Friday, January 26, 2018

जागेश्वर धाम

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22 अक्टूबर
आज मैं जागेश्वर धाम जा रहा था। रात में जल्दी सो गया था फिर भी घर से काठगोदाम तक की यात्रा और कटारमल के सूर्य मन्दिर तक की भागदौड़ में इतना थक गया था कि सुबह उठने में साढ़े पाँच गये। अल्मोड़ा के इस होटल में,जिसमें मैं ठहरा था,पानी की सप्लाई आज भी नहीं आ रही थी। शायद पानी भी दीपावली की छुट्टी पर था या फिर गुलाबी ठण्ड के आगमन की तैयारी कर रहा था। मैंने होटल मैनेजर से पूछा तो उसने बताया कि दो–दो कनेक्शन हैं और दोनाें में पानी नहीं आ रहा है। उसने यह भी जानकारी दी कि मैंने कल कटारमल जाने के लिए जहाँ से चढ़ाई शुरू की थी अर्थात कोसी,उसी कोसी से उसकी पानी की सप्लाई आती है।
बिचारा कहीं से एक बाल्टी पानी का जुगाड़ करके लाया। पानी की ऐसी ही समस्या मैंने दार्जिलिंग में देखी थी। वहाँ टैंकरों से भर कर पानी लाया जाता है। ठण्डे मौसम की वजह से इच्छा तो नहीं थी फिर भी मैंने नहाने की कोशिश की। पानी इतना ठण्डा था कि जल्दी में नहाने की क्रिया पूरी करनी पड़ी। वैसे भी रोज–रोज नहाना साधु–संतों को ही शोभा देता है।
6.45 बजे मैं होटल से बाहर निकल गया। कल वाली ही जगह अर्थात रोडवेज बस स्टेशन के थोड़ा आगे स्थित पेट्रोल पम्प के पास गाड़ियों का जमावड़ा लगा था। मैंने होटल में ही यह पता कर लिया था कि जागेश्वर जाने के लिए पिथौरागढ़ जाने वाली गाड़ी पकड़नी पड़ेगी और रास्ते में आरतोला नामक स्थान पर उतरना पड़ेगा। रिजर्व जाने वाली काफी गाड़ियां लगी थीं लेकिन मैं शेयर्ड गाड़ी की तलाश में था। एक खाली गाड़ी,जो पिथौरागढ़ जा रही थी,में मुझे जगह मिली। पूरी गाड़ी खाली थी और मैं आगे की सीट पर बैठना चाह रहा था लेकिन ड्राइवर ने बताया कि आगे की सीटें पिथौरागढ़ जाने वाले यात्रियों के लिए पहले से बुक हैं। ठीक भी है। दूर जाने वाले को वरीयता मिलनी ही चाहिए। मुझे भी इच्छा हुई पिथौरागढ़ चलने की लेकिन फिर अल्मोड़ा के आस–पास छूट जाता। 7.15 बजे गाड़ी फुल होकर पिथौरागढ़ के लिए रवाना हो गयी। मुझे आरतोला तक ही जाना था जो अल्मोड़ा से 33 किमी दूर है। किराया 60 रूपये। मुझे बताया गया था कि आरतोला से जागेश्वर के लिए गाड़ियां जाती हैं। आरतोला से जागेश्वर 3 किमी दूर है।

