Friday, October 18, 2019

घांघरिया से वापसी

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शाम को फूलों की घाटी से लौटकर जब मैं घांघरिया पहुँचा तो घांघरिया और भी सूना हो चुका था। पहले तो मैं गुरूद्वारे में घुसा। क्योंकि बिना पैसे की चाय वहीं मिलनी थी। वो भी जितनी चाहिए उतनी। यहाँ इक्का–दुक्का लोग ही दिखायी पड़ रहे थे। इस समय तक घांघरिया की भीड़–भाड़ काफी कम हो गयी थी। हेमकुण्ड बहुत कम ही लोग गये थे। जो भी थे फूलों की घाटी गये थे। इनमें से भी जो लोग जल्दी लौट आये वे तुरन्त घोड़ों पर सवार होकर गोविन्दघाट की ओर चल पड़े थे। इसी कारण घोड़ेवाले भी कम ही दिख रहे थे।

Friday, October 11, 2019

फूलों की घाटी

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पाँचवां दिन–
कल शाम को हेमकुण्ड साहिब से घांघरिया लौटा तो मेरी किस्मत के सितारे जगमगा रहे थे। मौसम साफ हो चुका था। मैं मौसम साफ होने के लिए वाहे गुरू से अरदास करता रहा। क्योंकि फूलों की घाटी जाने का असली मजा तभी आता जब मौसम साफ हो। शाम तक आसमान अधिकांशतः नीला हो चुका था। छ्टिपुट बादल ही दिखायी पड़ रहे थे। आसमान साफ होने से ठण्ड भी हल्की सी बढ़ गयी थी। घांघरिया के नीले आसमान में चमकते सितारों को देखना काफी रोमांचक था।

Friday, October 4, 2019

घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब

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चौथा दिन–
कल मैं दोपहर बाद घांघरिया पहुँचा था। कुछ खास चहल–पहल नहीं दिखी। यह समय या तो नीचे गोविन्दघाट से घांघरिया आकर कमरे खोजने का था या फिर नीचे गोविन्दघाट जाने का या फिर घांघरिया की गलियाें में टहलने का। लेकिन आज सुबह के समय लोग हेमकुण्ड साहिब या फिर फूलों की घाटी के लिए निकल रहे थे। रिमझिम बारिश हो रही थी। ऐसे में फूलों की घाटी जाना ठीक नहीं था। मौसम साफ होता तो फूलों की घाटी जाना अच्छा रहता। तो अधिकांश लोग हेमकुण्ड साहिब ही जा रहे थे। मैं भी इनमें से एक था।

Friday, September 27, 2019

गोविन्दघाट से घांघरिया

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तीसरा दिन–
सुबह सोकर उठा तो रिमझिम बारिश अपने पूरे शबाब पर थी। सामने लक्ष्‍मणगंगा बादलों से निकलकर नीचे हरे जंगलों में कहीं खो जा रही थी। गोविंदघाट की रोमानी सुबह अपने आप में बहुत कुछ कह रही थी। वास्तव में यह स्थान रास्ता नहीं वरन मंजिल होनी चाहिए। बारिश प्रकृति का उत्सव है। प्रकृति आज पूरे श्रृंगार में उत्सव मना रही थी। पहाड़ों की बरसात जितनी डरावनी होती है उतनी ही सुंदर भी। इस मौसम में पहाड़ हरी चादर तो वैसे भी ओढ़ लेते हैं। इस हरी चादर के ऊपर सफेद बादलों का दुशाला ओढ़ प्रकृति सुंदरी अपने अप्रतिम स्वरूप में निखर आती है।

Friday, September 20, 2019

गोविन्दघाट की ओर

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दूसरा दिन–
मुझे रात में पता चल गया था कि हरिद्वार से बद्रीनाथ के लिए पहली बस 3.15 पर है। मैंने पहले ही तय कर लिया कि इतनी सुबह बस पकड़ना मेरे बस की बात नहीं। वैसे इस पहली बस के बाद भी इस मार्ग पर निजी बस ऑपरेटरों की कई बसें हैं। अन्तिम बस सम्भवतः 8 बजे है। उत्तराखण्ड परिवहन निगम की एकमात्र बस 5.30 बजे है। उत्तराखण्ड परिवहन निगम को पहाड़ सम्भवतः अच्छा नहीं लगता और शायद इसी कारण वह अपनी अधिकांश बसें मैदानी इलाकों में चलाता है। कोई दिल्ली तो कोई चण्डीगढ़।  उत्तराखण्ड के अन्दरूनी भागों का जिम्मा निजी बस संचालकों के ही ऊपर है।

