Saturday, September 23, 2017

खज्जियार की बारिश

Sunday, September 10, 2017

नैनी लेक

Friday, August 25, 2017

गंगा आरती

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर 5 जनवरी 2017 को रिकार्ड किया गंगा आरती का एक वीडियो–


Friday, August 18, 2017

डलहौजी–नीरवता भरा सौन्दर्य

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22 जून
कल का दिन बारिश के जिम्मे रहा या फिर ये कहें कि बारिश का आनन्द लिया गया। तो फिर कल के दिन के लिए निर्धारित कार्यक्रम आज जारी था। गाड़ी वाले से बात हो गयी थी। चम्बा जाने का प्लान कैंसिल करना पड़ा। गाड़ी वाले ने नौ बजे का समय दे रखा था। हल्का–फुल्का नाश्ता करके हम बहुत पहले ही तैयार हो गये थे। बाहर निकले और गाड़ी में सवार हो गये। डलहौजी की सड़कें सँकरी हैं। कभी–कभी भीड़ हो जाती है। लेकिन शोर नहीं होता। बाकी हिल स्टेशनों जैसा भारी–भरकम जमावड़ा नहीं होता। इस समय पीक सीजन है। अगर इस समय यह स्थिति है तो बाकी समय तो और भी खाली रहता होगा।
गाड़ी चली तो उन्हीं पुराने रास्तों पर जिनपर हम पैदल घूम चुके थे। अर्थात बस स्टैण्ड से सुबास चौक,सुबास चौक से गाँधी चौक और गाँधी चौक से पंजपुला की ओर। पंचपुला का अर्थ है पाँच पुल। गाँधी चौक से पंचपुला की दूरी लगभग 2 किमी है। सुन्दर बलखाती सड़क। थोड़ी ही देर में पहुँच गये। बीच में है सतधारा फाल्स। चारों तरफ हरियाली से घिरा पंचपुला छोटा सा कस्बा है। लेकिन डलहौजी से पंजपुला तक पैदल टहलने के लिए आदर्श स्थान है यह।

Friday, August 11, 2017

डलहौजी–बारिश में भीगा एक दिन

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21 जून
डलहौजी हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में स्थित है। इसे 1854 में एक हिल स्टेशन के रूप में स्थापित किया गया। तत्कालीन वायसराय लार्ड डलहौजी के नाम पर इसका नाम रखा गया था। उस समय अंग्रेज अधिकारी व सैनिक अपनी छुटि्टयां बिताने यहाँ आया करते थे। डलहौजी की समुद्रतल से आैसत ऊँचाई 1970 मीटर या 6460 फीट है। डलहौजी एक बहुत ही छोटा सा कस्बा है जिसकी कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 7000 है और इस वजह से यहाँ लोगों का शाेर कम ही सुनाई देता है। पर्यटन के लिहाज से यह हिमाचल प्रदेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है और इसलिए आज हमने डलहौजी और आस–पास घूमने का प्लान बनाया था।
कल बीस जून को हम खज्जियार गये थे। खज्जियार के अपने रूप–रंग के अलावा बारिश ने भी कई रंग दिखाये। खज्जियार के कई सारे रूप एक ही दिन में देखने को मिल गये। शाम को आने के बाद हम डलहौजी और उसके आस पास घूमने के लिए एक गाड़ी बुक करने के फेर में थे। होटल वाले के माध्यम से बात भी हो गयी। हम निश्चिन्त होकर सो गये। अगले दिन डलहौजी घूमने के सपने लेकर। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही निर्धारित कर रखा था।

Friday, August 4, 2017

खज्जियार–मिनी स्विट्जरलैण्ड

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20 जून
डलहौजी के आस–पास देखने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन घूमने के लिहाज से अच्छा यही रहता है कि दूर वाला पहले घूम लें नजदीक वाला बाद में। इसलिए आज मिनी स्विट्जरलैण्ड के नाम से विख्यात खज्जियार की ओर निकल पड़े। खज्जियार जाने के लिए भी समस्या। अगर रिजर्व साधन से जाना चाहते हैं तो स्थानीय ट्रैवेल एजेण्ट लूटमार करने पर उतारू हैं। डलहौजी से खज्जियार की दूरी 22 किमी है। खज्जियार और दो–तीन और रास्ते में पड़ने वाली छोटी–छोटी जगहों को मिलाकर 2500 रूपये का पैकेज तैयार कर दिया गया है। अब अगर निगल सकते हैं तो निगलिए। 