मैं 8.30 बजे आरतोला पहुँच गया। इक्का–दुक्का दुकानें दिख रहीं थीं। किसी भी आकार–प्रकार की गाड़ी का कोई अता–पता नहीं था। तो अब बस एक ही विकल्प बचता था। एक दुकान पर मैंने चाय पी और पैदल जागेश्वर के लिए चल दिया। कुछ दूर जाने पर एक स्थानीय व्यक्ति के रूप में एक सहयात्री मिल गया। यह सहयात्री भी जागेश्वर जा रहा था। हम दोनों आपस में परिचय और बातें करते हुए चल पड़े। दस मिनट बाद ही हमारी किस्मत चमकी। मेरे सहयात्री का कोई परिचित मिल गया जो अपनी चारपहिया गाड़ी से जागेश्वर जा रहा था। बस फिर क्या था। अगले ही पल हम दोनों चारपहिया गाड़ी में सवार हो गये। अगले 5-7 मिनट में मैं जागेश्वर मन्दिर पहुँच गया। आरतोला से जागेश्वर धाम तक का रास्ता बहुत ही मनोहारी है। मन्दिर के आस–पास का क्षेत्र तो और भी सुन्दर है। चारों तरफ देवदार के पेड़ और हरियाली एक दूसरे का साथ निभाते हुए छाये हुए हैं। हाँ ये अलग बात है कि रास्ते में और मन्दिर के पास भी सुन्दरता को नष्ट कर बदसूरत बनाने का कुप्रयास शुरू हो चुका है। होटलों और भवनों का निर्माण,पता नहीं वैध है या अवैध,कई जगहों पर जारी है।
अभी सुबह के नौ बज रहे थे  और मन्दिर में बेरोजगारों की तरह केवल पुजारियों की ही भीड़ थी। दर्शनार्थियों की भीड़ अभी थोड़ी देर में होने वाली थी। मन्दिर के बाहर बने निःशुल्क जूता–चप्पल स्टैण्ड को अपनी चरण पादुकाएं समर्पित कर मैं भी बेरोजगार पुजारियों की तरह मन्दिर परिसर में टहलने लगा। पीठ पर लदे बैग और गले में झूलते कैमरे की वजह से कोई भी पुजारी मेरे पास नहीं फटका। अजीब सा प्रतिकर्षण है। शायद वे किसी अन्य प्रकार के मनुष्य की तलाश में थे। या फिर किसी दिव्य दृष्टि से उन्हें पता चल गया हो कि मैं भी पण्डित हूँ। बिना किसी विघ्न–बाधा के मैं आधे घण्टे से अधिक समय तक मन्दिर परिसर में घूमता रहा। परिसर में धीरे–धीरे दर्शनार्थियों और पूजार्थियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कोई सिर्फ दर्शन करने आया था तो कोई हवन करने। कोई सेल्फी खींचने आया था तो कोई पिकनिक मनाने। कोई मूर्ख बनने आया था तो कोई बनाने। मुझे इनमें से कुछ नहीं करना था सो मैं केवल घूम रहा था और देख रहा था।

और इस बीच मंदिर में जमे हुए सारे अर्थियों को धता बता कर,कोई वास्तविक अर्थी भी जीवित मनुष्यों को बेवकूफ बनाते हुए उनके कन्धों पर सवार होकर मंदिर की ओर आ रही थी। मेरी उत्सुकता बढ़ गयी। मंदिर में तो जीवित लोग आते हैं। यहाँ मुर्दाें का क्या कामǃ

