Friday, October 19, 2018

सरिस्का नेशनल पार्क

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

12.30 बजे मैं गोला का बास से सरिस्का के लिये रवाना हो गया। गोला का बास तक तो सड़क काफी कुछ ठीक थी लेकिन इसके बाद इसकी दशा किसी बीमार बुजुर्ग की तरह क्रमशः खराब होने लगी। गड्ढों का आकार और संख्या महँगाई की तरह बढ़ने लगी। लेकिन इसके साथ ही एक और परिवर्तन हुआ– और वो ये कि सड़क के किनारे का भूदृश्य भी बदलकर पथरीला और जंगली होने लगा। आबादी कम दिखने लगी। और ऐसे दृश्य काफी मनमोहक होते हैं। बारिश के मौसम की वजह से पहाड़ियां काफी हरी–भरी दिख रही थीं। पथरीला धरातल भी शायद ही कहीं ऐसा था जो हरियाली से न ढका हो।

Friday, October 12, 2018

भानगढ़–डरना मना हैǃ

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

आज जयपुर में मेरा चौथा दिन था। पिछली रात भी मेरी किराये की बाइक,होटल के सामने,सड़क के किनारे खड़ी रही और मैं होटल के कमरे में चैन की नींद सोता रहा। जयपुर के अन्दर लगभग सभी प्रमुख जगहों पर जा चुका था और आज जाने–माने,सुप्रसिद्ध,भानगढ़ के किले पर चढ़ाई करनी थी और वहाँ के भूतों से लड़ना था। वैसे तो भानगढ़ को एक किला होने की वजह से ही प्रसिद्ध होना चाहिए था लेकिन यह अपने किला होने की वजह से कम और भुतहा होने की वजह से अधिक जाना जाता है।

Friday, October 5, 2018

जयपुर की विरासतें–दूसरा भाग

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–


जयपुर का सिटी पैलेस जयपुर की शान है। अब अगर सिटी पैलेस के लिए भी अलग से टिकट है तो कोई बुरा नहीं। थोड़ा सा महँगा है– 130 रूपये। सिटी पैलेस भी मेरे कॉम्बो टिकट में शामिल नहीं था। लेकिन सिटी पैलेस के गेट के बाहर से ही सिटी पैलेस के नजारे देखकर यह लग रहा था कि टिकट के पैसे तो पूरी तरह से वसूल हो जायेंगे। सिटी पैलेस के मुख्य गेट के दाहिनी तरफ टिकट घर है। तो बिना समय गँवाये मैं टिकट लेकर सिटी पैलेस के अंदर दाखिल हो गया। सिटी पैलेस के अन्दर हम पूरब की ओर से प्रवेश करते हैं। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही ठीक सामने मुबारक महल दिखाई पड़ता है। इस मुख्य द्वार को वीरेन्द्र पोल भी कहा जाता है।

Friday, September 28, 2018

जयपुर की विरासतें-पहला भाग

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

आज जयपुर में मेरा तीसरा दिन था। और किराये की बाइक से मैं दूसरे दिन की यात्रा करने जा रहा था। वैसे तो जयपुर और हवामहल एक दूसरे के पर्याय हैं लेकिन पहले दिन का मेरा भ्रमण आमेर,नाहरगढ़ और जयगढ़ के नाम रहा और आज मैं राजस्थान की कुछ ऐतिहासिक विरासतों जैसे हवामहल,जंतर–मंतर इत्यादि की ओर जा रहा था। मौसम ने भी मेरा साथ दिया था। कल तो इन्द्रदेव ने प्रसन्न होकर सूर्यदेव को बादलों की ओट में कर दिया था ताकि मुझे राजस्थान की तेज धूप न लगे,सड़कों को धुल दिया था और हरियाली के रंग को और गाढ़ा कर दिया था जिससे की राजस्थान भी मुझे पूरी तरह से हरा–भरा दिखे।

Friday, September 21, 2018

जयगढ़

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

दिन के 2 बज रहे थे। नाहरगढ़ का किला फतह होने के बाद अब जयगढ़ की बारी थी। आज इन्द्रदेव मेरे ऊपर प्रसन्न थे ही। आमेर और नाहरगढ़ के बीच उन्होंने मुझे अपने प्रेमरस से सराबोर कर दिया था और संभावना लग रही थी कि अब मुझ पर सोम–रस भी बरसाएंगे। जयगढ़ किले के बाहरी गेट के बाहर ही,मैंने बिना पर्ची के बाइक खड़ी कर दी और अन्दर प्रवेश कर गया। हेलमेट कुछ–कुछ भीग गया था तो उसे उल्टा करके बाइक के हैण्डल में लटका दिया क्योंकि धूप खिलने के आसार नजर आ रहे थे। जयपुर शहर की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों को दिखाने वाले मेरे कॉम्बो टिकट में जयगढ़ शामिल नहीं था। इसी धरती पर बसी हुई काशी नगरी,जिस तरह से इस धरती से अलग शिव के त्रिशूल पर बसी हुई मानी जाती है,संभवतः उसी तरह से यह किला भी भारतीय पुरातत्व विभाग के  कॉम्बो टिकट के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

