Friday, March 2, 2018

अजंता–हमारी एेतिहासिक धरोहर (दूसरा भाग)

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अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में औरंगाबाद से लगभग 100 किमी की दूरी पर अवस्थित हैं। अपने स्वर्णिम काल के इतिहास की परतों में गुम हाे जाने के बाद 1819 में मद्रास सेना के कुछ यूरोपीय सैनिकों ने अनजाने में ही इन गुफाओं का पता लगाया। बाद में सन 1824 में जनरल सर जेम्स अलेक्जेण्डर ने राॅयल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में सर्वप्रथम अजंता गुफाओं पर लेख प्रकाशित कर इन्हें शेष विश्व की नजर में लाया।
ये गुफाएँ वाघोरा नदी की घाटी में निकटवर्ती धरातल से 76 मीटर की ऊँचाई पर घोड़े की नाल के आकार में खोदी गयीं हैं। अजंता गुफाओं की समुद्रतल से ऊँचार्इ 439 मीटर या 1440 फुट है।
नदी घाटी का यह स्थान उस समय बौद्ध भिक्षुओं के लिए साधना हेतु उपयुक्त माहौल प्रदान करता रहा होगा। आरम्भ में प्रत्येक गुफा से नदी की धारा तक सीढ़ियां बनी थीं जिनमें से काफी अब नष्ट हो चुकी हैं। ये गुफाएँ बेसाल्ट शैल की बनी हुई चट्टानों में खोदी गयीं हैं। निर्माण काल के आधार पर इन गुफाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है। कुल तीस गुफाओं में से छः का उत्खनन बौद्ध धर्म के हीनयान काल में हुआ जिनमें से 9 और 10 चैत्य हैं तथा 12,13 व 15 विहार हैं।
इन गुफाओं के निर्माण का दूसरा काल 5वीं–6वीं शताब्दी से शुरू होकर अगली दो शताब्दियों तक चलता रहा।इन नयी गुफाओं का निर्माण गुप्त शासकों के समकालीन वाकाटक शासकों के संरक्षण में चलता रहा। इन उत्खननों का मुख्य उद्देश्य राजपरिवार के सदस्यों और सामंतों द्वारा वाकाटक शासकों के प्रति निष्ठा दर्शाना था। सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इन गुफाओं का सजीव वर्णन किया है जबकि वह इन गुफाओं तक नहीं पहुँचा था। गुफा संख्या 26 में प्राप्त एक राष्ट्रकूट अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि 8वीं–9वीं शताब्दी तक इन गुफाओं का प्रयोग किया जाता रहा।

लक्षण तथा चित्रकला दोनों ही दृष्टियों से भारतीय कला केन्द्रों में अजंता का स्थान अत्यन्त ऊँचा है। अजंता की गुफाओं का निर्माण ईसवी पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी तक हुआ। वैसे तो अजंता की सारी गुफाएं बौद्ध धर्म से ही सम्बंधित हैं फिर भी दूसरी शताब्दी तक यहाँ हीनयान मत का प्रभाव था और उसके बाद महायान मत का। इन गुफाओं में बुद्ध तथा बोधिसत्वों का चित्रण मिलता है। इनमें जातक कथाओं तथा बुद्ध के जीवन की विविध घटनाओं को आधार बनाकर चित्रांकन किया गया है। अजंता में कुल 30 गुफाओं का निर्माण किया गया है जिनमें से पाँच गुफाएं 9,10,19,26,29 चैत्य और शेष विहार गुफाएं हैं। चैत्य का मतलब पूजागृह तथा विहार का मतलब निवास के लिए बनाये गये आश्रम।
वैसे तो अजंता की गुफाओं में बुद्ध की और अन्य मूर्तियां तो लगभग सभी जगह हैं परन्तु चित्रांकन केवल छः गुफाओं 1,2,9,10,16,17 में है। सम्भव है कि अन्य गुफाअों में किये गये चित्रांकन समय के साथ नष्ट हो गये हों। अजंता की गुफाओं में सर्वाधिक चित्रकारी भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग गुप्त काल की हैं। इस काल के चित्र सर्वाधिक सुन्दर भी हैं। गुफा संख्या 9 व 10 में की गयी चित्रकारी ईस्वी पूर्व पहली शताब्दी की है जबकि गुफा संख्या 16 व 17 की चित्रकारी गुप्तकाल की है। गुफा संख्या 1 व 2 के चित्र सातवीं शताब्दी के हैं।

