Friday, June 28, 2019

राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (तीसरा भाग)

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अब मेरी अगली मंजिल थी– विश्व शांति स्तूप। ब्रह्म कुण्ड से लगभग 2-2.5 किमी आगे चलने पर मुख्य सड़क छोड़कर बायें हाथ एक सड़क निकलती है जहाँ विश्व शांति स्तूप के बारे सूचना दी गयी है। मैं इसी सड़क पर मुड़ गया। लगभग 200 मीटर की दूरी पर सड़क के बायें किनारे जीवक आम्रवन के अवशेष हैं। यह वह स्थान है जहाँ राजवैद्य जीवक ने,चचेरे भाई देवदत्त द्वारा भगवान बुद्ध को आहत किये जाने पर उनके घावों पर पटि्टयां बाँध कर उनका इलाज किया था। जीवक ने यहाँ पर बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए एक विहार का निर्माण भी करवाया था।

Friday, June 21, 2019

राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (दूसरा भाग)

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मेरा अगला पड़ाव था– मनियार मठ। इसके लिए मुझे ब्रह्मकुण्ड से लगभग 1 किमी की दूरी तय करनी थी। ब्रह्मकुण्ड के पास की बस्ती के बाद मानव आवास लगभग समाप्त हो जाते हैं और राजगीर पीछे छूटने लगता है। मुख्य मार्ग पर लगभग 1 किमी चलने के बाद दाहिनी तरफ एक पतली सड़क निकलती है। दायें मुड़ते ही बायीं तरफ एक स्मारक परिसर दिखायी पड़ता है। परिसर की चारदीवारी से सटकर बाइक खड़ी करते ही एक चारपहिया गाड़ी से कुछ लोग उतरे और मुझसे पहले ही अन्दर पहुँच गये। अन्दर बैठे एक दुबले पतले शख्स ने उन्हें लपक लिया। मैं समझा कोई कर्मचारी होगा।

Friday, June 14, 2019

राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (पहला भाग)

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दिन के 2 बजे जब राजगीर पहुँचा तो सुबह के 7 बजे देवघर से निकलने के बाद 290 किमी बाइक चला चुका था। यह दूरी बहुत अधिक नहीं थी लेकिन तेज धूप में यह दूरी दुगुनी महसूस हो रही थी। शरीर की सारी ताकत को धूप ने सोख लिया था। पानी का बोझ सँभालते–सँभालते पेट थक गया था। फिर भी पहले राजगीर में रहने का ठिकाना ढूँढ़ना था। क्योंकि दिन भर की यात्रा के बाद आराम की जरूरत महसूस हो रही थी। मेरी समझ से यह ऑफ सीजन था फिर भी एक सस्ता कमरा ढूँढ़ने में पसीने छूट गये। पर्यटकों के लिए यह भले ही ऑफ सीजन था लेकिन शादी–विवाह के लिए यह पीक सीजन था।

Friday, June 7, 2019

देवघर

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15 अप्रैल
सुबह के 5.15 बजे मैं लालगंज से अपने मित्र के घर से रवाना हो गया। मेरी अगली मंजिल थी–बाबा वैद्यनाथ का घर यानी देवघर। लेकिन मंजिल तक पहुँचने से पहले लम्बी यात्रा करनी थी। प्राथमिकता थी कि सुबह के ठण्डे मौसम में जितनी भी अधिक दूरी तय करनी संभव हो,तय हो जाय। उसके बाद तो धूप में जलना ही था। मुझे हाजीपुर व पटना के अलावा दोनों शहरों के बीच गंगा नदी पर बने गाँधी सेतु को भी पार करना था। सुबह के समय भी सड़कों पर काफी ट्रैफिक था जिस कारण स्पीड नहीं बन पा रही थी। गाँधी सेतु पर तो जाम ही लगा था क्योंकि एक तरफ की लेन की मरम्मत चल रही थी।