Friday, September 14, 2018

आमेर से नाहरगढ़

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

11.30 बज रहे थे। तेज धूप में आमेर महल की चढ़ाई–उतराई ने शरीर का पानी सोख लिया था। उस जमाने के राजे–महाराजे कैसे महल में आते–जाते होंगे,सो तो वही जाने। शायद छत्र लगाने और हवा करने के लिए भी सेवक लगे रहते थे। पर अपनी किस्मत में यह सब कहाँǃ तो फिर बाहर निकल कर पहले मिल्क शेक के ठेले पर शरीर की जलापूर्ति बहाल की और फिर बाइक लेकर जयगढ़ और नाहरगढ़ के रास्ते पर निकल पड़ा।
आमेर से वापस जयपुर की ओर लगभग 2 किमी चलने पर एक त्रिमुहानी से दाहिने एक सड़क जयगढ़ व नाहरगढ़ की ओर निकलती है।

Friday, September 7, 2018

जयपुर–गुलाबी शहर में

गुलाबी इसलिए नहीं कि वहाँ गुलाबों की खेती होती है वरन गुलाबी इसलिए कि वहाँ के दर–ओ–दीवार का रंग गुलाबी है। जी हाँ,रेगिस्तान का प्रवेश द्वार गुलाबी ही तो है। और रेगिस्तान भी कितना हरा–भराǃ आश्चर्य है। क्योंकि मुझे तो हरा–भरा ही दिखाई पड़ा। अगस्त के महीने में जयपुर के अास–पास की धरती इतनी हरी–भरी थी कि मैंने सोचा भी न था। वैसे तो जेठ की भीषण गर्मी के बाद बरसात,रेगिस्तान तो क्या,पत्थर को भी नर्मदिल बना देती है। गुलाबी नगरी इस समय हरियाली से घिरी हुई थी। तो फिर राजघरानों की शान–ओ–शौकत के साथ मौसम की नजाकतों का लुत्फ उठाने मैं जयपुर की ओर निकल पड़ा।

Friday, August 31, 2018

अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

एक मोड़ पर हमारी बाइक फिर से खड़ी हो गई। खड़ी क्या हो गई,पीछे सरकने लगी। हमें संघर्ष करते देख हमारे पीछे आ रहे एक बोलेरो के ड्राइवर ने समझदारी दिखाते हुए अपनी गाड़ी चढ़ाई से पहले ही रोक ली,नहीं तो कुछ भी हो सकता था। बाइक पर पीछे बैठे मेरे मित्र को नीचे उतरकर धक्का लगाना पड़ा। तब जाकर हमारी बाइक ऊपर चढ़ सकी। लेकिन इस बार ऊपर चढ़ने के बाद मैंने बाइक किनारे खड़ी कर दी। कई बार इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने के बाद अब हम चिन्तन की दशा में पहुँच गए थे।

Friday, August 24, 2018

अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–


1 जून
अाज अपने सपने को पूरा करने के लिए हम मुक्तिनाथ के रास्ते पर निकल रहे थे। तो फिर विचार यह था कि जितनी सुबह निकल लिया जाय उतना ही अच्छा। सुबह के समय अधिक दूरी तय कर लेंगे। लेकिन मौसम रात से ही अपनी वाली कर रहा था। हम अपनी वाली करने पर तुले थे। लेकिन प्रकृति के आगे कौन टिक सकता है। सुबह के समय बारिश कुछ तेज थी। तो हम अपनी तैयारियों में लगे थे कि बारिश बन्द होते ही निकल लेंगे। रात के समय होटल वालों ने बाइक को अन्दर कर दिया था। तो बारिश हल्की होते ही उसे बाहर निकाला गया। अब बारी थी बैगबन्धन की।

Friday, August 17, 2018

अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)

इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–

दोपहर के 1 बजे हम विश्व शांति स्तूप से उतरकर वापस पोखरा शहर और फेवा लेक की ओर चल पड़े। लगभग आधे घण्टे में ही हम फेवा लेक के किनारे थे। और पोखरा की विश्व प्रसिद्ध,सपने सरीखी झील हमारी आँखों के सामने थी। बाइक खड़ी करते ही स्टैण्ड वाला पर्ची लिए सामने हाजिर हो गया। कुछ घण्टे पहले ही हम यहाँ 20 रूपए भुगत कर गए थे। सो हमने दिमाग दौड़ाया और उससे शिकायत की तो उसने बाकायदा पर्ची की जाँच की और पर्ची पर उसी दिन की तारीख देखकर हमें अपने प्रकोप से मुक्त कर दिया।