Friday, December 8, 2017

चन्देरी–इतिहास के झरोखे से


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दूसरा दिन–
चन्देरी का इतिहास– चन्देरी का इतिहास प्राचीन होने के साथ साथ गौरवशाली भी है। प्राचीन महाकाव्य काल में यह चेदि नाम से विख्यात था जहां का राजा शिशुपाल था। ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में प्रसिद्ध सोलह महाजनपदों में से चेदि या चन्देरी भी एक था। तत्कालीन चेदि राज्य काे वर्तमान में सम्भवतः बूढ़ी चन्देरी के नाम से जाना जाता है जो वर्तमान चन्देरी के 18 किमी उत्तर–पश्चिम में स्थित है। बूढ़ी चन्देरी में बहुत से बिखरे मंदिर,शिलालेख व मूर्तियों के अवशेष पाये जाते हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि यह प्राचीन काल में निश्चित रूप से कोई ऐतिहासिक नगर रहा होगा जो कालान्तर में घने जंगल में विलीन हो गया। 13वीं सदी तक बूढ़ी चन्देरी का महत्व धीरे–धीरे समाप्त हो गया और वर्तमान चन्देरी अस्तित्व में आया। वर्तमान चन्देरी नगर को 10वीं–11वीं सदी में प्रतिहारवंशी राजा कीर्तिपाल ने बसाया एवं इसे अपनी राजधानी बनाया।

Friday, December 1, 2017

चन्देरी की ओर

झरोखे से झांकना कितना आनन्ददायक लगता होगाǃ
यह झरोखे में बैठकर बाहर निहारती हुई किसी सुन्दरी को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे ही मुझे भी एक दिन झरोखे में से बाहर निहारने की इच्छा हुई और वह भी किसी ऐसे–वैसे झरोखे से नहीं वरन इतिहास के झरोखे से।
तो निकल पड़ा मध्य प्रदेश के कुछ गुमनाम से शहरों  की गलियों में।
शायद मुझे भी कोई झरोखा मिल जाय।
जी हाँ गलियों में और वो भी अकेले। पीठ पर बैग लादे सितम्बर के अन्तिम सप्ताह की चिलचिलाती धूप से बातें करते हुए मैं चल पड़ा–
"काश तुम ऐसी न होती तो कैसा हाेताǃ शायद मैं और दो चार किलोमीटर पैदल चल लेता।"
"लेकिन तुम ऐसी ही हो। मैं चाहकर भी तुमसे लड़ नहीं सकता।"
"इसलिए तुमसे समझौता कर लेता हूँ और पीठ पर के बैग के साथ-साथ सिर पर एक टोपी भी रख लेता हूँ।"

Wednesday, November 22, 2017

माता ने बुलाया हैǃ

माता ने बुलाया हैǃ
कहते हैं कि माता वैष्णो के यहाँ से बुलावा आता है,तभी आदमी वहाँ तक पहुँच पाता है। वैसे तो मन में आता है कि साल में कम से कम एक बार जरूर माता के दरबार में हाजिरी लगा लूँ लेकिन माता बुलाये तब तो। 2014 के जून महीने में माता के दरबार तक एक बार पहुँचा था लेकिन 2015 खाली–खाली ही बीत गया और माँ ने बुलावा नहीं भेजा। 2016 भी बीत गया और लगने लगा कि माँ कुछ नाराज है लेकिन 2017 में माँ ने बुलावा आखिर भेज ही दिया। समय का बहुत ही अभाव था लेकिन सितम्बर महीने के पहले सप्ताह में संयोग बन गया।

चल अकेलाǃ
यात्रा वैसे तो मैं अकेले करना पसन्द करता हूँ। हर तरह की आजादी रहती है। जहाँ मन करे वहाँ घूमो। जहाँ मन करे वहाँ रूको। जो मन करे वो खाओ। लेकिन बेतकल्लुफ दोस्त साथ हों तो यात्रा का मजा कई गुना बढ़ जाता है। और दोस्त भी ऐसे जो हर साल वैष्णो माता का जयकारा लगाते हुए माँ के दरवाजे पर मत्था टेकते हैं।

Sunday, September 10, 2017

Friday, August 25, 2017

गंगा आरती

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर 5 जनवरी 2017 को रिकार्ड किया गंगा आरती का एक वीडियो–


