Friday, August 31, 2018

अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

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एक मोड़ पर हमारी बाइक फिर से खड़ी हो गई। खड़ी क्या हो गई,पीछे सरकने लगी। हमें संघर्ष करते देख हमारे पीछे आ रहे एक बोलेरो के ड्राइवर ने समझदारी दिखाते हुए अपनी गाड़ी चढ़ाई से पहले ही रोक ली,नहीं तो कुछ भी हो सकता था। बाइक पर पीछे बैठे मेरे मित्र को नीचे उतरकर धक्का लगाना पड़ा। तब जाकर हमारी बाइक ऊपर चढ़ सकी। लेकिन इस बार ऊपर चढ़ने के बाद मैंने बाइक किनारे खड़ी कर दी। कई बार इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने के बाद अब हम चिन्तन की दशा में पहुँच गए थे।

Friday, August 24, 2018

अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)

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1 जून
अाज अपने सपने को पूरा करने के लिए हम मुक्तिनाथ के रास्ते पर निकल रहे थे। तो फिर विचार यह था कि जितनी सुबह निकल लिया जाय उतना ही अच्छा। सुबह के समय अधिक दूरी तय कर लेंगे। लेकिन मौसम रात से ही अपनी वाली कर रहा था। हम अपनी वाली करने पर तुले थे। लेकिन प्रकृति के आगे कौन टिक सकता है। सुबह के समय बारिश कुछ तेज थी। तो हम अपनी तैयारियों में लगे थे कि बारिश बन्द होते ही निकल लेंगे। रात के समय होटल वालों ने बाइक को अन्दर कर दिया था। तो बारिश हल्की होते ही उसे बाहर निकाला गया। अब बारी थी बैगबन्धन की।

Friday, August 17, 2018

अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)

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दोपहर के 1 बजे हम विश्व शांति स्तूप से उतरकर वापस पोखरा शहर और फेवा लेक की ओर चल पड़े। लगभग आधे घण्टे में ही हम फेवा लेक के किनारे थे। और पोखरा की विश्व प्रसिद्ध,सपने सरीखी झील हमारी आँखों के सामने थी। बाइक खड़ी करते ही स्टैण्ड वाला पर्ची लिए सामने हाजिर हो गया। कुछ घण्टे पहले ही हम यहाँ 20 रूपए भुगत कर गए थे। सो हमने दिमाग दौड़ाया और उससे शिकायत की तो उसने बाकायदा पर्ची की जाँच की और पर्ची पर उसी दिन की तारीख देखकर हमें अपने प्रकोप से मुक्त कर दिया।

Friday, August 10, 2018

अनजानी राहों पर–वालिंग टु पोखरा (दूसरा भाग)

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पोखरा अभी वालिंग से 2 घण्टे की दूरी पर था। शाम होने को आ रही थी सो हमने यहीं रूकने का फैसला किया। हमने वहीं खड़े–खड़े ही आस–पास नजर दौड़ाई तो सड़क के दोनों किनारों पर कुछ होटल दिखाई पड़े। कुछ देर तक हम दोनों तरफ के होटलों की ओर बारी–बारी से ललचाई निगाहों से देखते रहे,ताकि किसी हाेटल का कोई एजेण्ट हमारे पास आए और हम उससे मोल–भाव करने के साथ साथ कुछ जानकारी भी हासिल कर सकें। लेकिन हायǃ किसी ने इन अभागों को घास नहीं डाली। हार मानकर हम खुद ही एक होटल के दरवाजे तक पहुँचे।

Friday, August 3, 2018

अनजानी राहों पर–नेपाल की ओर (पहला भाग)

30 मई
राहें अनजान हों तो अधिक सुंदर लगती हैं। तो क्यों न कुछ अनजान राहों पर चला जाए। भाग्यवादी लोग तो यही मानते हैं कि सब कुछ पहले से निश्चित है। मैं ऐसा नहीं मानता। और यात्रा के बारे में तो ऐसा बिल्कुल ही नहीं है। यात्रा की फुलप्रूफ प्लानिंग पहले से नहीं की जा सकती। पेशेवर टूरिज्म की बात अलग है। वैसे तो यात्रा की कुछ न कुछ प्लानिंग हर बार मेरे दिमाग में जरूर बनी रहती है,लेकिन इस बार यात्रा का साधन मोटरसाइकिल थी,तो सब कुछ अनिश्चित था। गाड़ियों के हिसाब से बहुत कुछ प्लान करना पड़ता है। तो जब गाड़ी अपनी हो और उसपर भी मोटरसाइकिल,तो बहुत अधिक सोचने–समझने की जरूरत नहीं थी। रात को रहने का कैसा भी ठिकाना मिल जाए तो दिन पर सड़कों को नापते रहेंगे। तो इस बार नेपाल हिमालय फतह करने का इरादा था।

