Sunday, July 31, 2016

ओंकारेश्वर–महाकालेश्वर

मेरा यह यात्रा कार्यक्रम कुल छः दिनों का था। 15 अक्टूबर 2009 से 20 अक्टूबर 2009 तक। मेरे मित्र ईश्वर जी भी मेरे साथ थे। हमारा रिजर्वेशन कामायनी एक्सप्रेस,1072 अप में था जो वाराणसी से लाेकमान्य तिलक टर्मिनल को जाती है। वाराणसी से इसका प्रस्थान समय शाम 4 बजे था जबकि हम सुबह 10 बजे ही वाराणसी पहुंच गये थे। सो हमने सोचा कि समय का सदुपयोग कर लिया जाय। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने से बड़ी चीज क्या हो सकती है इसलिए खाना वगैरह खाया और आराम से टहलते हुए पहुंच गये बाबा के दर पर। पर जब दर्शन की लम्बी लाइन और पण्डों की जोर जबरदस्ती देखी तो मन बिदक गया। डर यह भी था कि कहीं लाइन में बहुत ज्यादा समय लग गया तो ट्रेन छूट जायेगी। प्लान फेल हो गया। हार मानकर गंगा मैया की शरण ली। दशाश्वमेध घाट पर बैठ कर गंगा दर्शन का लाभ लिया और स्टेशन को वापस हो लिये।

Sunday, July 24, 2016

यथार्थ

एक दिन
मैंने बनाई,
एक खूबसूरत पेंटिंग
मन के विस्तीर्ण कैनवस पर।
जिसमें खिला था–
सुनहरा सवेरा,
महाकवि माघ के प्रभात को लज्जित करता हुआ।
झील से मिलते धरती और आकाश,
बुझती युगों–युगों की प्यास।
गिरि–शिखरों के कोने से झांकता सूरज।
फूटती किरणें–
मानों मेरी आशायें फूट रही हों,
कालिदास की उपमा भी शरमा गई।
कलरव करते पक्षी,
खिलते फूल,
सब कुछ तो था।


अचानक
एक हवा का झोंका आया,
उड़ा ले गया सभी रंग।
रह गयी धुंधली रेखाएं,
कोरा कागजǃ
मैं स्तब्ध रह गया।
मेरी कल्पना
इतनी बदरंगǃ
या कहीं यही सच तो नहीं मेरे अन्दर काǃ
कहीं यही असली रंग तो नहीं बाहरी दुनिया का,
जिसमें मैं हूूं।
निर्णय नहीं कर सका–
क्या है यथार्थ।

निवेदन

हे प्रियतमǃ तुम आये
मन के मोती खनखनाये।
कौन कहता हैǃ
शंकर ने कामदेव को जला दिया,
तुम सशरीर मेरे पास हो।


मेरी जीवनरूपी आकांक्षा की चरम परिणति,
जन्मों की संचित अभिलाषा का मूर्त रूप,
मेरे आंगन के फूलों के माली।
इस तुच्छ जीवन के,
इस तुच्छ क्षण को,
तुम्हारी स्मृतियों ने जीवन्त कर दिया।
मुझे लगा तुम पास हो,
आहǃ मैं धन्य हो गई।


हे प्रियतमǃ तुम्हारी स्मृति धन्य है,
तुम कैसे होगेǃ
शायद मेरी याद तुम्हें न आये,
मैं सह लूंगी–तुम मेरे पास न आओ।
पर इक अभिलाषा है–
मेरा वो क्षण मुझे दे देना,
‘मेरी अन्तिम सांस तुम्हारी हो जाये।‘

Saturday, July 16, 2016

भविष्य

मैं सपने बुनता हूं
स्वर्णिम भविष्य के।
टूटते हैं रोज फिर भी
मेरी जिजीविषा अनन्त है।
पहले दूसरों से सुनता था
अब खुद भी कहता हूं–
‘‘कुछ करके दिखाउंगा,
कुछ बन के दिखाउंगा।‘‘
उजले कागजों को स्याह कर डालता हूं,
बाप की कमाई से सपनों का पेट पालता हूं,
क्योंकि मैं एक शिक्षित बेरोजगार हूं,
हर लक्ष्‍य के लिए संघर्ष करने को तैयार हूं।