मैं स्वयं के द्वारा पढ़ी हुई इतिहास की किताबों के आधार पर चित्रों को पहचानने की कोशिश कर रहा था। साथ ही पर्यटकों के किसी समूह के साथ आये गाइड के भाषणों से भी जानकारी चुराने का प्रयास कर रहा था और इसमें सफल भी हो रहा था। चूँकि गुफाओं में फोटाग्राफी करने के लिहाज से पर्याप्त प्रकाश नहीं था और फ्लैश प्रतिबन्धित था। साथ ही मेरे पास बहुत हाई क्वालिटी का कैमरा भी नहीं था तो मैं चित्रों की साफ–सुथरी फोटो लेने में असफल हो रहा था। फिर भी प्रयास जारी था। गुफा संख्या 1 व 2 सर्वाधिक नवीन हैं। गुफा 1 जो महायान सम्प्रदाय से सम्बंधित है,के बरामदे से अंदर प्रवेश करने पर एक बड़ा हॉल दिखायी पड़ता है। यह बीस स्तम्भों पर टिका है जिन पर सुन्दर नक्काशी की गयी है। गर्भगृह में भगवान बुद्ध की प्रतिमा व्याख्यान मुद्रा में स्थापित है। इस गुफा में एक भारतीय राजा के दरबार का चित्र है जिसमें कोई विदेशी दूत आया हुआ हैं। इसमें राजा दक्षिणी भारत की वेशभूषा के अनुरूप अधोवस्त्र पहने हुए है जबकि दूत को ईरानी टोपी,जामा तथा चुस्त पायजामा पहने हुए चित्रित किया गया है। दूत की दाढ़ी भी ईरानी ढंग की है। इसकी तुलना भारतीय शासक पुलकेशिन दि्वतीय के दरबार में आये फारस के राजदूत से की जाती है। इसी गुफा में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का एक सुन्दर चित्र बना है जिसमें बुद्ध को दायें हाथ में नीलकमल लिये हुए टेढ़ी मुद्रा में खड़ा दिखाया गया है। इसी चित्र के बगल में एक नारी का चित्र बना हुआ है जिसे काली राजकुमारी कहा जाता है। इसी गुफा में बुद्ध का कामदेव विजय का एक काफी बड़ा चित्र भी है। इसमें बुद्ध तपस्या में लीन हैं और कामदेव कई कन्याओं के साथ उन्हें रिझाने का प्रयास कर रहा है। इसी गुफा में एक मधुपायी दम्पत्ति का चित्रण भी किया गया है जिसमें प्रेमी अपने हाथ से प्रेमिका को मधुपात्र देते दिखाया गया है। एक जगह शिवि जातक की कथा को भी चित्रित किया गया है। यहीं नागराज की सभा का भी चित्रण किया गया है। मगधराज तथा नागराज के बीच वार्तालाप का भी चित्रांकन किया गया है।