Friday, August 18, 2017

डलहौजी–नीरवता भरा सौन्दर्य

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22 जून
कल का दिन बारिश के जिम्मे रहा या फिर ये कहें कि बारिश का आनन्द लिया गया। तो फिर कल के दिन के लिए निर्धारित कार्यक्रम आज जारी था। गाड़ी वाले से बात हो गयी थी। चम्बा जाने का प्लान कैंसिल करना पड़ा। गाड़ी वाले ने नौ बजे का समय दे रखा था। हल्का–फुल्का नाश्ता करके हम बहुत पहले ही तैयार हो गये थे। बाहर निकले और गाड़ी में सवार हो गये। डलहौजी की सड़कें सँकरी हैं। कभी–कभी भीड़ हो जाती है। लेकिन शोर नहीं होता। बाकी हिल स्टेशनों जैसा भारी–भरकम जमावड़ा नहीं होता। इस समय पीक सीजन है। अगर इस समय यह स्थिति है तो बाकी समय तो और भी खाली रहता होगा।
गाड़ी चली तो उन्हीं पुराने रास्तों पर जिनपर हम पैदल घूम चुके थे। अर्थात बस स्टैण्ड से सुबास चौक,सुबास चौक से गाँधी चौक और गाँधी चौक से पंजपुला की ओर। पंचपुला का अर्थ है पाँच पुल। गाँधी चौक से पंचपुला की दूरी लगभग 2 किमी है। सुन्दर बलखाती सड़क। थोड़ी ही देर में पहुँच गये। बीच में है सतधारा फाल्स। चारों तरफ हरियाली से घिरा पंचपुला छोटा सा कस्बा है। लेकिन डलहौजी से पंजपुला तक पैदल टहलने के लिए आदर्श स्थान है यह।

Friday, August 11, 2017

डलहौजी–बारिश में भीगा एक दिन

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21 जून
डलहौजी हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में स्थित है। इसे 1854 में एक हिल स्टेशन के रूप में स्थापित किया गया। तत्कालीन वायसराय लार्ड डलहौजी के नाम पर इसका नाम रखा गया था। उस समय अंग्रेज अधिकारी व सैनिक अपनी छुटि्टयां बिताने यहाँ आया करते थे। डलहौजी की समुद्रतल से आैसत ऊँचाई 1970 मीटर या 6460 फीट है। डलहौजी एक बहुत ही छोटा सा कस्बा है जिसकी कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 7000 है और इस वजह से यहाँ लोगों का शाेर कम ही सुनाई देता है। पर्यटन के लिहाज से यह हिमाचल प्रदेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है और इसलिए आज हमने डलहौजी और आस–पास घूमने का प्लान बनाया था।
कल बीस जून को हम खज्जियार गये थे। खज्जियार के अपने रूप–रंग के अलावा बारिश ने भी कई रंग दिखाये। खज्जियार के कई सारे रूप एक ही दिन में देखने को मिल गये। शाम को आने के बाद हम डलहौजी और उसके आस पास घूमने के लिए एक गाड़ी बुक करने के फेर में थे। होटल वाले के माध्यम से बात भी हो गयी। हम निश्चिन्त होकर सो गये। अगले दिन डलहौजी घूमने के सपने लेकर। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही निर्धारित कर रखा था।

Friday, August 4, 2017

खज्जियार–मिनी स्विट्जरलैण्ड

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20 जून
डलहौजी के आस–पास देखने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन घूमने के लिहाज से अच्छा यही रहता है कि दूर वाला पहले घूम लें नजदीक वाला बाद में। इसलिए आज मिनी स्विट्जरलैण्ड के नाम से विख्यात खज्जियार की ओर निकल पड़े। खज्जियार जाने के लिए भी समस्या। अगर रिजर्व साधन से जाना चाहते हैं तो स्थानीय ट्रैवेल एजेण्ट लूटमार करने पर उतारू हैं। डलहौजी से खज्जियार की दूरी 22 किमी है। खज्जियार और दो–तीन और रास्ते में पड़ने वाली छोटी–छोटी जगहों को मिलाकर 2500 रूपये का पैकेज तैयार कर दिया गया है। अब अगर निगल सकते हैं तो निगलिए।