Tuesday, March 21, 2017

कोणार्क और चन्द्रभागा

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चौथा दिन–
आज हमारा पुरी में चौथा और अन्तिम दिन था। आज हम कोणार्क जा रहे थे। कोणार्क पुरी जिले में ही पड़ता है। कोणार्क जाने के लिए पुरी से पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हैं। गुण्डीचा मन्दिर के पास स्थित बस स्टैण्ड से कोणार्क जाने के लिए आसानी से बसें मिल जाती हैं जिनका किराया 30 रूपये है। पैकेज के रूप में कोणार्क का टूर प्राइवेट बस आपरेटरों द्वारा भुवनेश्वर के साथ ही कराया जाता है जिसमें काफी भागमभाग व जल्दबाजी होती है। छोटे रिजर्व साधन के रूप में 3 से 4 सीट वाला आटो रिक्शा आसानी से उपलब्ध हैं। बिना मोलभाव वाला किराया है 700 रूपया जिसमें कुछ न कुछ गुंजाइश रहती ही है। पुरी से कोणार्क की दूरी 35 किमी है जिसे बस से तय करने में एक घण्टे से भी कम का समय लगता है।
वैसे तो कोणार्क अपने सूर्य मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है लेकिन हमारी यात्रा का महत्व एक और कारण से बढ़ गया था और वह था– चन्द्रभागा। चन्द्रभागा कोणार्क से लगभग 2 किमी पहले स्थित एक सुन्दर समुद्री बीच या किनारा है जहां लहरें शायद कुछ अधिक तीव्रता से किनारे से टकराती हैं। हिन्दी वर्ष के माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को चन्द्रभागा में एक मेला लगता है और हम इसी दिन कोणार्क जा रहे थे इसलिए हमारी यात्रा ऐतिहासिक हो रही थी। चूंकि चन्द्रभागा कोणार्क से पहले स्थित है अतः हम बस से चन्द्रभागा में उतर गये। आज मेले की वजह से भीड़ थी इसलिए बस वाले ने किराया भी बढ़ा कर 40 रूपये कर दिया था और इस वजह से स्थानीय यात्री उससे किच–किच कर रहे थे।
चन्द्रभागा बीच पर समुद्री किनारे से कुछ कदम पर एक छोटा सा तालाब है। इस तालाब के पास एक मन्दिर है। पूछने पर पता चला कि रात के ठीक 12 बजे मन्दिर के ठाकुर यानी देवता तालाब में स्नान करेंगे और उसके बाद सारे लोग यहां स्नान करेंगे। और यह वार्षिक मेला इन्हीं सारे परिदृश्यों से सम्बन्धित है। इस तालाब के चारों तरफ चारदीवारी है जिसके चारों तरफ बल्लियों की सहायतासे बैरिकेडिंग की गयी थी और प्रवेश व निकास द्वार भी बनाये गये थे। मन्दिर के आस–पास भजन–कीर्तन का कार्यक्रम चल रहा था। मन्दिर के पास के खाली प्रांगण में लोगों के ठहरने व खाना बनाने–खाने से सम्बन्धित प्रबन्ध एवं बाजार थे। भारी भीड़ की संभावित उपस्थिति को देखते हुए सुरक्षा की अच्छी–खासी व्यवस्था की गयी थी। कैमरा हाथ में लेकर मैं मेला प्रांगण में घुस गया। सारी व्यवस्था का जायजा लेने के बाद धीरे–धीरे बालू में फिसलते हुए हम चन्द्रभागा बीच पर पहुंच गये। कुछ देर तक हमने बीच पर उफनती लहरों का आनन्द लिया और फिर ऐतिहासिक कोणार्क के लिए वापस हो लिए।
सड़क पर आने पर एक आटो मिला जिसने हमें 10 मिनट में कोणार्क पहुंचा दिया और किराया 10 की बजाय 20 रूपये वसूल लिया। आटो से उतर कर हम लगभग 5 मिनट पैदल चले तो सूर्य मन्दिर दिखायी पड़ने लगा। मन्दिर में प्रवेश हेतु 20 रूपये का टिकट लगता है लेकिन मेले की वजह से आज प्रवेश निःशुल्क था। मन्दिर के प्रांगण में भारी भीड़ थी। टूर आपरेटरों द्वारा लायी गयी भीड़ गाइडों के पीछे भेड़–बकरियों की तरह की तरह दौड़ रही थी और गाइड अपने आधे–अधूरे सतही ज्ञान को किसी बड़े इतिहासकार की भांति परोस रहे थे।

कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण गंग वंश के शासक नृसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कराया था। इसके बारे में कहा जाता है कि बारह सौ शिल्पियों की बारह वर्षाें की कड़ी मेहनत के बाद इसका निर्माण हुआ। मन्दिर की परिकल्पना इस तरह से की गई थी कि जैसे यह सूर्यदेव का रथ हो जिसमें 24 पहिए हैं और सात शक्तिशाली घोड़े इसे पूर्व की ओर खींचते हुए ले जा रहे हों। मन्दिर को कुछ इस तरह से बनाया गया था कि सूर्य की पहली किरण पूरे वर्ष मन्दिर के जगमोहन अर्थात मुख्य भवन से होती हुए भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़े। सामने के भाग को छोड़कर मुख्य भवन की तीन ओर की दीवारों पर सूर्यदेव की प्रतिमाएं बनी हुईं हैं जो सूर्य उदय,मध्य दिन के सूर्य तथा अस्त सूर्य को प्रतिबिम्बित करती हैं। मुख्य भवन के सामने अर्थात पूर्व की ओर एक चबूतरा है जिसे नृत्य भवन का नाम दिया जाता है। मन्दिर की दीवारों पर उत्कीर्ण कामकला की नग्न प्रतिमाएं शिल्पकला का अप्रतिम उदाहरण हैं। इसके अलावा भी मन्दिर के सम्पूर्ण प्रांगण में अन्य छोटे–छोटे भवनों के अवशेष हैं। वैसे अब न तो सूर्य मन्दिर के सभी घोड़े सुरक्षित बचे हैं और न ही सूर्यदेव की वास्तविक प्रतिमा। क्योंकि एक घोड़े को छोड़कर शेष सभी नष्ट हो चुके हैं और सूर्य प्रतिमा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है। वस्तुतः सम्पूर्ण मन्दिर के निर्माण में अपूर्व कल्पना का समावेश है जिसे वर्तमान में दिखने वाले अवशेष पूरी तरह से सिद्ध करते हैं। कोणार्क के सूर्य मन्दिर को यूनेस्को द्वारा 1984 में विश्व धरोहर स्थल भी घोषित किया जा चुका है।

सूर्य मन्दिर को ब्लैक पैगोडा भी कहा जाता है। यह लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। इसके प्रवेश द्वार पर दो हाथियों के ऊपर आक्रमणकारी मुद्रा में दो सिंहों की मूर्तियां बहुत ही आकर्षक हैं। पर्यटकों की भीड़ को जानकारी देता हुआ एक गाइड बता रहा था कि मन्दिर के शीर्ष पर एक विशाल चुम्बकीय शिला थी जिसकी वजह से मंदिर का संतुलन बना रहता था। इस विशाल चुम्बक को मुस्लिम आक्रमणकारी उठा ले गये जिसकी वजह से मंदिर की दीवारों का संतुलन समाप्त हो गया और वे गिर गई। मेरे लिए इस पर विश्वास करना मुश्किल था। गाइडों से एक और बात मालूम हुई और वो ये कि यह मंदिर अपवित्र हो चुका है और इस पर चप्पल–जूता पहन कर चढ़ सकते हैं।
कोणार्क से लगभग 7 किमी पहले एक और सुन्दर समुद्री किनारा है जिसे रामचण्डी बीच कहते हैं। इसका नाम इस समुद्री किनारे पर स्थित रामचण्डी देवी के मन्दिर के नाम पर पड़ा है। इस बीच पर एक छोटी सी नदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है और इस संगम का नजारा बहुत ही खूबसूरत है।
आज का अपना पूरा दिन कोणार्क को समर्पित करने के बाद शाम 4 बजे हमने पुरी के लिए बस पकड़ ली और एक घण्टे के अन्दर पुरी पहुंच गये। होटल पहुंच कर कुछ देर हमने आराम किया और इसके बाद बाहर जाकर खाना खाया। होटल से चेकआउट करने की हमें जल्दी नहीं थी क्योंकि हमारी ट्रेन पुरूषोत्तम एक्सप्रेस रात के पौने दस बजे थी और साथ ही हमने आज का किराया भी चुका दिया था। हमारे गर्म कपड़े जो इस पूरी यात्रा में खूंटियों की शोभा बढ़ा रहे थे आज फिर से हमारे शरीर पर लद गये क्योंकि हमें फिर से ठण्डे मौसम की ओर वापस चलना था। ट्रेन के टाइम से लगभग एक घण्टे पहले हमने होटल छोड़ दिया और स्टेशन पहुंच गये।

रामचण्डी बीच पर नदी और सागर का संगम
सूर्य मन्दिर के आस–पास का प्रांगण


सूर्य मन्दिर का सामने से लिया गया फोटो

सूर्य मन्दिर का मुख्य भवन






गाइडों के पीछे भेड़–बकरियों की तरह दौड़ती भीड़

कितनी कारीगरी की गयी है दीवारों परǃ





सूर्य प्रतिमा



चन्द्रभागा तट पर भजन–कीर्तन
तालाब के चारों ओर की गई बैरिकेडिंग


चन्द्रभागा तट पर स्थित तालाब

चन्द्रभागा तट पर लहरों का संग्राम–









सम्बन्धित यात्रा विवरण–


कोणार्क के सूर्य मन्दिर का गूगल फोटो–

         

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