Sunday, March 31, 2019

घुमक्कड़ी ज़िंदाबाद


Friday, January 11, 2019

खलिया टॉप

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कुछ देर में बारिश कुछ हल्की हो गयी। बादल भी छँटने शुरू हो गये थे। हिमालय की चोटियों के होने का कुछ–कुछ एहसास होना शुरू हो गया था। ये भी एहसास हो रहा था कि अगर बादल नहीं होते तो नजारा कैसा होताǃ
मंदिर परिसर में एक–दो चक्कर लगाने के बाद 5 बजे मैं वापस लौट पड़ा। वो चारों सतयुगी बन्दे भी मंदिर छोड़कर बाहर निकल चुके थे लेकिन मैं उनसे दूरी बनाए हुए था।

Friday, January 4, 2019

मुन्स्यारी की ओर

कुमाऊँ कैलाश–मानसरोवर का प्रवेश द्वार है। अनादि काल से ही,भगवान शिव के निवास स्थान तक की यात्रा के लिए,कुमाऊँ मार्ग प्रदान करता रहा है। अब भोलेनाथ ने अपने घर तक,मुझे कभी नहीं बुलाया तो मैंने मार्ग को ही मंजिल बना दिया। और निकल पड़ा कुमाऊँ की खूबसूरत वादियों की ओर। कैलाश नहीं तो कुमाऊँ ही सही।
काठगोदाम कुमाऊँ का प्रवेश द्वार है। ट्रेन से कुमाऊँ आने के लिए काठगोदाम आना ही पड़ता है।

Friday, December 28, 2018

माणा–भारत का आखिरी गाँव

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20 अक्टूबर
भारत सेवाश्रम संघ में 200 रूपये में तीन बेड का कमरा मिला था। तीन रजाइयाँ भी मिली थीं। उधर केदारनाथ में दो बेड पर चार "हैवी रजाइयाँ" मिलीं थीं। संभवतः ठण्ड को देखते हुए। इतनी ठण्ड थी कि एक रजाई को ही गद्दा बनाकर गद्दे के ऊपर बिछाना पड़ा। वैसे यहाँ ऐसी बात नहीं थी। रजाइयाँ बहुत भारी नहीं थीं फिर भी ठण्ड महसूस नहीं हुई। भरपूर नींद आई। थकान भी उतारनी थी। केदारनाथ में एक बाल्टी गरम पानी का जुगाड़ होने के बाद भी नहाने की हिम्मत नहीं हुई थी तो फिर यहाँ ठण्डे पानी से कौन नहाता है।

Friday, December 21, 2018

बद्रीनाथ

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19 अक्टूबर
रात को ही बद्रीनाथ की ओर जाने के विकल्पों के बारे में पता कर आया था। गुप्तकाशी से वापस रूद्रप्रयाग जाकर वहाँ से गोपेश्वर जाने का विकल्प भी खुला था। लेकिन सूत्रों से पता चला कि सुबह के 6.30 बजे सीधे गोपेश्वर की बस मिल जायेगी। तो फिर रूद्रप्रयाग जाने की क्या जरूरत। मैं 6 बजे ही स्टैण्ड पर पहुँच गया। बस तो लगी थी लेकिन बस में यात्रा करने वाला कोई न था। तो आराम से मैंने पास की दुकान में चाय पी। 6.45 पर बस चल पड़ी। 85 किमी के 140 रूपये। गुप्तकाशी के बगल में ही ऊखीमठ है। हवाई दूरी तो कुछ भी नहीं है। मंदाकिनी दोनों को अलग कर देती है।

Friday, December 14, 2018

केदारनाथ–बाबा के धाम में

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18 अक्टूबर
सुबह के साढ़े पाँच बजे सोकर उठा और आधे घण्टे में बाहर निकल गया। शायद सफेद चोटियों पर सूरज की पीली रोशनी पड़ रही हो। लेकिन अभी तो बाहर रास्ते के किनारे पीली लाइटें जल रही थीं। सफेद चोटियों पर कालिमा छाई हुई थी। मंदिर बिल्कुल खाली था। सामने के प्रांगण में एक स्थान पर अँगीठी जल रही थी जहाँ कुछ लोग ठण्ड से दो–दो हाथ कर रहे थे। वो भी मेरी तरह यूँ ही टहलते हुए आ गये थे। यहाँ तो कोई "बेघर" शायद जीवन संघर्ष में सफल नहीं हो सकता। मेरे हाथों में भी गलन हो रही थी क्योंकि दस्ताने नहीं थे। चेहरा और होठ सुन्न हो रहे थे। सूरज उजले पहाड़ों की ओट में था। कुछ ही मिनटों में मैं काँपने लगा। एक चाय वाले की अँगीठी के पास मैं भी खड़ा हुआ।