मन्दिर परिसर से बिल्कुल सटकर एक छोटी सी नदी प्रवाहित होती है। इस नदी के किनारे स्थानीय लोग शवदाह क्रिया करते हैं। संयोग से उस दिन भी इस कार्य के लिए लोग बड़ी संख्या में मंदिर के पास पहुँच रहे थे। इनकी संख्या मंदिर में दर्शन–पूजन–हवन–पर्यटन–भ्रमण करने के लिए आये हुए सभी मनुष्यों से काफी अधिक थी। मंदिर से निकलकर मैं उस ओर बढ़ गया। इस कार्य हेतु नियत स्थान के आस–पास नदी की सँकरी धारा में चिता की जली–अधजली लकड़ियों का अम्बार लगा था। नदी की धारा मृत आत्माओं को भले ही मोक्ष प्रदान कर देती हो पर इन अधजली लकड़ियों को मुक्ति प्रदान करने में तो अक्षम ही दिख रही थी।नदी की धारा के उस पार जाने के लिए एक छोटा सा पुल बना हुआ है क्योंकि उस पार भी एक छोटा सा मन्दिर है। इसका नाम कुबेर मंदिर है। कुबेर मंदिर के पास चंडिका मंदिर नाम का एक और मंदिर भी है।
जागेश्वर धाम एक मन्दिर न होकर अनेकों मन्दिरों का एक समूह है। इसमें पार्वती,हनुमान,मृत्युंजय महादेव,भैरव,केदारनाथ,दुर्गा इत्यादि के मंदिर सम्मिलित हैं। मुख्य मंदिर महामृत्युंजय शिव का है। यह मंदिर सबसे विशाल तथा प्राचीनतम है। मन्दिर के पास लगे एक लेख से ज्ञात हाेता है कि यह मन्दिर कैलाश मानसरोवर जाने वाले प्राचीन मार्ग पर स्थित है तथा भगवान शिव के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक है। वैसे अधिकांश स्रोतों में जागेश्वर के शिवलिंग के स्थान पर द्वारिकापुरी के पास स्थित नागेश नाम के शिवलिंग को ही ज्योर्तिलिंग माना गया है। अब वास्तविकता क्या है,मुझे इस विवाद में नहीं पड़ना। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इस स्थान का भ्रमण किया तथा इस स्थान के महत्व को पुनर्स्थापित किया। यह भी मान्यता है कि लिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा का आरम्भ यहीं से हुआ। जागेश्वर मन्दिर समूह में छोटे–बड़े 125 मंदिर स्थित हैं जिनका निर्माण 7वीं से 8वीं सदी के मध्य हुआ। ये मंदिर भगवान शिव तथा अन्य देवी–देवताओं को समर्पित हैं। वैसे कई छोटे–छोटे मंदिरों में अन्दर देखने पर मुझे कोई भी प्रतिमा दिखाई नहीं पड़ी। इन मंदिरों का निर्माण यहाँ 7वीं से 14वीं सदी तक शासन करने वाले कत्यूरी राजाओं ने कराया।
जागेश्वर घाटी समुद्रतल से 1870 मीटर या 6135 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यह ऊँचे पहाड़ों के बीच में स्थित एक सँकरी घाटी है जहाँ थोड़ी सी आबादी और एक छोटा सा बाजार है।
जागेश्वर में एक संग्रहालय भी है। यहाँ 1995 में एक मूर्ति शेड बनाया गया था जिसे सन 2000 में संग्रहालय में बदल दिया गया। जागेश्वर क्षेत्र में मुख्य जागेश्वर धाम के अलावा इतने मंदिर हैं कि इसे कुमायूँ की काशी के नाम से भी जाना जाता है।
मन्दिर परिसर में काफी समय बिताने के बाद मैं बाहर निकला। देवपूजा के बाद पेटपूजा भी आवश्यक है। देवदर्शन के बाद अन्नदर्शन। मन्दिर के आस–पास दर्शनार्थियों की सहूलियत के लिए कुकुरमुत्ते की तरह से दुकानें उग आयी हैं। मैं भी एक ऐसी ही जगह तीस रूपये प्लेट वाले छोले–परांठे के लालच में पड़ गया। परांठे तो फिर भी ठीक थे लेकिन मटर का छोला गले के नीचे नहीं उतर रहा था। उसे धक्के देकर अन्दर करना पड़ा।

