Friday, December 17, 2021
Friday, December 10, 2021
Friday, December 3, 2021
Friday, November 26, 2021
Friday, November 19, 2021
Friday, November 12, 2021
Friday, November 5, 2021
Friday, October 29, 2021
Friday, October 22, 2021
Friday, October 15, 2021
Friday, October 8, 2021
Friday, October 1, 2021
Friday, September 24, 2021
Friday, September 17, 2021
Friday, September 10, 2021
Friday, September 3, 2021
Friday, August 27, 2021
Friday, August 20, 2021
Friday, August 13, 2021
भीमबंध के जंगलों में
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सुबह के 8.30 बजे मैं भागलपुर से सुल्तानगंज की ओर चल पड़ा। इसी रास्ते पर भागलपुर के पास ही,नाथनगर में एक जैन मंदिर के बारे में पता चला था। लेकिन यह मंदिर किस गली में था,मैं नहीं ढूँढ़ पाया। कई लोगों से पूछने के बाद भी इसका सही पता नहीं लग पाया। अधिक समय नष्ट करना भी मुनासिब नहीं था। अगले एक घण्टे में मैं सुल्तानगंज के गंगा घाट पर था। रास्ते में अत्यधिक ट्रैफिक मिला। सुल्तानगंज का नाम मैंने बहुत सुन रखा था। मेरे गाँव के मित्र यहीं से काँवड़ लेकर देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम तक की लगभग 104 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते रहे हैं। मेरे साथ ऐसा दुर्भाग्य रहा कि मैं एक बार भी काँवड़ न ले जा सका।
Friday, August 6, 2021
मंदार पहाड़ी पर
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विक्रमशिला के बाद अब मेरी अगली मंजिल थी– मंदार पहाड़ी। वैसे तो यहाँ जाने के लिए बारिश का मौसम ही बेहतर होता है क्योंकि उस समय पर्याप्त हरियाली होती है,लेकिन मुझे तो अप्रैल का महीना ही मिला था। वो कहते हैं न कि सावन के अंधे को हर जगह हरा ही सूझता है,तो मुझे भी घूमने के लिए किसी मौसम की दरकार नहीं होती। अब मुझे कहलगाँव और उससे आगे मंदार हिल तक जाना था। भरी दुपहरी और आगे मिलने वाले रास्ते के बारे में सोचकर ही रूह काँप रही थी। लेकिन जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डरǃ भागलपुर–कहलगाँव वाली सड़क के दोनों किनारे बने ईंट–भट्ठों को कोसते हुए मैं चलता रहा। खराब सड़क का डर मन में इतना गहरे पैठ गया था कि मंदार हिल जाने के लिए गलत रास्ता पकड़ लिया।
Friday, July 30, 2021
विक्रमशिला–गौरवशाली अतीत
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4 लेन के बरौनी–पूर्णिया हाइवे पर मेरी बाइक धुआँधार भागने लगी। लेकिन यह खुशी कुछ ही किलोमीटर जाने के बाद काफूर हो गयी। दरअसल यह एक निर्माणाधीन हाइवे है और काफी दूर तक मुझे गिट्टी पड़ी सड़क पर ही चलना पड़ा। अभी इसे फोर लेन बनाने की शुरूआत भर हो सकी है। लब्बोलुआब ये कि सड़क दो लेन की ही थी और नतीजा ये कि यात्रा में समय अधिक लगने वाला था। अब मेरी मंजिल थी भागलपुर या फिर भागलपुर के आस–पास स्थित कोई अन्य महत्वपूर्ण स्थल। लगभग सीधी सड़क कभी गंगा के पास तो कभी दूरी बनाते हुए चल रही थी। खगड़िया के बाद तो यह गंगा और कोसी के दोआब क्षेत्र में प्रवेश कर गयी। वैसे तो यह अप्रैल का महीना था लेकिन नदियों ने पर्याप्त हरियाली उपजा रखी थी।
Friday, July 23, 2021
राजनगर–एक भूली बिसरी कहानी
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सीतामढ़ी एक घना बसा हुआ पुराना शहर है। रेलवे स्टेशन के पास से गुजरती दो लेन की सड़क के बीच डिवाइडर बना हुआ है। वैसे यह डिवाइडर काफी पुराना है। दो लेन की सड़क पर डिवाइडर मैंने पहली बार देखा था। रात को होटल में कमरा लेने के बाद मैं शहर की सड़कों पर टहलने निकल पड़ा था और उसी समय इस डिवाइडर के दर्शन हुए। वैसे तो सीतामढ़ी के बारे में मुझे अधिक कुछ पता नहीं लेकिन इतना जरूर पता था कि यह माँ सीता की जन्मस्थली के रूप में विख्यात रहा है। उस स्थान पर जरूर कोई न कोई मंदिर बना होगा। वहाँ जाने की उत्सुकता मेरे मन में बनी हुई थी लेकिन इस समय रात हो चुकी थी और अब कल ही वहाँ जाना संभव था। पड़ोस में बसे रेस्टोरेण्ट में ʺसाधारणʺ खाना खाकर सीतामढ़ी की सड़कों पर पैदल टहलना पता नहीं क्यों, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। दिन भर की धूप की तपिश में जला शरीर ठण्डक का एहसास कर रहा था। कुछ तो है इस आध्यात्मिक शहर में।
