल का मकबरा यानी ताजमहल को तो सब जानते हैं लेकिन उन कड़ियों को कोई नहीं जोड़ता जो ताजमहल तक ले जाती हैं। 
तापी के उस पार इन दोनों स्थानों की खोज करने के बाद मैं वापस लौटा और लगभग 10.30 बजे तक बुरहानपुर के बस स्टैण्ड पहुँच गया। अर्थात लगभग साढ़े तीन घण्टे का पैदल मार्च। यहाँ लौटकर मैंने बस स्टैण्ड के पास स्थित एक रेस्टोरेण्ट में नाश्ता किया और होटल पहुँचकर चेकआउट किया।

अब मेरा अगला पड़ाव ओंकारेश्वर था। लेकिन ओंकारेश्वर के लिए बुरहानपुर से सीधी बस नहीं है इसलिए 11 बजे मैंने इन्दौर जाने वाली बस पकड़ी। बुरहानपुर से इन्दौर जाने वाली सड़क यावल वन्यजीव अभयारण्य के पूर्वी भाग से होकर गुजरती है। असीरगढ़ भी इस वन्यजीव अभयारण्य का ही भाग है। अभयारण्य के इस भाग में छोटी पहाड़ियों के बीच खुला हुआ जंगल है। सूखे मौसम में देखकर लगता ही नहीं है कि यह जंगल है। क्योंकि पेड़ों पर सिर्फ डालियां ही बची हैं। पत्तियां तो सूखे मौसम की भेंट चढ़ गयीं हैं। सड़क में तीखे मोड़ तो हैं लेकिन चढ़ाई–उतराई नहीं है। वैसे ऐसे भूदृश्य का भी अपना ही सौन्दर्य है। यह विरल आबादी वाला क्षेत्र है। धरातल भी पथरीला है और इस वजह से कृषि सम्बन्धी गतिविधियां शायद ही कहीं दिखाई पड़ती हैं।
मेरी अपनी समझ से बुरहानपुर इन्दौर मुख्य मार्ग पर ओंकारेश्वर जाने के लिए मुझे सनावद उतर जाना चाहिए था लेकिन कण्डक्टर की सलाह मानकर मैं मोर्टक्का तक चला गया। बुरहानपुर से सनावद की दूरी 110 किमी है जबकि मोर्टक्का सनावद से 5–6 किमी और आगे है। किराया 120 रूपये। सनावद से ओंकारेश्वर की दूरी 13 किमी है जबकि मोर्टक्का से 12 किमी। अर्थात दोनों में कोई खास अन्तर नहीं है फिर भी मेरी समझ से सनावद बेहतर रहता। मोर्टक्का के मुख्य बाजार से लगभग आधा किमी पहले ओंकारेश्वर जाने के लिए दायें हाथ एक सड़क निकलती है। 2.30 बजे मैं मोर्टक्का पहुँचा। यह बताने के बावजूद कि मुझे ओंकारेश्वर जाना है,कण्डक्टर मुझे मोर्टक्का के बाजार तक लेकर चला गया और फिर मुझे धूप में यह दूरी पैदल ही वापस लौटनी पड़ी। मुख्य मार्ग से अलग होकर ओंकारेश्वर जाने वाली रोड पर ऑटो लगी थी जिसमें एक भी सवारी नहीं थी। जाहिर है कि मुझे कुछ देर तक इन्तजार करना ही था। धूप में आधे घण्टे इन्तजार के बाद ऑटो ओंकारेश्वर के लिए रवाना हुई।


बुरहानपुर की सड़कों पर पुराने जमाने का आॅटो
तापी किनारे शाही महल


शाही हमाम

तापी के उस पार से शाही महल का दृश्य
अहूखाना







अहूखाना परिसर में बारादरी


मुमताज महल की कब्र


अगला भाग ः ओंकारेश्वर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. असीरगढ़–रहस्यमय किला
2. बुरहानपुर–यहाँ कुछ खो गया है
3. ओंकारेश्वर–शिव सा सुंदर
4. महेश्वर
5. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (पहला भाग)
6. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (दूसरा भाग)
7. धार–तलवार की धार पर

बुरहानपुर का गुगल मैप–

8 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रास बिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी।

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  2. देहाती कुत्ता विज्ञान यह पहली बार सुना...बुरहानपुर शहर वाले खुद इतना बुरहानपुर नही घुमें होंगे जितना आपने इतनी दूर से जाकर घुमा है

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    1. अब देहात में रहते रहते देहाती कुत्तों से भी परिचय हो ही गया है।

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  3. बुरहानपुर अच्छी तरह घूमा दिया आपने पाण्डेय जी .

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद नरेश जी। आगे भी आते रहिए।

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  4. फेसबुक से यहां पहुंचा..पढ़कर मजा आ गया ....पैदल खेत में..गांव वाले भी सोच रहे होंगे कौन पागल है जो बियावन में आ गया है

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    1. बहुत अच्छा लगा जो आप आए। बहुत बहुत धन्यवाद। आगे भी आते रहिए। वैसे अन्जानी जगहों पर घूमना बहुत अच्छा लगता है।

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