गुफा संख्या 2 भी महायान सम्प्रदाय को समर्पित है। इस गुफा के प्रमुख चित्रों में बुद्ध की माता मायादेवी के शयन कक्ष का चित्र है। इसके आगे सिंहासन पर बैठे बोधिसत्व का चित्र है। यहाँ उनके हाथ धर्मचक्रप्रवर्तन की मुद्रा में हैं। एक और चित्र में शुद्धोधन तथा मायादेवी खड़े दिखायी देते हैं। इनके साथ परिचारिकाएं भी चित्रित की गयीं हैं। सामने दो ज्योतिषी तथा दायीं ओर एक स्तम्भ के सहारे टिकी हुई एक सुसज्जित नारी का चित्रण है। इसके आगे सिद्धार्थ के जन्म की कथा चित्रित की गयी है। इसी गुफा में द्यूतक्रीड़ा का एक सुन्दर चित्रण है। अन्य चित्रों में झूला झूलती राजकुमारी,बोधिसत्व से उपदेश सुनती काशिराज की राजमहिषियाँ,बोधिसत्व की पूजा में लीन एक साधक के चित्र भी चित्रित किये गये हैं। इसके अलावा हंस जातक का चित्र भी प्रदर्शित किया गया है।
गुफा संख्या 3 अपूर्ण है।
गुफा संख्या 4 इस समूह की सबसे विशाल गुफा है जो 28 स्तम्भों पर टिकी है। यह गुफा भी संभवतः पूर्ण नहीं हो सकी है। इस गुफा को मथुरा नामक एक व्यक्ति ने विहार को दान में दिया था। गुफा के द्वार पर द्वारपालों की प्रतिमाएं बनी हुईं हैं। गुफा में संकटग्रस्त मनुष्य की सहायता करने वाले अवलोकितेश्वर का चित्रांकन किया गया है।
गुफा संख्या 5 भी अधूरी है।

गुफा संख्या 6 दुमंजिला है। पहली मंजिल पर बने हुए सभाकक्ष में पद्मासन लगाये बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। इसकी दूसरी मंजिल पर सीढ़ियों से चढ़ने के लिए लोग लाइन लगाये हुए थे। सँकरी सीढ़ियों पर एक साथ चढ़ना और उतरना काफी खतरनाक लग रहा था।
गुफा संख्या 7 एक छोटी गुफा है जिसके गर्भगृह में बुद्ध की मूर्ति बनी हुई है। गुफा संख्या 8 पर पर्यटन विभाग का कब्जा है।
अजंता गुफा समूह की गुफा संख्या 9 व 10 सबसे प्राचीन हैं। इन गुफाओं में बने चित्र भारतीय चित्रकला के प्राचीनतम नमूने हैं। इनके बाद के लगभग 300 वर्षाें तक चित्रण का कोई उदाहरण नहीं मिलता। इन गुफाओं के चित्र सामान्य ही हैं। गुफा 9 में पगड़ी धारण किये हुए पुरूषों का चित्रण किया गया है। ये पुरूष गले में मोटी–मोटी मालायें,कानों में कर्णफूल,हाथों में कड़े तथा कमर में कमरबन्द पहने दिखायी देते हैं। प्रवेश द्वार के पास एक जुलूस का चित्र भी है। चित्रों की पृष्ठभूमि में वृक्षों का अंकन विशेष रूप से किया गया है।
गुफा 10 में हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित एक चैत्य है। यह गुफा 40 स्तम्भों पर टिकी है। गुफा में एक छोटा सा स्तूप भी बना हुआ है। यहाँ हाथियों को विविध प्रकार से क्रीड़ा करते हुए सुन्दरता से चित्रित किया गया है। गुफा के स्तम्भों पर बुद्ध की अनेक आकृतियां बनायी गयी हैं।
गुफा संख्या 11 बड़े सभा कक्ष वाली गुफा है। गुफा संख्या 12 में भी एक विहार है। गुफा संख्या 13 व 14 पुरातत्व विभाग के स्टोर रूम की तरह से उपयोग में हैं। गुफा संख्या 15 भी अन्य गुफाओं की तरह मुख्य मंडप,सभा मंडप और गर्भगृह में भगवान बुद्ध की मूर्ति युक्त एक विहार गुफा है।