Friday, July 6, 2018

यही है जिंदगी

जीवन एक यात्रा है। अनवरत यात्रा। यह तभी रूकती है जब मृत्यु से साक्षात् होता है। मनुष्य की जिजीविषा मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य को भी भुला देती है। मृत्यु की वास्तविकता को जानते हुए भी वह उससे पहले विराम लेने को तैयार नहीं होता। और मनुष्य का यही हठ जीवन के सौन्दर्य का सृजन करता है। अन्यथा मृत्यु का भय मृत्यु से पहले ही सृष्टि के सृजन को सीमित कर देता। मानव जीवन की इसी विशेषता में सृष्टि का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है और गहराई तक सोचने पर लगता है कि शायद यही है जिन्दगी

Friday, June 29, 2018

धार–तलवार की धार पर

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माण्डव से धार के लिए बस रवाना हुई तो मैं माण्डव की वादियों में खो गया। माण्डव मुझे कुछ वैसे स्थानों में से एक लगा जहाँ चले जाने के बाद वापस लौटने का मन नहीं करता। लेकिन यह तो यात्रा का एक पड़ाव था। और यात्रा तो अनवरत–अविराम चलती रहती है। इस अनन्त यात्रा का एक छोटा सा हिस्सा अभी गुजरा था– कुछ ऐसी यादों को लिए हुए जो बार–बार दोहराए जाने की जिद करती हैं। लेकिन ऐसी यादों के साथ जीने की तो आदत पड़ चुकी है। तो फिर ऐसी ही मनोदशा में मैं बस में बैठा खिड़की से बाहर के संसार को आँखों के रास्ते आत्मसात करने की कोशिश करते हुए इतिहास प्रसिद्ध धारा नगरी की ओर बढ़ा चला जा रहा था।

Friday, June 22, 2018

माण्डू–सिटी ऑफ जॉय (दूसरा भाग)

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अब किले की दक्षिण दिशा में दो मुख्य इमारतें बची थीं– बाज बहादुर का महल एवं रानी रूपमती का मण्डप। माण्डव का नाम सम्भवतः इन्हीं दो इमारतों के साथ सर्वाधिक जाना जाता रहा है। रानी रूपमती का महल माण्डव की पहाड़ी की ऊँची कगार पर बना है जबकि बाजबहादुर का महल पहाड़ी की ढलान पर नीचे की ओर बना है। पहले बाज बहादुर के महल में चलते हैं। लाल पत्थरों से बनी इस इमारत का निर्माण 1508 में नासिर शाह खिलजी के द्वारा कराया गया था। इस इमारत के चारों ओर किले जैसी संरचना बनी थी जिसके अवशेष वर्तमान में भी दिखाई पड़ते हैं।

Friday, June 15, 2018

माण्डू–सिटी ऑफ जॉय (पहला भाग)

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आज मेरी मंजिल माण्डू या माण्डव थी। मेरी जानकारी में तो इसका नाम माण्डू ही था लेकिन स्थानीय रूप से इसका नाम माण्डव है। महेश्वर बस स्टैण्ड पर पता लगा कि माण्डव के लिए कोई सीधी बस नहीं है और इसके लिए धामनोद जाना पड़ेगा। जैसे ही मैं स्टैण्ड पहुँचा सुबह 8.15 पर मुझे धामनोद की बस मिल गयी। महेश्वर से धामनोद की दूरी 13 किमी और किराया 15 रूपये। अब चूँकि धामनोद,इन्दौर–महू–सेंधवा होकर महाराष्ट्र के धुले जाने वाले मुख्य मार्ग पर अवस्थित है तो इस वजह से यह एक महत्वपूर्ण जंक्शन है।

Friday, June 8, 2018

महेश्वर

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अपराह्न के 3 बजे मैं महेश्वर बस स्टैण्ड पर बस से उतरा। ओंकारेश्वर से महेश्वर के रास्ते में बस ने बहुत समय लिया। अगर गर्मी न होती तो छुक–छुक रेल का सा मजा आता। गूगल पर टेंपरेचर चेक किया तो 41 डिग्री था। मैंने बोतल में पानी भरकर रख लिया था। भले ही गर्म हो जाएगा,पास में रहेगा तो गले को सूखने से बचाने के काम आएगा। रास्ते में पथरीले धरातल के बीच कहीं–कहीं गेहूँ की फसल कट चुकी थी तो कहीं खेतों में ही खड़ी थी। बस अपने स्टैण्ड पर रूकी तो लगा कि बस स्टैण्ड के लिए जरूरी नहीं कि लम्बी–चौड़ी इमारत बनी हो और वहाँ दुनिया भर की बसें लगीं हों। सड़क किनारे बस खड़ी होती है तो उसे भी स्टैण्ड माना जा सकता है।