Friday, January 19, 2018

अल्मोड़ा

20 अक्टूबर
त्योहारों का आनन्द घर पर तो सभी लेते हैं। लेकिन ट्रेन में इसका मजा ही कुछ और होता है। और उस पर भी जब दुनिया घूमने का जुनून सिर पर सवार हो तो फिर कहाँ का त्योहार और कहाँ की व्यस्तता। ये तो वो तराना है जो नींद में भी सपने बनकर गूँजता रहता है। घुमक्कड़ी में त्योहार मनाने से कम मजा आता है क्याǃ तो मेरे मन में भी घुमक्कड़ी का तराना ऐसा गूँजा कि दीपावली के दिये जलाने के बाद अगले दिन मैं उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध शहर अल्मोड़ा के लिये निकल पड़ा।
वैसे प्लानिंग तो काफी पहले की थी। अल्मोड़ा जाने के लिए मैंने हावड़ा से काठगोदाम जाने वाली बाघ एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया था। मेरा रिजर्वेशन देवरिया से था। दीपावली के अगले दिन का समय था। रास्ते में बस या अन्य गाड़ियां मिलने में दिक्कत होने का अंदेशा था तो घर से देवरिया तक की 75 किमी की दूरी मैंने बाइक से ही नाप दी।
अपने मित्र नीरज के घर बाइक रखी और देवरिया रेलवे स्टेशन पहुँच गया। ट्रेन का समय तो 4.50 है लेकिन यह आयी 5.25 पर। भारतीय रेल के लिए इतनी देरी तो सर्वथा क्षम्य है। उस पर भी हम भारतीय काफी क्षमाशील हैं। दीपावली की वजह से ट्रेन में भीड़ भाड़ कम थी। दीपावली के दिये जलाने के बाद लोग–बाग आज गोवर्धन पूजा में व्यस्त थे और मैं अपनी ट्रेन यात्रा में ही मस्त था। जिसकी जहाँ लग जाय वहीं मस्ती है। मैं स्लीपर में हमेशा ऊपर की बर्थ चुनता हूँ। क्योंकि नीचे कितना भी भूचाल आये,ऊपर उसका असर नहीं पड़ता। उस पर भी अगर भीड़ न हो तो भूचाल वगैरह की सम्भावना वैसे ही नगण्य हो जाती है। तो ऊपर चढ़कर सोने वाले के लिए ऐसी परिस्थिति में आनन्द ही आनन्द है।
रात का खाना मैंने घर से ही पैक करा लिया था अतः इस ओर से मैं सर्वथा निश्चिन्त था। ट्रेन चली तो थोड़ी–बहुत देर सबेर के अलावा कोल्हू के बैल की तरह ठीक–ठाक चलती रही और बिना किसी विशेष घटना–परिघटना–दुर्घटना के अगले दिन सुबह लगभग अपने नियत समय पर 9.30 बजे काठगोदाम पहुँच गयी। काठगोदाम तक इसका टाइम–मार्जिन रेलवे ने ऐसा रखा है कि आधे–पौने लेट रहने पर भी यह काठगोदाम पहुँचते–पहुँचते अपना समय मेण्टेन कर लेती है और रेलवे अपनी देरी को बड़ी आसानी से छ्पिा लेता है।
21 अक्टूबर
काठगोदाम स्टेशन से बाहर निकलने पर मुझे भोजन से अधिक बस की चिन्ता थी। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 4-5 मिनट की पैदल दूरी पर परिवहन निगम का वर्कशाप तो है लेकिन बस–स्टेशन नहीं। पता नहीं और भी कहीं ऐसा है क्याǃ मैं इस तथ्य के बारे में भ्रम में था। नैनीताल की एक यात्रा के दौरान इस स्थान से गुजरते हुए मैंने इस वर्कशाप को ही बस–स्टेशन समझ लिया था। और वही बात अभी भी मेरे दिमाग में थी। इस यात्रा में जब मैं बस पकड़ने के लिए उस स्थान पर पहुँचा तो वास्तविकता का पता लगा। काठगोदाम के लिए बस–स्टेशन हल्द्वानी में ही है। वैसे इससे कोई समस्या नहीं थी। हल्द्वानी से आने वाली बस इसी रास्ते से होकर जायेगी। या फिर अगर दिक्कत महसूस हो तो बस पकड़ने के लिए आटो के सहारे हल्द्वानी भी जाया जा सकता है। वर्कशाप के पास खड़े एक व्यक्ति,जो रोडवेज का ही कर्मचारी लग रहा था,ने मुझे हल्द्वानी जाने की सलाह दी। तो मैंने भी देर नहीं की और झट से हल्द्वानी के लिए आटो पकड़ ली। अंजान जगह पर इस तरह का कोई सलाहकार मिलना भी बड़ी बात है। दूरी काेई खास नहीं है। केवल 5 किलोमीटर।