गुफा संख्या 16 व 17 महत्वपूर्ण गुुफाएँ हैं। गुफा संख्या 16 की चित्रकारी 500 ईस्वी के आस–पास प्रारम्भ होती है। इसमें मरणासन्न राजकुमारी का चित्र सर्वाधिक सुन्दर एवं महत्वपूर्ण है। इसमें पति के विरह में मरती हुई राजकुमारी का चित्र है। राजकुमारी के चारों ओर उसके शोकाकुल परिजन खड़े हैं। एक सेविका उसे सहारा देकर ऊपर उठाये है तथा दूसरी उसे पंखा झल रही है। एक स्त्री अत्यन्त आतुर होकर उसका हाथ अपने हाथ में थामे है। दो सेविकाएं हाथ में कलश लिए खड़ी हैं। राजकुमारी की आँखें बंद हैं और परिजनों के चेहरे पर दुख का भाव है। इस राजकुमारी की पहचान बुद्ध के सौतेले भाई नंद की पत्नी सुंदरी के रूप में की जाती है। इसी गुफा के एक चित्र में बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण का चित्रण किया गया है। इसमें उनकी वैराग्य भावना दर्शनीय है। इसके अतिरिक्त बुद्ध के जीवन से सम्बंधित कुछ अन्य दृश्यों का भी चित्रांकन किया गया है।
गुफा संख्या 17 को चित्रशाला कहा जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के चित्रांकन किये गये हैं। इसमें बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित घटनाओं जैसे उनके जन्म,महाभिनिष्क्रमण,महापरिनिर्वाण से सम्बन्धित दृश्यों का चित्रांकन किया गया है। इस गुफा का माता और शिशु नामक चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इस चित्र में सम्भवतः बुद्ध की पत्नी अपने पुत्र को उन्हें समर्पित कर रही हैं। माता तथा पुत्र दोनाें एकटक बुद्ध को देख रहे हैं। एक अन्य चित्र में बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण को अंकित किया गया है। एक अन्य चित्र में एक सम्राट को एक सुनहले हंस से बातें करते हुए चित्रित किया गया है। इसी गुफा में गंधर्वराज को अप्सराओं और परिचारकों के साथ आकाश में विचरण करते हुए दिखाया गया है। जातक कथाओं से सम्बन्धित सर्वाधिक चित्र इसी गुुफा में ही चित्रित किये गये हैं।

गुफा संख्या 19 एक चैत्य है तथा काफी सुन्दर है। चैत्य का आकार परम्परा से ही घोड़े की नाल के आकार का होता है। इसमें तीन छतरियों वाला एक स्तूप है।
गुफा संख्या 18 एवं 20 विहार हैं। गुफा संख्या 21 से 25 तक भी विहार हैं और पूर्ण नहीं हो सकी हैं।
गुफा संख्या 26 एक चैत्य या पूजागृह है। इस गुफा में की गयी बारीक मूर्तिकारी और नक्काशी की वजह से यह काफी आकर्षक बन पड़ी है। मुख्य स्तूप में मण्डप में बैठी हुई बुद्ध प्रतिमा स्थापित है। गुफा में प्रवेश करते ही बायीं तरफ बुद्ध के महापरिनिर्वाण को प्रदर्शित करते हुए 23 फीट लम्बी लेटी हुई प्रतिमा बनी हुई है।
गुफा संख्या 27 में बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित दाे चित्र प्रदर्शित किये गये हैं। गुफा संख्या 28 व 29 काफी ऊँचाई पर स्थित हैं और यहाँ पहुँचने के लिए मार्ग उपलब्ध नहीं है। गुफा संख्या 30 की खोज 1956 में हुई जो गुफा संख्या 15 व 16 के बीच में स्थित एक छोटा सा विहार है।
इन गुफाओं के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने 1983 में इन्हें विश्व विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया।
सब कुछ घूम लेने के बाद जब हम वापस टिकट काउण्टर के पास पहुुँचे तो 2.45 बज रहे थे। भूख अपने चरम पर थी। पास में पर्यटन विभाग का एक रेस्टोरेण्ट था। और जब इतनी सारी गुफाएं मिलकर भीड़ को नहीं सँभाल पा रहीं थीं तो एक रेस्टोरण्ट क्या सँभालेगा। वहाँ भी लाइन लगी थी। हार मानकर बाहर बिक रहे चने–चबेने का सहारा लिया गया। तभी एक लम्बी लाइन लगी दिखी। और जब लम्बी लाइन दिखती है तो हम भारतीयों का तेज जाग उठता है। पता किया तो यह वापसी के लिए बस में चढ़ने के लिए लगी लाइन थी। हमने भी जल्दी से भागकर लाइन की पूँछ पकड़ी। कुछ देर तक तो धैर्य बना रहा लेकिन देर होती देख व्यग्रता बढ़ने लगी। बसें तो मूसलाधार भाग रहीं थीं और लाइन थी कि आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थीं। रिजर्व बसों से आये बड़े–बड़े समूह समस्या की जड़ थे। क्योंकि उनके गाइड अकेले ही लाइन में लगकर सबकी टिकट बुक करा ले रहे थे और छोटी गाड़ियों या फिर हमारी तरह इक्के–दुक्के बसों से आये लाेग लाइन की पूँछ ही पकड़े रह जा रहे थे। कान पकड़ने की नौबत ही नहीं आ रही थी।