इस बीच भावनाएं घेरती हैं–
एक सुन्दर सी होगी
मेरी जीवन संगिनी।
सारी दुनिया से अलग
सारे सुख आसमां के
दूंगा मैं उसको।
वो मुझे देगी–‘बाहों का हार‘
मैं उसे दूंगा–‘प्राणों का प्यार‘


बात आगे बढ़ती है–
हम दोनों का प्यार
होगा साकार
एक नन्हें से चांद के रूप में।
रूप में वो होगा
कृष्ण का अवतार
बल में वो जायेगा
हनुमान से भी पार
ज्ञान में मिलेगा
उसे सरस्वती का प्यार
चांद की गति से
बढ़ेगा वो आगे
होगा वो मुझसे भी दो कदम आगे।


एक अनचाहा प्रश्न उठता है–
कौन सी सीमा
बनायी है मैंने
तोड़ेगा जिसको वह।
कौन सी है सीमा
दो कदम पीछे
रह गया मैं जिससे।
सोचता हूं–
‘‘मैं लाखों में एक नहीं‘‘
जैसा कि सोचा था
मेरे जन्मदाता ने
मैं लाखों की तरह एक था।
शायद वह लाखों में एक हो जाये
या फिर मेरी तरह, बुनता रह जाये
‘‘सपने– स्वर्णिम भविष्य के‘‘

Tuesday, July 12, 2016

शान्ति की खोज में

मैं शोर से आक्रान्त हूं
इसलिए मैं भागता हूं, हर जगह से
पर मैं पलायनवादी नहीं हूं
इसलिए मैं भटकता हूं
शान्ति की खोज में।


मैंने सुनी–
फूलों से भरी, लताओं से घिरी,
अकेली डगर की कराहǃ
पता नहीं कब तक चलना है;
कहां है मेरी सीमा।
मैंने पहचाना
वो गहरा दर्द
जो छ्पिा था
कल–कल करती नदी के गीत में।
मैंने देखी–
वो नीरसता,
जो छ्पिा रखी थी आकाश ने
नीरवता के आवरण में।
हवा की सरसराहट ने सुनायी,
अपनी शाश्वत कहानी
मार्ग के लिए संघर्ष की।
मैंने सुना,
तरूओं का शोर–
हमें आश्रय दो, आज तक हमने सबको आश्रय दिया,
हमें आश्रय दो।


मैं अशान्त हो उठा।
पर मैं सतयुगी ऋषि नहीं,
जो हिमालय की कन्दरा में धूनी रमा लेता,
मैं कलि का वंशज हूं।
मैं कमरे में छुप गया।
पर मैंने अनुभव किया
एक भयानक शोर
जो आ रहा था मेरे अन्दर से
मैं फिर भागा और भागता गया
दुनिया से दूर
ऐसी जगह की खोज में
जहां शान्ति हो।

Monday, July 4, 2016

यही है जिंदगी

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है,
क्या यही है जिन्दगी
जिसके बारे में हम कभी सोचते ही नहीं है।
सुबह होती है,शाम जाती है,जिन्दगी यूं ही तमाम होती है।
रोज की भागदौड़ में पता ही नहीं चलता कि कैसे मिनटों और घण्टों की शक्ल में पूरा दिन ही बीत गया।
दिन और हफ्तों की गिनती में महीने और साल बीत गये। साल दर साल बीतते गये। बचपन का वो सुनहरा दौर कैसे बीता,उसके बारे में तब सोचते हैं जब केवल सोच ही सकते हैं।
जब कुछ सोच कर करने का समय होता है, उस समय जवानी का  जोश इतना ज्यादा होता है कि उमर जोश को संभालने में ही बीत जाती है और कुछ समय बाद गुजरता समय बताता है कि अरे यार थोड़ा सा यहां चूक गये। ये बात समझने में थोड़ी सी चूक हो गयी,हमने ये क्यों नहीं सोचा ǃ
और फिर बाद में सोचते रह जाते हैं
क्योंकि अब सोच ही सकते हैं
करने को तो कुछ रह नहीं जाता
और लगता है–
‘क्या यही है जिन्दगी‘