10 बजे मैं काठगोदाम से वापस हल्द्वानी बस स्टेशन पहुँच गया मानो लौट के बुद्धू घर को आये। वहाँ पता चला कि अभी अल्मोड़ा के लिए रोडवेज की कोई बस नहीं है यानी पासा उल्टा पड़ गया। दिमाग चकरा गया। सोचा कि बाहर निकलकर कुछ पेटपूजा ही कर लूँ। स्टेशन से बाहर निकला तो एक प्राइवेट बस अल्मोड़ा के लिए निकलने की तैयारी में थी। मुझे भी आसानी से जगह मिल गयी। 10.15 बजे बस अल्मोड़ा के लिए प्रस्थान कर गयी। एक बात के फायदे में मैं था और वो ये कि अगर मैं काठगोदाम में ही बस का इंतजार करता तो बस भले ही मिल जाती,बैठने की जगह नहीं मिलती। हल्द्वानी से काठगोदाम तक लाेग बस में चढ़ते रहे और जल्दी ही बस फुल हो गयी।
हल्द्वानी से अल्मोड़ा की दूरी 92 किमी तथा बस का किराया 125 रूपये है। बस चली तो चलती ही गयी। लगभग ढाई घण्टे चलने के बाद पौने एक बजे कोसी नदी के किनारे एक स्थान पर चाय–पानी के लिए रूकी। उत्तराखण्ड की ऐसी जगहें काफी सुन्दर दिखतीं हैं। सड़क के किनारे पत्थरों से लड़ती–झगड़ती,शोर मचाती नदी,नदी के किनारे दीवार की तरह खड़े पहाड़,पहाड़ों काे हरे रंग में रंगते पेड़,पेड़ों के बीच में दूर–दूर बने छोटे–छोटे घरों से मिलकर बसा गाँव,गाँव के किनारे बने पतले–पतले सीढ़ीदार खेत,सड़क के पास वाले सीढ़ीदार खेत के मुहाने पर बना कोई छोटा सा रेस्टोरेण्ट,रेस्टोरेण्ट के पास आकर खड़ी कोई बस। और बस खड़ी हुई तो भूख के मारे पेट में खलबली मची थी। दो–तीन चाय पकौड़ी की दुकानें दिख रहीं थीं। और कुछ न सूझा तो 20 रूपये की आलू की पकौड़ियों पर ही हाथ साफ कर दिया। अल्मोड़ा पहुँचने के लिए इतना काफी था। कहीं बस निकल न जाये,इस सोच में जल्दी–जल्दी पकौड़ियां को मुँह के अंदर घुसेड़क कर बाहर निकला तो बस के बाकी यात्री अभी दूसरी दुकानों में मुँह चला रहे थे। महिलाएं हमेशा की तरह बस के अन्दर ही बैठी थीं शायद उनको भूख–प्यास कम लगती है। मैंने मौके का फायदा उठाया और सड़क पर थोड़ा आगे बढ़कर कोसी नदी के सुन्दर नजारों की फोटोग्राफी करने लगा। इस तरह के फालतू काम करने वाला मैं अकेला था क्योंकि बाकी यात्री तो पेट"पूजा" जैसा शुभ कार्य करने में ही व्यस्त थे।
2 बजे बस अल्मोड़ा बस स्टैण्ड पहुँच गयी। बस से उतरकर सड़क पर निकला तो लगा कि कहीं वीराने में आ गया हूँ। यह दीपावली का असर था। अधिकांश दुकानें व होटल बन्द थे। इक्का दुक्का लोग ही सड़क पर दिख रहे थे। 5100 फीट की ऊँचाई पर स्थित अल्मोड़ा में हल्की–हल्की ठंड महसूस हो रही थी। मैं सड़क पर अपने घसीटू बैग को घसीटते हुए होटल खोजने लगा। होटल दिख तो रहे थे लेकिन सबके गेट पर ताले लटके दिख रहे थे। लग रहा था कि इनमें से किसी का ताला मुझे ही तोड़ना पड़ेगा। रेस्टोरेण्ट के बोर्ड दिख रहे थे लेकिन उनके अन्दर आदमी नाम के जीव का कहीं अता–पता नहीं था। आधे घण्टे इधर उधर भटकने के बाद मुझे एक बहुत ही अच्छा होटल मिल गया। सिंगल रूम था ही नहीं। डबल रूम ही 300 में मिल गया। सबकुछ तो ठीक था लेकिन पानी की समस्या थी। कनेक्शन था लेकिन पानी की सप्लाई नहीं आ रही थी। होटल के रिशेप्सनिस्ट जो कि होटल का मैनेजर और चपरासी भी था,से माँगने पर बाल्टी भरकर पानी मिला। पानी देते समय उसने मुझसे चाय के बारे पूछा तो मैंने हाँ कर दी। उसने कहा कि आप नहाइए तबतक मैं चाय बनाता हूँ। पानी इतना ठण्डा था कि नहाने की इच्छा जाती रही। शरीर का शुद्धिकरण बस कर लिया। कमरे से बाहर निकला तो चाय इंतजार कर रही थी। मेरे आई.डी. प्रूफ की फोटो कापी करनी थी लेकिन बाहर फोटो कापी की दुकानें बंद थीं और होटल का इंकजेट प्रिंटर ठीक से काम नहीं कर रहा था। मैंने उसे भी ठीक किया। सारा काम तेजी से निपटाकर तीन बजे मैं कमरे से बाहर निकल गया। इससे पहले होटल मैनेजर,जो अल्मोड़ा के पास के ही एक गाँव का रहने वाला था,से मैं अल्मोड़ा और उसके आस–पास की घूमने लायक जगहों के बारे में जानकारी लेना नहीं भूला। बिचारा था बहुत अच्छे स्वभाव का। 