Friday, December 7, 2018

केदारनाथ के पथ पर

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जय केदारǃ
भीमबली से 1 किमी चलकर रामबाड़ा पहुँचा तो मंदाकिनी की विनाशलीला की याद आ गयी। एक झोपड़ी में मैगी बन रही थी। जीभ पर पानी आ गया लेकिन समय नहीं था। मैंने दुकान वाले से पूछा– "रामबाड़ा किधर है?"
उसने हाथ से इशारा कर दिया। लेकिन उधर तो पत्थर ही पत्थर थे। समझते देर न लगी कि सबकुछ मंदाकिनी के गर्भ में समा गया। लेकिन शायद मंदाकिनी यहाँ जितनी सुंदर लग रही थी उतनी मुझे अब तक कहीं नहीं लगी थी। यह विनाश के बाद वाली मंदाकिनी है। शायद इसीलिए इतनी सुंदर है। क्योंकि विनाश के बाद ही सृजन का आरम्भ होता है और सृजन अवश्य ही सुंदर होता है।

Friday, November 30, 2018

वाराणसी से गौरीकुण्ड

16 अक्टूबर
इस बार की यात्रा कुछ विशेष थी। क्योंकि उद्देश्य कुछ विशेष था। उद्देश्य था बाबा केदारनाथ के दर्शनों का। अवसर था दशहरे की छुटि्टयों का फायदा उठाने का। तो माध्यम बनी एक रेलगाड़ी जिसका नाम है– हरिहर एक्सप्रेस। इसका नाम भले ही हरिहर एक्सप्रेस है लेकिन यह "हरि के द्वार" अर्थात हरिद्वार के बगल से गुजर जाती है। वहाँ से अन्दर प्रवेश करने के लिए दूसरे जतन करने पड़ते हैं।

Friday, November 23, 2018

ब्रहमगिरि–गोदावरी उद्गम

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चौथा दिन–
आज मेरा नासिक में चौथा दिन था। कल की थकान की वजह से आज उठने में देर हो गयी। कई जगहें घूमने से छूट गयी थीं। समय कम रह गया था। पाण्डवलेनी या पाण्डव गुफाएं भी मैं नहीं जा सका था। हरिहर फोर्ट भी जाने के लिए मैं उत्सुक था। वैसे ये दोनों जगहें बहुचर्चित हैं। कई बार इनका नाम सुन चुका था सो तय किया कि यहाँ बाद में चलेंगे। अभी तो वहीं चलेंगे जहाँ से नासिक और आस–पास के क्षेत्र को जीवन देने वाली माँ गोदावरी का जन्म स्थल है। गोदावरी का उद्गम अर्थात ब्रह्मगिरि।

Friday, November 16, 2018

अंजनेरी–हनुमान की जन्मस्थली

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11 बज रहे थे और मैं अंजनेरी की चढ़ाई की ओर चल पड़ा। इस समय मैं समुद्रतल से लगभग 2500 फीट की ऊँचाई पर था। एक भेड़ चरवाहे से पता चला कि शुरू में तीन किमी का लगभग सीधा रास्ता है लेकिन उसके बाद अगले तीन किमी सीढ़ियां चढ़नी पड़ेंगी। शुरू में लगभग आधे किमी के बाद ही एक जैन मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है। मूर्ति का निर्माण तो हो चुका है लेकिन मंदिर का निर्माण अभी चल रहा है। पास ही एक छोटा सा आश्रम भी है जहाँ से मंदिर निर्माण का संचालन किया जा रहा है। मुझे प्यास लगी थी सो मैंने आश्रम में पानी पिया और आगे बढ़ गया। रास्ते के दोनों तरफ गायों व बकरियों के झुण्ड के साथ चरवाहे यहाँ–वहाँ दिखायी पड़ रहे थे। पहाड़ी पर चारों तरफ बिखरी हुई हरी–भरी घासें और पेड़ अत्यन्त मनमोहक दृश्य का सृजन कर रहे थे।