10.10 बजे मैं वापस हो लिया। मन्दिर से वापस आरतोला या अल्मोड़ा जाने के लिए मेरी तरह कोई भी जल्दी में नहीं था क्योंकि यहाँ आने वाले सभी लोग पूरे भक्तिभाव से हवन–पूजन में संलग्न थे तो फिर कोई गाड़ी भी वापस नहीं जानी थी। मैं अपने जूतों पर सवार हुआ और आरतोला की तरफ चल पड़ा। चूँकि मैं पैदल लौट रहा था तो जागेश्वर से लगभग एक किमी पहले या आरतोला की तरफ एक और मंदिर दिखा– दण्डेश्वर मंदिर। यहाँ भी एक मुख्य मंदिर है तथा इसके आस–पास कई छोटे–छोटे मंदिर हैं। यहाँ कोई दर्शनार्थी नहीं था। मैं अकेला ही मंदिर में गया। चूँकि मैं पैदल आ रहा था और धूप भी अच्छी–खासी हो चुकी थी,इसलिए स्वेटर मुझे परेशान कर रहा था फिर उसे बैग में रखकर पीठ पर ढोने से अच्छा तो शरीर पर ही ढोना था।
रास्ते में एक जगह एक अनोखी तकनीक दिखी। पहाड़ के लोग इसका अक्सर इस्तेमाल करते होंगे लेकिन मेरे लिए यह नयी चीज थी। पहाड़ से रिसकर नीचे गिरते पानी को इकट्ठा करने के लिए एक बित्ते भर का पाइप पत्थरों के लम्बवत लगा दिया गया था। अब जो पानी रिसकर नीचे गिर रहा था वह पाइप के सहारे धार के साथ टोंटी की तरह गिर रहा था जिसे आसानी से बाल्टी में इकट्ठा किया जा सकता था।
तीन किमी की दूरी 40 मिनट में तय करते हुए मैं 10.50 तक आरतोला पहुँच गया। अब अल्मोड़ा जाने के लिए गाड़ियों का इन्तजार शुरू हुआ। आज रविवार था और साथ ही दीपावली की छुटि्टयां भी समाप्त हो रही थीं। इसलिए अल्मोड़ा की तरफ जाने वाली गाड़ियों में भारी भीड़ थी। एक–दो बसें मैंने छोड़ दी। चढ़ने की गुंजाइश ही नहीं थी। भीड़ तक तो ठीक था लेकिन पहले गाड़ियां मिलें तब न। इन्तजार करते–करते 45 मिनट बीत गये। इन्तजार करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। तभी एक पिकअप वैन आती दिखी। मैंने इशारा किया तो रूक गयी। पता चला कि यह दूध की सप्लाई करने वाली गाड़ी है और यह अल्मोड़ा के कुछ पहले एन.टी.डी. चौराहे तक ही जाएगी। ड्राइवर से इशारों ही इशारों में निवेदन करके मैं फुर्ती से इसमें सवार हो गया। कई लोग मुँह ताकते रह गये।
रास्ते में ही प्रसिद्ध चितई गोलू देवता का मंदिर है। यह एक पहाड़ी पर स्थित छोटा सा मंदिर है। मंदिर की ऊँचाई से हिमालय की कुछ बर्फीली चोटियां दिखाई देती हैं। मैं भी यहाँ जाने की सोच रहा था लेकिन वापसी में गाड़ी न मिलने का डर सता रहा था। किसी तरह तो यह दूध वाली गाड़ी मिली थी। अल्मोड़ा बस स्टैण्ड से चितई गोलू मन्दिर की दूरी लगभग 7 किमी है। मैं 12.25 तक एन.टी.डी. चौराहे पहुँच गया। एन.टी.डी. चौराहा अल्मोड़ा शहर से लगभग 3 किमी दूर है। इस चौराहे के पास एक मृग विहार भी है। इस चौराहे से पिथौरागढ़ और बागेश्वर जाने वाली सड़कें अलग होती हैं।

अभी आधा दिन शेष था और अब मैं एक और नयी जगह पर जाने के बारे में सोच रहा था। मैंने बिनसर का बहुत नाम सुन रहा था। बिनसर एक वन्य जीव अभयारण्य है और यह अल्मोड़ा से बागेश्वर जाने वाली रोड पर स्थित है। तो बिनसर जाने के लिए मैं बिल्कुल सही जगह पर खड़ा था। अल्मोड़ा से बागेश्वर जाने वाली कोई भी गाड़ी आयेगी तो उसमें सवार होकर मैं बिनसर पहुँच जाऊँगा। बिनसर के बारे में जानकारी मेरे पास कुछ नहीं थी बस मैंने चौराहे से गुजरने वाली गाड़ियों से पूछताछ करनी शुरू कर दी। एक ने बताया कि शेयर्ड में चलेंगे तो आपको बिनसर गेट तक छोड़ देंगे अन्यथा ऊपर जाने के लिए गाड़ी बुक करनी पड़ेगी। मैंने इन्कार कर दिया। कुछ देर इन्तजार करने के बाद मुझे बस मिल गयी।
एक घण्टे में 23 किमी की दूरी तय करते हुए बस पौने दो बजे बिनसर गेट पहुँच गयी। यहाँ जब मैं पहुँचा और पूछताछ की तो लगा कि मैं मूर्ख बन गया हूँ। पता चला कि अभयारण्य,गेट से 11 किमी ऊपर है। लाेगबाग अपनी प्राइवेट गाड़ियां लेकर आ रहे थे और गेट के पास बने काउण्टर से परमिशन बनवाकर ऊपर जा रहे थे। वहाँ बुक करने के लिए कोई गाड़ी भी उपलब्ध नहीं थी। मेरे पास भी चरणदास की जोड़ी थी लेकिन इतना पैदल चलने के लिए काफी समय चाहिए। मैं गेट के पास रखी कुर्सियों पर बैठ गया और गेटकीपर से बातचीत करने लगा। उसने सलाह दी कि किसी प्राइवेट गाड़ी से बात करिए। अगर वो आपके साथ अपनी गाड़ी शेयर करने को राजी होते हैं तो आप भी घूम आयेंगे। मैंने एक–दो लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन असफल हुआ। कौन अपनी प्राइवेट गाड़ी में एक अन्जान आदमी को बैठाता। कहीं चोर–उचक्का ही न हो। हार मानकर मैं गेट के आस–पास ही कुछ देर तक टहलता रहा और अल्मोड़ा जाने वाली एक बस आयी तो मैं उसमें चढ़ गया। बिनसर घूमने का ख्वाब अधूरा ही रह गया। भविष्य में फिर देखा जायेगा।