आज समय कम था। फिर भी मैंने कटारमल के सूर्य मंदिर जाने की योजना बना ली। प्राइवेट बस स्टैण्ड से लगभग 200 मीटर आगे अर्थात उत्तराखण्ड रोडवेज के स्टेशन के पास ही एक पेट्रोल पम्प है जिसके आस– पास और सड़क पर जीप और टैक्सियां मंडरा रहीं थीं। होटल के कर्मचारी ने बताया था कि वहीं से कटारमल के लिए गाड़ियां मिलेंगी। ऐसी ही दो चार शेयर्ड गाड़ीवालों से मैंने कटारमल के बारे में पूछा तो पता चला कि उनमें से एक कटारमल जा रहा था। उसकी गाड़ी फुल हो चुकी थी और सबसे पीछे एक सीट खाली थी। मैं पीछे बैठने में हिचकिचाया तो उसने मजबूर होकर आगे की सीट पर जगह बनायी। 3.15 बजे गाड़ी कटारमल के लिए रवाना हो गयी। अब मैंने अपने बगल मैं बैठे एक लड़के और ड्राइवर से कटारमल के बारे में जानकारी लेनी शुरू की। पहला सवाल तो यही था कि वापसी में मुझे कोई गाड़ी मिल पायेगी कि नहीं। दोनाें मुझे आश्वासन तो दे रहे थे कि गाड़ी मिल जायेगी लेकिन उनके बात करने के तरीके से मुझे कुछ संदेह लग रहा था। ड्राइवर से मुझे ज्ञात हुआ कि अल्मोड़ा से 11 किमी की दूरी पर कोसी नामक एक स्थान है जिसका किराया 30 रूपये है। उसकी गाड़ी कोसी तक ही जा रही थी। कटारमल कोसी से दो–ढाई किमी ऊपर स्थित है जहाँ पैदल चढ़ाई करनी पड़ेगी।
मुझे यहीं डर लग रहा था। अभी मैं कोसी जाऊँगा और वहाँ से कटारमल की चढ़ाई करूँगा। पता नहीं कैसी चढ़ाई हैǃ फिर वापस कोसी आकर अल्मोड़ा के लिए गाड़ी पकड़नी पड़ेगी। छुटि्टयों का समय है। पता नहीं गाड़ियां मिलेगीं या नहींǃ लेकिन अब तो तीर कमान से निकल चुका था।

