Friday, May 25, 2018

बुरहानपुर

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27 मार्च
आज मुझे बुरहानपुर घूमना था। सो 7 बजते–बजते कमरे से निकल पड़ा। पुराने बसे बुरहानपुर की गलियों से होते हुए मुझे तापी नदी के किनारे बने बुरहानपुर किले की ओर जाना था। तापी के किनारे भी टहलना था और बन सके तो कलेजा कड़ा करके कुछ भुतहे खण्डहरों की टोह भी लेनी थी। पूछते–पूछते किले की ओर चल पड़ा। लगभग दो किलोमीटर की दूरी है। मन उछल रहा था कि इठलाती तापी से मुलाकात होगी। क्योंकि ओरछा में बेतवा ने मन को सम्मोहित कर लिया था। वही उम्मीद आज बुरहानपुर में तापी से भी थी।

Friday, May 18, 2018

असीरगढ़–रहस्यमय किला

युधिष्ठिर ने सिर्फ आधा झूठ बोला था– "अश्वत्थामा हतः।" "नरो वा कुंजरो" को तो श्रीकृष्ण की शंखध्वनि ने छ्पिा लिया था। इस आधे झूठ के कारण जीवन भर कभी भी मिथ्या भाषण न करने वाले युधिष्ठिर को नरक के दर्शन करने का दण्ड मिला था। खैर,यह तो बहुत बड़े धार्मिक विश्लेषण का विषय है और मेरी इतनी पहुँच नहीं है। मेरे तो इस धार्मिक चिन्तन का कारण सिर्फ यह मान्यता है कि असीरगढ़ के किले में स्थित शिव मन्दिर में आज भी अश्वत्थामा पूजा करने आते हैं। अब किसी स्थान का वर्तमान किसी रहस्यमय अतीत से जुड़ा है तो कौन ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहेगा।

Friday, May 11, 2018

अजयगढ़

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अपनी इस खजुराहो यात्रा में खजुराहो के मंदिर और खजुराहो के निर्माणकर्ता चंदेल शासकों की प्राचीन राजधानी कालिंजर घूम लेने के बाद आज मैं खजुराहो के पास स्थित एक और किले अजयगढ़ की ओर निकल रहा था। वैसे तो कल कालिंजर जाते समय मैं अजयगढ़ होकर ही गया था लेकिन रास्ते में इतना समय नहीं था कि अजयगढ़ की भी हाल–चाल ली जा सके। केवल कालिंजर घूम कर आने में ही नानी याद आ गयी थी। हाँ,आज अजयगढ़ से ही घूमकर लौटना था तो समय की समस्या नहीं होनी थी।

Friday, May 4, 2018

कालिंजर

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आज खजुराहो में मेरा तीसरा दिन था। वैसे तो खजुराहो आने वाले पर्यटक एक या दो दिन यहाँ ठहरने के बाद यहीं से वापस लौट जाते हैं अर्थात खजुराहो आने का मतलब यहाँ मंदिरों की दीवारों पर बनी बहुचर्चित मूर्तियों का दर्शन और फिर जल्दी से खजुराहो से पलायन,लेकिन मेरा कार्यक्रम कुछ और ही था। खजुराहो आने का मतलब ही क्या जब तक कि चंदेलों के इतिहास को अच्छी तरह से न खंगालें। चूँकि कालिंजर अतीत में चंदेलों की राजधानी रहा है और एक ऐसा भी दौर गुजरा जबकि कालिंजर का किला सत्ता का केन्द्र रहा। तो बिना कालिंजर की यात्रा किये खजुराहो यात्रा अधूरी रहती।

Friday, April 27, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (चौथा भाग)

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कल दिन भर मैंने खजुराहो की सड़कों पर डांडी मार्च किया था। दिन भर बिना कहीं बैठे लगातार खड़े रहने व चलते रहने की वजह से थक गया था। खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह तो कस्बे के बिलकुल पास में ही हैं,इसलिए इन तक पहुँचने के लिए ग्यारह नम्बर की जोड़ी ही पर्याप्त है। लेकिन पूर्वी मंदिर समूह तथा दक्षिणी मंदिर समूह तक पहुँचने के लिए कोई न कोई छोटा–मोटा साधन जरूरी है। हालाँकि दूरी इनकी भी बहुत अधिक नहीं है लेकिन व्यस्त जिंदगी में से किसी तरह बचा कर निकाला हुआ समय बहुत ज्यादा खर्च हो जायेगा। आज मैं इसी थ्योरी पर सोच रहा था। थोड़ा–बहुत घूमना शेष रह गया है। ऑटो वाले 'ऑटोमैटिकली' पूरा किराया वसूलेंगे। कल वाला युवक जो मोटरसाइकिल दे रहा था उसे भी मैंने फोन पर ही मना कर दिया था। फोन काटते समय उसने एक बहुत अजीब सा कमेंट किया जिस पर मैं काफी देर तक सोचता रहा– 'सिंगल परसन।'