लाइन में लगे–लगे एक घण्टे बीत गये तब जाकर अपना भी नम्बर आया। थोड़ी सी समझदारी हमने पहले ही दिखायी होती तो पैदल ही तीन किमी की दूरी तय कर वापस चले गये होते। समय और पैसे दोनों की ही बचत हो गयी होती। अजंता गेट तक पहुँचने में चार बज गये। यहाँ जल्दी से पेट पूजा की गयी और बस के इंतजार में लग गये। यहाँ एक व्यक्ति ने सलाह दी कि यहाँ बस मिलने में दिक्कत हो सकती है क्योंकि हो सकता है बस यहाँ रूके ही न। उसकी सलाह मानकर हम तुरंत आटो पकड़कर अजंता से और आगे अर्थात भुसावल की तरफ फर्दापुर बस स्टैण्ड चले गये। 20 रूपये ऑटो वाले को भुगतना पड़ा। तुरंत ही बस मिल गयी लेकिन सीट नहीं मिल सकी। लगभग एक घण्टे खड़े होकर यात्रा करनी पड़ी तब जाकर सीट मिली। 7.15 तक हम औरंगाबाद पहुँच गये।
औरंगाबाद पहुँचने के बाद फिर वही भोजन के लिए संघर्ष। वैसे संघर्ष करना नहीं पड़ा। शाकाहारी रेस्टोरेण्ट पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। शाकाहारी भोजन हर तरह का मिल जायेगा भले ही जेब थोड़ी ढीली हो जाए। तो एक दिन के लिए हमने भी जेब ढीली करने का फैसला किया और एक रेस्टोरेण्ट में मटर पनीर व रोटी का आर्डर किया। भले ही जेब को किसी दूसरे दिन थोड़ी टाइट कर लेंगे।


गुफा संख्या 21 का बरामदा


गुफा संख्या 23 का एक स्तम्भ

गुफा संख्या 24 एक अधूरी गुफा है


गुफा संख्या 26 का चैत्य

गुफा संख्या 26 में बुद्ध के महापरिनिर्वाण का दृश्य

गुफा संख्या 26 


गुफा संख्या 26 


गुफा संख्या 10 का चैत्य

वापसी के समय बस में चढ़ने के लिए लगी लाइन

गुफा संख्या 1 
गुफा संख्या 1

अगला भाग ः एलोरा–धर्माें का संगम (पहला भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–


2 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया पोस्ट लिखी । लेकिन जो जीवंत वर्णन किया उसके अनुसार फ़ोटो कम लगाई । जय हो

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  2. धन्यवाद भाई। दरअसल अजंता के बारे में जानकारी तो मैंने इतिहास की किताबों,अजंता की गुफाओं के पास पुरातत्व विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये लेखों और गाइडों के मुँह से सुनकर जुटा ली लेकिन अजंता की अँधेरी गुफाओं में बिना फ्लैश के फोटो खींचना बहुत दुरूह कार्य है। अच्छी गुणवत्ता के स्पष्ट फोटो मैं अधिक नहीं खींच सका। हाँ एलोरा में ऐसी कोई समस्या नहीं है।

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