3.45 पर मैं कोसी पहुँच गया। गाड़ी से उतर कर मैं तीर की तरह भागा। रास्ता पता करने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई। जहाँ से चढ़ाई शुरू करनी है उस स्थान पर पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड लगा है। शुरूआत में तो कुछ सीढ़ियां हैं लेकिन ऊपर केवल पगडंडी। कहीं वह भी नहीं। केवल पत्थर। हाँ रास्ता समझ में आता रहता है कि किधर जाना है। लेकिन चढ़ाई तीखी है। कहीं भी दम लेने का अवसर नहीं है। विडंबना यह कि ऐसे रास्ते पर मैं बिल्कुल अकेला हूँ। साथ देने वाला कोई है तो बन्दरों का झुण्ड जिनसे साथ कम और डर ज्यादा लगता है। कहीं–कहीं झाड़–झंखाड़ से घिरा सँकरा रास्ता है तो कहीं चीड़ के पेड़ों के बीच में से। जंगल के बीच में इस तरह चलना अच्छा लगता है। ऊपर पहुँचकर पता चला कि मन्दिर तक जाने के लिए पक्की सड़क भी बन रही है जो मन्दिर से लगभग आधा किमी पहले तक जायेगी। अधबनी सड़क पर भी कुछ लोग गाड़ियां लेकर पहुँचे हैं जो धूल उड़ाने के लिए काफी है।
मैंने काफी तेज चढ़ाई की थी। लगभग दौड़ते हुए। बहुत जोर की प्यास लग गई थी। एक जगह बैठकर बैग में से पानी की बोतल निकालने की कोशिश की तो पता चला कि बगल के पॉकेट से बोतल कहीं रास्ते में ही गिर गयी है। गला सूख रहा था तो जेब में रखे चॉकलेट से उसे गीला करने की असफल कोशिश करने लगा। मन्दिर से कुछ पहले जनरल स्टोर की एक दो दुकानें हैं जहाँ से मैंने एक बोतल पानी खरीदी। मैंन सोच रखा था कि अब बगल के पॉकेट में बोतल नहीं रखूँगा। इसलिए बैग के अन्दर बोतल रखने के लिए जब मैंने बैग खोला तो मेरी पहले वाली बोतल बैग के अन्दर रखी मिली। लगा कि बोतल भी मेरे साथ मजाक कर रही है।
लगभग आधे घण्टे पैदल चलने के बाद मैं कटारमल के सूर्य मन्दिर पहुँच चुका था। कटारमल पहाड़ी के ऊपर बसा एक छोटा सा गाँव है। शाम का समय होने के कारण मन्दिर पर पीछे की ओर से प्रकाश पड़ रहा था। वहाँ एक परिवार जो 12-15 की संख्या में अपने समस्त बन्धु–बान्धवों एवं सगे–सम्बन्धियों सहित आया हुआ था,मन्दिर पर पूरी तरह से कब्जा किये था। कोई मन्दिर के गर्भगृह पर कब्जा किये था तो कोई प्रवेश द्वार पर ही अपना अाधिपत्य जमाए हुए था। कोई ग्रुप फोटो खींच रहा था तो कोई सेल्फी। मेरे लिए कोई जगह ही नहीं बची थी। पाँच–सात मिनट तक तो मैंने उनको झेला लेकिन उसके बाद जब सहन नहीं हुआ तो उन्हें धकियाना शुरू किया यानी उन्हीं के बीच में खड़े होकर मैंने भी फोटाे खींचना शुरू किया। मेरे इस उपाय से कुछ राहत मिली और वे लोग किनारे होने लगे।