Friday, April 20, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (तीसरा भाग)

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पश्चिमी मंदिर समूह के पास से लगभग 15 मिनट चलने के बाद मैं चौंसठ योगिनी मंदिर पहुँचा तो रास्ते में और मंदिर के आस–पास मुझे कोई भी आदमी नहीं दिखा। केवल मंदिर के पास एक सुरक्षा गार्ड धूप से बचने के लिए बनाये गये टीन शेड के नीचे बैठा पेपर पढ़ रहा था। अास–पास चर रही बकरियां उसे परेशान किये हुए थीं। बिचारा मंदिर में अनधिकृत रूप से प्रवेश कर रही बकरियों को जब तक भगाने गया तब तक उसका पेपर हवा उड़ा ले गयी। दोहरी मारǃ

Friday, April 13, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (दूसरा भाग)

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टिकट और बैग चेकिंग की सारी औपचारिकताएं पूरी करने और बैग चेक करने वाले सुरक्षाकर्मी से बैग में रखा खाने–पीने का सामान मंदिर परिसर के अंदर प्रयोग न करने का वादा करने के बाद मैं पश्चिमी मंदिर समूह के मंदिरों का बारीक निरीक्षण करने में लग गया। परिसर के अंदर बहुत अधिक भीड़ नहीं थी लेकिन जो भी थी आश्चर्यजनक थी। क्योंकि अधिकांश दर्शनार्थी,जो कि पूजार्थी न होकर केवल पर्यटक थे,विदेशी थे। अब हिन्दू मंदिरों के अधिकांश दर्शक विदेशी हों तो थोड़ा सा आश्चर्य तो पैदा होगा ही।

Friday, April 6, 2018

खजुराहो–एक अलग परम्परा (पहला भाग)

खजुराहो का नाम सामने आते ही एक अजीब सी धारणा मन में उत्पन्न होती है। जो हमने इसके बारे में पहले से ही मन में बना रखी है। एक ऐसी जगह जहाँ उन्मुक्त कामकला की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। एक ऐसी क्रिया और भावना को व्यक्त करती सजीव मूर्तियाँ जो हमारे भारत में सदा से ही वर्जित फल रही है। लेकिन खजुराहो के बारे में सिर्फ यही सत्य नहीं है वरन खजुराहो के सम्पूर्ण सत्य का एक छोटा सा अंश मात्र ही है।और इससे बड़ा सत्य यह है कि खजुराहो,मंदिर निर्माण की दृष्टि से भारतीय इतिहास की वास्तुकला की सर्वाेत्कृष्ट कृतियों का पालना है।

Friday, March 30, 2018

औरंगाबाद की सड़कों पर

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26 दिसम्बर
आज हमारी इस यात्रा का अंतिम दिन था। अर्थात औरंगाबाद की यात्रा का अंतिम दिन,क्योंकि यात्रा का अंत तो कभी हो ही नहीं सकता। हमारी जीवन यात्रा के साथ ये छोटी–मोटी यात्राएं तो चलती ही रहेंगी आैर जीवन यात्रा में नयी–नयी कहानियां जुड़ती रहेंगी। फिर भी एक बड़े चक्र का छोटा सा भाग पूर्ण होने वाला था। औरंगाबाद से बाहर निकल कर घूमने का काम पूरा हो चुका था और अब औरंगाबाद शहर की सड़कें ही बची थीं। काम कम था और समय पर्याप्त। ऐसे में थोड़ा अधिक सोया जा सकता है। अब छोटी कक्षाओं में कभी पढ़ी गयी संस्कृत की उस सूक्ति– "दीर्घसूत्री विनश्यति" काे भूलकर हम भी सुबह के पौने सात बजे तक सोते रहे।

Friday, March 23, 2018

देवगिरि उर्फ दौलताबाद

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2 बजे हम दौलताबाद किले पहुँचे। दौलताबाद अपने इतिहास,महत्व और विशेषताआें की वजह से कम और मुहम्मद तुगलक के अदूरदर्शी फैसलों की वजह से अधिक जाना जाता है। दौलताबाद का किला औरंगाबाद से एलोरा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 52 के किनारे स्थित है। मुख्य सड़क छोड़कर किले की ओर बढ़ने पर बायें हाथ टिकट काउण्टर है।किले का प्रवेश शुल्क 15 रूपये है यानी अजंता या एलोरा का आधा। वैसे प्रवेश शुल्क कम या अधिक होने से इसके महत्व में कोई अंतर नहीं आता। इसके बाद दाहिनी तरफ मुड़कर आगे बढ़ने पर बायें हाथ किले का मुख्य प्रवेश द्वार है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर एक लम्बा पथरीला रास्ता मिलता है।