बस यात्रियों से खचाखच भरी थी और उसमें पैर रखने भर की भी जगह नहीं थी। मैं भी गेट पर झूलते हुए धीरे–धीरे अन्दर सरकता गया। साढ़े तीन बजे तक मैं अल्मोड़ा के धारानौला बस स्टैण्ड पहुँच गया। इस तरह लगभग तीन घण्टे व्यर्थ की भाग–दौड़ में व्यतीत हो गये। अब धारानौला से मैं फिर चढ़ाई करते हुए आधे घण्टे में अपने होटल पहुँचा। 15-20 मिनट में फ्रेश होकर मैं फिर से अल्मोड़ा के भ्रमण पर निकल पड़ा। पता चला कि ब्राइट एण्ड कार्नर अल्मोड़ा का बहुत ही खूबसूरत स्थान है। यहाँ से नदी,घाटी एवं सूर्यास्त का नजारा बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ता है। सीधे मॉल रोड पर ही दो–ढाई किमी की दूरी आधे घण्टे में तय करते हुए मैं पाँच बजे ब्राइट एण्ड कार्नर पहुँच गया। वहाँ अल्मोड़ा की ऊँचाई से घाटियों और उनके पीछे की पहाड़ियों का नजारा बहुत ही मनमोहक दिखाई दे रहा था। सूर्यास्त भी अब होने ही वाला था। और वास्तव में पहाड़ियों के पीछे सूरज को डूबते हुए देखना एक बहुत ही रोमांचक अनुभव था। पहले तो सूरज काफी धीरे–धीरे नीचे जा रहा था लेकिन जैसे ही इसने पहाड़ी पर खड़े पेड़ों को स्पर्श किया,इसके नीचे जाने की गति बढ़ गयी। देवदार के पेड़ों ने इसे भरसक रोकने की कोशिक की लेकिन वे सूरज को नीचे जाने से नहीं रोक सके। अगर ये पहाड़ियां बर्फ से ढकी हुई सफेद होती तो सूरज उन्हें लाल कर देता लेकिन उनकी हरियाली ने उन्हें पूरी तरह लाल होने से बचा लिया और वे आंशिक रूप से ही लाल हो पायीं। मेरे अलावा एक–दो अन्य लाेग भी इस लालिमा को अपनी आँखों में उतार रहे थे।
वैसे यह स्थान केवल अपने सूर्यास्त के लिए ही नहीं प्रसिद्ध है वरन यहाँ रामकृष्ण आश्रम भी है। इस स्थान को विवेकानन्द कार्नर भी कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद मैं भी उदास मन से वापस लौट पड़ा। शाकाहारी भोजन करने में 7.30 बज गये। कुछ–कुछ ठण्ड लग रही थी। थकान भी अच्छी–खासी हो गयी थी तो अब एक मात्र लक्ष्‍य सोना ही था।


जागेश्वर धाम मंदिर


मंदिर के पीछे नदी किनारे अधजली लकड़ियां







दण्डेश्वर मंदिर



अल्मोड़ा के ब्राइट एण्ड कार्नर पर सूर्यास्त


पेड़ों पर टंगा ढलता सूरज
अगला भाग ः बागेश्वर

सम्बन्धित अन्य यात्रा विवरण–
1. अल्मोड़ा
2. जागेश्वर धाम
3. बागेश्वर
4. कौसानी–गाँधीजी के साथ एक रात


2 comments:

  1. यहां जाना अभी बाकी है आदि कैलाश यात्रा के दौरान यहां जायेंगे।

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    1. धन्यवाद जी। बहुत ही आध्यात्मिक एवं सुंदर जगह है।

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