बड़ादित्य के नाम से प्रसिद्ध यह सूर्य मन्दिर कुमाऊँ क्षेत्र के विशालतम और ऊँचे मन्दिरों में से एक है। इस मन्दिर का निर्माण सम्भवतः मध्यकालीन कत्यूरी नरेश कटारमल द्वारा कराया गया था जो उस समय मध्य हिमालयी क्षेत्र में शासन कर रहे थे। यह मन्दिर पूर्वाभिमुख है। मन्दिर में पद्मासन लगाये हुए सूर्य की मूर्ति स्थापित है। यहाँ विभिन्न समूहों में लगभग 45 छोटे–बड़े मन्दिरों का निर्माण अलग–अलग काल में किया गया है। मुख्य मन्दिर की संरचना त्रिरथ है जिसका गर्भगृह वर्गाकार है। वास्तु लक्षणों एवं स्तम्भों पर उत्कीर्ण अभिलेखों के आधार पर इस मन्दिर का निर्माण काल तेरहवीं सदी माना जाता है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार उत्कीर्णित काष्ठ से निर्मित था जो वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में प्रदर्शित किया गया है। कहते हैं कि हिमालय के समस्त देवी–देवता इस मन्दिर में पूजा–अर्चना करने के लिए एकत्रित होते हैं।
लगभग आधे घण्टे का समय मन्दिर परिसर में बिताने के बाद मैं वापस मुड़ चला। पौने पाँच बज रहे थे। लेकिन पहाड़ की शाम। लग रहा था कि जल्दी ही अँधेरा हो जायेगा। मैं तेजी से भागता हुआ नीचे उतरा। सवा पाँच बज गये। भूख महसूस हो रही थी लेकिन प्राथमिकता गाड़ी की थी। कोसी छोटा बाजार है। गाड़ी खोजने की तेजी में मैं दस मिनट के अंदर कोसी के दो–तीन चक्कर लगा गया लेकिन अल्मोड़ा जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं मिली। गाड़ियां तो आठ–दस दिख रही थीं लेकिन सारी की सारी रिजर्व थीं। सबसे मैं पूछ गया लेकिन कोई मुझे ले जाने को तैयार नहीं हुआ। अब बुरा फँसा। हार मानकर एक ड्राइवर के पीछे पड़ गया। बिचारा काफी सहृदय था। मुझे ज्यादा रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ी। पीछे की सीट पर मुझे भी जगह मिल गयी। मैंने कटारमल के सूर्यदेव को धन्यवाद दिया। अब अल्मोड़ा तो पहुँच ही जाऊँगा।
गाड़ी चली तो 6.15 तक अल्मोड़ा पहुँच गयी। लेकिन यह गाड़ी अल्मोड़ा के रोडवेज बस स्टैण्ड न जाकर धारानौला बस स्टैण्ड चली गयी। ड्राइवर ने 40 रूपये किराया माँगा तो मैंने बिना अधिक सोच–विचार किये किराया चुका दिया। अब मुझे अपने होटल पहुँचने के लिए फिर से रास्ते की पूछताछ करनी थी। वैसे इस पूछताछ से अधिक कठिन तो रास्ता ही था क्योंकि धारानौला नीचे है और अब मुझे चढ़ाई चढ़नी थी। आधे घण्टे के अन्दर ही मैं होटल के पास पहुँच गया। अब भोजन की तलाश थी क्योंकि अधिकांश रेस्टोरेण्ट बन्द थे। उसपर भी कोढ़ में खाज यह कि मुझे शाकाहारी ही चाहिए। जो भी इक्का–दुक्का रेस्टोरेण्ट खुले थे वहाँ दूर से ही अण्डे रखे दिख रहे थे जो मेरे कदमों पर ब्रेक का काम कर रहे थे। एक रेस्टोरेण्ट मिला जो दीपावली और उसके अड़ाेसी–पड़ोसी त्योहारों की छुट्टी के बाद आज ही खुल रहा था और उसका स्टाफ अपने लिए खाना बना रहा था। मैं भी उसी में शामिल हो गया। सब कुछ निपटाने के बाद 7.30 बजे तक जब मैं अपने होटल पहुँचा तो होटल का स्टाफ मेरी चिन्ता में दुबला हुआ जा रहा था। यह जायज भी था। दूर देश से आया हुआ मैं अंजान पथिक अकेला होटल में ठहरा था और वो भी शाम के वक्त ऐसी जगह चला गया था जहाँ से लौटने में दिक्कत आ सकती थी। लेकिन जब मैं सही सलामत पहुँचा तो होटल का स्टाफ भी मेरी दाद दिये बिना न रह सका। मेरे चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।