Friday, September 13, 2019

सावन की ट्रेन

बारिश में पहाड़ खतरनाक हो जाते हैं। मानसून के दौरान पहाड़ों पर नहीं जाना चाहिए। बादल फटते हैं,बाढ़ आती है,रास्ते बन्द हो जाते हैं। बहुत रिस्क होता है। ऐसा सुनते–सुनते अजीर्ण हो गया था। तो जुमलों की सच्चाई जानने का दूसरा कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि मौके पर पहुँच कर इनकी परीक्षा ली जाय। संयोग कुछ ऐसा रहा कि इस साल अर्थात् 2019 के मानसून में न्यूज चैनलों पर लगभग रोज ही आधा हिन्दुस्तान नदियों की बाढ़ में बहता रहा। राजस्थान के रेगिस्तान में भी बाढ़ आती रही। फिर पहाड़ों का तो पूछना ही क्याǃ

Friday, September 6, 2019

कल्पेश्वर– पंचम केदार

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अब मेरा कार्यक्रम पाँचवें केदार अर्थात कल्पेश्वर जाने का था। पंचकेदार में से प्रथम केदार,केदारनाथ के दर्शन तो पहले ही कर चुका हूँ। इस बार की यात्रा में चतुर्थ व पंचम केदार की यात्रा के लिए निकला था। चतुर्थ केदार अर्थात् रूद्रनाथ का दर्शन  कठिन चढ़ाई के पश्चात् एक दिन पूर्व सम्पन्न हुआ और अब पंचम केदार कल्पेश्वर। क्रम की बाध्यताओं का अनुकरण करना आज के व्यस्त जीवन में काफी मुश्किल है। तो मुझे जहाँ भी पहुँचना संभव था पहुँचता रहा।

Friday, August 30, 2019

काण्डई बुग्याल से नीचे

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काण्डई बुग्याल से थोड़ी ही दूर चलने के बाद जंगल फिर से शुरू हो गया। साथ चल रहे साधु महाराज ने बताया कि ये जंगल अब अंत तक साथ चलेगा। मतलब ये कि सगर वाले रास्ते की तुलना में इस रास्ते के अधिकांश भाग पर जंगल है और यह जंगल काफी घना भी है। वैसे जंगल का डर अब तक मन से निकल चुका था। अब जंगल में चलने में मजा भी आ रहा था। हाँ,रास्ते का तेज ढाल उतराई में भी दिक्कतें पैदा कर रहा था। वैसे जंगल का मौसम काफी सम रहता है। साधु महाराज को जंगल से डर लग रहा था जबकि मुझे मजा आ रहा था।

Friday, August 23, 2019

रूद्रनाथ से वापसी

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26 मई
रात में वास्तविक ठण्ड की बजाय ठण्ड का डर अधिक था। मैं दो रजाई ओढ़ कर सोया था लेकिन सोने के एक घण्टे बाद ही मुझे एक रजाई हटानी पड़ी। क्योंकि शरीर पर कपड़े काफी थे और कमरा भी गर्म हो गया था। थकान की वजह से भी कुछ अधिक ठण्ड महसूस हो रही थी। संभवतः थकान की वजह से ही,नींद भी ठीक से नहीं आ रही थी। मेरी बगल में सोये दो लड़के भी इस समस्या से परेशान थे। एक लड़का तो रात भर उठता–बैठता रहा और मुझे भी डिस्टर्ब करता रहा। इस सबके बावजूद भोर में 4.15 पर ही वह उठ गया और मुझे भी जगा दिया।

Friday, August 16, 2019

पनार बुग्याल से रूद्रनाथ

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मुझे पहले से ही पता है कि पित्रधार इस ट्रेक का सबसे ऊँचा स्थान है। पनार में मैं 3400 मीटर की ऊँचाई पर था और अभी इससे भी कुछ सौ मीटर ऊपर जाना है। मैं अपने जीवन में पहली बार इतनी ऊँचाई चढ़ने जा रहा हूॅं। मन में रोमांच भी है और कुछ–कुछ डर भी। इसके अलावा डर इस बात का भी है कि मैंने लगभग 1750 मीटर की ऊँचाई से चढ़ाई शुरू की थी और एक ही दिन में इतनी ऊँचाई तय करने जा रहा हूँ। मेरा शरीर एक्लाइमेटाइज हो पायेगा या नहीं– मन में शंका है। लेकिन जुनून अपने चरम पर है।