Friday, July 16, 2021
अशोक की स्मृतियाँ-2
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अगले दिन सुबह उठने में देर हो गयी। यह देरी बाइक से यात्रा करने के नियम के विरूद्ध है। गर्मी के दिनों में बाइक की यात्रा सुबह जल्दी शुरू हो जानी चाहिए। मुझे होटल से निकलने में 8 बज गये। आज के मेरे गंतव्य पूर्व–निर्धारित थे– लौरिया अरेराज और रामपुरवा का अशोक स्तम्भ एवं केसरिया का स्तूप। अरेराज के अशोक स्तम्भ और केसरिया के स्तूप के बारे में तो मुझे कुछ–कुछ पता था लेकिन रामपुरवा की तो मुझे लोकेशन ही नहीं पता थी कि ये है कहाँ? इसके बारे में कोई बताने वाला भी अब तक नहीं मिला था। पूछताछ करने पर इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। लेकिन मुझे जाना था,इतना पूरी तरह सुनिश्चित था। मुझे एक संक्षिप्त सी सूचना अवश्य मिली थी। कल जब मैं लौरिया नंदनगढ़ में अशोक स्तम्भ के पास से लाैट रहा तो मुझे नरकटियागंज जाने वाली सड़क पर एक बोर्ड दिखा था जिस पर भितिहरवा स्तम्भ लेख और रामपुरवा का नाम लिखा दिखायी पड़ा था। बस इसी को आधार बना कर,गूगल मैप के सहारे निकल पड़ा।
Friday, July 9, 2021
अशोक की स्मृतियाँ-1
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नर देवी मंदिर से जब मैं बाहर निकला तो दिन के डेढ़ बज रहे थे। फिर भी गर्मी कुछ खास नहीं महसूस हो रही थी। दूर–दूर तक जंगल की छाया होने का यह असर था। जोर की भूख लग रही थी। रास्ते में खायी गयी सुबह की जलेबियों का असर समाप्त हो चुका था। लेकिन वाल्मीकि नगर के छोटे से बाजार में भाेजन की कहीं भी संभावना नहीं दिख रही थी। एक दो होटलों के बोर्ड कहीं दिखे लेकिन वे बंद थे। इस कोरोना–पीड़ित कलियुग में कौन यहाँ खाना खाने आएगा। एक दुकान पर समोसे दिखे। तो समोसे और कोल्ड ड्रिंक का लंच हुआ और फिर आगे का रास्ता। कुछ किलोमीटर तक तो दो लेन की अच्छी सड़क का साथ रहा लेकिन उसके बाद सड़क ने अपना रूप बदलना शुरू कर दिया। कहीं एक लेन,कहीं डेढ़ लेन तो कहीं पौने दो लेन की सड़क मिल रही थी। ऐसी मायावी सड़क मैंने पहले नहीं देखी थी।
Friday, July 2, 2021
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व की यात्रा
पिछली बार की तरह जब इस बार भी कुछ लोगों ने टोका कि यार,क्या बिहार जा रहे होǃ तो एकबारगी मेरे मन में भी शंका बलवती होने लगी। सच मेंǃ है ही क्या बिहार में। लेकिन सच कहूँ तो यह कुछ न होना ही मुझे बिहार की ओर खींच ले जाता है। न कोई बंदिश,न भेदभाव,न किसी तरह की कोई बाधा,न अनुशासन। मैं भी इसी तरह की माटी का बाशिंदा हूँ। फिर मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। कुछ होने का आकर्षण तो होता ही है लेकिन कुछ न होने का भी अपना आकर्षण है। ऐसा कैसे हो सकता है कि धरती के एक बड़े टुकड़े पर कुछ हो ही न जो मानवमात्र को आकर्षित कर सके। ऐसी ही क्रिया–प्रतिक्रिया और अंतर्द्वंद्व मन में समेटे मैंने दो पहियों वाले घोड़े यानी बाइक पर,मार्च के अंतिम सप्ताह में अपने बैग बाँध दिये। कोरोना के नाम ने ही शरीर में जंग लगा रखी है। और शायद सच कहूँ तो मन–मस्तिष्क में भी जंग लग रही है। इसे साफ करना है तो इसे चलाना होगा। मानव का स्वभाव है– चरैवेति,चरैवेति।
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