Friday, October 25, 2019

देवप्रयाग–देवताओं का संगम

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देवप्रयाग भागीरथी और अलकनन्दा के संगम पर बसा पवित्र स्थान है। देवप्रयाग की प्रसिद्धि यहाँ बने रघुनाथ मंदिर के कारण भी है। रघुनाथ मंदिर के अन्दर काले पत्थर की बनी,6 फुट ऊँची रघुनाथ जी की मूर्ति विराजमान है। कहते हैं देवप्रयाग के इस प्राचीन मंदिर का निर्माण शंकराचार्य ने कराया था। बाद में गढ़वाल राजवंश ने इस मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। इस स्थान का नाम देवप्रयाग होने के पीछे भी एक कहानी है। कहते हैं कि देवशर्मा नाम ऋषि ने यहाँ भगवान विष्णु की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया और तबसे उस ऋषि के नाम पर ही इस स्थान को देवप्रयाग के नाम से जाना जाता है।

Friday, October 18, 2019

घांघरिया से वापसी

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शाम को फूलों की घाटी से लौटकर जब मैं घांघरिया पहुँचा तो घांघरिया और भी सूना हो चुका था। पहले तो मैं गुरूद्वारे में घुसा। क्योंकि बिना पैसे की चाय वहीं मिलनी थी। वो भी जितनी चाहिए उतनी। यहाँ इक्का–दुक्का लोग ही दिखायी पड़ रहे थे। इस समय तक घांघरिया की भीड़–भाड़ काफी कम हो गयी थी। हेमकुण्ड बहुत कम ही लोग गये थे। जो भी थे फूलों की घाटी गये थे। इनमें से भी जो लोग जल्दी लौट आये वे तुरन्त घोड़ों पर सवार होकर गोविन्दघाट की ओर चल पड़े थे। इसी कारण घोड़ेवाले भी कम ही दिख रहे थे।

Friday, October 11, 2019

फूलों की घाटी

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पाँचवां दिन–
कल शाम को हेमकुण्ड साहिब से घांघरिया लौटा तो मेरी किस्मत के सितारे जगमगा रहे थे। मौसम साफ हो चुका था। मैं मौसम साफ होने के लिए वाहे गुरू से अरदास करता रहा। क्योंकि फूलों की घाटी जाने का असली मजा तभी आता जब मौसम साफ हो। शाम तक आसमान अधिकांशतः नीला हो चुका था। छ्टिपुट बादल ही दिखायी पड़ रहे थे। आसमान साफ होने से ठण्ड भी हल्की सी बढ़ गयी थी। घांघरिया के नीले आसमान में चमकते सितारों को देखना काफी रोमांचक था।

Friday, October 4, 2019

घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब

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चौथा दिन–
कल मैं दोपहर बाद घांघरिया पहुँचा था। कुछ खास चहल–पहल नहीं दिखी। यह समय या तो नीचे गोविन्दघाट से घांघरिया आकर कमरे खोजने का था या फिर नीचे गोविन्दघाट जाने का या फिर घांघरिया की गलियाें में टहलने का। लेकिन आज सुबह के समय लोग हेमकुण्ड साहिब या फिर फूलों की घाटी के लिए निकल रहे थे। रिमझिम बारिश हो रही थी। ऐसे में फूलों की घाटी जाना ठीक नहीं था। मौसम साफ होता तो फूलों की घाटी जाना अच्छा रहता। तो अधिकांश लोग हेमकुण्ड साहिब ही जा रहे थे। मैं भी इनमें से एक था।