सितम्बर का महीना। ऊमस भरी गर्मी। घुमक्कड़ ऐसे में चल पड़ा उस स्थान की ओर,जहाँ भगवान राम ने अपनी पर्णकुटी बनाई थी अर्थात् नासिक। सोचा था,एक दिन पर्णकुटी के बगल में किसी झोपड़ी में विश्राम करूँगा। जंगल में भगवान राम के चरण जहाँ पड़े होंगे,उन स्थानों का दर्शन करूँगा। उस गुफा में मैं भी एक दिन गुजारूँगा जहाँ राम ने माँ सीता को सुरक्षित रखा था। उस जगह को भी देखने की कोशिश करूँगा जहाँ मारीच का वध हुआ था। शायद मुझे ध्यान नहीं आया कि उस समय से अब तक कई युग बीत चुके हैं। अब तक तो वहाँ वृक्षों के जंगल की जगह कंक्रीट की इमारतों का जंगल खड़ा हो गया होगा।