Friday, July 28, 2017

वाराणसी से डलहौजी

मई की भीषण गर्मी में मध्य प्रदेश के पथरीले इलाके की एेसी सैर की कि किसी ठण्डी जगह जाना जरूरी महसूस होने लगा। तो जून के महीने में शरीर को ठण्ड का एहसास दिलाने  के लिए हिमाचल प्रदेश की वादियों में डलहौजी की ओर निकल पड़े। हमेशा की तरह मैं और मेरी चिरसंगिनी संगीता। सबसे पहली लड़ाई– घर से बनारस की। आधा दिन तो इसी में निकल जाता है और इसके बाद कहीं वास्तविक युद्ध शुरू हो पाता है। बनारस से जम्मू–कश्मीर या हिमाचल प्रदेश के उत्तरी भागों की तरफ जाने के लिए सबसे अच्छी ट्रेन है– बेगमपुरा एक्सप्रेस। हमने भी इसी को चुना था।
बनारस से 12.50 पर पठानकोट के लिए ट्रेन थी इसलिए सुबह की इण्टरसिटी एक्सप्रेस से घर से बनारस के लिए निकल पड़े। हिन्दुस्तान की ट्रेन है। कब लेट हो जाय और कब समय से पहुंच जाय,कहा नहीं जा सकता। बनारस अन्य कामों से आना–जाना पड़ता है तो इसी ट्रेन की सेवा लेता हूँ और यह कभी अपने निर्धारित समय पर नहीं पहुँचती। आज हमको 12.50 पर पठानकोट के लिए ट्रेन पकड़नी थी तो हमारी बनारस वाली गाड़ी 9 बजे तक बनारस में हाजिर हो चुकी थी। अब प्लेटफार्म की सेवा लम्बे समय तक लेनी पड़ेगी। इन्तजार किया गया। बेगमपुरा एक्सप्रेस 12 बजे तक प्लेटफार्म पर आ लगी। छोटा प्लेटफार्म,लम्बी गाड़ी। धूप तो लगेगी ही। अब ठण्डी जगह जा रहे हैं तो इतनी तो धूप सहन कर ही सकते हैं।

Friday, July 21, 2017

ग्वालियर का किला

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28 मई
आज हमारी इस यात्रा का आखिरी दिन था और आज का कार्यक्रम था ग्वालियर का किला। कल जब हम ग्वालियर पहुँचे और आटो से इधर–उधर भाग–दौड़ कर रहे थे तो कई जगह से ग्वालियर के किले की बाहरी दीवारों की एक झलक दिखाई पड़ी। काफी रोमांचक लगा। आज हम बिल्कुल पास से इसे देखने जा रहे थे। अपने होटल के पास से ही हमने आटो पकड़ी और आधे घण्टे के अन्दर 15–20 रूपये में किले के गेट तक पहुँच गये। बाहरी गेट के पास से किला बहुत साधारण सा लग रहा था लेकिन असली दृश्य अभी सामने आना बाकी था। किले के दो गेट हैं– पूर्व की ओर ग्वालियर गेट है जहाँ हम पहुँचे थे। यहाँ से आगे पैदल ही जाना पड़ता है। पश्चिम की ओर उरवाई गेट है जहाँ वाहन से पहुँचा जा सकता है। किले के आस–पास किले के अन्दर घुमाने के लिए लगभग 400 रूपये के खर्च में गाड़ियाँ उपलब्ध हैं लेकिन मोलभाव जरूरी है। ये सभी गाड़ियां पश्चिमी गेट से किले में प्रवेश करती हैं। हाँ,अगर 8–10 किमी पैदल चलने की इच्छा व क्षमता हो तो पैदल भी घूमा जा सकता है।

Friday, July 14, 2017

ग्वालियर–जयविलास पैलेस

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26 मई की रात को दिल्ली जाने वाली भोपाल एक्सप्रेस समय से चली और ऐसे ही समय से चलती रहती तो भोर में 2.55 बजे यह ग्वालियर पहुँच गयी होती। लेकिन रात में सोते समय पता नहीं कब बहुत भीषण आँधी आयी और रेलवे के तार वगैरह टूट गये और इसकी मरम्मत होने में ट्रेन 4 घण्टे लेट हो गयी। ग्वालियर पहुँचने में 7 बज गये। वैसे इससे हम लोगों का समय के अतिरिक्त अौर कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ। ग्वालियर पहुँच कर भी वैसा ही हुआ जैसा कि हर जगह होता है। हम लोग स्टेशन से बाहर प्लेटफार्म नं0 1 की ओर बाहर निकले और आटो वालों की शरण में पड़े। दरअसल मैं ग्वालियर रेलवे स्टेशन के पास न ठहरकर किले के पास ठहरना चाह रहा था क्योंकि स्टेशन से किला काफी दूर (लगभग 3 किमी) है। ग्वालियर का किला देखने की मुझे बड़ी इच्छा थी। आटो वाले से बात करके किले की तरफ गये लेकिन वहां कोई ढंग का होटल ही नहीं मिला। वहाँ हजीरा चौराहे के आस–पास इक्के–दुक्के होटल ही थे। एक गली में एक होटल दिखा भी तो उसके अगल–बगल देसी और विदेशी शराब की अनेकों दुकानें दिखाई दे रही थीं। कई बार दरवाजा भड़भड़ाने के बाद भी होटल का कोई स्टाफ चेहरा दिखाने के लिए बाहर नहीं निकला। रात की आँधी की वजह से छोटी–मोटी दुकानें व टिन–शेड वगैरह उखड़े पड़े थे। उसी आटो से हम फिर उल्टे पाँव स्टेशन के पास आ गये।