कटारमल का सूर्य मंदिर


पहाड़ी पर कटारमल जाने वाला रास्ता

सबको धकिया कर मैंने अकेले ही मंदिर पर कब्जा कर लिया





कटारमल के सूर्य मंदिर से अल्मोड़ा शहर का विहंगम दृश्य


कटारमल के रास्ते में चीड़ के पेड़ों से लीसा निकालने के लिए चाकू से लगाये गये चीरे और उनसे बहता दूध




कोसी नदी


अल्मोड़ा रोडवेज बस स्टेशन का टाइम टेबल



अगला भाग ः जागेश्वर धाम
सम्बन्धित अन्य यात्रा विवरण–
1. अल्मोड़ा
2. जागेश्वर धाम
3. बागेश्वर
4. कौसानी–गाँधीजी के साथ एक रात


10 comments:

  1. अबकी बार यहां भी जाते है अपुन भी,
    शाकाहारी के चक्कर में बिस्कुट ही एकमात्र सहारा है जो हर समय बैग में होना ही चाहिए।

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    1. बिस्कुट कब तक साथ निभायेगा जी। कहीं कहीं शाकाहार की भीषण समस्या आ जाती है।
      धन्यवाद।

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  2. ब्रजेश जी अच्छी जानकारी दी है पोस्ट में । मेरा भी अगले महीने यहां जाने का विचार है ।देखो शायद बन जाये ।
    मेरा भी एक ब्लॉग है कभी पधारो 😊
    http://nareshsehgal.blogspot.in

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद नरेश जी। आगे भी आते रहिए। अभी आपसे सम्पर्क नहीं हुआ था। आपका ब्लॉग मैंने अभी देखा है। एक–दो दिन में ठीक से देखता हूँ।

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  3. कटारमल बहुत अच्छी जगह है मेरा तो घर ही अल्मोड़ा है तो सभी जगहें करीब से देखी हैं

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    1. धन्यवाद जी। मुझे पता नहीं था नहीं तो आपसे जानकारी जरूर लिया होता।

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  4. बेहतरीन व दिलचस्प लेखन। क्या अाप कसारदेवी भी गए थे?

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  5. बेहतरीन व दिलचस्प लेखन। क्या अाप कसारदेवी भी गए थे?

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. ब्रजेश जी बहुत ही अच्छा लगा आपका ब्लॉग पढ़के। एक बार कई साल पहले अल्मोड़ा गया था पर जानकारी के अभाव में कुछ भी घूम नहीं पाया था। लगा अल्मोड़ा बेकार जी जगह है। पर अब लगता है दोबारा जाना पड़ेगा। आप बलिया के है जान के अच्छा लगा। मैं भी गोरखपुर का हूं। कभी समय निकाल के मेरा भी ब्लॉग देखिएगा

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