Tuesday, January 24, 2017

वाराणसी दर्शन–गंगा के घाट और गंगा आरती

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गोदौलिया बनारस का सबसे पुराना बाजार है। इसलिए भीड़ तो होगी ही। चौराहे पर लगा बोर्ड बता रहा था– काशी विश्वनाथ मन्दिर 500 मीटर और दशाश्वमेध घाट 700 मीटर। चौराहे से पैदल ही जाना है और यही उचित है क्योंकि बाजार और संकरी सड़कों की वजह से गाड़ियां ले जाना काफी समस्या पैदा करने वाला है। फिर भी स्थानीय लोग कहां मानने वाले हैं। रिक्शाें और माेटरसाइकिलों की भीड़ तो थी ही और पैदल की तो पूछना ही क्या।
उसी में बचते–बचाते,धक्के खाते चल दिये। रास्ते में काशी विश्वनाथ मन्दिर का सिंहद्वार दिखाई पड़ा। संगीता की इच्छा दर्शन करने की थी लेकिन अगर दर्शन की लाइन में लग जाते तो वहीं शाम हो जाती। मैं वैसे भी मन्दिरों का बहुत दर्शनाभिलाषी कभी भी नहीं रहा हूं। तो दर्शन का कार्यक्रम किसी तरह से टरकाया और टहलते हुए 2 बजे तक नदी किनारे पहुंचे।

Thursday, January 19, 2017

वाराणसी दर्शन–नया विश्वनाथ मन्दिर

भोले बाबा की नगरी–
वाराणसी
मां गंगा का नगर,भगवान बुद्ध का नगर,फक्कड़ों का नगर,पंडो–पुजारियों का नगर, मन्दिरों का नगर,घाटों का नगर,गलियों का नगर,अखाड़ों का नगर,सन्तों का नगर,औघड़ों का नगर ............
और भी पता नहीं कितने विशेषण जुड़े हैं इस शहर के साथ।
लेकिन वाराणसी या बनारस अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी जडें इतिहास में हैं जिन्हें खोजते हुए तमाम विदेशी और हम भारतीय भी इसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
तो हम भी एक दिन चल पड़े बनारस। जनवरी का पहला सप्ताह। कड़कड़ाती ठंड और कपड़ों काे भिगोता कुहरा। मौसम की बेवफाई और यात्रा का उत्साह। देखते हैं कौन बीस है और कौन उन्नीस।
तो हमने भी–हम यानी मैं और संगीता ने बस पकड़ी और अपने घर से लगभग 140 किमी दूर पहुंच गये घाटों के शहर वाराणसी में। बस इसलिए पकड़ी कि इस मौसम में ट्रेनों को उनका कंट्रोल रूम नहीं बल्कि कोहरा कंट्रोल करता है।

Tuesday, January 10, 2017

नैनीताल और आस–पास

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11 अक्टूबर को हमने नैनीताल के आस–पास के पर्यटन–स्थलों तक पहुंचने की सोची। कई विकल्प सामने थे– एक तो था भुवाली–रानीखेत–अल्मोड़ा,दूसरा था जिम कार्बेट तथा तीसरा था– लेक टूर यानी सातताल–भीमताल–नौकुचियाताल। समय अभी हमारे पास तीन दिन था क्योंकि हमारी वापसी 13 तारीख को थी। इसमें से एक दिन अभी हम नैनी झील के लिए रखना चाह रहे थे और आस–पास थोड़ा घूमना चाह रहे थे और जिम कार्बेट में 1 जून से 14 नवम्बर तक मानसून की वजह से प्रवेश नहीं होता,लेकिन ना–जानकारी की वजह से सही प्लानिंग नहीं हो पाई।
हमारे होटल में ठहरा हुआ एक और परिवार रानीखेत–अल्मोड़ा जाने की प्लानिंग कर रहा था और बोलेरो गाड़ी बुक कर रहा था लेकिन उसे 2500 का किराया महंगा पड़ रहा था सो उसने हमसे शेयर करने की बात की। हमने स्वीकार कर लिया। लेकिन ट्रेवल एजेन्सी वाला बात करने के बाद भी अत्यधिक भीड़ की वजह से गाड़ी उपलब्ध नहीं करा पाया। ऐसा दशहरे की छुट्टी की वजह से हुआ।

Tuesday, January 3, 2017

सातताल

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12 अक्टूबर को हम लेक टूर पर निकले। लेक टूर यानी नैनीताल के अास–पास स्थित झीलों का दर्शन। हमने एक छोटी गाड़ी 1500 रूपये किराये पर ले ली और निकल पड़े। सबसे पहले नैनीताल से लगभग 22 किमी दूर स्थित सातताल। कहते हैं कि सातताल सात छोटी–बड़ी झीलों का समूह है लेकिन यहां के ड्राइवर⁄ट्रैवल एजेण्ट या तो इसकी जानकारी नहीं देते या खुद नहीं जानते। एक और बात भी है और वो यह कि एक बड़ी झील के आस–पास एक–दो छोटी झीलें भी हैं जिनके बारे हर कोई नहीं जानता। बाहर से आने वाले पर्यटक के लिए ऐसी जगहों पर पहुंच पाना असंभव नहीं तो काफी मुश्किल है।
खैर,हमारा मक्सद तो हर उस छोटी–बड़ी जगह तक पहुंचना था जहां तक कि हम पहुंच सकते थे।
एक घण्टे में सातताल पहुंच गये। सातताल की सुन्दरता देखकर मन अभिभूत हो गया। वास्तव में सातताल  में उतनी भीड़–भाड़ और गन्दगी नहीं है। यहां दाे झीलें एक–दूसरे से जुड़ी हुईं हैं और दोनों के संगम पर पुल बना हुआ है। किनारे के दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि इसी में चार भाग हैं अर्थात सातताल की सात झीलों में से चार इसी में हैं और बाकी तीन और कहीं हैं। हमारा ड्राइवर,जो अपने को गाइड बता रहा था,को तो इतना भी नहीं पता था।

Monday, January 2, 2017

नैनीताल भ्रमण

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9 अक्टूबर को यानी नैनीताल पहुंचने के अगले दिन हमने स्नो व्यू प्वाइंट तक पैदल चलने का निश्चय किया और चल दिये। बिल्कुल सही रास्ता पता नहीं था अतः पूछते हुए चल दिये। एक दिन पहले टैक्सी से भी हम यहां पहुंच चुके थे लेकिन इन पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर टैक्सीवाला किधर से वहां पहुंचा,समझ में नहीं आया। वैसे बहुत ज्यादा पूछने की आवश्यकता भी नहीं थी। माल रोड पर ही चिड़ियाघर जाने के लिए छोटी गाड़ियों का स्टैण्ड है और वहीं से ऊपर चढ़ाई करते हुए एक सड़क गई है जिसपर कुछ दूर आगे जाने पर स्नो व्यू प्वाइंट जाने वाला रास्ता बायें कट जाता है और दाहिने का रास्ता चिड़ियाघर चला जाता है। सुबह के लगभग आठ बजे हम निकले और पैदल टहलते हुए 10.30 बजे तक अर्थात लगभग ढाई घंटे में ढाई किमी की दूरी तय कर ली। 
अब नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाला मुहावरा कैसे बना यह तो नहीं पता लेकिन शायद कोई ऐसा ही चलने वाला बहादुर रहा होगा जिसकी चाल पर यह मुहावरा बन गया।